NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना
“मालिक हम से दस से बारह घंटे काम लेता है। मशीन पर खड़े होकर काम करना पड़ता है। मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है। आठ घंटे की मजदूरी के आठ-नौ हजार रुपये तनखा देता है। चार घंटे ओवर टाइम करनी पड़ती है तब जाकर परिवार का गुजारा होता है। अगर हम नौ-दस घंटे काम करें तो ओवर टाइम नहीं देता है। पूरे चार घंटे ओवरटाइम करने पर ही ओवर टाइम का पैसा मिलता है...।”
राज वाल्मीकि
01 May 2022
workers
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार

झारखण्ड से आए आदिवासी समुदाय से संबंध रखने वाले पैंतालीस वर्षीय सोहनलाल आनंद पर्वत में मोटर पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में मजदूरी करते हैं। वे कहते हैं –

“ मालिक हम से दस से बारह घंटे काम लेता है। मशीन पर खड़े होकर काम करना पड़ता है। मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है। आठ घंटे की मजदूरी के आठ-नौ हजार रुपये तनखा देता है। चार घंटे ओवर टाइम करनी पड़ती है तब जाकर परिवार का गुजारा होता है। अगर हम नौ-दस घंटे काम करें तो ओवर टाइम नहीं देता है। पूरे चार घंटे ओवरटाइम करने पर ही ओवर टाइम का पैसा मिलता है। ओवर टाइम में भी हमारी मर्जी नहीं चलती है। करनी ही पड़ती है। ना करें तो मालिक काम से निकालने की धमकी देता है।... लॉक डाउन के बाद से काम मिलना भी मुश्किल हो गया है। इसलिए मजबूरी में काम करना ही पड़ता है। आखिर परिवार का पेट पालन तो करना ही है...।”

वे बताते हैं कि कुछ दिन पहले मशीन पर काम करते वक्त एक मजदूर की उंगलियाँ मशीन से कट गईं। उसे मुआवजा भी नहीं मिला है। उलटे उसे काम से और हटा दिया गया है।

इसी तरह टैंक रोड की एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाली दलित वर्ग की तीस वर्षीय  बबली कहती हैं कि – “...अब बच्चों के स्कूल खुल गए हैं। सुबह जल्दी उठकर नाश्ता बना  कर बच्चों की टिफिन तैयार करके उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता है। पति सुबह ही ड्यूटी चले जाते हैं। इसलिए बच्चों को मुझे ही स्कूल छोड़ने जाना  पड़ता है। फिर फैक्ट्री में जाने के लिए लेट हो जाती हूँ। इसलिए कभी-कभी नाश्ता करने की भी फुर्सत नहीं होती। ऐसे में ग्यारह बजे तक भूख लगने लगती है। पर वहां लंच टाइम एक बजे होता है। तो मैं टॉयलेट जाने के बहाने टॉयलेट में नाश्ता करती हूँ। ...आठ घंटे का तो नाम ही है ड्यूटी तो हमें दस घंटे करनी पड़ती है। मालिक एक–दो घंटे की ओवर टाइम का हिसाब लगा कर तनखा देता है। अब हम पढ़े लिखे तो हैं नहीं। मालिक जो ओवर टाइम का  हिसाब लगा देता है वही लेनी होती है। पर मेरे कमाने से परिवार को सहारा मिल जाता है। वर्ना इस आसमान छूती मंहगाई में घर का गुजारा कैसे चले। मकान मालिक किराया बढाने पर जोर देता है। अब ऐसे में अकेले पति की कमाई में पूरा पड़ता नहीं है। कमरे का किराया। बच्चों के स्कूल का खर्च। फिर घर के रोजमर्रा के खर्च। ऐसे में क्या खाएं क्या बचाएं। बहुत मुश्किल होता है।”

बबली के साथ कामे करने वाली माया कहती हैं– “भईया क्या बताएं, गर्मी का समय है प्यास बहुत लगती है। पर हम ज्यादा पानी भी नहीं पीती हैं। बार-बार टॉयलेट जाना होता है। ज्यादा बार जाओ तो सुपरवाईजर डांटता  कि तुम काम  करने आती हो या टाइम पास करने। ढंग से काम कर लो वरना छोड़ दो।...”

उपरोक्त मजदूरों से बातचीत करने पर लगा कि बेशक आठ घंटे की ड्यूटी कहा जाता है। पर मालिक दस-बारह घंटे इनसे काम लेते हैं। ओवर टाइम का लालच जरूर देते हैं। पर कितना ओवर टाइम देंगे वह भी उनकी मर्जी पर निर्भर करता है।  

कहने को तो हम 1 मई 2022  को 133वां अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मना रहे हैं। पर इस दिवस को मनाने के लिए 19वीं सदी में जिन मजदूर और मजदूर नेताओं ने अपनी शहादत दी और हमें आठ घंटे काम करने का अधिकार दिलाया। लगता है उनकी शहादत बेकार होने जा रही है। क्योंकि मोदी सरकार मजदूरों से उनके अधिकार छीनकर फिर से 19वीं सदी में उन्हें धकेल रही है। ऐसे में कार्ल मार्क्स याद आते हैं जिन्होंने मजदूर एकता पर जोर देते हुए नारा दिया  था -  “ दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।”

