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भारत
राजनीति
लॉकडाउन : हाशिये पर खड़े घुमंतू-बंजारा समुदाय के सामने अस्तित्व का संकट
आज जब देशभर में लॉकडाउन है तो इन लोगों के सामने खाने और रहने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है, चरवाहे अपने पशुओं को चारे के अभाव में जहां-तहां छोड़ने को मज़बूर हैं। स्थायी ठिकाने और कागजों के आभाव में अभी भी सरकारी मदद इनसे कोसो दूर है।
सोनिया यादव
10 Apr 2020
बंजारा समुदाय

‘बिंजारी ए हंस हंस के बोल, आच्छी आच्छी बोल, मीठी मीठी बोल,

दुनिया सूं न्यारी बोल, की बातां थारी रह ज्यासी’

ये गीत बंजारा समुदाय की एक टोली का है, जिसका संदेश है कि बंजारे, सभी लोगों से हंसकर अच्छा-मीठा बोलो, क्योंकि जब एक दिन हम इस दुनिया से चले जाएंगे तब केवल हमारी बातें रह जाएंगी। बंजारा-घुमंतू समुदाय की आवाज़ में रेगिस्तान की आत्मा बसती है, समाज और संस्कृति की विरासत झलकती है लेकिन आज जब देशभर में लॉकडाउन है तो इन लोगों के सामने खाने और रहने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है, चरवाहे अपने पशुओं को चारे के अभाव में जहां-तहां छोड़ने को मज़बूर हैं। स्थायी ठिकाने और कागजों के आभाव में अभी भी सरकारी मदद इनसे कोसो दूर है। ऐसे में इस समुदाय के लोगों की मांग है कि सरकार इनके लिए अलग से राहत अभियान चलाए।

बंजारा या घुमंतू समाज का नाम लेते ही हमारे दिमाग में एक ऐसे समाज की तस्वीर उभरती है जो निरंन्तर घूमते रहते हैं, एक गांव से दूसरे गांव की यात्रा करते हैं, जिनकी एक रंग-बिरंगी संस्कृति और जीवन शैली है। लेकिन लॉकडाउन में इस समुदाय के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस समुदाय के लाखों लोगों के पास न तो बैंक अकाउंट है और नाही कोई स्थायी ठिकाना। देशभर के घुमंतू अलग-अलग मौसमों में एक से दूसरी जगह काम की तलाश में पलायन करते हैं। इसमें कई पशुपालक जातियां भी शामिल हैं जो ऊंट, गधे, भेड़-बकरियों का बड़े स्तर पर पालन करते हैं। फिर इसका व्यापार कर अपना गुजर-बसर करते हैं। फिलहाल इन लोगों के पास न रोज़गार है और न ही पशुओं के लिए आहार।

2011 की जनगणना के अनुसार पूरे भारत में घुमंतू समाज के अंतर्गत 840 समुदाय हैं जिसमें अकेले राजस्थान से 52 समुदाय आते हैं। इसमें नट,भाट, भोपा, बंजारा, कालबेलिया, गड़िया लोहार, गवारिया, बाजीगर, कलंदर, बहरूपिया, जोगी, बावरिया, मारवाड़िया, साठिया ओर रैबारी प्रमुख हैं।

राजस्थान के घुमंतू समदाय के लोग रेगिस्तान के गर्म मिट्टी के धोरों में अपने जहाज यानी ऊंटों को खुला छोड़ने को मज़बूर हैं। क्योंकि लॉकडाउन के चलते उनके पास इन्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं है। यहां भेड़-बकरियां पालने वाले भी निराश हैं, उनका कहना है कि जब उनके खुद के पास खाने को कुछ नहीं है तो वो अपने रेवड़ यानी मवेशियों को कहां से खिलाएंगे?

इसे पढ़ें : रेगिस्तान की पूरी इकोलॉजी को बिगाड़ देगा ये कोरोना संकट!

