NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
मन्नू भंडारी; सादगी का गहरा आकर्षण: वो जो खो गया
मन्नू भंडारी नई कहानी के मशाल धावकों में से थीं। कहानी-उपन्यास के साथ साहित्य की अन्य विधाओं के लिए भी मन्नू भंडारी के योगदान को याद रखा जाएगा।
किरण सिंह
17 Nov 2021
mannu

मन्नू भंडारी (3 अप्रैल 1931-15 नवंबर 2021) की मृत्यु हिन्दी साहित्य में सादगी के गहरे आकर्षण के क्षीण होते चले जाने की यात्रा है। मन्नू भंडारी की पहली कहानी 1955-56 में, भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘कहानी’  के ‘कहानी विशेषांक’ में प्रकाशित हुई। इनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं-‘एक प्लेट सैलाब’, ‘मैं हार गई’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’, ‘यही सच है’, ‘त्रिशंक’, ‘आँखों देखा झूठ’, ‘नायक खलनायक विदूषक।’ उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं, ‘आपका बंटी’, ‘महाभोज’‘एक इंच मुस्कान।’ इन्होंने सिनेमा, टेलीविजन के लिए कई पटकथाओं पर काम किया है और नाटक (बिना दीवारों का घर) भी लिखा है।

बासु चटर्जी और मन्नू भंडारी की कलात्मक संगत ने साहित्य और सिनेमा दोनों की धारा को प्रभावित किया। ‘रजनी’, दूरदर्शन का एक लोकप्रिय धरावाहिक था जिसकी पटकथा मन्नू भंडारी ने तैयार की थी और बासुचटर्जी का निर्देशन था। इसमें सरकारी दफ्तरों के कामकाज और अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाती ‘रजनी’ के किरदार में प्रिया तेंदुलकर को खूबपसंद किया गया। बासु चटर्जी ने मन्नू जी के उपन्यास ‘स्वामी’ पर इसी नाम से और कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ शीर्षक से फीचर फिल्म का निर्माण किया। जिसमें विद्या सिन्हा के रूप में एक ऐसी नायिका आई जिसकी तरह बड़े छाप की शिफॉन साड़ी सभी लड़कियाँ पहन सकती थीं। उषा गांगुली, दिनेश ठाकुर, अरविंद देशपांडे, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसी संस्थाओं और निर्देशकों ने मन्नू भंडारी के लिखे नाटक और कहानी उपन्यासों को थियेटर के लिए कंसीव किया। कहानी-उपन्यास के साथ साहित्य की अन्य विधाओं के लिए भी मन्नू भंडारी के योगदान को याद रखा जाएगा।

‘त्रिशंकु’ मन्नू भंडारी की प्रिय कहानी है। गौर से देखने पर भान होता है कि यह त्रिशंकुपना यानी द्वंद्व और अर्न्तद्वंद्व उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानियों की मूल वैचारिकी है। राजेन्द्र यादव से प्रेम न करते हुए भी, उनके व्यक्तित्व में मौजूद अराजकताओं को समझ कर भी वे उनके साथ लंबे समय तक रहीं। ऐसा, लेखन से प्रेम के कारण संभव हो सका।

