NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
लॉकडाउन और आर्थिक संकट: खेत मज़दूरों के शोषण का औजार बने सामंती पंचायतों के तुग़लक़ी फ़रमान
खेत मज़दूरों और किसानों की एकता, ग्रामीण भारत में वर्तमान संकट का पहला शिकार बनी है जब कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों द्वारा एकतरफा तरीके से धान की रोपाई की मज़दूरी के दाम खेत मज़दूरों पर थोपे गए हैं।
विक्रम सिंह
16 Jun 2020
लॉकडाउन और आर्थिक संकट
Image courtesy: Kisan Bharti

पिछले तीन महीनों के हमारे अनुभव से स्पष्ट हो गया है कि भले ही कोरोनो वायरस अमीर और गरीब, विभिन्न धर्मो और जातियों के लोगो में कोई भेदभाव नहीं करता हो परन्तु संक्रमण को रोकने के लिए किए गए उपाय जैसे अनियोजित लॉकडाउन- मुख्य रूप से गरीबों, मज़दूरों, खेत मज़दूरों और सीमांत तथा गरीब किसानों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। हालांकि, यह भी सच है कि अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति का परिणाम भूख, कुपोषण और कमजोर रोग प्रतिरोधक शक्ति के कारण मज़दूरों और गरीबों में संक्रमण की आशंका अधिक होती है। भारत में जितना संकट कोरोना वायरस ने पैदा किया है उससे कही ज्यादा नुकसान तो मानव निर्मित संकट से हुआ है। यह संकट है बिना किसी योजना के लागू किया गया लॉकडाउन। देश का कमेरा वर्ग बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उनके जीवन भुखमरी और वायरस से संक्रमण के दोहरे खतरे से लड़ाई लड़ रहे हैं।

हम सब जानते हैं कि देश कि अर्थव्यवस्था मार्च महीने के पहले भी बहुत बुरे दौर से गुज़र रही थी। इसकी सबसे बड़ी मार रोजगार पर पड़ रही थी और बेरोजगारी की दर पिछले कुछ दशको के अपनी उच्चतम सीमा पर पहुँच गई थी। ग्रामीण भारत भी इससे बुरी तरह प्रभावित था। किसानी तो लगातार घाटे का सौदा ही बनी हुई है और किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, देश में ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 10 श्रमिकों में 6 बेरोजगार हो गए हैं।

भारत में रोजगार में लगे हुए लोगों की संख्या के आधार पर खेती का काम सबसे बड़ा रोजगार है। यह सर्वविदित है कि भारतीय कृषि में काम कर रहे खेतिहर मज़दूर जनसंख्या के सबसे हाशिये पर धकेले गए हिस्से में से एक हैं। कृषि संकट का सबसे तीव्र रूप भूमिहीन मज़दूरों की संख्या में तेज वृद्धि से पता चलता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में कुल किसानों की संख्या 11,86,69,264 है, जबकि खेतिहर मज़दूरों की कुल संख्या 14,43,29,833 है। 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में 90 लाख की गिरावट हुई, जबकि खेतिहर मज़दूरों की संख्या में 3 करोड़ की बढ़ोतरी हुई। यह संख्या केवल उन 30 लाख किसानों की नहीं है जो हर साल अपनी ज़मीन बेचकर ग्रामीण बेरोजगारों की सेना में शामिल होने को मजबूर हैं, बल्कि उन बेरोजगार कारीगरों और फैक्ट्री मज़दूरों के चलते भी है जिन्हें फैक्ट्रियों की बंदी के चलते अपना काम गंवाना पड़ा और उनके पास ग्रामीण मज़दूरों के तौर पर काम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

लम्बे लॉकडाउन के प्रभाव से ग्रामीण भारत में संकट और गहरा गया है। हम सब जानते हैं कि आर्थिक संकट केवल आर्थिक जीवन तक सीमित नहीं रहता है बल्कि सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है। जाहिर सी बात है इन प्रभावों के पहले शिकार समाज के वंचित तबके ही होंगे। इसके लक्षण अभी से दिखने शुरू हो गए हैं। सरकार ने महामारी के दौर में संकट का हवाला देते हुए कई ऐसे निर्णय लिए है जिनका जनता विशेष तौर पर ग्रामीण जनता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसमें से प्रमुख है केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा पास तीन अध्यादेश जो ग्रामीण भारत में रोजगार और अन्न की आपूर्ति को बड़े स्तर पर प्रभावित करेंगे ।

