NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राजनीति के भंवर में किताबों का महाकुंभ
मेले में इस बार हमारे पड़ोसी देश-पाकिस्तान,बांग्लादेश और अफगानिस्तान का कोई प्रकाशक नहीं आ रहा है। दरअसल, उन्हें इस बार विश्व पुस्तक मेले में आमंत्रित ही नहीं किया गया है।
प्रदीप सिंह
03 Jan 2020
book fair

किताबों का महाकुंभ यानी विश्व पुस्तक मेला (World Book Fair 2020) शनिवार से शुरू हो जाएगा। 4-12 जनवरी तक चलने वाले 28वें नई दिल्ली वर्ल्ड बुक फेयर (NDWBF) का उद्घाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ करेंगे। नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) और आईटीपीओ द्वारा आयोजित मेले की थीम इस बार ‘‘लेखकों के लेखक महात्मा गांधी’’ रखी गई है, जो खासतौर से महात्मा गांधी के जीवन और लेखन पर केंद्रित है।

महात्मा गांधी एक सफल लेखक, संपादक और प्रकाशक थे। उन्होंने गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में लिखा। उनके लेखन ने न केवल अहिंसा और शांति के उनके दर्शन को प्रतिबिंबित किया, बल्कि देश के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को भी एक अंतर्दृष्टि दी। इस वर्ष थीम के मुताबिक पुस्तक प्रेमियों को यह बताने का प्रयास किया जाएगा कि,  “एक बड़े राजनीतिक शख्सियत होते हुए भी कैसे महात्मा गांधी ने लेखकों को पीढ़ियों तक प्रभावित व प्रेरित किया और कैसे बाद के लेखकों ने उनकी प्रेरणा को अपने लेखन में शब्दों के माध्यम से प्रकट किया।”

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष प्रो. गोविन्द प्रसाद शर्मा ने कहा कि इस वर्ष भारत महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। मेले में विशेष रूप से तैयार किए गए मंडप में गांधी द्वारा और गांधी पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखी गईं 500 पुस्तकों की प्रदर्शनी भी लगायी जाएगी।
लेकिन गांधी थीम पर आयोजित होने वाला यह पुस्तक मेला उनके विचार,दर्शन और लेखन की जरा भी परवाह नहीं कर रहा है।
Press Conf_0758.jpg
गांधी जी अपने पड़ोसियों से शांति और सहयोगात्मक संबंध रखने की बात करते थे। थीम के विपरीत मेले में इस बार हमारे पड़ोसी देश-पाकिस्तान,बांग्लादेश और अफगानिस्तान का कोई प्रकाशक नहीं आ रहा है। दरअसल, उन्हें इस बार विश्व पुस्तक मेले में आमंत्रित ही नहीं किया गया।

मेले के आयोजक संस्थान नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रो.गोविंद प्रसाद शर्मा बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं, “आप सब लोग जानते हैं बहुत चीजें राजनीति के कारण नहीं हो पाती हैं।पाकिस्तान को इस बार राजनीतिक कारणों से नहीं आमंत्रित किया गया।”

पड़ोसी देशों को आमंत्रित न करने के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी कहते हैं कि, “ एनबीटी ने तीन पड़ोसी राष्ट्रों को विश्व पुस्तक मेले में न बुलाकर भारत सरकार के मुस्लिम विरोधी नीति की ही पुष्टि की है। ज्ञान के क्षेत्र में धर्म-मजहब और राजनीति को घसीटने से फांसीवादी प्रवृत्तियों को ही बढ़ावा मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि देश का वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान साफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर तेजी से चल पड़ा है। अफगानिस्तान जो पिछले कई वर्षों से अशांत है,उसे न बुलाकर दिल्ली ने एक बड़ा राजनीति-कूटनीतिक भूल की है। इसी तरह बाग्लादेश 1972 से भारत का दोस्त रहा है। उसके प्रति भी इस तरह का रवैया नामंजूर है।”

सीधे-सीधे कहा जा सकता है कि विश्व पुस्तक मेले पर नागरिकता संशोधन कानून का असर है। सरकार के निर्देश पर तीन पड़ोसी देशों को नहीं बुलाया गया। पिछले पुस्तक मेले में पड़ोसी चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल समेत करीब 20 देशों के प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था। पुस्तक मेला आयोजकों ने सिर्फ तीन पड़ोसी देशों का ही बॉयकाट नहीं किया है बल्कि इस बार पुस्तक मेले में कोई ‘अतिथि देश’ भी नहीं है।