स्थानिय लोगों और कुछ जगह छपे आंकड़ों के अनुसार यहां मारवाड़ में करीब दो लाख ऊंट, 90 लाख से ज्यादा भेड़-बकरियां तथा 60 हज़ार से ज्यादा गधे हैं। यहां पशुपालन का काम रायका-रैबारी, बागरी ओर बावरिया समाज से जुड़े लोग सदियों से करते आ रहे हैं।

रायका समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ऊंट पालक गजेंद्र ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में बताया, “गर्मियों मे यहां का इलाका पूरी तरह सूख जाता है। इसलिए हम लोग अपने मवेशियों को लेकर हरियाणा, पंजाब, मध्य-प्रदेश और कुछ आस-पास के राज्यों की ओर निकल जाते हैं। वहां हमें चारा और गुजारे के लिए कुछ काम भी मिल जाता है और जब यहां अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत में मौसम थोड़ा ठीक-ठाक हो जाता है, बारिश होने लगती है, तो हम यहां अपने मवेशियों के साथ अपने टोलों में वापस आ आते हैं।”

लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुई समस्या के बारे में बताते हुए गजेंद्र कहते हैं कि अब जब बंदी में हमारे पास खुद अपने खाने के लिए कुछ नहीं है तो ऊंटों और बाकी मवेशियों को खिलाने का इंतजाम कैसे करें? वो आगे बताते हैं कि जिस समय सरकार ने अचानक बंदी की, उस समय राजस्थान में वर्षिक चैत्री मेला चल रहा था। इस मेले में ऊंटों की बिक्री और खरीद भी होती है लेकिन मेला बीच में ही बंद हो गया, जिस कारण हम लोगों को अपने मवेशियों को या तो वापस साथ लेकर आना पड़ा या वहीं मेले में ही खुला छोड़ देना पड़ा।

लॉकडाउन के चलते अपने घरों को लौटने को मज़बूर प्रवासी मज़दूरों की सड़कों पर सैंकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा पूरे देश ने देखी लेकिन ऐसे ही कई लोग जो घूमंतु समदाय से जुड़े हैं वो भी कई अलग-अलग राज्यों में फंस गए हैं और अब अपने इलाके में वापसी करना चाहते हैं। राजस्थान, हरियाणा में फसल कटाई के लिए आए घुमंतू समुदाय के कई लोग फिलहाल यहीं फंस गए हैं। इन लोगों के पास कोई सरकारी सहायता भी नहीं पहुंच रही और नाही स्थानिय लोग इन्हें अपना मानकर मदद ही कर रहे हैं।

राजस्थान के जैसलमेर में फंसें गुना के करीब 300 घूमंतुओं की कहानी बयां करते हुए स्थानीय अजय जाखड़ कहते हैं, “ये लोग यहां फतेहगढ़ क्षेत्र में जीरा की कटाई के लिए आए थे। लॉकडाउन के बाद जिलों की सीमाएं सील होने के कारण अब ये यहीं फंस गए हैं। इन लोगों ने मिलकर वापस गुना जाने के लिए बस भी बुक की थी लेकिन पुलिस ने इनकी बस चित्तौड़गढ़ जिले की सीमा पर रोक दीं और इन लोगों को वापस भेज दिया। इसके बाद इन लोगों ने पैदल ही गुना जाने की योजना बना ली। हालांकि जहां ये लोग जा रहे हैं, वहां भी इनका स्थाई आवास नहीं है, लेकिन अपने क्षेत्र में पहुंच कर इन्हें कुछ राहत मिलने की उम्मीद जरूर है।”

राजस्थान की राजधानी जयपुर में लाखों की संख्या में बेघर घुमंतू रह रहे हैं, शहर में घुमंतुओं की ऐसी करीब 17 बस्तियां हैं जहां 3,300 से ज्यादा परिवार रहते हैं। लॉकडाउन में इन्हें मजदूरी नहीं मिल रही और अब इनके सामने भूखे रहने की नौबत आ गई है।

इसे पढ़ें : जो घुमंतू हैं वो दस्तावेज कहाँ से लाएंगे ?