ग्रामीण भारत में कृषि और गैर कृषि में रोजगार संकट के इस दौर में जरूरत है कि गाँव के सभी समुदाय मिल कर इसका सामना करे विशेष तौर पर किसान और खेत मज़दूर एकता के साथ इन चुनौतियों से पार पाएं। अपनी एकता के बल पर सरकार कि नीतियों के खिलाफ लामबंद हो जो पिछले कुछ वर्षों में देखने को भी मिला जब खेत मज़दूर न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग पर किसानों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर रैली में चलते थे और किसान भी मनरेगा के मांगो पर मज़दूरों के साथ नारे लगाते थे।

खेत मज़दूरों और किसानों की यही एकता, ग्रामीण भारत में वर्तमान संकट का पहला शिकार बनी है जब कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों द्वारा एकतरफा तरीके से धान की रोपाई की मज़दूरी के दाम खेत मज़दूरों पर थोपे गए। पंजाब और हरियाणा के कुछ जिलों से खबर आ रही है कि धान की रोपाई के लिए धनी किसान अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए ग्राम पंचायतों के माध्यम से एकतरफा तरीके से रेट तय करने का नोटिस निकलवा रहें है।

गौरतलब है कि यह समय धान की रोपाई का समय है जो मुख्यता खेत मज़दूरों के द्वारा किया जाता है। यह काम बहुत मुश्किल और जोखिम भरा होता है। वर्तमान में कई तरह की कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग के बढ़ने से इसमें जोखिम और बढ़ गया है। इसमें कठोर शरीरिक श्रम करने की जरूरत होती है। धान की रोपाई के काम में महिलाये सबसे ज्यादा शामिल होती है और पूरा दिन सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक यह काम चलता है।

सामान्यता इसके लिए मज़दूरी का दाम क्षेत्र (प्रति एकड़) के हिसाब  से किया जाता है । मज़दूरी का यह दाम अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रो के अनुसार मज़दूरों और किसनो के बीच बातचीत से तय होता है। लेकिन इन दो राज्यों में (यह चलन बाकी राज्यों में भी है) धनी किसान खेत मज़दूरों से बात किये बिना ही तुग़लक़ी फरमान पंचायतों के माध्यम से निकाल रहे हैं और मज़दूरों को सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक दण्ड का डर दिखा कर इन दरों पर काम करने के लिए मज़बूर कर रहे हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा के फतेहाबाद के इलाके में पिछले वर्ष धान रोपाई की मज़दूरी प्रति एकड़ 3000 से 3200 रुपये थी। मज़दूर इस वर्ष 3500 से 4000 रुपये प्रति एकड़ की मज़दूरी की आशा कर कहे थे परन्तु पंचायतें यह दाम 2800 से 3000 रुपये तय कर रही हैं।

टोहाना ब्लॉक के अंकावाली पंचायत ने धान रोपाई की मज़दूरी प्रति एकड़ 3000 रुपये तय कि है और इसमें चाय आदि का खर्च भी शामिल है। सामान्यता चाय आदि का खर्चा किसान वहन करते हैं। इसके अतिरिक्त इसी नोटिस में यह भी कहा गया है कि अगर कोई किसान इससे ज़्यादा कि मज़दूरी देगा तो उसे 21000 रुपये का जुर्माना होगा। यही नहीं इस बात की खबर देने वाले व्यक्ति को 10 हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया है। ऐसे ही फरमान रतिया खंड की हमजापुर पंचायत, भूना खंड की डूल्ट पंचायत और फतेहाबाद जिले की ही सालमखेडा पंचायत ने भी जारी किये हैं। यह निर्णय केवल कुछ प्रभावशाली किसानों के द्वारा ही लिए गए है और खेत मज़दूर इसमें कोई भागीदारी नहीं है।