अपने साक्षात्कारों में वे चर्चा करती हैं कि राजेन्द्र यादव उन्हें लिखने के लिए बराबर प्रोत्साहित करने वाले एक अच्छे मित्र और मन्नू जी के जिम्मे घर की जिम्मेदारियाँ छोड़ देने वाले एक ख़राब पति थे। इस दांम्पत्य का यथार्थ ‘यही सच है’ की कल्पना से मेल खाता है। इस कहानी पर आधारित बासुचटर्जी के एडॉप्शन ने हिन्दी सिनेमा से प्रेम के ‘देवदास-चन्द्रमुखी-पारो’ के त्रिकोण को पलट कर ‘दीपा-संजय-निशीथ’में बदल दिया। यह कहानी सिनेमा और साहित्य दोनों जगह से प्रेम के रुमानियत और पुरुष वर्चस्व को अपदस्थ कर केन्द्र में स्त्री और व्यावहारिक सच को रखती है। एक स्त्री का, एक ही समय में, दो पुरुषों से प्रेम दिखा कर भी यह कहानी गिरीश कर्नाड के नाटक ‘हयवदन’ की तरह की स्थापना नहीं देती। यह कहानी प्रेम को बचाने में इंसान को होम करने की बजाय इंसान को बचाने में प्रेम के सदुपयोग की कहानी है। यह एक नया यथार्थ था। वास्तव में प्रेम की भूमिका मनुष्य को बचा ले जाने की होनी चाहिए। यह कथन फिर भी रुमानी सा लग सकता है। ‘यही सच है’ उससे भी आगे जाकर प्रेम को परिभाषित करती है,‘प्रेम वह है जो आपको अपनी जरूरत में खड़ा मिले।’ प्रेम का यह यथार्थवादी से अधिक व्यावहारिक रुप है।

मन्नू भंडारी नई कहानी के मशाल धावकों में से थीं। बीसवीं सदी के साठ का दशक आदर्श सामूहिकता के नारे से मध्यमवर्गीय ‘निज उन्नति ही...सब उन्नति को मूल’ के मुहावरे की ओर शिफ्ट कर रहा था। यह मध्यवर्ग समाज के विकास के साथ स्वयं का विकास देखने की बजाय, स्वयं की उन्नति में समाज की उन्नति देख रहा था। यह लोकतंत्र का गहराता प्रभाव था जिसने व्यक्ति की निजता को बहुत महत्त्व दिया और उसे इकाई के रूप में समाज का प्रतिनिधि माना। मन्नू भंडारी के लेखन को आजादी से मोहभंग के दौर का साहित्य नहीं माना जा सकता क्योंकि वहाँ विध्वंस और उसके बाद निर्माण का सुर धीमा है। इनकी कहानियों में जीवन, नई जीरॉक्स मशीन से निकलते पन्नों की तरह, अपने स्पष्ट और चमकीले अक्षरों में अत्यन्त पठनीयता के साथ मौजूद है।

वे अजातशत्रु हैं। उनकी कहानियों को सभी पसंद करते हैं। लोगों को अपना-अपना जीवन उन कहानियों में दिखाई देताहै। जिन्दगी का हू बहू चित्रण उनकी कहानियों को पाठकों का व्यापक संसार देता हैं लेकिन यही उनके साहित्य की सबसे बड़ी सीमा है। जो है, उसे तोड़ कर उसकी जगह वह लाना जो नहीं हो सका, लेखक को व्यवस्था विद्रोही बनाता है। व्यवस्था को तोड़ने पर आप अजातशत्रु नहीं रह जाते। व्यवस्था को तोड़ने की प्रक्रिया में आप और व्यवस्था दोनो टूटते हैं। इसी टूट-फूट का क्लासिक उदाहरण है, राजनीतिक चेतना से लैस उनका उपन्यास ‘महाभोज।’ इस उपन्यास में वर्ग विभाजन और राजनीति-नौकरशाही के गठजोड़ से उपजे हालात को दिखाया गया है।

‘अकेली’ कहानी दसवीं आईसीएससी के पाठ्याक्रम में थी। उसकी रीडिंग लगाने से बच्चे मना कर देते थे। क्योंकि उनका गला भर आता था और वे कक्षा में सबके सामने रोना नहीं चाहते थे। पुराने विद्यार्थी कहते हैं, ‘‘मैम! मैं आपको याद हूँ। आपने मुझे ‘खोटे सिक्के’ कहानी पढ़ाई थी।’ विद्यार्थी हर उस शिक्षक नहीं भूलेगा जिसने उसे मन्नू भंडारी की कहानियाँ पढ़ा दी हों। युवाओं पर इन कहानियों का गहरा असर उन्हें समाज के प्रति संवेदनशील बना कर उनमें साहित्य के बीज भी रोप रहा है।

