NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
फ्रांस में मैक्राँ की जीत से दुनियाभर में राहत की सांस
दुनिया भर की: रविवार को हुए मतदान में मैक्राँ को 58.55 फीसदी वोट मिले। दक्षिणपंथी ला पेन ने अगर मौजूदा राष्ट्रपति मैक्राँ को हराकर उलटफेर कर दिया होता तो खासी बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल हो जाती।
उपेंद्र स्वामी
25 Apr 2022
Emmanuel Macron
फोटो साभार: रायटर्स

फ्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए रविवार को हुए निर्णायक दौर के चुनावों में इमेन्युएल मैक्राँ की जीत से एक तरह से मौजूदा विश्व व्यवस्था और खास तौर पर यूरोप ने राहत की बड़ी सांस ली है। दक्षिणपंथी ला पेन ने अगर मौजूदा राष्ट्रपति मैक्राँ को हराकर उलटफेर कर दिया होता तो खासी बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल हो जाती।

रविवार को हुए मतदान में मैक्राँ को 58.55 फीसदी वोट मिले। यानी ला पेन को मिले मतों का प्रतिशत 42 फीसदी से थोड़ा कम रहा। वहां पहले दौर का मतदान 10 अप्रैल को हुआ था जिसमें मैदान में उतरे कुल 12 प्रत्याशियों में से मैक्राँ व पेन पहले दो स्थानों पर रहे और उसके बाद रन-ऑफ यानी निर्णायक दौर का मतदान रविवार को हुआ।

मैक्राँ व पेन का मुकाबला 2017 में हुए पिछले चुनावों का दोहराव ही था। उस समय भी ये दोनों ही भिड़े थे लेकिन इस बार अंतर यह था कि मैक्राँ अब राजनीतिक रूप से नौसिखिए नहीं रह गए थे। दूसरा, पेन ने भी 2017 की तुलना में अपनी छवि में काफी बदलाव लाया था। पिछले महीने भर में जो माहौल बन रहा था, उसमें एकबारगी यह आशंका मंडराने लगी थी कि कहीं पेन उलटफेर में कामयाब न हो जाएं। कई ओपिनियन पोल में दोनों के बीच अंतर महज कुछ अंकों का रह गया था। लेकिन फ्रांस के मतदाताओं ने पूरी समझदारी दिखाई और मैक्राँ फ्रांस में पिछले बीस सालों में दूसरी बार चुनाव जीतने वाले पहले राष्ट्रपति बन गए।

यूरोप इस समय पहले ही यूक्रेन संकट में उलझा हुआ है, ऐसे में अगर ला पेन चुनाव जीतती तो यूरोप की राजनीति में घमासान मच जाता। यूरोपीय यूनियन व पश्चिम के साथ फ्रांस के रिश्तों में बुनियादी तौर पर बदलाव आ जाता। ब्रेक्जिट के बाद फ्रांस व जर्मनी ही इस समय यूरोपीय संघ में नेतृत्व की भूमिका में हैं। यूरोप के तमाम लोग इस राजनीतिक विचलन के दौर से परेशान है जिसके परिणति वे ब्रेक्जिट, अमेरिका में 2016 में ट्रंप की जीत और फिर यूरोप में दक्षिणपंथ के उभार के तौर पर देख रहे हैं।

हालांकि फ्रांस की अंदरुनी राजनीति के लिहाज से देखें तो जीत इतनी सहज भी नहीं है। खुद मैक्राँ मानते हैं कि उनका पिछला कार्यकाल संतोषजनक नहीं रहा है और उन्हें अपना प्रदर्शन काफी सुधारने की जरूरत है। उन्होंने इस हकीकत को भी स्वीकार किया कि कई लोगों ने सिर्फ ला पेन को न जीतने देने के लिए उन्हें वोट दिया क्योंकि वे फ्रांस में धुर दक्षिणपंथी शासन नहीं चाहते थे।