न्यूज़क्लिक ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि पंजाब के जिला मुक्तसर, जिला बठिंडा, मोगा, मानसा और बरनाला के दर्जनों गांवों में भी ऐसे ही नोटिस निकाल कर धान रोपाई की मज़दूरी के दाम तय किये गए है। जिला बरनाला के गांव चीमा की पंचायत ने तो जुर्माने की रकम 1 लाख रख दी है।

यह निर्णय मजूरों को मानना ही होगा; उनके पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि कई पंचायतों ने मज़दूरों को किसी दूसरे गांव में काम करने पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है। पंचायतों ने इस निर्णय को मज़दूरों पर लादने के लिए किसानों पर जुर्माने का प्रावधान तो किया ही है परन्तु मज़दूरों पर सामाजिक बहिष्कार के साथ साथ आर्थिक दण्ड का भी प्रावधान किया है। यह बिलकुल ही अमान्य और शोषणकारी निर्णय है। यह उन पुराने दिनों की याद दिलाते है जब खेत मज़दूरों को बंधुआ मज़दूरों की तरह रखा जाता था। वर्तमान चलन से भी खेत मज़दूर अपना श्रम बिना उचित मज़दूरी के बेचने के लिए मज़बूर हैं। यह मज़दूरों के अपनी मज़दूरी के दाम के मोलभाव करने के अधिकार का हनन है। यह भी गुलामी से कम नहीं है। यह पूरी प्रक्रिया ही गैर कानूनी और अमानवीय है।

लॉकडाउन कि वजह से अपना रोजगार छिनने के चलते करोड़ों प्रवासी मज़दूर अपने घरों को वापस गए हैं। सबका ऐसा मानना था कि इन मज़दूरों के घर वापस जाने कि वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में मज़दूरों की संख्या में वृद्धि होगी। दूसरी तरफ इस आर्थिक संकट और मांग की कमी की वजह से रोजगार के अवसरों में कमी आएगी। कामगारों की संख्या में वृद्धि और कम काम का सीधा प्रभाव मज़दूरी के दाम पर पड़ेगा। कई राज्यों में यह चलन शुरू हो गया है। लेकिन इन दो राज्यों में इस बार मज़दूरों की कमी है क्योंकि कोरोना वायरस और लॉकडाउन के कारण ज्यादातर प्रवासी मज़दूर वापस जा चुके है और इस बार केवल स्थानीय मज़दूर ही इस काम के लिए उपलब्ध है। सामन्यता मज़दूरों की कमी के समय मज़दूरी के दाम में बढ़ोतरी होनी चाहिए परन्तु धनी किसान इस हथकण्डे के द्वारा मज़दूरी बढ़ाने की बजाय कम कर रहें है। देश के कई राज्यों में अलग अलग तरीके अपना कर खेत मज़दूरों को कम मज़दूरी पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस तरह खेत मज़दूर दोहरी मार झेल रहें है, जिन राज्यों में प्रवासी मज़दूर वापस आए हैं वहां तो प्रतिस्पर्धा के कारण उनको कम मज़दूरी मिलेगी ही परन्तु इन राज्यों में जहाँ इसी सिद्धांत के चलते उनको ज्यादा मज़दूरी मिलनी चाहिए थी वहां धनी किसानों और पंचायतों की मिलीभगत के कारण उनको कम मज़दूरी पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

इन दो राज्यों में खेत मज़दूरों पर इस निर्णय का तानाशाही तरीके से थोपे जाने के पीछे सामाजिक पृष्ठभूमि भी है। इन दोनों राज्यों में खेत मज़दूर में ज्यादातर संख्या दलितों की है। हरियाणा की जिन पंचायतों में यह फरमान जारी किये गए हैं वहां पर पंचायत प्रधान सवर्ण जातियों के हैं। ऐसी हालत में सामाजिक तौर पर पिछड़े व प्रभावहीन दलित मज़दूरों की राय लेना गैरजरूरी समझा जाता है। हमारे गांवों में यह सामान्य प्रचालन है कि नीतिगत निर्णय तो केवल सवर्ण जातिया ही लेंगी और दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को इन निर्णयों को मानना ही पड़ेगा। दूसरा बड़ा कारण है महिलाओं की इस काम में ज्यादा भागीदारी और पितृसतात्मक समाज की यह समझ कि महिलायों को पुरुषो के बराबर मज़दूरी नहीं दी जा सकती। सामान्यता महिलाओं द्वारा किये जाने वाले काम की कीमत कम आंकी जाती है या महिलाओं के हिस्से में वही काम आते हैं जिनमें कम मज़दूरी मिले। निर्णय लेने में महिला मज़दूरों कि भागीदारी का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। इसलिए पंचायत घरों में या गाँव की चौपाल पर बैठे मठाधीशों ने जो तय कर दिया वो सर्वमान्य होगा ।

