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भारत
राजनीति
मोदी के डिजिटल स्वास्थ्य मिशन से जनता को क्या मिलेगा? 
मोदी के स्वास्थ्य मिशन का सम्पूर्ण विश्लेषण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मोदी का डिजिटल इंडिया जनता के हित के लिए नहीं, बल्कि कारपोरेट घरानों के हित में काम करेगा।
बी. सिवरामन
26 Oct 2021
Modi
Image courtesy : AffairsCloud

“आज एक ऐसे मिशन की शुरुआत हो रही है जिसमें भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने की ताकत है”- ये कहते हुए 27 सितम्बर 2021 को आयुष्मान भारत नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन (एनडीएचएम) की प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की थी। यदि जुमलों के लिए कोई नोबेल पुरस्कार होता तो वो निश्चित ही मोदी जी को मिलता! आखिर, हम इसके अलावा क्या निष्कर्ष निकालें, यदि किसी देश का प्रधानमंत्री 1.3 अरब लोगों के लिए एक राष्ट्रीय मिशन शुरू करता है, जिससे उन्हें एक भी अतिरिक्त स्वस्थ्य सुविधा नहीं मिलती।

एनडीएचएम के अंतरगत तीन कम्पोनेंट आते हैं-

1. इस मिशन के अंतर्गत 130 करोड़ नागरिकों को यूनीक हेल्थ आईडी (ID) मिलेगी, जिसके तहत वे अपने सारे स्वास्थ्य रिकॉर्ड डिजिटल रूप में एक राष्ट्रीय डेटा बेस में रख सकते हैं। वे खुद या कोई भी पंजीकृत अस्पताल, जो उसकी चिकित्सा कर रहा हो, वो इन्हें ले सकता है।

2. समस्त स्वास्थ्य प्रोफेशनल का पंजीकरण होगा- डाक्टरों से लेकर नर्सों और वार्ड बॉय तक। सभी स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पंजीकरण अनिवार्य होगा, और उन्हें अपनी योग्यता, तथा वे क्या सेवाएं प्रदान कर सकते हैं, इसका डाटा भी उपलब्ध कराना होगा।

3. एक अन्य पंजीकरण होगा, जो चिकित्सा सेवाएं देने वालों से संबंधित होगा, मसलन अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लिनिक और लैब्स आदि।

एनडीएचएम (NDHM) के क्या फायदे-नुक़सान हैं?

नगरिक के लिए एक ही लाभ दिखाई देता है- वह यह कि बजाए इसके कि वह अपने पिछले सारे इलाज के रिकार्ड और उसके लिए किये गए सारे टेस्ट रेपोर्टों की फाइल हाथ में लेकर घूमे, अब केवल अपने डिजिटल आईडी कार्ड ले जा सकते हैं और अस्पताल उनके सारे रिकार्ड डाउनलोड कर सकता है और स्क्रीन पर उन्हें देख सकता है।

इसके नकारात्मक पहलू ज्यादा व अधिक गम्भीर हैंः

* स्वास्थ्य बीमा कम्पनियां, बड़ी फ़ार्मा कम्पनियां और कारपोरेट अस्पताल इस डेटाबेस का इस्तेमाल करके रोगियों का पता लगा सकते हैं और उनपर विज्ञापनों की बौछार कर सकते हैं तथा मार्केटिंग के दंद-फन्द के माध्यम से उन्हें अपने चंगुल में फंसा सकते हैं। किसी भी नागरिक का स्वास्थ्य-संबंधी रिकार्ड उसका निजीडाटा है। पर देश में अब तक ऐसा कोई कानून नहीं है जो नागरिकों के व्यक्तिगत डाटा के गलत इस्तेमाल के विरुद्ध संरक्षा प्रदान करता हो। मोदी सरकार ने तो प्रस्तावित पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल के कुछ प्रावधानों पर अमेरिका के ऐतराज के बाद उसे ठंडे बस्ते में ही डाल दिया। मोदी सरकार ने 130 करोड़ नागरिकों के विस्तृत स्वास्थ्य डाटाबेस बनाने की ठान तो ली है, पर निजी डाटा के गलत इस्तेमाल के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा नहीं दी।

* सरकार इस मिशन को नागरिकों पर बिना उनकी सहमति के थोप देना चाहती है-यानि किसी भी स्टेकहोल्डर से सलाह लिए बिना आगे बढ़ रही है। न चिकित्सकों के संगठन और न ही अस्पतालों के प्रबंधकों, नर्सो और तकनीकी स्टाफ से सलाह-मशविरा किया गया है। यहां तक कि संसद तक में इस पर चर्चा नहीं हुई है।

* इस मिशन के अंतर्गत, राज्य सरकारों को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं, यानि अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा करा रहे रोगियों के सभी स्वास्थ्य अभिलेखों को डिजिटाइज़ करना है और अपने खर्च पर नेशनल हेल्थ डाटाबेस पर अपलोड करना है। पर आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार ने इसके बारे में किसी भी राज्य सरकार के साथ बातचीत तक नहीं की। क्या यह लोकतत्र का मोदी मॉडल है?

