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भारत
राजनीति
मोदी का मेक-इन-इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण का दूसरा नाम
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गिग कार्यकर्ता नई पीढ़ी के श्रमिक कहे जा सकते  हैं, लेकिन वे सीधे संघर्ष में उतरने के मामले में ऑटो व अन्य उच्च तकनीक वाले एमएनसी श्रमिकों से अब टक्कर लेने लगे हैं। 
बी. सिवरामन
07 Jan 2022
make in india

19वीं शताब्दी में प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने हमें दिखाया कि पूंजीवाद की मूल भावना के पीछे प्रोटेस्टेंट नैतिकता थी। लेकिन समय के साथ बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद प्रतिगमन कर रहा है। श्रम संबंधों में नैतिकता  का सर्वर्था अभाव भारत जैसे विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय निगमों (एमएनसी) की पहचान बन गया है। 21वीं सदी में बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद में काम करने की स्थिति 19वीं सदी  इंग्लैंड के डिकेंसियन युग के घिनौनेपन की तुलना में भारत कहीं अधिक बदतर है।

हाल ही का एक उदाहरण लें- कुख्यात ताइवान की बहुराष्ट्रीय कंपनी फॉक्सकॉन और उसके चेन्नई संयंत्र की स्थिति। यह ऐप्पल (Apple) को iPhone 12 मॉडल के स्मार्ट फोन की आपूर्ति करता है, जो गूगल (Google), माइक्रोसाफ्‌ट (Microsoft) और अमेजॉन (Amazon) से ऊपर दुनिया में सबसे मूल्यवान हाई-टेक एमएनसी (MNC) है। फॉक्सकॉन की सैकड़ों महिला श्रमिकों ने पिछले महीने, 18 दिसंबर 2021 को, अचानक हड़ताल कर दी और श्रीपेरम्पुदुर के विशाल औद्योगिक क्षेत्र में चेन्नई-बैंगलोर राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया, जब उनके 256 साथी श्रमिकों को 15 दिसंबर को अस्पताल ले जाया गया; उनमें से 159 कंपनी के हॉस्टल में खाना खाने के बाद फूड प्वाइजनिंग के लिए अस्पताल में भर्ती थे। प्रबंधन द्वारा "माफी" मांगने के बाद ही उन्होंने काम फिर से शुरू किया।

श्रमिकों ने आरोप लगाया कि सबसे बड़ी वैश्विक टेक फर्म को नवीनतम हाई-टेक स्मार्ट फोन की आपूर्ति करने वाली हाई-टेक प्रमुख कंपनी अपने हॉस्टलों में श्रमिकों को अक्सर बासी भोजन मुहय्‌या कराती है। उन्हें बंधुआ दास मजदूरों के रूप में माना जाता रहा है। 10 महिला श्रमिकों को कंपनी के हॉस्टलों के 10X10 फीट छोटे कमरों में बहुत कम सुविधाओं के साथ ठूंस दिया जाता है, जहां उन्हें फर्श पर सोने को मजबूर होना पड़ता है। चेन्नई में फॉक्सकॉन के 20,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर्मचारी हैं। और उनमें से लगभग सभी अस्थायी संविदा कर्मचारी हैं, जिनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं है। यह याद किया जा सकता है कि 2010 में फॉक्सकॉन के चीनी संयंत्रों में 14 श्रमिक कार्यस्थल पर अत्याचार सहन न कर सके, इसलिए उन्होंने छत से कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

फॉक्सकॉन की घटना कोई अकेला मामला नहीं है। एक अन्य उदाहरण है ताइवानी मुख्यालय वाला विस्ट्रॉन कम्पनी का, जो कर्नाटक के कोलार में नरसापुरा में एप्पल के लिए एक और आईफोन आपूर्तिकर्ता है। इसमें 8500 संविदा कर्मचारी कार्यरत हैं, लेकिन केवल 1350 स्थायी कर्मचारी हैं। 12 दिसंबर 2020 को श्रमिकों ने हिंसक विद्रोह किया, जब उनके वेतन में कटौती की गई, यहां तक कि कुछ मामलों में वेतन 22,000 रुपये से घटाकर 8,000 रुपये तक किया गया था।  ऐप्पल के कई आईफोन आपूर्तिकर्ताओं के बीच भारी प्रतिस्पर्धा और लाभ मार्जिन में गिरावट के कारण ऐसा हुआ। ठेकेदारों द्वारा समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं करने पर मजदूरों ने हिंसक विद्रोह करते हुए फैक्ट्री में तोड़फोड़ की। अपनी आपूर्ति-श्रृंखला में इस तरह के प्रकोप के फलस्वरूप प्रतिकूल प्रचार से आहत, Apple को कुछ दिन पहले फॉक्सकॉन को श्रम मानकों में सुधार करने के लिए एक चेतावनी जारी करनी पड़ी थी।

