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राजनीति
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यूक्रेन संघर्ष का कोई जादुई समाधान नहीं है
मैक्रॉन ने इस दिशा में काफी कुछ दांव पर लगे पेरिस में चल रहे नार्मंडी फोर शिखर सम्मलेन में कुछ बढ़त हासिल की है, जिसकी मेजबानी उन्होंने सोमवार को की।
एम. के. भद्रकुमार
12 Dec 2019
There’s no Miracle Solution
जर्मन चान्सलर एंजेला मर्केल, बायें, फ़्रांस के राष्ट्रपति इम्मानुएल मैक्रॉन और रुसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन पर 9 दिसम्बर, 2019 को पेरिस के एलयसी पैलेस में शिखर सम्मेलन के बाद प्रेस कांफ्रेंस के दौरान आपस में बातचीत करते हुए।   फोटो: एएफपी/चार्ल्

हृदय रोग जीवनशैली पर असर डालता है और शरीर के सुचारू रूप से संचालन में बाधा उत्पन्न करता है। यकीनी तौर पर यूक्रेन संघर्ष की खासियत को दर्शाने के लिए फ़्रांस के राष्ट्रपति इम्मानुएल मैक्रॉन ने बेहद शक्तिशाली रूपक का इस्तेमाल किया-“यूरोपीय महाद्वीप के दिल में एक घाव” बताया। यह उस बेहद-महत्त्व वाली नोर्मंडी फोर शिखर सम्मेलन का बेहद सटीक विवरण था जो पेरिस के एलीसी पैलेस जिसका उन्होंने सोमवार को आयोजन किया था।

हृदय रोग की ही तरह, यूक्रेन संघर्ष का भी कोई तत्काल उपचार नहीं है। लेकिन यूरोपीय राजनीति में लगातार बने हुए लक्षण जो पिछले हफ्ते लन्दन में नाटो सम्मलेन में भी उजागर हुए, उन्हें भी अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है।इस डर से कि कहीं नाटो के 70वें सालाना वर्षगाँठ के शिखर सम्मेलन में कोई संयुक्त विज्ञप्ति ही जारी न हो जाये, गठबंधन ने इस ऐतिहासिक अवसर को मात्र शीर्ष नेताओं की मीटिंग के रूप में घोषित कर बात आई गई कर दी। यह एक ऐसी परिस्थिति के सादृश्य है जैसे उत्तरअटलांटिक गठबन्धन को हृदयाघात से जकड़ रखा हो।

यूक्रेन संघर्ष ने पश्चिम के साथ रूस के सम्बन्धों में गाँठ बाँध रखी है। इसने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को तेज कर दिया है, और मास्को को एक दुश्मन की छवि में ढाल दिया है।यकीनन कुछ समय के लिए इसने अमेरिका और यूरोप के उत्तरअटलांटिक सम्बन्धों को और मजबूती प्रदान की है, लेकिन तभी तक जब तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नहीं पहुंचे थे, और पूरी पार्टी का मजा ही किरकिरा न कर दिया। उन्होंने पुराने यूरोप’ के आत्म-सम्मान को तिरस्कृत किया और इस बात पर यूरोपीय पुनर्विचार करने पर जोर दिया।

सुसंगत दृष्टिकोण की जरूरत  

रूस को अलग-थलग करने वाली बुद्धिमत्ता पर यूरोप में संदेह और बढ़ते असहमति के स्वरों देखने को मिल रहे हैं। लेकिन रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का जारी रहना एक यथार्थ वास्तविकता बनी हुई है, और रूस के प्रति एक सुसंगत दृष्टिकोण का यूरोप में अभी भी अभाव है।इस बीच वाशिंगटन ने रूस और चीन को एक खाँचे में फिट कर अपना प्रधान विरोधी घोषित कर दिया है और इसे नाटो के एजेंडा में शामिल कर दिया है।

भू-राजनीतिक दृष्टि से फ़्रांस इसका प्रधान भिन्नमतावलम्बी बनकर उभरा है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से महाद्वीप में रूस के साथ रिश्ते इस प्रभाव के प्रमुख कारक हैं। पिछले महीने द इकोनॉमिस्ट पत्रिका के साथ विस्तृत तौर पर विश्लेषण किये गए साक्षात्कार में इम्मानुएल मैक्रॉन ने इस बात पर घोर निराशा व्यक्त की थी कि नाटो एक “दिमागी मौत” से पीड़ित है और वाशिंगटन “हमारे प्रति अपनी पीठ मोड़ने” का संकेत दे रहा है।

