NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बाज़ार और सामाजिक संबंध!
अब तो हालात ये हैं, कि बाज़ार हमें ही घर से बेदख़ल कर रहा है। और हम घर फूँक तमाशा देखने की स्थिति में हैं।
शंभूनाथ शुक्ल
27 Feb 2021
बाज़ार और सामाजिक संबंध!
प्रतीकात्मक तस्वीर।

बाज़ार अब हमारे घर में घुस चुका है। हम बाज़ार से आकर्षित होते हैं और बाज़ार को अपने घर बुलाने लगते हैं। बाज़ार पहले भी घर में मौजूद था किंतु सोवियत संघ के विघटन और नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह की टोली ने इसे बढ़ावा दिया। अब तो हालात ये हैं, कि बाज़ार हमें ही घर से बेदख़ल कर रहा है। और हम घर फूँक तमाशा देखने की स्थिति में हैं। इसीलिए अब महँगाई पर चर्चा नहीं होती, कोई सड़क पर नहीं उतरता, किसी को कोई बिलबिलाहट नहीं होती।

सबको पता है, कि ईंधन के दाम बढ़ने से हर चीज़ को आग लग जाएगी लेकिन किसी भी राजनेता ने इस पर सिवाय ट्वीट करने के और कुछ नहीं किया यानी विरोध प्रदर्शन के लिए भी बाज़ार। दूध की क़ीमते एक मार्च से बढ़ने की आशंका हैं। और इसके विरोध में कोई विरोधी दल खड़ा होने की दम नहीं भर रहा। मज़े की बात कि दूध की क़ीमतें बढ़ने का कोई कारण नहीं है। कोरोना के भय से मिठाई की दुक़ानों पर सन्नाटा है, फिर यह दूध कहाँ जाता है। लेकिन अकूत मुनाफ़ा कमाने को आतुर कंपनियाँ हर तरह के छल, छद्म पर उतारू हैं। व्यवस्था ऐसी कम्पनियों का पोषण करती है। वह देख रही है कि जब व्यक्ति किसी भी वृद्धि पर आपत्ति नहीं कर रहा, तो जो चाहो सो करो। कोई रोक-टोक करने वाला नहीं।

बाज़ार के लिए यह बहुत मज़े की स्थिति होती है। लोकतंत्र में जब विपक्ष विरोध की पहल न करे तो मान लीजिए कि उसने विपक्ष में बैठना अपनी नियति मान लिया है। यह स्थिति जनता के लिए दुखद है।

पूँजीवादी लोकतंत्र खुली अर्थ व्यवस्था को बढ़ावा देता है। यह किसी कम आबादी वाले देश के लिए तो सही हो सकता है किंतु इतनी विशाल आबादी वाले देश के लिए बहुत घातक होता है। इसके चलते एक विशाल मध्यवर्ग तथा किसान व मज़दूर अपने-अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। वे एक मशीनी ज़िंदगी जीने को विवश हो जाते हैं और व्यवस्था को यह सूट करता है।

आज देश की स्थिति ख़राब होती जा रही है। मगर अंधश्रद्धा और धार्मिक उन्माद में डूबे समाज को निज के कष्ट कम लगते हैं। वह एक थोथे आत्म-गौरव में डूबा है। उसे लगता है कि महँगाई का तो काम ही है बढ़ना। महँगाई नहीं बढ़ेगी तो देश विकास कैसे करेगा?