मैग्ना ऑटोमोटिव एक अन्य कनाडा स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी है, जिसका चेन्नई में श्रीपेरम्पुदुर से सटे ओरगडम में एक छोटा संयंत्र है, जिसमें लगभग 70 स्थायी और 200 कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी हैं। इधर प्रबंधन ने 18 श्रमिकों को यूनियन बनाने की वजह से पुणे में एक दूर के संयंत्र में स्थानांतरित कर दिया, जो कोविड-19 लहर के चरम पर था। कर्मचारी हड़ताल पर चले गए और प्रबंधन को पीछे हटना पड़ा, लेकिन उन्होंने हड़ताल के दिनों के लिए श्रमिकों के वेतन में कटौती की। तमिलनाडु में ट्रेड यूनियन के वरिष्ठ नेता एस कुमारस्वामी जो मैग्ना वर्कर्स यूनियन का नेतृत्व कर रहे हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि चन्नई श्रमिकों की एकजुटता की गौरवशाली विरासत को जीवित रखते हुए, श्रीपेरंपुदुर-ओरगडम औद्योगिक क्षेत्र के 700 श्रमिकों ने पिछले महीने मैग्ना श्रमिकों के समर्थन में रैली निकाली और, प्रबंधन को आंशिक रूप से पीछे हटने के लिए मजबूर किया, लेकिन प्रबंधन लॉकडाउन के कारण बिना काम के दिनों और अर्जित छुट्टी को समायोजित करने और लॉकडाउन भत्तों का भुगतान न करने जैसे अवैध कृत्यों के माध्यम से श्रमिकों का उत्पीड़न जारी रखे हुए है।

ऑटो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय संयंत्रों के श्रमिकों को मंदी और महामारी से उपजी वैश्विक ऑटो संकट और पुनर्गठन का खामियाजा भुगतना पड़ा। फोर्ड मोटर्स के 4000 कर्मचारियों ने गुजरात में सनद संयंत्र को बंद कर दिया और लगभग इतनी ही संख्या ने नौकरी खो दी जब ओरागडम में उनके चन्नई संयंत्र को भी सितंबर में बंद कर दिया गया। जनरल मोटर्स ने 2017 में अपना गुजरात प्लांट बंद कर दिया। फोर्ड मोदी के मेक-इन-इंडिया के तहत बंद होने वाला छठा प्रमुख ऑटो प्लांट है!

बहुराष्ट्रीय कंपनियां, भारत में अनिश्चित गिग श्रमिकों के सबसे बड़े नियोक्ता

अमेजॉन, वॉलमार्ट, फि्‌लपकार्ट (Amazon, Walmart-Flipkart) आदि जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में गिग वर्कर्स की एक नई परिघटना को जन्म दिया है जिसे स्विगी (Swiggy)और जोमैटो (Zomato) जैसी भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनाया है। भारत आज दुनिया में गिग वर्कर्स के सबसे बड़े नियोक्ता के रूप में उभरा है। हम इस कॉलम में पहले ही देख चुके हैं कि गिग वर्कर कानूनी तौर पर नॉन-वर्कर होते हैं। अक्सर उनका एकमात्र "कौशल" ब्रेक-नेक गति से मोटरसाइकिल चलाने की क्षमता है, शहर के खतरनाक यातायात के बीच, एक दिन में जितना संभव हो उतना सामान वितरित करने के लिए 10,000 रुपये प्रति माह सबसे अच्छी कमाई मानी जाती है। रोजगार की संख्या के मामले में महामारी और तालाबंदी गिग श्रमिकों के लिए एक वरदान के रूप में आई है। वह कार्यबल की सबसे बड़ी श्रेणी थी, जो महामारी और आर्थिक मंदी के माध्यम से विस्तारित हुई। लेकिन कमाई के मामले में, बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उन्हें मार ही खिलाई।

भारत में नए एमएनसी सम्राट, अमेज़ॉन ने मार्च 2021 में श्रमिकों के पारिश्रमिक को प्रति डिलीवरी 35 रुपये से घटाकर मोटरसाइकिल द्वारा 10 रुपये और टेम्पो द्वारा  15 रुपये कर दिया। इससे उनकी औसत आय लगभग 15,000 रुपये प्रति माह से घटकर 10,000 रुपये हो गई। बंगलुरु और एनसीआर शहरों में यातायात की भयावह स्थितियों के चलते उन्हें अक्सर इतना कमाने के लिए ओवरटाइम काम करना पड़ता है, जिसके लिए एक भी रुपया अतिरिक्त नहीं मिलता है। स्वाभाविक रूप से, अमेज़ॉन के गिग वर्कर्स- जिन्हें "डिलीवरी पार्टनर्स" के रूप में महिमामंडित किया गया था- ने अमेज़ॉन पर वेतन कटौती को वापस लेने के लिए हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र, बंगलुरु और पुणे में हड़ताल की। लेकिन रोलबैक आंशिक रहा और 35 रुपये प्रति डिलीवरी के मूल स्तर तक वापस नहीं हुआ।