भारतीय सामजिक संस्थान के आदिवासी विभाग के प्रमुख विन्सेंट एक्का मजदूरों की स्थिति पर अपनी टिप्पणी करते हुए कहते हैं –“19वीं सदी में लम्बे संघर्ष के बाद दुनिया के मजदूरों को कुछ अधिकार दिए गए जिसमें उचित वेतन, सुरक्षा, सम्मान, श्रम का सम्मान आदि सम्मिलत हैं। मजदूरों या कामगारों के इस तरह के अधिकारों को पाने के लिए अमेरिका, यूरोप और रूस जैसे बड़े देशों में काफी संघर्ष हुए,और इसके परिणामस्वरूप श्रीमिकों को कुछ पहचान, सम्मान , अधिकार और इज्जत मिली। इन्हीं उपलाब्धियों की याद में दुनियाभर में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है।

भारत देश के सन्दर्भ में मजदूरों की पहचान, सम्मान और अधिकार की बात की जाए तो वह “हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और वाली बात हो जाती है। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले एवं आजादी के बाद श्रमिकों के अधिकार संबंधी कई क़ानून बने हैं जिसके तहत मजदूर अपने अधिकार, न्याय, पहचान एवं सम्मान की मांग करता है। वर्तमान भारत सरकार ने इस प्रकार के 29 श्रम कानूनों को मिलाकर चार श्रम संहिता के रूप में लोकसभा के माध्यम से सितम्बर 2020 में पास कराया गया है. ये चार श्रम संहिता हैं – 1. वेतन /मजदूरी संहिता 2. औद्योगिक संबंधों पर संहिता 3. काम विशेष से जुडी सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थलों की दशाओं पर संहिता  4. सामाजिक एवं व्यावसायिक सुरक्षा संहिता।

सरकार ने चार लेबर कोड लाकर श्रमिकों को बारह-बारह घंटे काम कनरे के लिए कानूनी मान्यता देकर सैकड़ों साल के संघर्ष को (सन 1886 के मजदूर आंदोलन की उपलब्धि) को 130 साल बाद छीन लिया। अगर सरकार की भाषा में कहें तो “आपदा में अवसर” पूंजीपति वर्ग ले रहा है। मेहनतकशों की तनख्वाह को पहले से ही कम कर दिया गया है। खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं। जिसके कारण मजदूर वर्ग पूंजीपतियों के लिए मुनाफा कमाने की मशीन बन गया है। इसी कारण हमारे देश में पूंजीपतियों की पूंजी और संपत्ति में और अधिक बढोत्तरी हो रही है। वे और अमीर होते जा रहे हैं।

इन श्रम संहिताओं को लोकसभा में पारित कर केंद्र सरकार यह दावा कर रही है कि इन श्रम संहिता से संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों को भविष्यनिधि, कर्मचारी पेंशन योजना और कर्मचारी बीमा योजना का लाभ मिलेगा। इस तरह से वर्तमान भारत सरकार श्रमिकों के वेतन सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और ‘एक पंजीकरण एक लाइसेंस’ का दावा कर रही है। गौर करनेवाली बात यह है कि देश का मजदूर संगठन और मजदूर वर्ग इन सभी सरकारी दावों को खोखला एवं झूठा मानता है। क्योंकि राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण मजदूरों को उचित वेतन, सामाजिक एवं व्यावसायिक सुरक्षा, सम्मान एवं स्वास्थ्य सुविधा मुहैया नहीं होती है। सरकारी एवं प्राइवेट औद्योगिक  संस्थान सरकार की इस ढुलमुल नीति का गलत फायदा उठाते हैं।”

काबिले गौर है कि वर्ष 2020-21 में कोरोना महामारी और लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर पड़ी है। नियोक्ता केंद्र एवं राज्य सरकार तहत प्राइवेट संस्थानों आदि ने मजदूरों और खासकर प्रवासी मजदूरों  एवं उनके आश्रितों से अपना पल्ला झाड़ लिया था। परिणामस्वरूप लोगों ने सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की दूरी या तो पैदल तय करने या अपने सीमित संसाधनों से अपने पैतृक स्थानों को लौटने को मजबूर है गए। कई प्रकार की असुविधाओं, भूख, प्यास और थकान के कारण कई प्रवासी मजदूरों की मृत्यु रास्ते में ही हो गई थी।

