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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान कृषि कानूनों का क्यों विरोध कर रहे हैं ?
नवीनतम कृषि कानूनों में जहाँ ठेके पर खेती किये जाने की बात सुझाई गई है, जिसके बारे में किसानों का मानना है कि यह कुलमिलाकर उन्हें उनके सबसे अमूल्य धरोहर, उनकी जमीनों से उन्हें बेदखल कर देगा।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
01 Dec 2020
पश्चिमी उत्तर प्रदेश

“अभी कुछ दिन पहले ही मैं अपनी किडनी की सर्जरी कराकर लौटा हूँ, और यह अभी भी दर्द कर रहा है। मैं इस दर्द को बर्दाश्त कर सकता हूँ, लेकिन सरकार ने हमें जिस पीड़ा से दो-चार करा रखा है, वह निश्चित तौर पर हमें मार डालेगी। यह असहनीय है और इसी के वास्ते मैं इसका विरोध करने के लिए दिल्ली जा रहा हूँ” किसान हरिराज सिंह के ये शब्द पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच में हाल ही में अधिनियमित किये गए कृषि कानूनों के प्रति उनके अविश्वास और पीड़ा को बयाँ करते हैं।

न्यूज़क्लिक की टीम की मुलाक़ात उत्तर प्रदेश में बिजनौर के किसान हरिराज सिंह से मेरठ से दिल्ली के रास्ते में हुई, जब किसान भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के विरोध प्रदर्शन के आह्वान दिए जाने पर राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच करने के लिए इकट्ठा हुए थे। न्यूज़क्लिक ने इस दौरान सिंह सहित अन्य किसानों से बातचीत की, जिसमें उन्होंने खेती-किसानी के उपर लगातार छाए हुए संकट के बारे में अपनी व्यथा का विवरण दिया कि किस प्रकार से यह उनकी जिन्दगी में कभी न खत्म होने वाली ऋणग्रस्तता और कष्टों को बढ़ाता जा रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को इसके गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है और यहाँ पर सिम्भावली एवं मवाना सहित कई प्रमुख चीनी मिलें मौजूद हैं। गन्ने की खेती ने यहाँ के किसानों के लिए भरपूर लाभ और समृद्धि लाने का काम किया था, जिसके चलते उन्होंने धान और गेंहूँ की खेती करना करीब-करीब छोड़ रखा है। लेकिन निजी मिलों द्वारा भुगतान करने में देरी ने ऐसा लगता है इनकी जिन्दगी में कहर ढा दिया है। जबकि नवीनतम कृषि कानूनों में अनुबंध खेती की सलाह के बारे में किसानों का मानना है कि यह कुलमिलाकर उन्हें उनकी सबसे अमूल्य धरोहर, उनकी जमीनों से उन्हें बेदखल कर देने वाला साबित होने जा रहा है। 

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सिंह का कहना था “इन नए कानूनों के लिए सरकार से किसी ने भी नहीं कहा था। क्या इसने किसी भी किसान या किसानों के संगठन को यह जानने के लिए आमंत्रित किया था कि हम क्या चाहते हैं? नहीं, यह सिर्फ हमारे उपर कानूनों को थोपने का काम कर रही है!”

वे आगे तर्क पेश करते हैं कि यदि केंद्र की कोई गलत मंशा नहीं थी, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोहरा रहे हैं कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना जारी रहेगा, तो इस बारे में कानूनों में दो लाइन जोड़ देने में किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए थी। “आखिर इसे लिखने में यह संकोच क्यों है?” उनका सवाल था।

किसान इस इलाके में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य मिथ्या अहसास पर भी प्रकाश डालते हैं। सिंह ने कहा “हमारे सामने सबसे बड़ी बाधा हमारे क्षेत्र में खरीद केन्द्रों के सीमित संख्या में होने की वजह से झेलनी पड़ रही है। सरकार सिर्फ दो महीने के लिए इन केन्द्रों को खोलती है। मैं अभी अपनी उपज को नहीं बेचना चाहता लेकिन मेरे पास कोई और चारा भी नहीं है और इससे मुझे नुकसान हो रहा है।”

उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा “उदहारण के लिए सरकार ने गेंहूँ की खरीद के लिए एमएसपी मूल्य 1,975 रूपये प्रति कुंतल की घोषणा की। लेकिन जब मैं बाजार में जाता हूँ तो मुझे इसका कोई खरीदार नहीं मिलता, और मुझे इसे 1,500 रूपये के भाव में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जब मैं अपनी लागत का हिसाब लगाता हूँ तो मैं पाता हूँ कि मुझे एक बीघे में तीन कुंतल की पैदावार के लिए 4,500 रूपये तक की लागत पड़ रही है, ठीक उतना ही जितना बाजार में मुझे इसके दाम मिल रहे हैं। तो फिर प्रॉफिट कहाँ गया? जबकि मोदी जी अपनी हर सभाओं में यही दोहराते रहते हैं कि किसानों की आय को 2022 तक दोगुना कर दिया जाएगा। क्या इस तरह से हमें दुगुनी आय मिलने जा रही है? मुझे नहीं लगता। हमारी लागत बढ़ चुकी है। हमें अपने बिजली के बिलों के लिए 18,000 रूपये का भुगतान करना पड़ रहा है। गन्ने के मामले में यह लगातार चौथा वर्ष है जब इसकी एसएपी (यूपी सरकार द्वारा जारी की जाने वाली राज्य सलाहकारी मूल्य) में कोई वृद्धि नहीं की गई है। हमारे बकाया बिलों का भुगतान पिछले एक साल से भी अधिक समय से चीनों मिलों के पास लंबित पड़े हैं, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। हम इस पर कैसे भरोसा कर सकते हैं?

