NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
एमसीडी उपचुनाव: वेतन में हो रही देरी के मद्देनज़र नगरपालिका कर्मचारियों की सारी उम्मीद मतदाताओं पर टिकी
रविवार, 28 फरवरी को होने वाले उप-चुनावों को अगले साल होने वाले नगर निगम के चुनावों के लिए “सेमी-फाइनल” के तौर पर देखा जा रहा है। 
रौनक छाबड़ा
27 Feb 2021
एमसीडी उपचुनाव
फाइल फोटो

आगामी एमसीडी उपचुनावों के मद्देनजर अपने-अपने राजनीतिक दलों के लिए वोट जुटाने की कवायद में राजनीतिक नेताओं के नेतृत्व में पिछले कुछ दिनों से निकाले जा रहे रोड-शो ने राष्ट्रीय राजधानी की गलियों को सजा रखा है। 28 फरवरी को होने वाले मतदान के दिन के लिए भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच में, दो वार्डों की पांच रिक्त सीटों-उत्तरी एमसीडी के रोहिणी और शालीमार बाग़ और पूर्वी एमसीडी के त्रिलोकपुरी, कल्याणपुरी और चौहान बांगर के लिए मतदान होने जा रहा है।

आगामी उप-चुनावों को अगले वर्ष होने वाले नगर निगम चुनावों के लिए “सेमी-फाइनल” के तौर पर देखा जा रहा है। दिल्ली में कुल 272 वार्डों सहित तीन नगर निगम निकाय उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी दिल्ली हैं, और ये सभी 2012 से भाजपा के अधीन हैं।

खबरों के मुताबिक़ भाजपा जहाँ अपने सांगठनिक कौशल पर ध्यान केन्द्रित कर रही है, वहीं इसकी मुख्य प्रतिद्वंदी आम आदमी पार्टी, जिसके नियंत्रण में दिल्ली सरकार है, ने अपनी जीत दर्ज करने की उम्मीद को सत्ता-विरोधी लहर पर टिका राखी है।

बहरहाल चाहे जो भी हो, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं जिनकी वजह से पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली में एमसीडी का काम-काज बुरी तरह से प्रभावित हो रखा है, जिनसे मतदान के रुझान को प्रभावित करने की उम्मीद की जा सकती है। उनमें से सर्वप्रमुख नगर निगम के कर्मचारियों को वेतन के वितरण में लंबे समय से चली आ रही देरी है। 

पिछले महीने ही तकरीबन 35 कर्मचारी संघों ने जिसमें नगर निकायों के पेंशनरों सहित सभी वर्गों से सम्बद्ध अध्यापकों, इंजीनियरों, नर्सों और सफाई कर्मचारियों ने लंबे समय से झेल रहे अपनी लंबित वेतन से जुड़ी समस्याओं के कारण “स्थाई समाधान” की मांग के साथ हड़ताल पर चले गए थे। 

उनका आरोप था कि मासिक भुगतान में जो दो से चार महीनों की सामान्य देरी चली आ रही थी, उसमें पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी के चलते कुछ मामलों में सात महीनों तक की देरी हो रही है – जिसकी वजह से कर्मचारियों को मजबूरी वश अपने कर्तव्यों के निर्वहन से अनुपस्थित होना पड़ रहा है।

उनकी शिकायतों के इतिहास के बारे में पता लगाने के लिए 2012 से वापस जाकर तलाशा जा सकता है, जब दिल्ली में तत्कालीन एमसीडी को राष्ट्रीय राजधानी में तब की मौजूदा कांग्रेस सरकार द्वारा तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया गया था। इसके साथ-साथ एक केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते, दिल्ली का प्रशासनिक ढांचा अपने आप में अनूठा है, जहाँ नगर निकायों को केंद्र के नियंत्रण में रखा गया है।

इसने एक चुनौती खड़ी कर दी है, विशेष तौर पर जब से दिल्ली में आप सत्ता पर काबिज हुई है। इसके परिणामस्वरूप मोटे तौर पर यह मुद्दा जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस वर्ष जनवरी में “राजनीतिक कीचड़ोतस्व” नाम दिया था, तक ही सीमित रह गया है।

हड़ताल पर जाने के बावजूद इसका कोई “स्थायी समाधान” हासिल नहीं हो पाया है, जिसे कुछ महीनों का भुगतान प्राप्त कर लेने के बाद वापस ले लिया गया था। 

कर्मचारियों ने अब अपनी निगाहें इस उम्मीद से आम जनता के मत और चुनाव पर टिका राखी है  कि शायद इसके जरिये कोई समाधान निकले। वहीं  उनमें से एक हिस्से को खेद है कि उनका यह संघर्ष जारी रहने वाला है, भले ही कोई भी पार्टी जीते।

उप-चुनावों के नतीजों से उम्मीद की जाती है कि 2022 नगर निगम चुनावों के नतीजों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ने जा रहा है।