बहुत-से मध्य वर्गीय लोग तर्क देते हैं, कि महँगी कारें, महँगे मोबाइल और विलासिता की सामग्री तो लोग ख़रीद ही रहे हैं फिर कैसे माना जाए कि लोग महँगाई से त्रस्त हैं। वे गाँवों या छोटे शहरों में रह रहे लोगों को क़ाहिल और नाकारा समझते हैं। वहाँ से हो रहे पलायन को मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति मानते हैं। उनको समझ नहीं आता कि ग़रीबों की ज़िंदगी कितनी पीड़ादायी हो गई है। बड़े शहरों के फुटपाथों और सब-वे पर ज़िंदगी काट रहे लोगों की वे अनदेखी कर देते हैं। किंतु वे यह नहीं समझ रहे कि बाज़ार जब फैलता है तो वह ग़रीबों को ही नहीं धीरे-धीरे मध्य वर्ग को भी जकड़ लेता है।

वह दिन दूर नहीं जब यह शहरी मध्य वर्ग ख़ुद भी फुटपाथ पर ज़िंदगी गुज़ारने को विवश हो जाएगा। इसको जितनी जल्दी समझा जाए उतना ही बेहतर।

इस चीज़ पर भी गौर किया जाए कि आख़िर बाज़ार हमारे घर में घुसा कैसे। आज़ादी के बाद जो संविधान बना, उसमें बेलगाम बाज़ार को दूर ही रखने की कोशिश की गई थी। यूँ भी पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू में गांधीवादी सहजता व सरलता थी तथा समाजवादी रुझान भी। तब भला कैसे बाज़ार को खेलने की अनुमति दी जाती। इसीलिए किसानों और मज़दूरों के लिए कई क़ानून केंद्र सरकार ने बनाए थे, ताकि राज्य सरकारें बेलगाम न हो सकें। इंदिरा गांधी का अपना झुकाव सोवियत संघ की तरफ़ था, मगर उनके समय से ही मज़दूर क़ानूनों से छेड़छाड़ होने लगी और ज़्यादातर कारख़ाने इसी काल में बंद हुए। मज़दूर-यूनियनों पर इंटक या कुछ स्वतंत्र माफिया टाइप नेताओं ने क़ब्ज़ा किया और इन लोगों ने प्रबंधन के साथ सौदेबाज़ी की नई परंपरा शुरू की। मिल मालिक अपनी पुरानी हो चुकी मिलों को बंद करने की फ़िराक़ में थे। शहर के भीतर आ चुकी इन मिलों की ज़मीन का भू-उपयोग बदलवा कर उनके व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए मिल मालिक सत्तारूढ़ दल के नेताओं को पैसा देने लगे। मिलें बंद हो जाने से कारख़ाना मज़दूर बेकार हो गए। उनके समक्ष दो ही विकल्प थे, अपने गाँव लौट जाएँ या किसी बड़े शहर की राह पकड़ें। बड़े शहरों में स्थिति कोई भिन्न नहीं थी। इसलिए संगठित क्षेत्र का यह मज़दूर दिहाड़ी का काम करने लगा। जिसमें मज़दूरी न के बराबर थी और सरकारी सुविधाएँ शून्य। संगठित क्षेत्र का मज़दूर होने के नाते उसे कर्मचारी राज्य बीमा निगम की स्वास्थ्य सेवाएँ, राज्यों के श्रम विभाग से आवंटित क्वार्टर आदि सब कुछ मिलता था। मगर बड़े शहरों में आकर वह फुटपाथ पर ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हो गया। उधर छोटी होती कृषि जोतों और परिवार के विस्तार के चलते लाखों लोगों का पलायन प्रति वर्ष होता है।

