NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया
मई दिवस की महिला नेत्रियां जिन्होंने इतिहास रचने में अपना योगदान दिया I
बादल सरोज
01 May 2021
नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया

मई दिवस दुनिया को बेहतर बनाने का सपना देखने वालों का त्यौहार है।  एकमात्र ऐसा पर्व जिसे देश-धर्म-रंग-भाषा-जाति-सम्प्रदाय और नस्लों से ऊपर उठकर पृथ्वी के हर कोने में साथ मनाया जाता है।  आठ घंटे काम की मांग को लेकर 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्किट स्क्वायर पर हुई मजदूर रैली पर दमन की याद एक सुखद समाज बनाने की जद्दोजहद बन गयी। 

दुनिया और पृथ्वी दोनों ही स्त्रीलिंग शब्द हैं। इसी तरह  हिंदी में क्रान्ति और अंगरेजी में रेवोल्यूशन ये दोनों भी स्त्रीलिंग शब्द हैं। लिहाजा स्त्रियों की भागीदारी के बिना किसी क्रान्ति की कल्पना करना ही अशुध्दि होगी - और यह सिर्फ भाषायी अशुध्दि भर  नहीं होगी।  1886 के मई दिवस की लड़ाई में भी अनेक शानदार नेत्रियां थीं।  फिलहाल इनमे से दो के बारे में ;

लूसी पार्सन्स  (1853-1942)

लूसी 1853 में काले, स्पैनिश और इंडियन पुरखों के परिवार में टैक्सास की जान्सन काउंटी में जन्मी थीं। उनकी शुरूआती पृष्ठभूमि के बारे में मालूमात बहुत कम है। मगर बाद के  वर्षों में रोजर परिवार ने दावा किया था कि लूसी असल में उनकी पुरानी गुलाम, मैलिन्डा है जो गृहयुद्ध के वक्त उन्हें छोड़ गई थी। दक्षिण में लूसी जरूर रिपब्लिकन थी। मगर वे और अल्बर्ट जब 1873 में शिकागों आये तो उन्होंने पाया कि यहां के रिपब्लिकन्स नस्लीय व स्थानीय समूहों तथा अल्पसंख्यकों की समस्याओं के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते है। 1877 में वे दोनों सोशलिस्टिक लेबर पार्टी में शामिल हो गए। लूसी ‘द अलार्म’ अखबार  की नियमित लेखिका बन गई। अनगिनत रैली और सभाओं में बोलने वाली लूसी अपने पति और  बच्चों के साथ 1 मई 1886 को शिकागो में हुई 80 हजार मजदूरों की विराट रैली के अगले जत्थे में थीं। 

अल्बर्ट पार्सल्स को सजा सुनाये जाने के बाद लूसी ने पूरे अमरीका में घूम घूमकर हेमार्केट चौराहे की सच्चाई लोगों को बताई। वह यूरोप और लंदन के दौरों पर भी गईं जहां जार्ज बॉर्नार्ड शॉ और आस्कर वाइल्ड जैसे बुद्धिजीवियों को भी इस अभियान से जोड़ा। 

शिकागो लौटकर खुद लूसी ने मई दिवस मुकदमें की परतें खोलने वाली पुस्तिका ‘‘ क्या यह सच्चा इंसाफ था : गर्वनर के नाम अपील’’ की पांच हजार प्रतियां, बार बार पुलिस के द्वारा पकड़े जाने के बाद भी बेची। अल्बर्ट की फांसी के बाद लूसी ने उसकी जिंदगी पर किताब लिखी जिसके समर्पण में उसने लिखा कि ‘‘जिसका एक मात्र अपराध यह था कि वह अपने वक्त से काफी पहले हुआ..’’

