NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आधी आबादी
कानून
महिलाएं
समाज
भारत
राजनीति
मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!
देश में मैरिटल रेप को अपराध मानने की मांग लंबे समय से है। ऐसे में अब समाज से वैवाहिक बलात्कार जैसी कुरीति को हटाने के लिए सर्वोच्च अदालत ही अब एकमात्र उम्मीद नज़र आती है।
सोनिया यादव
17 May 2022
marital rape

मैरिटल रेप को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का बँटा हुआ फैसला अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने है। इससे पहले इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान शादी में बलात्कार को गैरकानूनी करार देने की याचिका पर दो जजों की बेंच में आम राय नहीं बन पाई थी। जहां एक जस्टिस ने कहा कि बिना अपनी पत्नी की सहमति के ज़बरदस्ती संबंध बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, तो वहीं दूसरे जस्टिस इस फैसले से सहमत नहीं दिखे, जिसके चलते अब याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय का रूख किया है।
बता दें कि भारत में 'वैवाहिक बलात्कार' यानी 'मैरिटल रेप' क़ानून की नज़र में अपराध नहीं है। इसलिए आईपीसी की किसी धारा में न तो इसकी परिभाषा है और न ही इसके लिए किसी तरह की सज़ा का प्रावधान है। दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले में दायर की गई याचिकाओं में धारा 375 के अपवाद 2 की संवैधानिकता को मनमाना, अनुचित और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई थी। अब तक इस संबंध में कई अलग-अलग याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं।

क्या है पूरा मामला?

देश में मैरिटल रेप को अपराध मानने की मांग लंबे समय से है। साल 2015 में गैर सरकारी संगठन आरटीआई फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन तथा दो महिला और पुरुषों ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस संबंध में याचिका दायर की थी, जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया था। 2016 में, केंद्र ने एक हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया था कि मैरिटल रेप को अपराध नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि इसका भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मामला तीन साल से ज्यादा समय तक स्थगित रहा और आखिरकार दिसंबर 2021 में सुनवाई फिर से शुरू हुई। जिसके बाद 11 मई 2022 को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने खंडित फैसला सुनाया, जिसमें दोनों जजों की अलग-अलग राय सामने आई।

इस फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव शकधर ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध कहते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद 2 को असंवैधानिक बताया। जस्टिस शकधर का कहना था कि पत्नी की सहमति से ज़बरदस्ती संबंध बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है। वहीं जस्टिस सी हरिशंकर ने कहा कि वो इस मामले में जस्टिस शकधर के फ़ैसले से सहमत नहीं दिखे और उन्होंने धारा 376 बी और 198 बी की वैधता को बरकरार रखने की बात कही।

मालूम हो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा बताई गई है और उसे अपराध माना गया है। इन याचिकाओं में इस धारा के अपवाद 2 पर आपत्ति जताई गई है। ये अपवाद कहता है कि अगर एक शादी में कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, जिसकी उम्र 15 साल या उससे ऊपर है तो वो बलात्कार नहीं कहलाएगा, भले ही उसने वो संबंध पत्नी की सहमति के बगैर बनाए हों। हालांकि साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने महिला की आयु 18 साल कर दी थी। लेकिन सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या शादी के बाद पति को पत्नी का शारीरिक शोषण करने का लाइसेंस मिल जाता है।

इस मामले में हाई कोर्ट कोर्ट ने दो वरिष्ठ वकील रेबेका जोन और राजशेखर राव को एमिकस क्यूरी यानि इस मामले में अदालत की मदद के लिए नियुक्त किया था और सरकार से भी सवाल किया था। इन दोनों वकीलों ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को हटाने की बात कही थी। वहीं इससे पहले साल 2017 में केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध करार नहीं दिया जा सकता है और अगर ऐसा होता है तो इससे शादी जैसी पवित्र संस्था अस्थिर हो जाएगी। इसी तरह सरकार ने यह तर्क भी दिया था कि इसे अपराध की श्रेणी में लेने से महिलाओं को अपने पतियों को सताने के लिए एक आसान हथियार मिल जाएगा। जिसके बाद हाई कोर्ट ने इसकी समीक्षा के लिए एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र नियुक्त किए थे।