ये सब मज़दूर शहर आकर पूँजीपतियों को आराम पहुँचाने लगे। मज़दूरों के आधिक्य के चलते उनको सस्ती लेबर मिलने लगी। यहाँ तक कि ड्राइवरी, प्लंबरी और इलेक्ट्रीशियन जैसे कौशल के कामों के लिए मज़दूर बहुत सस्ते मिल जाते। और यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, बल्कि निजी क्षेत्र में चल रहे स्कूल के अध्यापकों की स्थिति भी ऐसी हो गई। यानी एक तरह से बाज़ार ने मिडिल क्लास को अपना ग़ुलाम बना लिया। इंदिरा गांधी के समय शुरू हुई यह लूट अटल बिहारी के समय खुल कर खेली जाने लगी। सरकारी कम्पनियों को विनिवेश के नाम पर निजी क्षेत्रों को सौंपा जाने लगा। इसी की चरम परिणिति है आज का निज़ाम। आप लोगों को याद होगा कि अटल बिहारी की एनडीए सरकार की इन नीतियों का विरोध भारतीय मज़दूर संघ (आरएसएस का संगठन) के नेता भी करते थे। किंतु आज तो कोई विरोध करने वाला भी नहीं है और बाज़ार हमें ही हमारे घर से बाहर कर रहा है। और हम विरोध तक नहीं कर पा रहे।

किसी भी देश में सिर्फ़ मिडिल क्लास ही विरोध के लिए आगे बढ़ता है। परंतु भारत का मिडिल क्लास अभी सत्ता-मद में चूर है। उसे कारपोरेट की नौकरियाँ लुभाती हैं। और ये नौकरियाँ पाने के लिए वह हर तरह का समझौता करता है। देश की समस्याओं को समझने की उसमें कूवत नहीं है। वह न्यूज़ और व्यूज से बेख़बर है। उसको सिर्फ़ अपने करियर की चिंता है। और जो लोवर मिडिल क्लास है वह धर्म के उन्माद में डूबा है। नतीजा यह है कि महँगाई बढ़ती है, बढ़ने दो। नौकरियाँ ख़त्म हो रही हैं, ख़त्म होने दो। उसे बस अपनी चिंता है। लेकिन जब तक एक निज़ाम कल्याणकारी नहीं बनता, सामाजिक नहीं बनता तब तक लूट-खसोट और निजी लाभ के लिए चल रहे खेल को रोका नहीं जा सकता। सच बात तो यह है कि भारत में पढ़ा-लिखा बौद्धिक मिडिल क्लास कॉफ़ी हाउसों या क्लबों में जाकर बस बहस करता है। मौजूदा ख़ामियों के लिए शासन की लानत-मलामत करता है और फिर ट्वीट कर सो जाता है। विरोधी दलों के नेता भी यही करते हैं। आख़िर वे सब इस लूट में हिस्सेदार जो रहे हैं। उन्हें लगता है, कभी जब उनकी सरकार आएगी तब लूट का ऐसा खेल खेलने के लिए उन्हें नज़रें नहीं चुरानी पड़ेंगी। तब वे कह सकते हैं कि यह तो सनातन परंपरा है। उधर बिना पढ़ा-लिखा मिडिल क्लास इसमें खुश है कि हमने चीन को हड़काया हुआ है। पाकिस्तान हमसे डरता है और आज विश्व में हमारा डंका बज रहा है। 

जब तक मिडिल क्लास इसी तरह सोता रहेगा, कुछ नहीं हो सकता। उसे बढ़ती महँगाई, कुछ हाथों तक पहुँचती अर्थ व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होना पड़ेगा। वह खड़ा होगा तो उससे छोटा आदमी भी आ जाएगा। उसे भी पता चल जाएगा, कि खोखला घमंड या गर्व की अनुभूति से रोटी नहीं मिलती। हमारा देश तब सिरमौर होगा जब हम आत्म निर्भर होंगे। हमारे यहाँ से पलायन रुकेगा। रोज़ी-रोटी के लिए लोग परदेश जाना बंद कर देंगे। अभी तो हमारी स्थिति एक लेबर सप्लायर देश की बनी हुई है। भले वह लेबर स्किल्ड हो या अनस्किल्ड। यह स्थिति तब ही बदलेगी जब हम ग़लत बात का विरोध करना सीखें। महँगाई और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं को समझें। अन्यथा बाज़ार हमारे घर में घुसता रहेगा और हमारी सामाजिकता को नष्ट करता जाएगा। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

market
Social Relation
Inflation
Rising inflation
capitalism

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License