घुमंतू साझा मंच के विरेंद्र बंजारा के अनुसार यहां रह रहे ज्यादातर लोगों के पास न तो आधार कार्ड है और न ही कोई अन्य पहचान के दस्तावेज़ हैं जिससे इनको सरकारी मदद मिल सके। क्योंकि ये लोग लोहे के औजार बनाने, मजदूरी, पशुओं के खुर साफ करने, नाचने-गाने का काम करते हैं इसलिए अब इनके पास कोई काम नहीं है। लॉकडाउन के कारण इनके सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया है।

विरेंद्र आगे कहते हैं कि हमारी सरकार से अपील है कि घुमंतू समुदाय के लोगों के लिए अलग से राहत अभियान चलाया जाना चाहिए ताकि इस महामारी में इन्हें मदद मिल सके।’

बंजारों की एक ऐसा ही समूह बिहार के भागलपुर कजरैली के पास भी फंसा है। टोली में मर्द, औरत और बच्चों सहित कुल मिलाकर सौ लोग हैं। इनके पास खाने को खाना नहीं है। पहले टोली जिस इलाके में डेरा डालती थी, वहां कुछ न कुछ काम मिल जाता था। कोई गांव-शहर घूमकर कान और घाव के मवाद साफ करता तो कोई जड़ी-बूटी वाली दवाएं बेचता था। महिलाएं और बच्चे घूम-घूम कर अनाज मांग कर ले आते थे। अब लॉकडाउन की वजह से कजरैली में ही यह टोली मुख्य मार्ग से सटे आम के बगीचे में लगे डेरा में कैद हो गई है। डेरे का राशन भी समाप्त हो गया है। ऐसे में आगे क्या होगा, ये समस्या इनके सामने है।

टोली के बुजुर्ग सिनेष राठौर कहते हैं, “अभी स्थिति यह है कि किसी गांव में उन्हें देखते ही लोग शोर मचा कर भगा दे रहे हैं। बोलते हैं कि भागो, कोरोना फैल जाएगा। अब तो उनकी टोली को भोजन के लाले पड़ गए हैं। कजरैली के समीप एक गांव के मुखिया ने एक-एक किलो अनाज भी दिया, जो इनके लिए उंट के मुंह में जीरा जैसा साबित हुआ।”

छत्तीसगढ़ के जग्दलपुर में सेमरा के पास बंजारा समुदाय के दर्जनों लोग फंसे हुए हैं। ये लोग लॉक डाउन के चलते पिछले एक हफ्ते से परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इनके सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। समस्या ये है कि घुमंतू समुदाय के होने के कारण इनके पास राशनकार्ड व आधारकार्ड नहीं है और इस वजह से शासन द्वारा मिलने वाली किसी भी योजनाओं का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है।

घुमंतू समुदाय से जुड़े समाजिक कार्यकर्ता बृजेश सिंह बतातें है, “रेनके कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 98% घुमंतू बिना जमीन के रहते हैं, 57% झोंपड़ियों में और 72% लोगों के पास अपनी पहचान के दस्तावेज तक नहीं हैं। 94% घुमंतू बीपीएल श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे में इन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना असंभव है। इस समुदाय के लिए सरकार को अलग से योजनाएं लानी होंगी नहीं तो इन लोगों पर बहुत प्रतिकूल असर होगा। कहीं लॉकडाउन में हाशिये पर खड़ा घुमंतू-बंजारा समुदाय कहीं खत्म ही न हो जाए।”

वो आगे कहते हैं , “जो पशुपालक हैं उनके लिए और बड़ी मुसीबत है क्योंकि इस वक्त वो अपने पशुओं के साथ राजस्थान और गुजरात से देश के दूसरे हिस्सों में चले जाते थे। इस तरह वहां के किसानों को खेतों के लिए जैविक खाद मिल जाती थी और बदले में पशुओं को फसल निकालने के बाद खेतों में अनावश्यक बचे फूल-पत्ते, फलियां और भूसा। लेकिन लॉकडाउन के चलते ये लोग अब चारे-पानी की व्यवस्था कैसे करेंगे, सरकार को ये भी सुनिश्चत करना होगा, नहीं तो बड़ी संख्या में मवेशी मारे जाएंगे।”

गौरतलब है कि कोरोना महामारी का कहर देश-विदेश में जारी है, जिसका फिलहाल सरकार के पास लॉकडाउन ही एक आखिरी उपाय है। ऐसे में सरकार को इस समुदाय के लोगों पर अलग से ध्यान देने की आवश्यकता है नहीं तो पहले से ही हाशिए पर खड़ा घुमंतू समाज इस त्रासदी के बाद और पिछड़ जाएगा।

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