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नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया
मई दिवस की महिला नेत्रियां जिन्होंने इतिहास रचने में अपना योगदान दिया I
बादल सरोज
01 May 2021
नींव की शिलायें दो महिलायें, जिन्होंने खामोश कर दिए मौन को मुखर बना दिया

मई दिवस दुनिया को बेहतर बनाने का सपना देखने वालों का त्यौहार है।  एकमात्र ऐसा पर्व जिसे देश-धर्म-रंग-भाषा-जाति-सम्प्रदाय और नस्लों से ऊपर उठकर पृथ्वी के हर कोने में साथ मनाया जाता है।  आठ घंटे काम की मांग को लेकर 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्किट स्क्वायर पर हुई मजदूर रैली पर दमन की याद एक सुखद समाज बनाने की जद्दोजहद बन गयी। 

दुनिया और पृथ्वी दोनों ही स्त्रीलिंग शब्द हैं। इसी तरह  हिंदी में क्रान्ति और अंगरेजी में रेवोल्यूशन ये दोनों भी स्त्रीलिंग शब्द हैं। लिहाजा स्त्रियों की भागीदारी के बिना किसी क्रान्ति की कल्पना करना ही अशुध्दि होगी - और यह सिर्फ भाषायी अशुध्दि भर  नहीं होगी।  1886 के मई दिवस की लड़ाई में भी अनेक शानदार नेत्रियां थीं।  फिलहाल इनमे से दो के बारे में ;

लूसी पार्सन्स  (1853-1942)

लूसी 1853 में काले, स्पैनिश और इंडियन पुरखों के परिवार में टैक्सास की जान्सन काउंटी में जन्मी थीं। उनकी शुरूआती पृष्ठभूमि के बारे में मालूमात बहुत कम है। मगर बाद के  वर्षों में रोजर परिवार ने दावा किया था कि लूसी असल में उनकी पुरानी गुलाम, मैलिन्डा है जो गृहयुद्ध के वक्त उन्हें छोड़ गई थी। दक्षिण में लूसी जरूर रिपब्लिकन थी। मगर वे और अल्बर्ट जब 1873 में शिकागों आये तो उन्होंने पाया कि यहां के रिपब्लिकन्स नस्लीय व स्थानीय समूहों तथा अल्पसंख्यकों की समस्याओं के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते है। 1877 में वे दोनों सोशलिस्टिक लेबर पार्टी में शामिल हो गए। लूसी ‘द अलार्म’ अखबार  की नियमित लेखिका बन गई। अनगिनत रैली और सभाओं में बोलने वाली लूसी अपने पति और  बच्चों के साथ 1 मई 1886 को शिकागो में हुई 80 हजार मजदूरों की विराट रैली के अगले जत्थे में थीं। 

अल्बर्ट पार्सल्स को सजा सुनाये जाने के बाद लूसी ने पूरे अमरीका में घूम घूमकर हेमार्केट चौराहे की सच्चाई लोगों को बताई। वह यूरोप और लंदन के दौरों पर भी गईं जहां जार्ज बॉर्नार्ड शॉ और आस्कर वाइल्ड जैसे बुद्धिजीवियों को भी इस अभियान से जोड़ा। 

शिकागो लौटकर खुद लूसी ने मई दिवस मुकदमें की परतें खोलने वाली पुस्तिका ‘‘ क्या यह सच्चा इंसाफ था : गर्वनर के नाम अपील’’ की पांच हजार प्रतियां, बार बार पुलिस के द्वारा पकड़े जाने के बाद भी बेची। अल्बर्ट की फांसी के बाद लूसी ने उसकी जिंदगी पर किताब लिखी जिसके समर्पण में उसने लिखा कि ‘‘जिसका एक मात्र अपराध यह था कि वह अपने वक्त से काफी पहले हुआ..’’

त्रासदी ने लूसी के साथ नहीं छोड़ा। उसके दोनों बच्चे लुलू और अल्बर्ट जूनियर जल्दी ही मर गए। उनकी कब्र की मिट्टी उसने हमेशा अपने साथ सहेज कर रखी। बाकी पूरा जीवन लूसी ने सामाजिक न्याय के लिए समर्पित कर दिया। बहुत कम लोग जानते है कि यह लूसी थी जिसने ‘हड़ताली धरने’ के हथियार को खोजा था। 1905 में हुए औद्योगिक मजदूरों के विश्व सम्मेलन में बोलते हुए उसने कहा था कि -  ‘‘भविष्य की हड़तालों के बारे में मेरी धारणा, हड़ताल करके बाहर चले जाने और भूखों मरने की नहीं है। बल्कि हमें हड़ताल करके अंदर ही धरना देकर बैठना चाहिए और उत्पादन से जुड़ी जरूरी संपत्तियों को अपने आधिपत्य में लेना चाहिए।’’