गौरतलब है कि निर्भया कांड के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि असहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को बलात्कार की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए। इस रिपोर्ट में मैरिटल रेप के लिए अलग से क़ानून बनाने की मांग की थी। उनकी दलील थी कि शादी के बाद सेक्स में भी सहमति और असहमति को परिभाषित करना चाहिए। दरअसल वैवाहिक बलात्कार के विपक्ष में खड़े लोगों का अक्सर ये तर्क होता है कि इस तरह के मामले में ये पता लगाना मुश्किल है कि क्या वास्तव में पुरुष दोषी है या उसे उसे किसी साजिश के तहत झूठे आरोपों में फंसाया जा रहा है। इसमें अन्य अपराधों की तरह दोष साबित नहीं किया जा सकता। हालांकि इसके पक्षकारों का कहना है कि सिर्फ इस आधार पर पुरुष को पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान करना बहुत गलत है।

हालांकि, 2013 में पारित आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम में जस्टिस वर्मा कमिटी की सिफारिशों को जगह नहीं दी गई। और कानून के पारित होने से पहले अध्यादेश की जांच के लिए गठित गृह मामलों की एक संसदीय पैनल ने यह कह दिया था कि, "अगर मैरिटल रेप को अपराध घोषित कर दिया गया तो हमारी पूरी परिवार व्यवस्था गहरे तनाव में आ जाएगी।”

मैरिटल रेप वास्तव में कितना दर्दनाक होता है और क्या ये किसी रेप से अलग होता है? इसे समझने के लिए हमें उस महिला की मानसिक स्थिति को समझना होगा जिस पर शादीशुदा होने का टैग तो लग गया है लेकिन वो अपने पति के साथ सेक्स करने को लेकर सहज नहीं है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक एक रेप में सामने वाले की सहमति के बिना उससे यौन संबंध बनाए जाते हैं, मैरिटल रेप में भी यही होता है।

इसे भी पढ़ें: पत्नी नहीं है पति के अधीन, मैरिटल रेप समानता के अधिकार के ख़िलाफ़

अब तक कैसे रहे हैं अदालतों के फ़ैसले

मैरिटल रेप के मामलों को देखें तो अब तक आए कोर्ट के फैसलों में एक विरोधाभास नज़र आता है। जहां छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज एन के चंद्रावंशी ने एक आदमी को अपनी ही पत्नी के बलात्कार के आरोप के मामले में बरी करते हुए ये कहा था कि एक पति का अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार नहीं है चाहे वो दबाव में या उसकी इच्छा के बगैर बनाया गया हो। वहीं केरल हाई कोर्ट ने ऐसे ही मामले में कहा था कि ये मानना कि पत्नी के शरीर पर पति का अधिकार है और उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाना मैरिटल रेप है।

इस मामले में सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी भी खूब सुर्खियों में रही थी, जिसमें अदालत ने इसे अपराध माने जाने को लेकर दाख़िल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा था कि वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में प्रथम दृष्टया सजा मिलनी चाहिए और इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

अदालत का यह भी कहना था कि महत्वपूर्ण बात यह है कि एक महिला, महिला ही होती है और उसे किसी संबंध में अलग तरीके से नहीं तौला जा सकता, "यह कहना कि, अगर किसी महिला के साथ उसका पति जबरन यौन संबंध बनाता है तो वह महिला भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (बलात्कार) का सहारा नहीं ले सकती और उसे अन्य फौजदारी या दीवानी कानून का सहारा लेना पड़ेगा, ठीक नहीं है।"

बाक़ी दुनिया का क्या है हाल?

दुनिया में देखा जाए तो कई ऐसे देश है जहां मैरिटल रेप एक अपराध की श्रेणी में आता है। संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूएन वीमेन के मुताबिक घर महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगहों में से एक है। संस्था की रिपोर्ट के अनुसार दस में से चार देश मैरिटल रेप को अपराध मानते हैं। 

1932 में पोलैंड मैरिटल रेप को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करने वाला पहला देश बना। तो वहीं, ऑस्ट्रेलिया, 1976 में नारीवाद की दूसरी लहर के प्रभाव में, सुधारों को पारित करने और मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने वाला पहला कॉमन लॉ (सामान्य कानून) देश बना।

अब तक 50 से ज्यादा देशों, जिसमें अमेरिका, नेपाल, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं, जहां पत्नी के साथ मैरिटल रेप को अपराध माना गया है। वहीं एशिया के ज्यादातर देशों में क़ानून में बदलाव को लेकर कोशिशें जारी हैं।