हरियाणा में तो इस जातिगत शोषण की लम्बा इतिहास रहा है विशेष तौर पर दलित खेत मज़दूरों के शोषण का। यह वही क्षेत्र है जहा पर एक दशक पहले तक दलित खेत मज़दूरों को जंजीर से बाँध कर रखा जाता था और उनकी मुक्ति के लिए मज़दूरों को तीखे आन्दोलन करने पड़े थे। उस समय भी क्षेत्र के गांवों और किसानों में इस मुद्दे पर एक विभाजन देखा जाता था। वर्तमान समय में भी पंचायतों के यह कदम समाज में विभाजन ही पैदा करेंगे क्योंकि मज़दूरों के पास तो आन्दोलन के सिवाय कोई रास्ता है ही नहीं। कम काम के दौर में धान की रोपाई का सीजन बहुत आशा लेकर आता है। अगर इस दौरान भी मज़दूरी के कम दाम मिलेंगे तो आने वाले कई महीनो तक जीवन प्रभावित होगा। इस स्थिति का फायदा प्रतिक्रियावादी ताकतें अपने स्वार्थ के लिए करेंगी और समाज की एकता को कमजोर करते हुए सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ होने वाले संघर्ष कि धार को कुंद करने का काम करेंगी।

हमारा मानना है इस समस्या का मूल कारण सरकार की नीतियों के कारण पैदा हुआ आर्थिक संकट है। किसी भी विकास प्रक्रिया में रोज़गार की दोहरी भूमिका होती है। किसी भी समाज में श्रम शक्ति के अधिकतर इस्तेमाल तथा लोगों के खरीदने की ताकत बढ़ाने से बाजार में विभिन्न तरह के उत्पादों के लिए मांग पैदा होती है। इसके अलावा यह अहम है कि किसी भी तरह की विकास प्रक्रिया नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार करे। इसलिए किसी भी विकास प्रक्रिया के लिए पहली प्राथमिकता बेरोज़गारों और अर्द्ध बेरोजगारों के लिए काम के अवसर अधिकतम बनाना होनी चाहिए। ग्रामीण भारत जीविका के लिए मुख्य तौर पर खेती पर निर्भर है। किसानों के अलावा बटाईदार, अन्य कृषक व भूमिहीन श्रमिकों के बड़े हिस्से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। कृषि में बदलावों तथा बड़े पैमाने पर मशीनीकरण व पूंजी के इस्तेमाल से पुराना ढांचा बड़े पैमाने पर बदल गया है। श्रम के ढांचे में बदलाव की रफ्तार पिछले 25 सालों से बेहद तेज़ हो गई है, जब से देश में नवाउदारवादी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं।

कोरोना के कारण बिना किसी तैयारी के लागू किया गए लॉक डाउन ने इस आर्थिक संकट को ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा दिया है। इसके प्रभाव के चलते कृषि भी संकट के दौर से गुजर रही है। पिछली फसल के ठीक से कटाई और खरीद न होने के कारण किसान संकट के दौर से गुजर रहा है। ऊपर से केंद्र सरकार ने नए अध्यादेश के माध्यम से कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव लाये हैं जिससे किसान अपने आप को अधिक अनिश्चितता की स्थिति में देख रहे हैं। इस स्थति का फायदा उठाकर ही धनी किसान इस तरह के निर्णय मज़दूरों पर थोप रहे हैं। यह खेत मज़दूरों के शोषण के सिवाय कुछ भी नहीं है।