7 मार्च 1942 शनिवार को दोपहर में लूसी के मकान में आग लग गई। वह अब अंधी हो चुकी थी, इसलिए बिल्डिंग से बाहर नहीं निकल सकी और उसी आग में भस्म हो गई उसे बचाने की असफल कोशिश में 32 साल से साथ रह रहे जॉर्ज मार्कशाल की भी मौत हो गई। उसकी व दोनों बच्चों की भस्म के साथ उसे अल्बर्ट पार्सन्स की कब्र के पास ही दफना दिया गया। 

 उसके मरते ही 2500 से 3000 किताबों वाली उसकी लाइब्रेरी अमरीकी पुलिस ने गायब कर दी। लूसी ने अपना मकान और जमीन बेचकर उस राशि को शहीदों के आंदोलन को दिए जाने की वसीयत  की थी। इस तरह उसने अपनी मुहिम अपनी मौत के बाद भी जारी रखी। 

नीना वान जांट स्पाइज

खाये पीये परिवार की उत्सुकता के चलते आगस्ट स्पाइज के मुकदमें को सुनने अदालत पहुंची नीना वान बाद में न केवल उसकी दोस्त बन गई बल्कि आगस्ट के जेल में रहते ही उससे शादी कर उसकी पत्नी भी बन गई। एक दवा कंपनी के मालिक की बेटी नीना का पूरा नाम रोजेनिया क्लार्क वान जांट था। 1883 में उसने स्नातक की डिग्री ली। रईसी उसे सिर्फ पिता की ओर से ही नहीं मिली थी। उसकी मौसी ने उसके लिए पांच लाख डॉलर इस उम्मीद से रख छोड़े थे कि वह अमीर सोसायटी में रहेगी और ‘अच्छी’ शादी करेगी। सजायाफ्ता ऑगस्ट स्पाइज से शादी करने के नतीजे में यह दौलत भी नीना से छिन गई। 

मुकदमें के दौरान सुबह और शाम दोनों वक्त अलग-अलग  शानदार गाउन पहनकर अदालत में बैठने वाली यह नवयुवती उस वक्त के अखबारों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। उसके और आगस्ट  स्पाइज के प्रेम के किस्से आम होते रहे। उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि एक अजायब घर में उसकी मोम की मूर्ति तक रख दी गई। जिस पर मुकदमा ठोक कर नीना ने हरजाना वसूला और हे मार्केट के मुकदमें को लडऩे वाली कमेटी को वह राशि सौंप दी। आगस्ट की आत्मकथा लिखने में भी नीना ने उसकी मदद की। 

जब फांसी का वक्त नजदीक आया और जेल अधिकारियों ने नीना की ऑगस्ट से मुलाकात पर रोक लगा दी और कहा कि वह न रिश्तेदार है न पत्नी तो उसने ऑगस्ट से शादी की पेशकश की। तत्कालीन प्रशासन ने जब जेल में शादी की अनुमति नहीं दी तो नीना ने बाहर ही एवजी विवाह कर खुद के लिए आगस्ट की पत्नी का दर्जा हासिल कर लिया। बाद के बर्षों में जब उसने लूसी पार्सन्स के साथ अनगिनत जुलूसों में भाग लिया।

मई दिवस के शहीदों के साथ अपने इस अनूठे और अपरिमित लगाव और समर्पण के चलते उसने बाकी जिंदगी गरीबी में गुजारी। मगर न अपने पिता से पैसा मांगा न मौसी के पास गई। अप्रैल 1936 में उसकी मौत हो गई। उसकी अंतिम इच्छा के अनुरूप लूसी पार्सन्स ने उसके अंतिम संस्कार में भाषण दिया। 

एक सहृदय नारी-नीना-ने अपने घर में अनेक बेजुबान जानवर पाल रखे थे। वह खुद गरीबी में रही मगर अपनी मौत के बाद तीन हजार डॉलर इन जानवरों की देखरेख के लिए एक संस्था के नाम छोड़ गई थी। यह बात अलग है कि बाद में इस संस्था ने नीना की कब्र पर स्मृति पत्थर लगाने के लिए 10 डॉलर देने से भी मना कर दिया। 

लूसी पार्सन्स और नीना स्पाइज का जिक्र इसलिए कि ये दोनों ही मई दिवस के शहीदों की पत्नियां थीं। मगर ऐसी सैंकड़ों महिलायें और भी हैं जो ‘हे मार्केट’ शिकागो से लेकर दुनिया के हर कोने में लड़ रही है। इस विश्वास के साथ कि ‘‘लड़ेेगी तो जीतेंगी जरूर’’ इस यकीन के साथ कि आने वाली दुनिया इतनी निर्मम नहीं होगीI

(यह लेख तीन वर्ष पूर्व मई दिवस के अवसर पर न्यूज़क्लिक पर प्रकाशित हुआ था। लेख के प्रासंगिकता के कारण हम इस मई दिवस के अवसर पर  फिर प्रकाशित कर रहे हैं।)

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