कैसे हुई मजदूर दिवस की शुरुआत

इस दिन की शुरुआत 1 मई सन् 1886 को अमेरिका में एक आंदोलन के कारण हुई थी। इस आंदोलन में अमेरिका के मजदूर शामिल थे, जिन्होंने काम के लिए 8 घंटे निर्धारित करने की मांग की थी। इससे पहले इन मजदूरों से 15-15 घंटे काम करवाया जा रहा था। ऐसे में मजदूर अमेरिका की सड़कों पर उतर आए थे। इस आंदोलन के दौरान कुछ मजदूरों पर पुलिस ने गोली भी चलाई, जिसके कारण कुछ मजदूरों की मौत हो गई वहीं 100 से ज्यादा मजदूर इस आंदोलन के चलते घायल भी हुए। 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन ने जब दूसरी बैठक की तो उस बैठक में एक प्रस्ताव पारित करने के साथ-साथ 1 मई का दिन अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा, इस बात की भी घोषणा की। वहीं यह भी कहा गया कि इस दिन सभी मजदूर, कामगारों और श्रमिकों की छुट्टी रहेगी। इससे अलग दुनिया के देशों में मजदूर 8 घंटे ही काम करेंगे।

अगर भारत की बात की जाए तो हमारे देश में लेबर डे की शुरुआत 1923 में चेन्नई में हुई थी। इसकी शुरुआत लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान ने मद्रास में की थी। इस दिन पहली बार लाल रंग झंडा मजदूर दिवस के प्रतीक के रूप में उपयोग में लाया गया था।

दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर कौन करेगा ग़ौर

आज के समय में भाजपा सरकार जिस तरह से श्रम कानूनों पर निर्णय ले रही है उस से वह मजदूरों को न केवल  उनके अधिकारों से वंचित कर रही है बल्कि पूंजीपतियों को उनका शोषण करने के लिए खुली छूट दे रही है। दलित मजदूर जिस तरह से सफाई के जोखिम भरे काम करते हैं और सीवर-सेप्टिक टैंको में अपनी जान गँवा रहे हैं। उस पर सरकार ने चुप्पी साध रही है। रैग पिकर जिस तरह से जोखिम भरे काम कर रहे हैं। बीमारियों से असमय मर  रहे हैं। इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं हैं।

इस इक्कीसवीं सदी में, जब हम मानव अधिकारों की बात कर रहे हैं और मानवीय गरिमा से जीवन जीने के अधिकार की बात करते हैं तब ये सवाल उठाना लाज़मी है कि इन दलित आदिवासी और मेहनतकशों को क्या इज्जत से, मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक़ नहीं है?

May Day
May Day Special
Workers' Day
International Workers' Day
working class
unemployment
Inflation
Modi government
Narendra modi
aadiwasi
tribals
Tribal workers

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

अमित शाह का शाही दौरा और आदिवासी मुद्दे

सालवा जुडूम के कारण मध्य भारत से हज़ारों विस्थापितों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग 


बाकी खबरें

  • tor wennesland
    एपी
    इज़राइल, फ़लस्तीन के बीच नए सिरे से हिंसा भड़कने की आशंका : संयुक्त राष्ट्र दूत
    01 Dec 2021
    वेनेसलैंड ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहा है कि यह जरूरी है कि पक्षकार ‘‘जमीन पर स्थिति को संयमित करें’’, पूरे फलस्तीन में हिंसा कम करें, एकतरफा तरीके से इजराइली बस्तियों को बसाने से बचा जाए।
  • भाषा
    रिश्वत लेकर अपराधी छोड़ने के मामले में क्राइम ब्रांच प्रभारी व मुख्य आरक्षी बर्ख़ास्त
    01 Dec 2021
    सूत्रों ने बताया कि नोएडा पुलिस की टीम ने हैकरों से 50 लाख रुपये की मांग की थी लेकिन 20 लाख रुपये पर समझौता हुआ। बाद में हैकरो के घर पहुंची टीम क्रेटा कार भी ले आई।
  • Tribals
    रूबी सरकार
    सामूहिक वन अधिकार देने पर MP सरकार ने की वादाख़िलाफ़ी, तो आदिवासियों ने ख़ुद तय की गांव की सीमा
    01 Dec 2021
    मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने आदिवासी इलाक़ों में सामूहिक वन अधिकार देने का वायदा किया था, लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं किया। तब जागरूक आदिवासियों ने स्वयं ही गांव गणराज्य ग्राम सभा का सपना और अपने…
  • Climate change
    प्रबीर पुरकायस्थ
    धरती का बढ़ता ताप और धनी देशों का पाखंड
    01 Dec 2021
    ऊर्जा के वैकल्पिक रास्तों को अपनाने की क्या क़ीमत होगी और इस क़ीमत का बोझ कौन उठाएगा? ये पहलू कोप-26 से पूरी तरह से ही गायब था। उसमें कम कार्बन उत्सर्जन के रास्ते के अपनाए जाने के लिए वित्त व्यवस्था…
  • Sudha Bhardwaj
    भाषा
    एल्गार परिषद : बंबई उच्च न्यायालय ने वकील सुधा भारद्वाज को ज़मानत दी
    01 Dec 2021
    अदालत ने भारद्वाज को इस आधार पर ज़मानत प्रदान कि उनके ख़िलाफ़ निश्चित अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ इसलिए वह ज़मानत की हकदार हैं। भारद्वाज वर्ष 2018 में गिरफ़्तारी के बाद से विचाराधीन कैदी के तौर पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License