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महाराष्ट्र: समुद्री तट के 'गोल्डन बेल्ट' में बंदरगाह बनाने को लेकर मछुआरे और किसानों का विरोध
बंदरगाह के निर्माण से लगभग एक लाख परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी और इसका प्रभाव 13 गांवों पर पड़ेगा और यहां की करीब चालीस प्रतिशत आबादी के सामने रोज़ीरोटी का संकट खड़ा होगा।
शिरीष खरे
07 Jan 2021
स्थानीय स्तर पर इस परियोजना के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू हो चुका है। तस्वीर: सोशल मीडिया से
स्थानीय स्तर पर इस परियोजना के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू हो चुका है। तस्वीर: सोशल मीडिया से

पालघर: महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से लगे पालघर जिले के समुद्री तट पर स्थित तथा पर्यावरण के लिए अति संवेदनशील क्षेत्र वाढवण में बंदरगाह निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों में भारी असंतोष है। लोगों का आरोप है कि इस परियोजना के अंतर्गत पर्यावरण को होने वाले नुकसान का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। इस परियोजना के विरोध का दूसरा कारण यह है कि जैव विविधता और मछुआरों तथा किसानों की आजीविका की दृष्टि से यह पूरी पट्टी 'गोल्डन बेल्ट' के नाम से जानी जाती है। इसलिए बंदरगाह का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इसके निर्माण से लगभग एक लाख परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। इस परियोजना का प्रभाव 13 गांवों पर पड़ेगा और यहां की करीब चालीस प्रतिशत आबादी के सामने रोजीरोटी का संकट खड़ा होगा। 

बता दें कि वाढवण स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट की यह बंदरगाह परियोजना पांच हजार एकड़ समुद्री क्षेत्र में स्थापित की जा रही है। इसके तहत समुद्र तट से चार किलोमीटर लंबा और 20 मीटर गहरा एक ढांचा तैयार किया जाएगा। वर्ष 2028 तक कुल 38 माल गोदाम बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यहां से कोयला, सीमेंट, रसायन और तेल आदि चीजों का सालाना 132 मिलियन टन माल का परिवहन किया जा सकता है। इस बंदरगाह के लिए 350 किलोमीटर लंबी सड़क और 12 किलोमीटर लंबी रेललाइन का निर्माण किया जाएगा।

वर्ष 1995 में एक निजी कंपनी ने पहले भी इस परियोजना का निर्माण शुरू किया था। लेकिन, तब भी भारी जनविरोध के कारण तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इस परियोजना का काम रोक दिया गया था। इसके अलावा डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण ने परियोजना के खिलाफ दायर एक याचिका पर निर्णय लेते हुए वर्ष 1998 में इस बंदरगाह के निर्माण को स्थगित कर दिया था।

ग्राम पंचायत स्तर पर इस योजना को अनुमति नहीं दी गई है। तस्वीर: सोशल मीडिया से

उसके बाद वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'ड्रीम प्रोजेक्ट' बताया। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (74%) और महाराष्ट्र सागर मंडल (26%) की भागीदारी से 65 हजार करोड़ रुपए की लागत से पुन: निर्माण कार्य शुरू करने की मंशा जाहिर की गई थी। वहीं, परियोजना समर्थकों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि प्रस्तावित बंदरगाह 24 घंटे चालू रहेगा, इस से पूरे क्षेत्र का तेजी से विकास होगा।

दूसरी तरफ, बंदरगाह परियोजना का स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हो रहा है। इस बारे में वाढवण की सरपंच हेमलता बालाशी बताती हैं, "यह परियोजना पारंपरिक कृषि, बागवानी और मछलीपालन से जुड़े एक लाख परिवारों के लिए नुकसानदायक साबित होगी। स्थानीय लोगों ने कई सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर एक संघर्ष समिति बनाई है। इस समिति के बैनर के तले हम सभी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।" इसके साथ ही पूरी परियोजना के विरोध का प्रमुख आधार जैव विविधता के लिए का खतरा बताया जा रहा है। खासकर अनेक तरह की मछलियों को ध्यान में रखते हुए यह समुद्री क्षेत्र जलीय जीव-जंतुओं का घर माना जाता है। ऐसे में यदि यहां बंदरगाह बनाया जाता है तो सबसे बुरा असर एक दर्जन से अधिक गांवों के मछुआरों की आजीविका पर और जैव विविधता के लिए खतरा साबित होगा।

दरअसल, समुद्र की इस पट्टी पर चट्टानें हैं इसलिए मछली की कई प्रजातियां प्रजनन के लिए यहां आती हैं। यही वजह है कि बंदरगाह बनने के बाद आने वाले समय में ऐसी मछलियों की प्रजनन प्रक्रिया और उनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी आशंका यह है कि मालवाहक नावों से निकलने वाला ज्वार का पानी खाड़ी क्षेत्र में घुसपैठ करेगा और कृषि भूमि को नुकसान पहुंचाएगा। परियोजना विरोधियों का मानना है कि कई किलोमीटर लंबा तटबंध बनाने से समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा और इसका असर समुद्र के किनारों पर पड़ेगा। अर्नाला मच्छीमार संस्था के उपाध्य्क्ष हिराजी तारे बताते हैं, "इससे मछली पालन का पूरा व्यवसाय ध्वस्त हो जाएगा, मछुआरे भाग जाएंगे और पूरे इलाके की समृद्ध खेती खत्म हो जाएगी। इसके अलावा, बंदरगाह के लिए बड़ी संख्या में कंटेनर यार्ड बनाए जाएंगे, विदेशियों को बंदरगाह में काम करने के लिए भुगतान किया जाएगा, इससे इस इलाके की संस्कृति बिगड़ेगी।" वहीं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस परियोजना को लेकर उनसे कोई राय नहीं ली गई है। इनका यह भी कहना है कि पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन संतोषजनक ढंग से नहीं किया गया है।

बंदरगाह के विरोध में पूरे जगह-जगह बंद आयोजित किए जा रहे हैं। तस्वीर: सोशल मीडिया से

एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वर्ष 1991 से इस पूरे क्षेत्र को पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। इसकी वजह से यहां विकास से जुड़ी कई परियोजना पहले से ही लंबित हैं। हालांकि, बंदरगाह परियोजना को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इसे 'उद्योग' के रूप में नहीं गिनने का फैसला लिया है। इसके अलावा, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रक्रिया में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को अनुमति देने के लिए भी उसे मौलिक रूप से बदल दिया गया है। वहीं, प्रस्तावित बंदरगाह के लिए नियमों के लिए दी जा रही ढील का शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के विधायकों ने विरोध किया है।

इस बंदरगाह के विरोध के लिए स्थानीय स्तर पर आंदोलन शुरू हो चुका है। एक स्थानीय निवासी नरेन्द्र पाटिल बताते हैं, "यहां के लोगों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर एंटी पोर्ट जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यहां के किसानों और मछुआरों को स्थानीय व्यापारियों का भी साथ मिल रहा है।" वहीं, इस परियोजना का विरोध करने वाले कई कार्यकर्त्ताओं का कहना है कि जब राज्य सरकार ने केंद्र की प्रस्तावित मेट्रो कार शेड परियोजना को पर्यावरण की दृष्टि से प्रतिकूल मानते हुए इसे रोकने का मन बना लिया है तो यही पक्ष उसे इस परियोजना के तहत भी लेना चाहिए। अब देखना यह है कि पर्यावरण के मुद्दे पर स्थानीय लोगों का साथ देने का दावा करने वाली राज्य सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है?

(शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Port construction
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Fishermen and farmers protest
Jawaharlal Nehru Port Trust

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