इस फौरी संकट को समझने के लिए इसके पीछे के आधारभूत कारणों को समझाना होगा और मज़दूर और किसानों दोनों को आने वाले संघर्षों के लिए तैयारी करनी होगी। यहाँ यह इंगित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि सैद्धांतिक तौर पर खेत मज़दूरों और किसानों के बीच एक टकराव को देखा जाता है मज़दूरी के दाम को लेकर। यह बात सही भी है परन्तु हमें यह समझना होगा कि अगर किसान को उसकी फसल का उचित दाम नहीं मिलेगा तो वह इसकी भरपाई खेत मज़दूरों को कम मज़दूरी देकर करने की कोशिश करेगा। इसलिए बहुत महतवपूर्ण हो जाता है किसानों के लिए C2+50 (इसमें मज़दूरों की मज़दूरी भी शामिल है) के आधार पर फसलों के न्यूनतम मूल्य का संघर्ष। इसी तरह यह भी समझना जरूरी है कि खेत पर मज़दूरों के लिए लगातार कम होते काम को देखते हुए मनरेगा के काम के लिए संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन दोनों मांगों पर किसान और खेत मज़दूर एक मंच पर आ सकते हैं।

(लेखक विक्रम सिंह अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं। इससे पहले आप स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) के महासचिव रह चुके हैं।)  

Coronavirus
Lockdown
Workers and Labors
farmer crises
Rural india
economic crises
poverty
Haryana
punjab

Related Stories

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

उनके बारे में सोचिये जो इस झुलसा देने वाली गर्मी में चारदीवारी के बाहर काम करने के लिए अभिशप्त हैं

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

सड़क पर अस्पताल: बिहार में शुरू हुआ अनोखा जन अभियान, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता ने किया चक्का जाम

किसानों और सरकारी बैंकों की लूट के लिए नया सौदा तैयार

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला


बाकी खबरें

  • loksabha
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    संसद में चर्चा होना देशहित में- मोदी, लेकिन कृषि क़ानून निरस्त करने का बिल बिना चर्चा के ही पास!
    29 Nov 2021
    सरकार की कथनी-करनी का फ़र्क़ एक बार फिर तुरंत देश के सामने आ गया। आज सुबह संसद सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से कहा कि संसद में चर्चा होना देशहित में है और सरकार हर सवाल का जवाब…
  • TN
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु इस सप्ताह: राज्य सरकार ने सस्ते दामों पर बेचे टमाटर, श्रमिकों ने किसानों के प्रति दिखाई एकजुटता 
    29 Nov 2021
    इस सप्ताह, तमिलनाडु ने 52,549 करोड़ रूपये की 82 औद्योगिक परियोजनाओं के लिए सभी क्षेत्रों के प्रमुख उद्योगपतियों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इसके साथ ही सरकार ने थूथुकड़ी, नागापट्टिनम और…
  • alok dhanwa
    अनिल अंशुमन
    ‘जनता का आदमी’ के नाम ‘जनकवि नागार्जुन स्मृति सम्मान’: नए तेवर के कवि आलोक धन्वा हुए सम्मानित
    29 Nov 2021
    यह सम्मान 2020 में ही दिल्ली में नागार्जुन जी के स्मृति दिवस पर दिया जाना था। लेकिन कोरोना महामारी के कारण यह संभव नहीं हो सका। इसलिए महामारी प्रकोप के कम होते ही यह सम्मान आलोक धन्वा के प्रिय शहर…
  • Assam
    संदीपन तालुकदार
    असम: नागांव ज़िले में स्वास्थ्य ढांचा उपलब्ध होने के बावजूद कोविड मरीज़ों को स्थानांतरित किया गया
    29 Nov 2021
    महामारी ने स्वास्थ्य सुविधा संकट की परतें खोलकर रख दी हैं और बताया कि कैसे एम्स की सुविधा होने पर नागांव बेहतर तरीक़े से महामारी का सामना कर सकता था।
  • Bahgul River
    तारिक़ अनवर
    यूपी के इस गाँव के लोग हर साल बांध बना कर तोड़ते हैं, जानिए क्यों?
    29 Nov 2021
    हालांकि सरकार ने पिछले साल एक स्थायी जलाशय बनाने के लिए 57.46 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की थी, लेकिन इस परियोजना को अभी तक अमल में नहीं लाया गया है और इस साल भी मिट्टी से बांध बनाने की प्रक्रिया…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License