NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मप्र :आदिवासियों को अंधेरे में रखकर एक और बांध की तैयारी
मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी में प्रस्तावित 29 बड़ी बांध परियोजनाओं में शुमार मोरंड एवं गंजाल संयुक्त सिंचाई परियोजना निर्माण के लिए नियमों का उल्लंघन कर सरकार ने टेंडर निकाल दिया है और साथ ही डूब क्षेत्र के ग्रामीणों को पूरी जानकारी नहीं दी जा रही है।
राजु कुमार
10 Oct 2019
मप्वासियों को अंधेरे में रखकर एक और बांध की तैयारी

नर्मदा नदी पर निर्मित सरदार सरोवर बांध के कारण मध्यप्रदेश के लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। इस बांध के निर्माण, सर्वे में गड़बड़ी और आधे-अधूरे पुनर्वास के कारण कई ऐसे गांव डूब क्षेत्र में आ गए, जिन्हें सर्वे में छोड़ दिया गया था। इसे लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवाई में चले आंदोलन के बाद मौजूदा सरकार ने यह दिखाया कि वह इस मुद्दे पर डूब प्रभावितों के साथ है और पिछली सरकार की ख़ामियों एवं गुजरात सरकार द्वारा पुनर्वास पैकेज की राशि नहीं देने की वजह से समस्याएं बढ़ गई हैं।

लेकिन दूसरी ओर मध्यप्रदेश सरकार एक और बड़ी बांध परियोजना - मोरंड एवं गंजाल संयुक्त सिंचाई परियोजना के निर्माण के लिए टेंडर जारी कर इस दिशा में क़दम बढ़ा चुकी है। इस परियोजना से प्रभावित लोगों को सही जानकारी भी नहीं दी जा रही है, जिसकी वजह से वे आक्रोशित हैं और बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।

इस परियोजना में हरदा, होशंगाबाद एवं बैतूल ज़िले में 2371.14 हेक्टेयर का घना जंगल डुबाया जा रहा है। क़ानून के अनुसार इतने बड़े पैमाने पर वन भूमि को ख़त्म करने के लिए फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस लेना अनिवार्य होता है। इस परियोजना में होशंगाबाद के 4, हरदा के 4 और बैतूल ज़िले के 2 गांव डूब क्षेत्र में आएंगे। ये गांव गोंड एवं कोरकू आदिम जनजाति बहुल्य (लगभग 95 फीसदी) हैं और लगभग 870 परिवारों का प्रभावित होना बताया जा रहा है। इसमें 25 गांवों के जंगल डूबने की संभावना है। 2012 में इस परियोजना की लागत 1434 करोड़ रुपये बताया गया था और कोई काम शुरू हुए बिना ही पिछली शिवराज सिंह सरकार ने यह लागत दोगुना करके 2017 में लगभग 2813 करोड़ रुपये करने की प्रशासनिक स्वीकृति दे दी।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा इस परियोजना के तहत बताया जा रहा है कि परियोजना तीन चरणों में पूरी होगी। इससे तीनों ज़िले: होशंगाबाद के 28, खंडवा के 62 और हरदा के 121 गांवों की 52205 हेक्टेयर ज़मीन सिंचित होंगी। सिंचाई के साथ ही कमांड क्षेत्र के 211 गांवों में पेयजल उपलब्ध कराने की बात भी की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि परियोजना प्रस्तावक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को 17 अक्टूबर 2012 में टीओआर मिला था, जिसकी वैधता 2 वर्ष की थी, जिसे बढ़ाकर 4 वर्ष किया गया था। परियोजना की पर्यावरणीय मंज़ूरी के लिए जन सुनवाई और पर्यावरण प्रभाव का आंकलन करके इसी समय सीमा के अंदर भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय में भेजना था। एनवीडीए ने जल्दीबाज़ी में नवंबर 2015 में इस परियोजना से प्रभावित तीन ज़िलों में जन सुनवाई कर ली। स्थानीय लोगों के व्यापक विरोध के बावजूद इसकी रिपोर्ट के साथ पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन रिपोर्ट जुलाई 2016 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को प्रस्तुत कर दी थी।

ज़िन्दगी बचाओ अभियान की शमारुख़ धारा ने नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) द्वारा हरदा एवं होशंगाबाद ज़िले में नर्मदा घाटी में मोरंड एवं गंजाल नदी पर प्रस्तावित संयुक्त सिंचाई परियोजना के निर्माण के लिए जारी किए गए टेंडर को ग़ैर क़ानूनी बताया है। उनका कहना है, ‘‘केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मार्च 2017 में स्पष्ट बोल दिया था कि इस परियोजना की पर्यावरणीय मंज़ूरी तभी मिलेगी जब एनवीडीए को फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस मिल जाएगा।

क़ानून के अनुसार बड़ी परियोजना के लिए फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस की प्रक्रिया के बिना पर्यावरणीय मंजूरी के लिए आवेदन करना ग़ैर क़ानूनी है। सितंबर 2019 में सुचना के अधिकार क़ानून के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार इस परियोजना को न तो पर्यावरणीय मंज़ूरी मिली है और न ही फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस मिला है। इसके बावजूद नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा बांध के निर्माण के लिए टेंडर जारी करना क़ानून का उल्लंघन है।’’