संयुक्त राष्ट्र की Progress of World Women 2019-20 की रिपोर्ट बताती है कि 185 देशों में सिर्फ 77 देश ऐसे हैं जहां मैरिटल रेप को लेकर कानून है। बाकी 108 में से 74 देश ऐसे हैं जहां महिलाओं को अपने पति के खिलाफ रेप की शिकायत करने का अधिकार है। वहीं, भारत समेत 34 देश ऐसे हैं जहां मैरिटल रेप को लेकर लेकर कोई कानून नहीं है।

भारत में मैरिटल रेप को भले ही अपराध नहीं माना जाता, लेकिन अब भी कई सारी भारतीय महिलाएं इसका सामना करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक, देश में अब भी 29 फीसदी से ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं जो पति की शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में अंतर और भी ज्यादा है। गांवों में 32% और शहरों में 24% ऐसी महिलाएं हैं।

जाहिर है मैरिटल रेप सिर्फ घरेलू मसला नहीं है, जो इसे घरेलू हिंसा कानून के तहत लपेट दिया जाए, ये एक अपराध है। अपराध करने वाला पति है तो उसको नकारा नहीं जा सकता है। इस मामले में अब समाज से वैवाहिक बलात्कार जैसी कुरीति को हटाने के लिए सर्वोच्च अदालत ही अब एकमात्र उम्मीद नज़र आती है।

इसे भी पढ़ें: मैरिटल रेप: घरेलू मसले से ज़्यादा एक जघन्य अपराध है, जिसकी अब तक कोई सज़ा नहीं

Family
Women
Marital Rape
Supreme Court
Delhi High court
rape
Indian Penal Code

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

लड़कियां कोई बीमारी नहीं होतीं, जिनसे निजात के लिए दवाएं बनायी और खायी जाएं

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

पत्नी नहीं है पति के अधीन, मैरिटल रेप समानता के अधिकार के ख़िलाफ़

रूस और यूक्रेन: हर मोर्चे पर डटीं महिलाएं युद्ध के विरोध में

बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की

बिहार शेल्टर होम कांड-2’: मामले को रफ़ा-दफ़ा करता प्रशासन, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

बिहार शेल्टर होम कांड-2: युवती ने अधीक्षिका पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- होता है गंदा काम

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर


बाकी खबरें

  • Supreme Court Asks: Why no Arrest in Lakhimpur Killings?
    न्यूज़क्लिक टीम
    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: लखीमपुर में गिरफ्तारी क्यों नहीं ?
    07 Oct 2021
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस कार्यक्रम में अभिसार शर्मा लखीमपुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में बात कर रहे हैं, और बात कर रहे हैं कि किस तरह बीजेपी के प्रवक्ता लगतार किसानों को टारगेट कर…
  • Tribal Settlement Near Tamil Nadu Temple Uprooted
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: उजाड़ दी गईं मंदिर से सटी आदिवासी बस्तियां 
    07 Oct 2021
    11 इरुलर आदिवासी परिवारों ने आरोप लगाया है कि यह जगह उन्हें स्थायी रिहाइश के लिए जमीन के पट्टे दिए जाने तक रहने के लिए दी गई थी।
  • SC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर नरसंहार: न्यायालय ने उप्र सरकार से पूछा क्या आरोपी गिरफ़्तार किए गए हैं?
    07 Oct 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमणा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वकील को इस बारे में स्थिति रिपोर्ट में जानकारी देने का निर्देश दिया।
  • delhi violence
    सबरंग इंडिया
    दिल्ली हिंसा मामले में पुलिस की जांच की आलोचना करने वाले जज का ट्रांसफर
    07 Oct 2021
    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने पिछले कुछ महीनों में दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों को फटकार लगाई थी, और कुछ मामलों में पुलिस गवाहों की विश्वसनीयता पर संदेह करते हुए जमानत भी दे दी थी।
  •  15 killed in road accident in Uttar Pradesh's Barabanki
    भाषा
    उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में सड़क दुर्घटना में 15 लोगों की मौत
    07 Oct 2021
    बाराबंकी के देवा थाना क्षेत्र के बबुरी गांव के निकट वॉल्वो बस और ट्रक की भीषण टक्कर से बस में सवार 15 लोगों की मौत हो गई और 21 अन्य घायल हो गये।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License