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भारत
राजनीति
मंथन: जब सरकारें ख़ुद क़ानून के रास्ते पर चलती नहीं दिखतीं…
अदालत ने कहा है कि राजद्रोह का कानून शांति और सुव्यवस्था कायम करने का ताक़तवर उपकरण है, लेकिन शरारती तत्वों को चुप कराने के नाम पर उसे बेचैनी/असहमति के स्वरों का दमन करने लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

सुभाष गाताडे
17 Feb 2021
sedition

एक ऐसे वक़्त में जब सरकार के लिए असहज लगनेवाली हर छोटी मोटी बात का अपराधीकरण करने का सिलसिला तेज हो चला है, दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा राजद्रोह के आरोपों के तहत गिरफ्तार दो व्यक्तियों को ज़मानत पर रिहा करते हुए जो बात कही गयी है, वह ताज़ी बयार की तरह प्रतीत होती है।

मालूम हो कि दिल्ली पुलिस ने दो व्यक्तियों को किसान आन्दोलन के दौरान कथित तौर पर फेक वीडियो साझा करने के लिए sedition यानी राजद्रोह जिसे देशद्रोह के नाम से दोहराया जाता है, के आरोप के तहत गिरफ्तार किया था। ख़बर के मुताबिक इस वीडियो के माध्यम से यह संकेत दिया गया था कि दिल्ली पुलिस बल में असंतोष है। पुलिस का कहना था कि यह वीडियो सरकार के खिलाफ असंतोष फैलानेवाले हैं। न्यायाधीश महोदय ने कहा कि यह कानून तभी लागू हो सकता है जब कि ‘हिंसा के लिए आह्वान’ किया गया हो, चूंकि ऐसी कोई बात नहीं है, लिहाजा उन्हें ज़मानत दी जाए।

अदालत ने कहा कि राजद्रोह का कानून शांति और सुव्यवस्था कायम करने का ताकतवर उपकरण है, लेकिन शरारती तत्वों को चुप कराने के नाम पर उसे बेचैनी/असहमति के स्वरों का दमन करने लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। ;

एक तरह से देखें तो न्यायाधीश महोदय राजद्रोह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दो ऐतिहासिक फैसलों ‘केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य’  और ‘बलवंत सिंह और भूपिंदर सिंह बनाम पंजाब सरकार’ की बातों की तरफ ही इशारा कर रहे थे, जिसके मुताबिक इस कानून का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जहां हिंसा के लिए भड़काया जा रहा हो या जहां अव्यवस्था फैलाने का इरादा हो।

फिलवक्त यह कहना मुश्किल है कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की यह बातें क्या कार्यपालिका में, सत्ता के सूत्र हाथ में रखे लोगों में किसी आत्ममंथन को जन्म देंगी या नहीं?

यह मसला विचारणीय इस वजह से है क्योंकि अलग अलग आंकड़ों के माध्यम से - फिर चाहे नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकडें हों या स्वतंत्र विश्लेषकों द्वारा संग्रहित एवं संकलित तथ्य हों - हम यहीं पा रहे हैं कि राजद्रोह/देशद्रोह के आरोप लगाने का सिलसिला विगत कुछ सालों में तेज हो चला है, जिसके निशाने पर छात्र, युवा, पत्रकार, बु़द्धजीवी एवं साधारण मजदूर किसान या सामाजिक कार्यकर्ता आ रहे हैं।  

एक अग्रणी वेबपोर्टल ‘आर्टिकल 14’ द्वारा अपने नए डाटाबेस के आधार पर प्रकाशित यह आलेख चकित करनेवाला है। उसके मुताबिक ‘मोदी युग में राजद्रोह के मामलों में तेजी आयी है।’..‘किसान आंदोलन के दौरान छह लोगों पर राजद्रोह के केस, सीएए के खिलाफ जारी प्रदर्शनों में 25 लोगों पर केस तो हाथरस में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद 22 लोगों पर राजद्रोह के तहत मुकदमे तो पुलवामा के बाद 27 लोगों पर ऐसे केस। हमारा अध्ययन बताता है कि विगत एक दशक में - सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए – ऐसे देशद्रोह (राजद्रोह) के मामलों में 28 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है, खासकर 2014 के बाद आलोचकों एव प्रदर्शनकारी इसके निशाने पर आए हैं।’ 

आंकड़ों के मुताबिक अब सरकारों एवं सत्ताधारियों की आलोचना भी बेहद जोखिम का काम बनता जा रहा है।