Map of Proposed dam.jpg

डूब क्षेत्र में आने वाले बोथी गांव के ग्रामीणों ने इसका विरोध करते हुए हरदा कलेक्टर को ज्ञापन भी दिया है। आदिवासियों के पास पट्टे की ज़मीन है, लेकिन प्रशासन उन्हें सही जानकारी नहीं दे रहा है। ग्रामसभाओं से भी बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया है। एक ओर ज़िला प्रशासन कह रहा है कि उनके गांव डूब क्षेत्र में नहीं आएंगे, तो दूसरी ओर वन विभाग सर्वे कर रहा है। शमारुख़ का कहना है कि परियोजना में डूब में आने वाले जंगलों के बदले पेड़ लगाने के लिए ज़मीन दिखानी पड़ती है। इसमें अलग-अलग ज़िलों, सागर, जबलपुर, बैतूल में 12 टुकड़ों में ज़मीन दिखाई गई है और दिखाई गई ज़मीन में से बैतूल की ज़मीन किसी और की है।

एनवीडीए ने बांध निर्माण के लिए 1808 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला है, जिसके लिए अंतिम तिथि 18 अक्टूबर रखी गई है। इस टेंडर का विरोध करते हुए प्रभावित ग्रामीणों ने ज़िन्दगी बचाओ अभियान के बैनर तले मुख्यमंत्री कमलनाथ को 28 सितंबर को एक पत्र लिखा है। उन्होंने लिखा है, ‘‘पिछली सरकार ने नियमों एवं क़ानूनों की अनदेखी करते हुए मोरंड गंजाल बांध परियोजना को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हुए परियोजना को प्रशासनीय स्वीकृति प्रदान की थी। प्रस्तावित गंजाल मोरंड बांध परियोजना में न तो पर्यावरणीय मंज़ूरी मिली है और न ही फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस मिला है, फिर भी नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा बांध निर्माण के लिए टेंडर जारी किया गया है।

इसमें 2371.14 हेक्टेयर सघन वन भूमि को डुबाया जा रहा है और वर्तमान लागत भी 2813 करोड़ प्रस्तावित है और हम सभी यह जानते हैं कि समय के साथ इसमें बढ़ोतरी होगी, मध्यप्रदेश जैसे आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्य के लिए यह बहुत बड़ी राशि है, इस राशि से कई ज़िलों में स्थानीय स्तर पर कई अच्छे प्रयास किये जा सकते हैं। बड़े बांधों की लागत की तुलना में लाभ बहुत ही कम है और यह यह तथ्य कई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों ने भी विभिन्न रिपोर्ट्स में स्वीकार किया है और दुनिया के विकसित देश बड़े बांधों की बजाय अन्य विकल्पों पर विचार मंथन कर आगे बढ़ रहे हैं।

महोदय, प्रस्तावित गंजाल एवं मोरंड संयुक्त सिंचाई परियोजना के बारे में एक बार आपकी सरकार पुनः विचार कर एक बड़े वन क्षेत्र को जलमग्न होने से बचा सकती है। साथ ही सैकड़ों परिवारों को उजड़ने से रोक कर एक संस्कृति को बचा सकती है। अतः माननीय महोदय से हम सभी सविनय अनुरोध करते हैं कि इस परियोजना के संदर्भ में मानवीय दृष्टिकोण के साथ ही पर्यावरणीय एवं आर्थिक पक्षों को ध्यान में रखते हुए एक बार पुनर्विचार अवश्य करें।

धन्यवाद।"

इस मसले पर नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ सक्रिय अमूल्य निधि का कहना है, ‘‘यह एक विडंबना ही है कि आज जब मध्यप्रदेश के धार, अलीराजपुर, बड़वानी ज़िलों के 178 गांव सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर से अपनी ज़िन्दगी से संघर्ष कर रहे हैं, तब एनवीडीए एक और बड़ा बांध बनाने की तैयारी कर रहा है जो कि निश्चित ही प्रदेश के हित में नहीं है। एक ओर सरकार सरदार सरोवर प्रभावितों के पुनर्वास में मदद नहीं कर रही है, तो दूसरी ओर 1800 करोड़ रुपये का टेंडर एक बड़े बांध के लिए निकाल रही है। इससे लगता है कि सरकार की संवेदनशीलता सिर्फ़ भाषणों तक ही सीमित है।’’

Madhya Pradesh
aadiwasi
29 major dam projects
Narmada River
Narmada Valley Development Authority
NVDA
tribal communities
tribal rights

Related Stories

नर्मदा के पानी से कैंसर का ख़तरा, लिवर और किडनी पर गंभीर दुष्प्रभाव: रिपोर्ट

परिक्रमा वासियों की नज़र से नर्मदा

कड़ी मेहनत से तेंदूपत्ता तोड़ने के बावजूद नहीं मिलता वाजिब दाम!  

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

गुजरात: पार-नर्मदा-तापी लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ने की तैयारी!

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

एमपी ग़ज़ब है: अब दहेज ग़ैर क़ानूनी और वर्जित शब्द नहीं रह गया

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License