त्रासदी ने लूसी के साथ नहीं छोड़ा। उसके दोनों बच्चे लुलू और अल्बर्ट जूनियर जल्दी ही मर गए। उनकी कब्र की मिट्टी उसने हमेशा अपने साथ सहेज कर रखी। बाकी पूरा जीवन लूसी ने सामाजिक न्याय के लिए समर्पित कर दिया। बहुत कम लोग जानते है कि यह लूसी थी जिसने ‘हड़ताली धरने’ के हथियार को खोजा था। 1905 में हुए औद्योगिक मजदूरों के विश्व सम्मेलन में बोलते हुए उसने कहा था कि -  ‘‘भविष्य की हड़तालों के बारे में मेरी धारणा, हड़ताल करके बाहर चले जाने और भूखों मरने की नहीं है। बल्कि हमें हड़ताल करके अंदर ही धरना देकर बैठना चाहिए और उत्पादन से जुड़ी जरूरी संपत्तियों को अपने आधिपत्य में लेना चाहिए।’’

7 मार्च 1942 शनिवार को दोपहर में लूसी के मकान में आग लग गई। वह अब अंधी हो चुकी थी, इसलिए बिल्डिंग से बाहर नहीं निकल सकी और उसी आग में भस्म हो गई उसे बचाने की असफल कोशिश में 32 साल से साथ रह रहे जॉर्ज मार्कशाल की भी मौत हो गई। उसकी व दोनों बच्चों की भस्म के साथ उसे अल्बर्ट पार्सन्स की कब्र के पास ही दफना दिया गया। 

 उसके मरते ही 2500 से 3000 किताबों वाली उसकी लाइब्रेरी अमरीकी पुलिस ने गायब कर दी। लूसी ने अपना मकान और जमीन बेचकर उस राशि को शहीदों के आंदोलन को दिए जाने की वसीयत  की थी। इस तरह उसने अपनी मुहिम अपनी मौत के बाद भी जारी रखी। 

नीना वान जांट स्पाइज

खाये पीये परिवार की उत्सुकता के चलते आगस्ट स्पाइज के मुकदमें को सुनने अदालत पहुंची नीना वान बाद में न केवल उसकी दोस्त बन गई बल्कि आगस्ट के जेल में रहते ही उससे शादी कर उसकी पत्नी भी बन गई। एक दवा कंपनी के मालिक की बेटी नीना का पूरा नाम रोजेनिया क्लार्क वान जांट था। 1883 में उसने स्नातक की डिग्री ली। रईसी उसे सिर्फ पिता की ओर से ही नहीं मिली थी। उसकी मौसी ने उसके लिए पांच लाख डॉलर इस उम्मीद से रख छोड़े थे कि वह अमीर सोसायटी में रहेगी और ‘अच्छी’ शादी करेगी। सजायाफ्ता ऑगस्ट स्पाइज से शादी करने के नतीजे में यह दौलत भी नीना से छिन गई। 

मुकदमें के दौरान सुबह और शाम दोनों वक्त अलग-अलग  शानदार गाउन पहनकर अदालत में बैठने वाली यह नवयुवती उस वक्त के अखबारों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। उसके और आगस्ट  स्पाइज के प्रेम के किस्से आम होते रहे। उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि एक अजायब घर में उसकी मोम की मूर्ति तक रख दी गई। जिस पर मुकदमा ठोक कर नीना ने हरजाना वसूला और हे मार्केट के मुकदमें को लडऩे वाली कमेटी को वह राशि सौंप दी। आगस्ट की आत्मकथा लिखने में भी नीना ने उसकी मदद की। 

जब फांसी का वक्त नजदीक आया और जेल अधिकारियों ने नीना की ऑगस्ट से मुलाकात पर रोक लगा दी और कहा कि वह न रिश्तेदार है न पत्नी तो उसने ऑगस्ट से शादी की पेशकश की। तत्कालीन प्रशासन ने जब जेल में शादी की अनुमति नहीं दी तो नीना ने बाहर ही एवजी विवाह कर खुद के लिए आगस्ट की पत्नी का दर्जा हासिल कर लिया। बाद के बर्षों में जब उसने लूसी पार्सन्स के साथ अनगिनत जुलूसों में भाग लिया।

मई दिवस के शहीदों के साथ अपने इस अनूठे और अपरिमित लगाव और समर्पण के चलते उसने बाकी जिंदगी गरीबी में गुजारी। मगर न अपने पिता से पैसा मांगा न मौसी के पास गई। अप्रैल 1936 में उसकी मौत हो गई। उसकी अंतिम इच्छा के अनुरूप लूसी पार्सन्स ने उसके अंतिम संस्कार में भाषण दिया। 