कृत्रिम मेधा और मल्टीटास्किंग के जटिल समय में मन्नू भंडारी की सहजता-सरलता को थामे रह कर गहराई में उतरने की कला बेचैन कर देती है। यही है वो जो खो गया।

(लखनऊ स्थित किरण सिंह वरिष्ठ उपन्यासकार और कहानीकार हैं।)

 

इसे भी पढ़ें: 'मन्नू दी' आप अकेले सफ़र पर निकल गईं: मन्नू भंडारी के नाम सुधा अरोड़ा का पत्र

Mannu Bhandari
Indian author
writer
Mannu Bhandari passes away

Related Stories

नहीं रहे अली जावेद: तरक़्क़ीपसंद-जम्हूरियतपसंद तहरीक के लिए बड़ा सदमा

जन्मशतवार्षिकी: हिंदी के विलक्षण और विरल रचनाकार थे फणीश्वरनाथ रेणु 

बोलने में हिचकाए लेकिन कविता में कभी नहीं सकुचाए मंगलेश डबराल

स्मृति शेष: वह हारनेवाले कवि नहीं थे

मंगलेश डबराल नहीं रहे

तीन लेखक संगठनों का साझा कार्यक्रम : “सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो”

लेखक-कलाकारों की फ़ासीवाद-विरोधी सक्रियता के लिए भी याद रखा जाएगा ये चुनाव

स्मृति शेष : कलम और कूँची के ‘श्रमिक’ हरिपाल त्यागी

रमणिका गुप्ता : “रुको कि अभी शेष है जिंदगी की जिजीविषा…”

स्मृति शेष : एक असाधारण व्यक्तित्व; द वन एण्ड ओनली रमणिका गुप्ता


बाकी खबरें

  • Auroville
    सत्यम श्रीवास्तव
    विकास की बलि चढ़ता एकमात्र यूटोपियन और प्रायोगिक नगर- ऑरोविले
    16 Dec 2021
    ऑरोविले एक ऐसा ही नगर है जो 1968 से धीरे-धीरे बसना शुरू हुआ। इस छोटे से नगर को पूरी दुनिया में एक प्रायोगिक शहर के तौर पर देखा जाता है। इस नगर को यूटोपियन यानी सुंदर कल्पना के तौर पर भी पूरी दुनिया…
  • Milind Naik
    राज कुमार
    यौन शोषण के आरोप में गोवा के मंत्री मिलिंद नाइक का इस्तीफ़ा
    16 Dec 2021
    महिला के यौन शोषण के आरोप के चलते भाजपा नेता और गोवा के शहरी विकास और समाज कल्याण मंत्री मिलिंद नाईक को इस्तीफा देना पड़ा है। गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने बताया कि मिलिंद नाइक का इस्तीफा…
  • bank strike
    रूबी सरकार
    निजीकरण को लेकर 10 लाख बैंक कर्मियों की आज से दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल
    16 Dec 2021
    बैंक कर्मियों की इस हड़ताल का समर्थन बीमा कर्मचारियों ने भी किया है। किसान आंदोलन की सफलता के बाद अब श्रमिक संगठनों को भी उम्मीद जगी है।
  • Nirbhaya
    सोनिया यादव
    निर्भया कांड के नौ साल : कितनी बदली देश में महिला सुरक्षा की तस्वीर?
    16 Dec 2021
    हर 18 मिनट में बलात्कार का एक मामला, निर्भया कांड के न्यायिक नतीजे से आने वाले व्यापक सामाजिक बदलावों की उम्मीद पर कई सवाल खड़े करता है।
  • Van Gujjar community
    प्रणव मेनन, तुइशा सरकार
    उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में वन गुर्जर महिलाओं के 'अधिकार' और उनकी नुमाइंदगी की जांच-पड़ताल
    16 Dec 2021
    वन गुर्जर समुदाय के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार के आलोक में समुदाय की महिलाओं के अधिकार
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License