मैक्रॉन का वैश्विक मिज़ाज अधिकाधिक चार्ल्स डे गाल से मिलता-जुलता है और वे बात को महसूस करते हैं कि फ़्रांस का हित इस बात में है कि पश्चिम और रूस अपने रिश्तों को संतुलित बनाये। जिसे वे “रूस को दोबारा यूरोप से बांधने” के रूप में कहा है। और वे व्लादिमीर पुतिन में “सैंट पेटर्सबर्ग का बालक” के अक्स को देखते हैं, जिस पीटर द ग्रेट ने पश्चिम के लिए एक खिड़की के रूप में रुसी राजधानी नेवा में बसाई थी।

और हाँ, यह सच है कि फ़्रांस और जर्मनी के बीच बढ़ते तनावों की एक छाप भी मौजूद है- यद्यपि जब कभी यूक्रेन की बात आती है तो एंजेला मेर्केल पाती हैं कि मिन्स्क प्रक्रिया उनकी भी राजनीतिक विरासत से सम्बद्ध है। यह कहना पर्याप्त होगा, जो कि विरोधाभासी है कि परिस्थितियाँ कभी इतनी जटिल नहीं थी, और इतनी आशाजनक भी नहीं कि एक तरफ यूक्रेन वाली गाँठ को भी खोलने का समय हो और साथ ही डोनबास के संघर्ष से दो-चार होना पड़े।

हर पहलू के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष को ध्यान में रखकर तीन कारकों को गिना जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यूक्रेन में बर्फ की तरह जमे संघर्ष से अमेरिकी हित सधते हैं। जिसे मध्य यूरोप और बाल्टिक के पूर्व वॉरसॉ समझौते वाले देशों ने रूस के साथ किसी भी प्रकार के रचनात्मक सहयोग की ओर बढ़ते कदम पर अमेरिकी अविश्वास को साझा किया है। इसके अलावा यूक्रेनी चरम-राष्ट्रवादियों के साथ जो रूस के साथ किसी भी प्रकार की सुलह के खिलाफ लामबंद हैं।
 
बाध्यकारी तत्व
 
और तीसरी बात क्रिमीया को हड़पने वाला विवादास्पद मुद्दा - जिसपर मास्को कभी भी पीछे हटना नहीं चाहेगा। लेकिन गतिरोध की यही वह वजह है जो गले में सेव के फंसे होने के समान है, जो रूस के खिलाफ यूरोपीय प्रतिबंधों को जारी रखने को प्रेरित करते हैं।हालाँकि सकारात्मक पहलू के रूप में बाध्यकारी कारक भी हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदीमीर ज़ेलेंस्की को डोनबास में संघर्ष को हल करने और रूस के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए विशाल जनादेश हासिल है। यूरोपीय संघ और नाटो को नहीं लगता कि निकट भविष्य में यूक्रेन को हथियाया जा रहा है और अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा के विपरीत राष्ट्रपति ट्रम्प यूक्रेन के सवाल पर अनिर्णय की स्थिति में हैं।
 
बदले में यह परिस्थिति, नोर्मंडी फोर देशों - फ्रांस, जर्मनी, रूस और यूक्रेन के लिए स्थान मुहैय्या करती है, जिससे वे वर्तमान में पहलकदमी लेकर तथाकथित ‘स्टेनमिएर फ़ॉर्मूले’ के आधार पर मिंस्क समझौते को लागू कर सकते हैं, जो डोनबास में संघर्ष-विराम की परिकल्पना करता है। कीव द्वारा संवैधानिक सुधारों के मातहत अलगाववादी क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करने और इसके बाद अन्तराष्ट्रीय निगरानी के तहत चुनाव सम्पन्न किये जा सकते हैं।