एक सहृदय नारी-नीना-ने अपने घर में अनेक बेजुबान जानवर पाल रखे थे। वह खुद गरीबी में रही मगर अपनी मौत के बाद तीन हजार डॉलर इन जानवरों की देखरेख के लिए एक संस्था के नाम छोड़ गई थी। यह बात अलग है कि बाद में इस संस्था ने नीना की कब्र पर स्मृति पत्थर लगाने के लिए 10 डॉलर देने से भी मना कर दिया। 

लूसी पार्सन्स और नीना स्पाइज का जिक्र इसलिए कि ये दोनों ही मई दिवस के शहीदों की पत्नियां थीं। मगर ऐसी सैंकड़ों महिलायें और भी हैं जो ‘हे मार्केट’ शिकागो से लेकर दुनिया के हर कोने में लड़ रही है। इस विश्वास के साथ कि ‘‘लड़ेेगी तो जीतेंगी जरूर’’ इस यकीन के साथ कि आने वाली दुनिया इतनी निर्मम नहीं होगीI

(यह लेख तीन वर्ष पूर्व मई दिवस के अवसर पर न्यूज़क्लिक पर प्रकाशित हुआ था। लेख के प्रासंगिकता के कारण हम इस मई दिवस के अवसर पर  फिर प्रकाशित कर रहे हैं।)

May Day
May Day Special
Women Workers
Workers day
lucy parsons
Nina Van Zandt
मज़दूर दिवस
मई दिवस

Related Stories

श्रम मुद्दों पर भारतीय इतिहास और संविधान सभा के परिप्रेक्ष्य

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

दिन-तारीख़ कई, लेकिन सबसे ख़ास एक मई

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

हरियाणा: हड़ताली आंगनवाड़ी कार्यकार्ताओं के आंदोलन में अब किसान और छात्र भी जुड़ेंगे 

गुजरात: गन्ने के खेत में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं की बंधुआ ज़िंदगी

इतवार की कविता : मज़ूर

मुफ्त टीकाकरण की मांग को लेकर मई दिवस पर ट्रेड यूनियनों का विरोध प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • beedi worker
    सतीश भारतीय
    बीड़ी कारोबार शरीर को बर्बाद कर देता है, मगर सवाल यह है बीड़ी मजदूर जाएं तो जाएं कहां?
    05 Feb 2022
    मध्यप्रदेश का सागर जिला जिसे बीड़ी उद्योग का घर कहा जाता है, वहां बीड़ी कारोबार नशा से बढ़कर गरीब आवाम की रोजी-रोटी का सहारा है। उन्हें बीड़ी कारोबार से बाहर निकालकर गरिमा पूर्ण जीवन मुहैया करवाने के…
  • handloom
    मोहम्मद ताहिर
    ग्राउंड रिपोर्ट : जिस ‘हैंडलूम और टेक्सटाइल इंडस्ट्री' को PM ने कहा- प्राइड, वो है बंद होने की कगार पर
    05 Feb 2022
    देश के प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले हैंडलूम सेक्टर को मेरठ का ’प्राइड’ कहा था। न्यूज़क्लिक ने जब इस सेक्टर की पड़ताल की तो पता चला कि ये सेक्टर अपने सबसे ख़राब दिनों से गुजर रहा है। जिसकी…
  • up elections
    एस एन साहू 
    यूपी चुनाव: क्या पश्चिमी यूपी कर सकता है भाजपा का गणित ख़राब?
    05 Feb 2022
    पश्चिमी यूपी में 10 फरवरी, 2022 को होने वाला पहले चरण का चुनाव, शेष चरणों के लिए भी काफी महत्व रखता है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से, पश्चिमी यूपी में अधिकांश विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करने वाला राजनीतिक…
  • up chunav
    सौरभ शर्मा
    यूपी चुनाव: कांस्य युग में फंसा एक द्वीपनुमा गांव
    05 Feb 2022
    उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार चल रहा है, लेकिन ग्रामीणों को अभी तक उनके क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के बारे में पता तक नहीं चल पाया है। इसके पीछे की वजह है-बुनियादी सुविधाओं का अभाव। 21वीं…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1.28 लाख नए मामले, 1,059 मरीज़ों की मौत
    05 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,27,952 नए मामले सामने आए हैं | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 20 लाख 80 हज़ार 664 हो गयी है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License