- राजनेताओं और सरकारों की आलोचना करने के लिए जिन 405 भारतीयों को देशद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है, उसमें 96 फीसदी मामले वर्ष 2014 के बाद दर्ज हुए हैं, जिनमें 149 मामलों में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति ‘आलोचनात्मक’ और ‘अपमानजनक’ बातों के मामले शामिल है तो 144 मामले में यू पी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति टिप्पणी करनेवाले मामले शामिल हैं। /-वही-/

बमुश्किल छह माह पहले इंडियन एक्स्प्रेस ने अपने अंक में इसी मसले पर एक विस्तृत आलेख में राष्टीय अपराध रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में यही बात बतायी थी और यह भी बताया था कि ऐसे मामलों में दोषसिद्ध होनेवालों की संख्या में भी काफी कमी आयी है। ‘राजद्रोह के मामले में और दमनकारी यूएपीए के तहत मामलों में वर्ष 2019 में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन इनमें से महज 3 फीसदी मामलों में आरोप सिद्ध किए जा सके हैं।’

राजद्रोह की धाराओं का इस्तेमाल जिस कदर आम हो चला है, उसे हम देश के अग्रणी पत्रकारों, संपादकों एवं एक जानेमाने बुद्धिजीवी एवं सांसद पर अलग अलग राज्यों में एक ही वक्त दायर मुकदमों को पलट कर देख सकते हैं। याद रहे किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी की टैक्टर रैली में एक युवा किसान की मौत हुई, पुलिस का इस मामले में दावा रहा है कि वह टैक्टर पलटने से मरा तो उसके परिजन पुलिस की इस थ्योरी पर सवाल उठाते हैं, इस अस्वाभाविक मौत की जांच करने को लेकर उसके परिजनों ने अदालत में अर्जी भी दाखिल की है। इन अग्रणी पत्रकारों ने चूंकि परिजनों तथा कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर सोशल मीडिया पर इस बात को साझा किया, जो पुलिसिया कहानी से एक अलग वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत करती है, इसी वजह से वह राजद्रोह के आरोपों का सामना कर रहे हैं।  

बेंगलुरु से युवा पर्यावरण कार्यकर्ता की हुई गिरफ्तारी - ‘देशद्रोह’ के आरोपों का सामना कर रही सबसे ताज़ा कड़ी है, जिस पर न केवल देशद्रोह तथा षडयंत्र में शामिल होने के आरोप लगे हैं। प्रश्न उठता है कि क्या महज आरोप लगाने मात्र से उसके तमाम नागरिक अधिकार स्थगित हो जाते हैं ? अग्रणी वकीलों एव नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक अपने घर से गिरफ्तार करके उसे ले जाते वक्त़ कथित तौर पर ऐसी तमाम बातों का ध्यान नहीं रखा गया जिसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय दिशानिर्देश दे चुका है। मालूम हो कि किसी भी अभियुक्त को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाते वक्त़ न केवल पहले स्थानीय पुलिस को पहले सूचित करना होता है तथा स्थानीय अदालत से ट्रांजिट रिमांड हासिल करना होता है। यहां तक कि एक अग्रणी अख़बार से बात करते हुए कर्नाटक पुलिस के तीन वरिष्ठ अधिकारियों ने - नाम न बताने की शर्त पर कहा - कि उन्हें इस गिरफ्तारी की सूचना तभी मिली जब सारी प्रक्रियाएं पूरी की चुकी थीं, यह अलग बात है कि दिल्ली पुलिस इस बात से इन्कार करती है। 

अंत में, सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि असहमति रखनेवाले लोगों, बुद्धिजीवियों, छात्रों आदि के खिलाफ - जो महज सत्ताधारी नेता पर कुछ टिप्पणी करें, तो हरकत में आनेवाला पुलिस बल उन मामलों में बिल्कुल चुप्पी ओढ़ लेता है, जहां दक्षिणपंथी की सियासत के अग्रणी या उनके विचारों के समर्थक खुल्लमखुल्ला हिंसा का आह्वान करते दिखते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब हिंदुत्व की दक्षिणपंथी राजनीति के किसी हिमायती ने यूट्यूब पर एक लिंक साझा किया था जिसमें देश के कुछ अग्रणी पत्रकारों, सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को ‘‘सज़ा ए मौत’’ देने की हिमायत की थी, इस वीडियो को कुछ ही घंटों में यूट्यूब ने ही हटा दिया, लेकिन तब तक लाखों लोग उसे देख चुके थे।

आखिरी ख़बर आने तक इसके निर्माताओं के खिलाफ न कोई कार्रवाई हुई न कोई जांच ?

 

(लेखक स्वतंत्र विचारक और पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Sedition Law
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