गुड़गांव बेंगलुरू को टक्कर देने वाला नया पॉश हाई-टेक शहर है। यहां अर्बन कंपनी (जिसे पहले अर्बनक्लैप के नाम से जाना जाता था), एक ऑनलाइन सेवा वितरण प्रमुख है, जिसका मुख्यालय गुड़गांव में है, और जो भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्लेटफॉर्म कार्य के माध्यम से गिग श्रमिकों द्वारा नए श्रम शोषण का सबसे अच्छा प्रतिनिधि उदाहरण बनकर उभरा है। जैसा कि उसे अभिराज सिंह और बहल वरुण खेतान, दोनों IIT कानपुर के पूर्व छात्र, और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के 31 वर्षीय राघव चंद्र जैसे नई पीढ़ी के टेक-गीक्स द्वारा स्थापित किया गया था, इसे "भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी" के रूप में जाना जाता है। यह सिंगापुर, सिडनी, अबू धाबी और दुबई के अलावा गुड़गांव और 17 अन्य भारतीय शहरों में कार्य कर रहा है। लेकिन इस तथाकथित "इंडियन एमएनसी" में कौन निवेश कर रहे हैं? (1) डच एमएनसी समूह प्रोसस (2) अमेरिकी निवेश दिग्गज वेलिंगटन मैनेजमेंट द्वारा 1 खरब डॉलर से अधिक का निवेश (3) एक अन्य अमेरिकी निवेश कंपनी ड्रैगनीयर और (4) वाय कैपिटल, जो दुबई वित्तीय माफिया की एक कंपनी है, जो केमैन आइलैंड्स के माध्यम से कर चोरी यानि कर छूट के साथ काम कर रही है (5) एक अन्य अमेरिकी वित्तीय पूंजी फर्म टाइगर ग्लोबल, जो मॉरीशस के माध्यम से कार्य संचालन करके भारत में इसी तरह की कर चोरी में संलग्न है और (6) लंदन स्थित वैश्विक निवेश कंपनी स्टेडव्यू कैपिटल।

यह एक प्लेटफॉर्म वर्क कंपनी है जिसके माध्यम से लगभग 40,000 गिग वर्कर 18 शहरों में 5 मिलियन ग्राहकों को उनके आवास पर हेयर-डू, जाम नलों को साफ करने और बिजली और प्लंबिंग समस्याओं को ठीक करने, बाथरूम की सफाई और पेंटिंग आदि जैसी सेवाएं प्रदान करते हैं। पिछले महीने, दिसंबर 2021 में, गुड़गांव में सौंदर्य सेवाएं प्रदान करने वाली इस अर्बन कंपनी की महिला गिग वर्कर्स अचानक हड़ताल पर चली गईं, जब कंपनी ने श्रमिकों से गिग वर्क के आवंटन के लिए जमा राशि के रूप में कुछ अग्रिम भुगतान की मांग की, ताकि वे काम छोड़ न सकें। वे अधिकारियों को मोटी तनख्वाह देते हैं और श्रमिकों को एक छोटी पगार देते हैं। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रति वर्ष 14.8 लाख रुपये कमाता है, जबकि एक प्रबंधक 7 लाख रुपये कमाता है, लेकिन एक गिग कार्यकर्ता, "प्रशिक्षु" अथवा “इंटर्न” के रूप में "नियोजित" होता है। इंटर्न घरों पर सेवाएं देने के लिए प्रति माह केवल 10,580 रुपये कमाता है और एक कार्यालय कर्मचारी औसतन 11,293 रुपये कमाता है, लेकिन उनसे प्रति माह कंपनी द्वारा निर्धारित न्यूनतम सेवाएं प्रदान करने की उम्मीद की जाती है।

गिग वर्कर्स द्वारा इस तरह का फ्लैश विरोध और टेक वर्कर्स का हिंसक विरोध अब आम हो गया है लेकिन इस मामले में कुछ खास था। अर्बन कंपनी ने हड़ताली गिग श्रमिकों पर अदालत में मुकदमा दायर किया और कानूनी रूप से उन्हें श्रमिकों का दर्जा न देने के बावजूद उनकी हड़ताल को गैरकानूनी और अवैध करार दिया। विडंबना यह है कि अदालतों से "गैर-श्रमिकों" की हड़ताल को अवैध घोषित करना, वह भी श्रमिकों पर लागू आईडी अधिनियम के तहत, यह मिसाल बन जाने पर न्यू नॉर्मल बन जाने का खतरा है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गिग कार्यकर्ता नई पीढ़ी के श्रमिक कहे जा सकते  हैं, लेकिन वे सीधे संघर्ष में उतरने के मामले में ऑटो व अन्य उच्च तकनीक वाले एमएनसी श्रमिकों से अब टक्कर लेने लगे हैं। 

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