एमसीडी अध्यापक संघ के महासचिव राम निवास सोलंकी का इस बारे में कहना था “लोगों को उस पार्टी को वोट करना चाहिए जो एमसीडी की प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रूप से चलाने का वादा करती हो। आखिरकार अगर उसमें सुधार होता है तो यह आम जनता ही है जिसे इस सबका लाभ मिलने वाला है।” दिल्ली में जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सड़कों की सफाई, कचरा प्रबंधन सहित अन्य कार्य निगमों के दायरे में आते हैं।

सोलंकी ने आगे बताया कि प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों, विशेषकर उत्तरी एमसीडी के अध्यापकों को अभी तक अक्टूबर तक का ही वेतन हासिल हो सका है। सोलंकी अफ़सोस जताते हुए कहते हैं “वे दावा करते हैं कि फण्ड की कमी के चलते ऐसा हो रहा है। आप और भाजपा दोनों ही एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं।” उन्होंने बताया कि कर्मचारियों की मांग अब वास्तव में इन तीनों एमसीडी क्षेत्रों के एकीकरण पर केन्द्रित होती जा रही है।

कॉन्ट्रैक्ट इंजीनियर्स एसोसिएशन, एमसीडी के हितेश गांधी ने कहा “आप और भाजपा के बीच की इस लड़ाई की वजह से वेतन में हो रही इस लगातार देरी से कर्मचारी बेहद हैरान-परेशान हैं। हम इसके जल्द से जल्द खत्म होने की उम्मीद करते हैं क्योंकि हमें लगता है हम इन दोनों पार्टियों के बीच में फंस कर रह गए हैं। अब यह जनता पर निर्भर है कि वह सोच-समझकर फैसला ले कि किसे चुना जाए।”

हिन्दू राव नर्सेज यूनियन की महामंत्री इंदुमति ने न्यूज़क्लिक से अपनी बातचीत में बताया कि इस बात से शायद ही कोई फर्क पड़ता है कि कौन सी पार्टी निगम पर राज करती है, क्योंकि उनका मानना है कि कर्मचारियों को हर हाल में अपने संघर्ष को जारी रखना होगा। उनका कहना था “वेतन में होने वाली देरी ही एकमात्र मुद्दा नहीं है। एमसीडी में नौकरियों में कार्यबल के अभाव के कारण मौजूदा कर्मचारियों को काम का जबर्दस्त दबाव का भी सामना करना पड़ रहा है।” उत्तरी एमसीडी के दायरे में आने वाले हिन्दू राव अस्पताल के उदाहरण का हवाला देते हुए इन्दुमति ने दावा किया कि अस्पताल में नर्सिंग कर्मचारियों के कुल 144 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 14 नर्सिंग कर्मचारी ही कार्यरत हैं। 

उप-चुनावों को लेकर उनका कहना था “ये कर्मचारी ही हैं जो असल में जनता को विभिन्न सेवाएं मुहैया कराते हैं। जनता को किसे वोट करना है इसका निर्णय लेने से पहले  उन्हें हमारे मुद्दों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

MCD Bypolls: Salary Delays in Mind, Civic Employees Pin Hope on Voters

Municipal Corporation Delhi
AAP
BJP
Congress
MCD Teachers’ Association
Contract Engineers Association
Hindu Rao Nurses Union
MCD Workers Strike
MCD Bypolls
AAP government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग


बाकी खबरें

  • sc
    भाषा
    वकीलों को वरिष्ठ का दर्जा देने संबंधी याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा उच्चतम न्यायालय
    23 Aug 2021
    “वकीलों का दर्जा निर्दिष्ट समिति द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर तय होना चाहिए और मतदान का सहारा केवल तब लिया जाना चाहिए जब कोई और रास्ता न हो। उच्च न्यायालय मतदान एक अपवाद के रूप में नहीं बल्कि एक…
  • सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    भाषा
    सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    23 Aug 2021
    समाज सुधारक एवं धार्मिक नेता श्री नारायण गुरू की 167वीं जयंती के अवसर पर फेसबुक पर एक पोस्ट में विजयन ने लिखा, ‘‘यह समय भाईचारा और समानता को कमजोर करने वाली सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी…
  • तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    बी. सिवरामन
    तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    23 Aug 2021
    हाल ही में लाए गए सिनेमैटोग्राफ़ संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में दो ध्रुवों पर खड़े कमल हासन और सूर्या एक साथ आ गए, इस घटना ने तमिल फिल्म जगत में चेतना की एक लहर दौड़ा दी है।
  • "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    प्रशांत पद्मनाभन
    "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    23 Aug 2021
    तर्कवादी सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की 8वीं पुण्यतिथि के बाद प्रशांत पद्मनाभन ने उनकी विरासत को याद करते हुए लिखा है कि "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" क्या होती है और कैसे इसका विकास किया जा सकता है।
  • Kalyan Singh
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    पिछड़ों के सांप्रदायीकरण की योजना और दुविधा के प्रतीक थे कल्याण सिंह
    23 Aug 2021
    वास्तव में कल्याण सिंह पिछड़ा वर्ग की उस दुविधा के प्रतीक थे जिसके तहत कभी वह जाति के अपमान से छूटने और सत्ता पाने के लिए सांप्रदायिक होने को तैयार हो जाता है तो कभी हिंदुत्व की ब्राह्मणवादी योजना से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License