हाल के सालों में यूरोप के कई अन्य देशों की ही तरह फ्रांस में भी सामाजिक विभाजन और तीखा हुआ है। हमने पिछले साल भी कुछ नतीजों में देखा कि भले ही वहां प्रगतिशील खेमों को जीत मिली हो लेकिन दक्षिणपंथी गुट व पार्टियां भी उतनी ही मजबूत हुई हैं।

फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी उतनी मजबूत स्थिति में नहीं है। पहले दो साल की महामारी और फिर इस साल के शुरू से यूक्रेन के संकट ने दबाव खासा बढ़ा दिया है। यही वजह है कि चुनावों से ऐन पहले आर्थिक मुद्दे काफी हावी हो गए थे। वरना, ला पेन के प्रचार तंत्र में शुरू में भारत के दक्षिणपंथ ही की ही तरह इस्लामाफ़ोबिया और हिजाब जैसे मुद्दे प्रमुख चल रहे थे।

नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि मैक्राँ को लोगों के बीच जाकर हालात को समझना होगा। उन्हें अपनी कार्यशैली में थोड़ी राजनीतिक परिपक्वता लानी होगी। वरना कुछ हलकों में उन्हें घमंडी कहा जाने लगा था। यह इस बात से भी साबित होता है कि इन चुनावों में मतदान का प्रतिशत कम हुआ है। चुनावी आंकड़ों में वोट न देने वालों का प्रतिशत 1969 के बाद से सबसे ज्यादा बताया जा रहा है। इससे भी साफ होता है कि लोगों में मैक्राँ से नाराजगी तो थी लेकिन वे ला पेन को भी जीतते नहीं देखना चाहते थे।

मैक्राँ के लिए यह जीत फौरी राहत का मसला तो हो सकती है लेकिन अभी संसदीय चुनावों के रूप में एक जंग और बाकी है। मैक्राँ के दूसरे कार्यकाल का प्रदर्शन संसदीय चुनाव के नतीजों पर ही निर्भर करेगा।

ला पेन की निगाहें अब संसदीय चुनावों के लिए ‘राष्ट्रवादी’ गठजोड़ बनाने पर हैं और इसके लिए वह धुर दक्षिणपंथी गठजोड़ बनाने में लगी हैं। देखना यह भी होगा कि संसदीय चुनावों में वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन कैसा रहता है। ज्यां-लुक मेलेंकाँ सबसे प्रमुख वाम चेहरे के तौर पर उभरे हैं। वह राष्ट्रपति पद के चुनावों में पहले दौर के उम्मीदवारों में एक थे। पहले दौर में उन्हें वोट देने वालों में से ज्यादातर ने दूसरे दौर में मैक्राँ को अपना वोट दिया। लेकिन विश्लेषक इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मतदाता यथास्थितिवाद से नाराज हैं। इसका बड़ा संकेत इस आंकड़ों से मिलता है कि पहले दौर में एक दर्जन उम्मीदवारों में से 57 फीसदी से ज्यादा वोट या तो धुर दक्षिणपंथी या फिर धुर वामपंथी उम्मीदवारों को मिले।

लेकिन यहां एक और मजेदार बात देखने वाली है। जैसा कि हमने पहले कहा, ला पेन ने 2017 की हार के बाद से निरंतर अपनी छवि में सुधार करने की कोशिश की है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि ला पेन की आर्थिक नीतियों में जिस तरह का वामपंथी झुकाव देखने को मिला, वैसा उनकी पार्टी में दशकों से देखा नहीं गया। यह मतदान के आंकड़ों के शुरुआती विश्लेषण से भी देखने को मिलता है कि वर्किंग क्लास के दो-तिहाई वोट ला पेन को गए, वहीं सफेदपोश कामगारों व पेंशनरों में दो-तिहाई वोट मैक्राँ को गए। ला पेन ने प्रचार में जीवनयपान के बढ़ते खर्च के मुद्दे उठाए, ईंधन पर कर में कटौती का बात कही और जरूरी वस्तुओं पर बिक्री कर हटाने तक का पक्ष लिया। नौकरियों व जनकल्याण के मुद्दों पर उनका प्रचार ज्यादा आक्रामक रहा। मतदान में उम्र व आर्थिक हैसियत के हिसाब से काफी तीखा विभाजन देखने को मिला। मैक्रां को 18-24 साल के युवाओं के 59 फीसदी वोट मिले।