नोर्मंडी फॉर शिखर सम्मेलन ने सोमवार को संपन्न हुई यूक्रेन शांति प्रक्रिया के रूप में एक मामूली लेकिन महत्वपूर्ण शुरुआत को पुनर्जीवित किया है। इन तीन प्रमुख क्षेत्रों में सम्मिलन की स्थिति थी: एक “सभी के लिए सभी” बंदियों के आदान-प्रदान की और साल के अंत तक पूर्ण युद्ध-विराम। इसके साथ ही 2015 के मिंस्क समझौतों के प्रति एक बार फिर से आश्वासन, जो यूक्रेनी कानूनों के माध्यम से संवैधानिक सुधार और कीव द्वारा स्थानीय चुनावों के माध्यम से फिर से एक बार अलगाववादी क्षेत्रों पर अपने नियन्त्रण को स्थापित करने को साकार होते देखना चाहता है। इस बात पर भी समझौता हुआ कि चार महीनों के उपरान्त फिर से नोर्मंडी फोर शिखर सम्मेलन को आयोजित किया जायेगा।यथार्थ यह है कि मतैक्य बने हुए हैं, जो मुख्य रूप से स्थानीय चुनावों को संपन्न करने को लेकर सुरक्षा और राजनैतिक परिस्थितियों के चरणबद्ध (पदानुक्रम) को लेकर हैं। लेकिन मैक्रॉन ने सावधानीपूर्वक आशावादी स्वर में कहा है कि आने वाले चार महीने सम्पूर्णता में माहौल को बेहतर बना सकते हैं और यूक्रेन और रूस के मतभेदों को कम कर सकते हैं।

बेहद अनौपचारिक रूप से उन्होंने स्वीकार किया कि: “आज हमारे बीच मतभेद हैं। हम इसका कोई चमत्कारी समाधान नहीं निकाल सके, लेकिन हम उस दिशा में आगे बढे हैं।” पेरिस शिखर सम्मेलन के मौके पर जो पुतिन और ज़ेलेंस्की के बीच पहली मुलाकात है, को भी एक सकारात्मक पहल के रूप में गिना जा सकता है। मास्को इसे शांति के प्रति ज़ेलेंस्की की वास्तविक चाहत के रूप में देख रहा है।

एक बेहद महीन रेखा पर चलना
 
पुतिन का यह पेशकश कि यूक्रेन में औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए गैस की कीमतों में 25% की कमी की जा सकती है। यदि मास्को और कीव “संयुक्त ईमानदारीपूर्वक कार्य” पर सहमत हो जाते हैं तो इसे ज़ेलेंस्की के हाथों को मजबूत करने वाला बुद्धिमत्तापूर्ण कदम के रूप में देखा जा सकता है।रूस को बिना किसी संरक्षक भाव के, ज़ेलेंस्की की मोलभाव करने की क्षमता को मजबूत करने के लिए एक बेहद महीन लकीर पर चलना होगा। हालाँकि पुतिन एक यथार्थवादी व्यक्ति हैं, लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें अति सक्रिय होने की छूट हासिल नहीं है।रूस के लिए सर्वोत्तम निष्कर्ष तो यह होगा कि मिंस्क समझौतों को लागू किया जा सके जो डोनेत्सक और लुगान्स्क क्षेत्रों के यूक्रेन में पुनरेकीकरण की ओर ले जाती हो। लेकिन अत्यधिक मात्रा में स्वायतत्ता के अधिकारों ने, जिससे उन क्षेत्रों को रूस के साथ खास रिश्तों को बनाए रखने में सक्षम बनाता है और जो उन्हें कीव की विदेश नीति में उनकी पकड़ को बनाता है, से असर पड़ सकता है।

जहाँ तक पेरिस सम्मेलन में क्रीमियन मुद्दों को स्पष्ट करने का सवाल है मास्को ने एक प्रतीकात्मक विजय हासिल कर ली है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण मैक्रॉन का पश्चिम में जबर्दस्त रूप से रूस विरोधी वातावरण वाले भय को दूर करने वाले साहसिक प्रयास में नजर आता है। पेरिस शिखर सम्मेलन से कुछ ख़ास तो नहीं, पर रुसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव और ट्रम्प की इस हफ्ते व्हाईट हाउस में होने वाली मुलाक़ात के लिए अनुकूल चरण तैयार हो गया है।

साभार: एशिया टाइम्स 

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

There’s no Miracle Solution to Ukraine Conflict

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