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राजनीति
लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद सके।
समीना खान
30 Apr 2022
lucknow

देश में महंगाई और बेरोजगारी ने ईद के रंग को फीका कर दिया है। रमजान का पाक महीना चल रहा है और मुस्लिमों के त्योहार ईद को बस दो दिन ही शेष रह गए हैं। ऐसे में लोग इसकी तैयारी में जुटे हैं। त्योहार की खरीदारी के लिए लोग बाजार तो निकलते हैं लेकिन बढ़े हुए सामान की कीमतों से उनकी खुशियां कम हो रही है। इस मौके से हर कोई अपने लिए और अपने बीवी-बच्चों के लिए नए कपड़े के साथ-साथ ईद के दिन खुद अपने परिवार के लिए और घर आने जाने वाले मेहमानों के लिए खाने-पीने की वस्तुएं खरीदना चाह रहे हैं लेकिन इस बार कोरोना महामारी के बाद महंगाई की मार ने उनके बजट को बिगाड़ दिया है। एक तरफ लोगों के हाथ में पैसा नहीं है जिससे वे अपनी ख्वाहिश के मुताबिक खरीदारी कर सकें वहीं दूसरी तरफ त्योहार के मौके से आमदनी की आस में कर्ज लेकर दुकान में सामान को भरने वाले दुकानदार भी चिंतित हैं। उनके चिंता की वजह है कि लोग दुकान पर आ तो रहे हैं लेकिन उनके जेब में पैसा न होने या कीमत के ज्यादा होने के चलते वे खरीदारी नहीं कर पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दुकानदारों का हाल भी की कुछ इसी तरह का है। ईद की खरीदारी को लेकर पुराने लखनऊ के नक्खास के बाज़ार में एक बार फिर से चहल पहल है और माहौल मेले जैसा है। बीते दो वर्षों में महामारी और लॉकडाउन के कारण ईद के मौके पर यहां का कारोबार देश के अन्य हिस्सों की तरह ठप रहा। इस बार हालात कुछ बदले हुए दिखाई देते हैं। बाजार में रौनक लौटी है। दुकानदारों ने मार्केट बहाल करने का हर मुमकिन कोशिश भी की है। खरीदार भी इन बाज़ारों में पहुंच रहे हैं। इन सबके बावजूद ग्राहकों की कमज़ोर आर्थिक स्थिति का साफ़ असर इस ऐतिहासिक बाज़ार में भी देखने को मिल रहा है।

रेशमा जितना पैसा लेकर दो बेटियों के लिए ईद की खरीदारी करने निकली हैं उतने में सिर्फ एक बेटी के लिए ही सामान ले पाना संभव है। मां के साथ आई रमशा और शीबा खामोश हैं। उधर मां रेशमा दुकानदार से कपड़े की कीमत कम करने की फ़रियाद कर रही हैं। वहीं दुकानदार भी बढ़ी महंगाई का हवाला देते हुए अपनी मजबूरी बता रहा है। मेले जैसे माहौल में खुशियां की जगह झुंझलाहट ने ले ली है। ऐसा मंज़र किसी एक जगह नहीं बल्कि हर दुकान में आम है।

करीब दो सदी पुराने लखनऊ स्थित नक्खास के इस बाज़ार की ख़ासियत रही है कि ये काफी कम कीमत में मध्य और निम्न मध्य वर्ग की ख़्वाहिशें उनकी हैसियत के अंदर ही पूरी कर दिया करता था। लेकिन इस बार नक्खास के बाज़ार की इस खूबी को ग्रहण लग गया है। बढ़ी हुई बेरोज़गारी के साथ बेतहाशा बढ़े कीमतों का असर ग्राहकों की ख़्वाहिशों पर पानी फेर रहा है। बेटे के लिए फुटपाथ पर से रेडिमेड कपड़ा तलाशती रेशमा ने दुकानदार से जब ये कहा कि आपके कपड़े की कीमत तो स्टोर जितने महंगे हैं। इस पर दुकानदार ने कहा, 'जितने में आपको दे रहे हैं उतने पैसे में स्टोर वाला दुकान के अंदर आने के इजाज़त भी नहीं देगा।' इतनी बात सुनकर रेशमा खामोश हो गई और कहा कि 'भैय्या कुछ गुंजाईश कर दीजिए। बस बच्चे का इंतेज़ाम हो जाए, मेरे पास इससे ज़्यादा रक़म नहीं है।'

ईद के मौके पर हर दुकानदार ने अपनी-अपनी दुकान में माल भरने की पूरी कोशिश की है। ऐसा नहीं है कि बाजार में ग्राहकों की कमी हो। त्योहार को देखते हुए भारी भीड़ भी है लेकिन कीमत ज्यादा होने और पैसे की कमी से लोग खरीदारी में कटौती कर रहे हैं। एक शू स्टोर के मालिक अनवर बताते हैं कि क़र्ज़ लेकर दुकान के लिए माल खरीदा है। दुकान में दो स्टाफ को बढ़ाया है और रात के दो बजे तक पूरी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। लोग आते हैं सामान देखते हैं और खरीदारी तक बात इसलिए नहीं पहुंचती क्योंकि उनकी जेब इसकी इजाज़त नहीं देती।