अंत में मसला शायद विश्व मंच पर फ्रांस की छवि का रहा होगा जिसने लोगों को वोट का विकल्प चुनने की राह दिखाई होगी। अतीत में पुतिन की तरफदारी भी शायद ला पेन को भारी पड़ी और यह डर भी कि कहीं ला पेन फ्रांस को यूरोपीय संघ से बाहर न ले जाएं। वह फ्रांस को नाटो से भी बाहर करने के इरादे जाहिर करती रही हैं।

फिलहाल फ्रांस के नतीजे उस यथास्थिति को ही कायम रखने की पुष्टि करते हैं जिसमें सभी सुकून में हैं। लेकिन संसदीय चुनावों के बाद यह ज्यादा स्पष्ट होगा कि फ्रांस की राजनीतिक दिशा कैसी रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

France
French President
Emmanuel Macron

Related Stories

मैक्रों की जीत ‘जोशीली’ नहीं रही, क्योंकि धुर-दक्षिणपंथियों ने की थी मज़बूत मोर्चाबंदी

कीव में झूठी खबरों का अंबार

माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है

मॉस्को कर रहा है 'गुड कॉप, बैड कॉप' का सामना

अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन को आतंकवाद का स्रोत नहीं बनना चाहिए : भारत, फ्रांस

विशेष : पांडिचेरी के आज़ादी आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका

AUKUS पर हंगामा कोई शिक्षाप्रद नज़ारा नहीं है

कटाक्ष: ये जासूसी-जासूसी क्या है?

क़यामत का एक निरर्थक गिरजाघर

अतिदक्षिणपंथी और मैक्रोनवादी फ़्रांस का क्षेत्रीय चुनाव हार गए, जबकि ट्रेडिशनल पार्टियों ने बनाई पकड़


बाकी खबरें

  • Kashmir press club
    राज कुमार
    जम्मू-कश्मीर में मीडिया का गला घोंट रही सरकार : प्रेस काउंसिल
    15 Mar 2022
    ग़ौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने सितंबर 2021 में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को एक पत्र लिखा था और मांग की थी कि काउंसिल एक फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम भेजकर जम्मू-कश्मीर में…
  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: हेमंत सरकार ने आदिवासी समूहों की मानी मांग, केंद्र के ‘ड्रोन सर्वे’ कार्यक्रम पर लगाईं रोक
    15 Mar 2022
    ‘ड्रोन सर्वे’ और ‘ज़मीन की डिजिटल मैपिंग’ कार्यक्रम के खिलाफ आवाज़ उठा रहे सभी आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।
  • अजय कुमार
    रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
    15 Mar 2022
    आर्थिक जानकारों का कहना है कि सरकार चाहे तो कच्चे तेल की वजह से बढ़े हुए ख़र्च का भार ख़ुद सहन कर सकती है।
  • रौनक छाबड़ा
    ईपीएफओ ब्याज दर 4-दशक के सबसे निचले स्तर पर, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आम हड़ताल से पहले खोला मोर्चा 
    15 Mar 2022
    ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने शनिवार को वित्त वर्ष 2021-22 के लिए अपनी मौजूदा ब्याज दर को 8.5% से घटाकर 8.1% करने की सिफारिश की है। 
  • सतीश भारतीय
    हरियाणा के बजट पर लोगों की प्रतिक्रिया 
    15 Mar 2022
    सरकार बजट को आंकड़ों की लफ़्फ़ाज़ी के साथ पेश तो कर देती है। मगर अधिकतर पढ़े लिखे और आम लोग बजट के बारे में ढंग से जानते नहीं है। क्योंकि उन्हें लगता है कि बजट का उन्हें सीधे तौर पर कोई वाजिब लाभ नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License