* चलिये हम एक उदाहरण लें। उच्च कोटि के सरकारी अस्पताल, चेन्नई जनरल हॉस्पिटल में औसतन 2000 भर्ती रोगियों के अलावा 10,000 बाह्य रोगियों का इलाज होता है। अस्पताल के प्रबंधन को यदि रोगियों के अभिलेख(Record) प्रतिदिन डिजिटाइज़ करने हों तो कम-से-कम 250 कर्मचारी रखने होंगे। हम यहां अनुमान लगाते हैं कि एक कर्मचारी प्रतिदिन 50 रोगियों के रिकार्ड डिजिटाइज़ और अपलोड करने की क्षमता रखता होगा। यानि तमिलनाडू सरकार को कम-से-कम एक लाख अतिरिक्त रोज़गार पैदा करने होंगे, ताकि वह सभी अस्पतालों, प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों, सामुदायिक स्वास्य केंद्रों और लैब्स सहित अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं में रोगियों के प्रतिदिन रिकार्ड डिजिटाइज़ हो जाएं। यदि हम मानें कि प्रति कर्मचारी औसतन 5 लाख रुपये प्रति वर्ष वेतन दिया जाएगा, और हम बाकी खर्च, यानि हार्डवेयर व आधारभूत ढांचे पर खर्च को न भी जोड़ें, तो राज्य सरकार को अपने कोष से 5000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च करने होंगे। केंद्र सरकार इस काम के लिए राज्यों को एक भी रुपया नहीं देने वाली। इसलिए राज्यों को अनिवार्य रूप से अपने कोष से इसके लिए खर्च करना होगा। मोदी सरकार के कोआपरेटिव संघवाद का यही ब्रांड है!

* निजी स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं का क्या होगा? इस मिशन के अंतर्गत, उनके लिए अपने को पंजीकृत कराना अनिवार्य होगा, और उन्हें उनके द्वारा चिकित्सा प्रदान किये गए समस्त रोगियों का पंजीकरण कर उनके स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी डाटा अपलोड करना होगा। अपोलो और मैक्स जैसे बड़े अस्पतालों के लिए नए डिजिटल कर्मचारियों की नियुक्ति करना आसान हो सकता है क्योंकि वे अतिरिक्त खर्च को रोगी के मत्थे मढ़ देंगे। पर छोटे और सड़क किनारे चल रहे निजी क्लिनिक और नर्सिंग होम, जिन पर बहुसंख्यक भारतीय नागरिक निर्भर हैं, इतना बड़ा खर्च नहीं उठा सकते। बहुतों को ऐसी स्थिति में अपना काम बंद कर देना होगा। क्या यह ‘मिशन मोदी’ उन्हें खत्म करके बड़े कारपोरेट अस्पतालों को लाभ दिलाने की योजना है? इससे तो तय है कि आखिर में रोगी की जेब ही कटेगी।

ये भी पढ़ें: बेहतर सेवा स्थिति की मांग को लेकर आशा, आंगनवाड़ी और अन्य स्कीम वर्कर्स की दो दिन की हड़ताल

-दूसरे शब्दों में कहें तो इस मिशन के तहत रोगियों को एक भी अतिरिक्त स्वास्थ्य संबंधी लाभ नहीं मिलेगा।

1. आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत सभी औद्योगिक श्रमिकों और निजी कर्मचारियों को कवर करने हेतु कोई वादा नहीं किया जा रहा। वर्तमान समय में यह स्वास्थ्य बीमा केवल बीपीएल श्रेणी और असंगठित श्रमिकों के कुछ हिस्सों तक सीमित है।

2. सरकार इस मिशन के तहत सभी औषधियों और निजी कारपोरेट अस्पतालों द्वारा प्रदान किये जा रहे डायग्नोसिटक सेवाओं व स्वास्थ्य सेवाओं के दामों के नियंत्रण पर चुप्पी साधे हुए है।

3. सरकार गरीबों व अन्य वंचित श्रेणियों के लिए निःशुल्क आवश्यक औषधियों और स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में कोई वादा नहीं करती। यानि मिशन के कारण इन लोगों की आय से अधिक चिकित्सा खर्च बढ़ेगा।