बढ़े हुए दाम और घटी हुई आमदनी की शिकायत इस वक़्त ईद की ख़रीदारी का सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। नक्खाश बाजार के आस पास के इलाक़े में जरदोजी के काम से जुड़े ज़्यादातर कारीगर रहते हैं। उनके मालिक महामारी के दौरान या तो कारोबार बंद कर चुके हैं या फिर उसे इतना समेट लिया है कि ज़्यादातर वर्कर को नौकरी से हटाना पड़ा है। अनवर हुसैन एक ज़रदोज़ी के कारखाने में हाथ से कढ़ाई करने का काम करते थे। उनके मालिक ने दो साल पहले कोविड के पहले लॉकडाउन में ही काम बंद कर दिया था। तब से अनवर कभी गली गली जाकर सेनेटाइजर बेचते रहे या फिर एक दो होटल में काम किया मगर परिवार का पेट पालने भर की आमदनी भी जुटाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था। उन्हें पिछले दिनों एक पैथोलॉजी लैब में काम मिला है लेकिन उससे भी घर का खर्च नहीं चल पाता है। वे ईद के मौके से अपनी बेटी को सस्ते से सस्ता कपड़ा व अन्य चीजें दिलाने के लिए कई दुकानों पर भटकने को मजबूर हैं।

सामान से अटे पड़े इस बाज़ार में ग्राहकों की भीड़ है। खरीदारी को लेकर कुछ ऐसा ही जवाब यहां एक स्टोर में पांच साल से काम कर रहे जकी से सुनने को मिला। ज़की बताते हैं कि इस बार लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि ज़्यादातर मां-बाप बच्चों की जरूरत का ही सामान खरीद रहे हैं और अपने लिए समझौता करते नज़र आ रहे हैं। ज़की जिस स्टोर पर काम करते है वहां रेडीमेड सूट के अलावा दुपट्टे और लेस बेची जाती है।

दुकानदार और फुटपाथ वाले दोनों को ही शिकायत है कि बाज़ार में इस समय हर सामान मुहैया है, लोगों का सैलाब है मगर खरीदारी हमेशा के मुक़ाबले बिलकुल कम हो रही है। नागरे जूते की दुकान में भी यही बात देखने को मिली। नागरा जूता खरीदने आई नग़मा को शिकायत है कि हमेशा उन्होंने जो नागरा इस दुकान से दो-ढाई सौ रूपये में खरीदा था आज उसकी कीमत साढ़े पांच सौ बताकर उन्हें लूटा जा रहा है। वहीं नगमा से दुकानदार शोएब कहते है, 'लेदर का दाम बढ़ने से लागत बढ़ी है और इतने पर बेचना हमारी मजबूरी है।' वे आगे बताते हैं कि इस समय नागरा जूते की लागत दोगुनी से ज़्यादा हो गई है। इस महंगाई में हमें अपने स्टाफ को भी हटाना पड़ा और अब सारा दिन लोगों को ये बताने में गुज़र जाता है कि हमने दाम नहीं बढ़ाए बल्कि महंगाई की वजह से लागत बढ़ गई है। चूड़ी और आर्टिफिशियल ज्वेलरी की दुकानों पर भी औरतों और लड़कियों की भीड़ ज़रूर है मगर जेब इनकी भी ख्वाहिशें पूरी करने की हैसियत नहीं रखती। लोग सामान उठाते हैं, दाम पूछते हैं और वापस रख देते हैं।

एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने वाली ज़किया कहती हैं कि उनके पति जिस पब्लिकेशन में काम करते थे उसे बंद हुए दो साल बीत गए हैं। अभी तक कोई नौकरी नहीं मिल पाई है। इस बार ईद के मौके से कुछ आमदनी की उम्मीद में उन्होंने करीबी लोगों कुछ क़र्ज़ लिया और घूम घूम कर बच्चों के कपड़े बेचने का काम किया लेकिन वह काम भी ठीक ढ़ंग से नहीं चला। उदास जकिया कहती हैं कि कभी नहीं सोचा था कि पेट पालने के लिए ये दिन देखना पड़ेगा, पर मेहनत की कमाई के लिए ये भी करने को राज़ी हुए। मगर अफ़सोस इस बात का है कि हर दिन ये सोच कर घर से निकले कि शायद आज ठीक ठाक बिक्री हो जाएगी और अब तो ईद का वक़्त करीब आ गया मगर अभी तक लगाई गई कीमत भी नहीं वसूल हो सकी है। जकिया की मुश्किलें यहीं पर ही ख़त्म नहीं होती, वह आगे कहती हैं कि हम दो लोग हैं अपना कुछ नहीं बनाएंगे चलेगा मगर घर आने वालों के लिए खोये और मेवे की न सही दूध और शकर की सादी सिवई बनाने के लिए भी सोचना पड़ रहा है।

ईद की तैयारियों पर लंबे समय से कारोबार को पटरी पर लाने की उम्मीद हर व्यापारी यही शिकायत करता मिला कि हर घर की आर्थिक स्थिति कोविड से पहले वाली ईद की तुलना में बहुत ख़राब है। ऐसे में केवल वही लोग ख़रीदारी कर रहे हैं जिनकी आय पर कम असर पड़ा है लेकिन इन लोगों का प्रतिशत बहुत ही कम है। इन्हीं लोगों की बदौलत खाने, कपड़े और दूसरे सामन की बिक्री हो रही है मगर कम आय की मार झेलने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा है और इसका सीधा असर हम सबके कारोबार पर पड़ा है।

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