एक अन्य किसान ने न्यूज़क्लिक से बातचीत के दौरान बताया कि गन्ने की शुरुआती किस्म के लिए एसएपी पिछले चार वर्षों से लगातार 325 रूपये प्रति कुंतल पर रुकी पड़ी है, जबकि इस अवधि के दौरान लागत में लगातार बढ़ोत्तरी का रुख जारी रहा है। उनका कहना था “हमने नरेंद्र मोदी को अपना समर्थन दिया था क्योंकि उन्होंने वादा किया था कि हमें 14 दिनों के भीतर भुगतान चुकता कर दिया जायेगा। अब यहाँ पर एक साल से भी अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन मिलों से भुगतान के बारे में कोई सुराग नहीं मिल रहा है।” स्वतंत्र अनुमान सुझाते हैं कि इन मिलों के पास किसानों की सामूहिक बकाया धनराशि करीब 12,000 करोड़ रूपये तक का है।

बीकेयू के पदाधिकारी धरमेंदर मलिक इस क्षेत्र में खेती-किसानी के अर्थशास्त्र और नीतियों के बारे में, जिसके चलते यह उदासीनता बनी है का खुलासा करते हैं। उनके अनुसार “अगर मैं खेतीबाड़ी की लागत से शुरू करता हूँ तो यह फसल और भूमि के आकार के साथ भिन्न-भिन्न हो सकती है। इसको लेकर किसी सर्वसम्मति पर पहुँच पाना काफी मुश्किल हो सकता है, लेकिन जब हम लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और जीबी पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के निष्कर्षों पर निगाह डालते हैं तो हम पाते हैं कि उनके द्वारा काम पर रखे गये किसानों की लागत धान के लिए 1,800 रूपये और गेंहूँ के लिए 2,000 रूपये तक आई है। यदि हम स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हैं तो धान के लिए 27000 और गेंहूँ के लिए 3000 रूपये तक की एमएसपी मिलनी चाहिए।

वे आगे कहते हैं “फसल कटाई के बाद अगली सबसे बड़ी बाधा खरीद केन्द्रों और उससे जुड़े भ्रष्टाचार को लेकर है। उत्तरप्रदेश में हमारे पास हर 25 गावों के लिए एक खरीद केंद्र है, जबकि पंजाब में यह अनुपात हर दो गावों पर एक खरीद केंद्र का है। चूँकि खरीद केन्द्रों पर लंबी कतारें बनी रहती हैं, ऐसे में निजी खिलाडी किसानों के पास आ जाते हैं और बेहद कम कीमतों पर खरीद करने में सफल रहते हैं। उसी उपज को बाद में शाम के समय इन्हीं खरीद केन्द्रों पर बेच दिया जाता है और खाद्य निगम इसे खरीद लेता है।”

उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त यहाँ पर समन्वयकारी मशीनरी का भी अभाव है, जिसके कारण बिचौलिए और इस प्रकार की ताकतें इसका फायदा उठा लेती हैं। उनके अनुसार “एक किसान संगठन के तौर पर हम साफ़-साफ़ देख पाते हैं कि विभिन्न मंत्रालयों के बीच में आपसी समन्यवय की कमी है और नीतियां आयातकों के पक्ष में झुकी हुई हैं। किसानों से संबंधित तकरीबन 27 मंत्रालय हैं, लेकिन एक भी कोई ऐसा साझा मंच नहीं है जहाँ वे एक दूसरे के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बिठा सकें। उदाहरण के लिए आयात को लेकर फैसला वाणिज्य मंत्रालय द्वारा लिया जाता है, इसमें कृषि मंत्रालय का कोई योगदान नहीं रहता। किसानों को संकटग्रस्त हालत में छोड़ वाणिज्य मंत्रालय ही विश्व व्यापार संगठन के साथ विभिन्न समझौतों पर भी दस्तखत करने का काम करता है। अनाजों की किल्लत के नाम पर सरकार आयात के लिए टेंडर जारी कर देती है। इसकी खरीद में महीनों का समय लग जाता है और यह तब जाकर पहुँचती है जब हमारी फसल तैयार होने को रहती है। और इस प्रकार हमें अपनी फसलों के उचित दाम नहीं मिलते। एक प्रमुख उदाहरण मक्के का हमारे सामने है, जिसके लिए सरकार ने 1800 रूपये की एमसपी घोषित की थी, लेकिन बाजार में कोई भी इसके 800 रूपये देने को तैयार नहीं था। इसलिये हमारी माँग है कि इस भेदभावपूर्ण नीति को खत्म किया जाए।”

मलिक सरकार की खरीद की नीति और एमएसपी निर्धारण को लेकर भी नाराज हैं। उनका कहना था “इस बारे में हमारी यह समझ बनी है कि सरकारी अधिकारी एमएसपी को निरंतर कम पर बनाए रखने में रूचि रखते हैं, क्योंकि वे कम से कम कीमतों पर अनाज की खरीद करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये गरीबों के बीच में वितरित करना होता है। मुझे उनकी मंशा को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। हम राष्ट्र को भोजन उपलब्ध कराने के लिए ही अन्न का उत्पादन करते हैं। लेकिन इसे इतना भी कम नहीं होना चाहिए कि हमारी प्लेटें खाली रहें और हमारे बच्चे निरक्षर बने रहें और हमेशा के लिए कर्ज के दलदल में फंसे रहें।”

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

MSP, Debt Crisis: Why Farmers in Western UP Are Protesting Against Farm Laws

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