आप कह सकते हैं कि यह मिशन जनता के लिए नहीं, बल्कि कारपोरेट के लिए है। चेन्नई के एक प्रख्यात सर्जन, जो एक समय चेन्नई गवर्मेंट हॉस्पिटल में कार्यरत थे और अब राज्य सरकार के स्वास्थ्य नीति निर्माता हैं, ने नाम न बताने की शर्त पर न्यूज़क्लिक को बताया, ‘‘समस्त नागरिकों के स्वास्थ्य संबंधी डाटा का केंद्रीकरण करना वही नहीं है। हमें डिजिटल ‘रिकार्ड-कीपिंग’ के लिए सरकार की जरूरत नहीं है। कई एजेंसियां हैं जो नागरिकों को 300 जीबी तक निःशुल्क क्लाउड सर्विसेज़ प्रदान करती हैं। याहू (Yahoo) भी अनलिमिटे डस्टोरेज की सुविधा देता है और गूगल (Google) का जीमेल (Gmail) प्रति अकाउंट 15 जीबी (GB) तक की ये सुविधा देता है। किसी रोगी के डिजिटल स्वास्थ्य रिकार्ड स्टोर करने के लिए यह जरूरत से अधिक ही होगा। डिजिटल हेल्थ मिशन एक भारी-भरकम बिग डाटा है, जो देश के सभी नागरिकों का सारा-का-सारा स्वास्थ्य रिकार्ड एक जगह रख देगा। इसे लुटेरे कारपोरेट और अन्य निहित स्वार्थी तत्व आराम से ऐक्सेस कर सकते हैं।’’

आगे उन्होंने कहा, ‘‘यह तो सच है कि मरीज़ों के डिजिटलाइज़्ड स्वास्थ्य रिकार्ड मुहैया होने से उनकी चिकित्सा आसान हो जाएगी। पर कभी भी किसी मरीज़ को, पिछले स्वास्थ्य रिकार्ड न जमा करने के चलते गलत चिकित्सा नहीं मिली है। न ही उन्हें इस कारण चिकित्सा से वंचित किया गया है। जरूरत पड़ने पर ये रिकार्ड तो मुनिसिपैल्टी या पंचायत रख सकती हैं। कोई जरूरत नहीं है कि केंद्र जबरदस्ती सभी मरीजों, चिकित्सकों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों से नागरिकों के स्वास्थ्य रिकार्ड एकत्र करे और एक विशालकाय केंद्रीय डाटाबेस तैयार करे, जिस तक किसी भी पंजीकृत प्राइवेट पार्टी की पहुंच हो जाए। इससे केवल बड़े कारपोरेट और अस्पतालों को मुनाफा कमाने में मदद मिलेगी। सरकार जरूर दावा कर रही है कि यह नागरिकों की स्वेच्छा पर छोड़ दिया जाएगा। पर क्या ऐसा होता है? यदि कोई नागरिक इलाज के लिए किसी अस्पताल या क्लिनिक जाएगा/जाएगी, तो उसकी सहमति के बगैर उससे स्वास्थ्य रिकार्ड को डाटाबेस में डाल दिया जाएगा। इस ‘डाटा ट्रैप’ से साधारण नागरिक कैसे बच पाएगा?

पहले का एक बिल, जिसके तहत समस्त क्लिनिकी संस्थाओं का अनिवार्य रूप से पंजीकरण और विनियमन होना था, लंबित होता रहा और अब मोदी सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। उपभोक्ताओं को बड़े अस्पतालों द्वारा दुव्र्यवहार का शिकार बनाना या भारी-भरकम बिल बनाकर उन्हें लूटने से बचाने के लिए देश में कोई कानून नहीं है। पिछले वर्ष ही विश्व भर ने देखा कि कैसे दवा और ऑक्सिजन के अभाव में हज़ारों भारतीय कोविड-19 के मरीज़ों को अस्पतालों में दम तोड़ना पड़ा। देश में आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार हैं। इन समस्याओं से निदान दिलाने की जगह सरकार राज्य सरकारों को बाध्य करना चाहती है कि वे हेल्थ डिजिटलाइज़ेशन के लिए दसियों हजार करोड़ का खर्च उठाए।

ये विशालकाय डाटाबेस अब एक सच्चाई बन चुका है। कोविन डाटाबेस के अंतर्गत वैक्सीन दिया जाना और उसे आधार से जोड़ना- इससे तो 100 करोड़ भारतीयों का डाटाबेस तैयार हो चुका है और उसे हेल्थस्टैक नाम के राष्ट्रीय डिजिटल डाटाबेस में डाल दिया गया है। अंतिम विश्लेषण में लगता है मोदी का डिजिटल इंडिया जनता के हित के लिए नहीं, बल्कि कारपोरेट घरानों के हित में काम करेगा।

(लेखक श्रम और आर्थिक मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

ये भी देखें: स्वास्थ्य डाटा प्रबंधन नीति: उठ रहे हैं निजता से जुड़े बड़े सवाल

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