पिछली बार बुक फेयर में शारजाह 'अतिथि देश' के तौर पर शिरकत किया था। इस बार ‘अतिथि देश’  नहीं चुनने के सवाल पर एनबीटी का डायरेक्टर नीरा जैन कहती हैं,  “ प्रगति मैदान में निर्माण के चलते इस बार निर्णय किया गया कि किसी देश के स्पेशल तौर पर नहीं बुलाया जाएगा। जब परिसर में निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा और प्रर्याप्त जगह उपलब्ध होगा तब अतिथि देश को बुलाया जाएगा।”

ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रगति मैदान में हर चीज के लिए स्पेस उपलब्ध है तो सिर्फ अतिथि देश के लिए ही जगह की कमी क्यों है? संभावना है कि राजनीतिक दबाव के चलते एनबीटी ने अतिथि देश को आमंत्रित करने से मना कर दिया।

प्रो. गोविंद प्रसाद शर्मा ने बताया कि, “इस वर्ष लगभग छह सौ से अधिक प्रकाशक विभिन्न भाषाओं में अपनी पुस्तकें तेरह सौ से अधिक स्टॉलों पर प्रदर्शित करेंगे। ये पुस्तकें विभिन्न भाषाओं जैसे बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, मैथिली, मलयालम, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू में होंगी।”

पुस्तक मेला जनता के लिए प्रत्येक दिन 11 बजे से रात्रि आठ बजे तक खुला रहेगा। इस अवसर पर भारतीय व्यापार संवर्धन संस्थान के अधिशाषी निदेशक, राजेश अग्रवाल ने बताया कि मेले को आगंतुकों के लिए सुलभ बनाने हेतु आईटीपीओ ने विशेष प्रबंध किए हैं। स्कूल यूनिफॉर्म में आने वाले स्कूली बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों का प्रवेश निःशुल्क होगा। लेकिन स्कूली बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को छूट देने के बावजूद अन्य टिकट का दाम बढ़ा दिया गया है।

पिछली बार जहां टिकट का मूल्य बच्चों के लिए दस रुपये व वयस्कों के लिए बीस रुपये रखा गया था वहीं, इस बार बच्चों का 20 और वयस्कों के लिए 30 का टिकट रखा गया है। एनबीटी की निदेशक नीरा जैन ने बताया की मेले में 600 से अधिक प्रकाशक होंगे तथा 1300 से अधिक स्टाल होंगे जो की 23 हज़ार वर्ग मीटर पर फैला हुआ है। मेले में 20 से अधिक विदेशी प्रतिभागी भी होंगे। एनबीटी द्वारा युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नवलेखन प्रोत्साहन योजना’ शुरू की है।
 
कहा जाता है कि ‘बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है।’ लेकिन बेहतर किताबों तक पहुंचने के रास्ते में राजनीति जब-तब रोड़ा बन कर खड़ी हो जाती है। किताबों और प्रकाशकों पर राजनीतिक बंदिश किसी भी सभ्य समाज और लोकतंत्र के लिए सही नहीं कहा जा सकता है।  

(प्रदीप सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

World Book Fair 2020
National Book Trust
Religion Politics
CAA
Books fair and Politics
Pakistan
Bangladesh
Afganistan

Related Stories

जम्मू-कश्मीर के भीतर आरक्षित सीटों का एक संक्षिप्त इतिहास

शाहीन बाग़ : देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ!

शाहीन बाग़ ग्राउंड रिपोर्ट : जनता के पुरज़ोर विरोध के आगे झुकी एमसीडी, नहीं कर पाई 'बुलडोज़र हमला'

चुनावी वादे पूरे नहीं करने की नाकामी को छिपाने के लिए शाह सीएए का मुद्दा उठा रहे हैं: माकपा

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

लाल क़िले पर गुरु परब मनाने की मोदी नीति के पीछे की राजनीति क्या है? 

शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार

‘हेट स्पीच’ के मामले 6 गुना बढ़े, कब कसेगा क़ानून का शिकंजा?

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License