NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी सरकार की विचित्र आर्थिक नीति : उधार अधिक, ख़र्च कम!
अप्रैल से जुलाई 2020 के दौरान, जब महामारी तेज़ी से बढ़ रही थी और लॉकडाउन लगाया गया था, तब भी सरकारी ख़र्च पिछले साल के मुक़ाबले कम था। यह बात नवीनतम डेटा में सामने आई है।
सुबोध वर्मा
11 Sep 2020
Translated by महेश कुमार
मोदी सरकार की विचित्र आर्थिक नीति : उधार अधिक, ख़र्च कम!

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा प्राप्तियों और खर्च पर जारी आंकड़ों ने उस दुखद और कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है जिसका तजुरबा भारतीय कर रहे थे- कि उन्होने अपने सभी जरूरी खर्चों को रोक दिया था। हर महीने (एक महीने के अंतराल के बाद) लेखा महानियंत्रक (CGA) आंकड़ों को जारी करता है जिससे पता चलता है कि मोदी सरकार खर्च को बढ़ावा देने के बजाय उल्टे कम रही है, सरकार द्वारा खर्च बढ़ाने से लोग महामारी से लड़ सकते और खराब लॉकडाउन के दुष्ट प्रभाव से बच सकते है, वास्तविकता में पिछले साल की तुलना में खर्च कम हुआ है। [नीचे चार्ट देखें] पिछले साल, सरकारी खर्च में साल दर साल 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। यदि इसे मूल्य वृद्धि से समायोजित किया जाता है, तो पिछले वर्ष की वास्तविक वृद्धि अभी भी 10.8 प्रतिशत ही है।

graph_1.jpg

इस साल, मामूली वृद्धि 11.3 प्रतिशत दर्ज़ की है, लेकिन वास्तविकता (मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद) में, यह केवल 4.3 प्रतिशत की वृद्धि है। 2015-16 के बाद से यह सबसे धीमी वास्तविक वृद्धि है। इस वर्ष की शुरुआत में पेश किए गए 2020-21 के बजट में खर्च में 12.7 प्रतिशत की वृद्धि करने का लक्ष्य रखा गया था। महामारी के बावजूद, सरकार ने अभी तक उस स्तर के लक्ष्य को नहीं छुआ है।

अधिक ख़र्च करना क्यों ज़रूरी है?

भारत अपने सबसे खराब आर्थिक संकट से गुजर रहा है। मार्च के अंत में मोदी सरकार द्वारा लगाए गए समय से पहले और दुर्भावनापूर्ण लॉकडाउन के कारण मांग और आपूर्ति दोनों में गिरावट आ गई थी। यानि पहले से ही धीमी चल रही अर्थव्यवस्था को इसने पूरी की पूरी आर्थिक गतिविधियों को तबाह कर दिया। अप्रैल में बेरोजगारी लगभग 24 प्रतिशत तक बढ़ गई थी, निवेश ढह गया था, औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन रुक गया और यहां तक कि सेवा क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, और एमएसएमई क्षेत्र को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया था।

इस विनाशकारी हमले से अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए, सरकार के सामने केवल लिए एक ही रास्ता बचा था कि वह आम जनता की क्रय शक्ति को बढ़ाने पर विशेष जोर देती, यानि अर्थव्यवस्था में धन को पंप करती। इससे मांग में सुधार होता और पूरे आर्थिक तंत्र पर इसका असर पड़ता।

मोदी सरकार ने यह सब करने के बजाय बैंकों के माध्यम से अधिक कर्ज़ प्रदान करने का रास्ता अपनाया, यह एक बचकाना उम्मीद थी कि इससे निवेश बढ़ेगा और साथ ही रोजगार भी बढ़ेगा आदि। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सरकार ने गाड़ी के सामने घोड़े को खड़ा कर दिया। अब परिणाम सब के समाने हैं। जीडीपी घायल-अवस्था में है, बेरोजगारी अभी भी 8-9 प्रतिशत पर चल रही है, बैंक क्रेडिट में ठहराव है, औद्योगिक उत्पादन को अभी रफ्तार पकड़नी है, निर्यात और आयात दोनों नीचे की तरफ हैं, और बड़े पैमाने पर भूखमरी फैल रही है।

जिन क्षेत्रों में सरकार ने खर्च बढ़ाया है, ये वे कार्यक्रम हैं जिनमें मुख्य ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) है, जिसके लिए बजट में लगभग 60,000 करोड़ रुपये से लेकर लगभग 1 लाख करोड़ रुपये तक का आवंटन किया गया है। एक अन्य योजना जिसे पर्याप्त धन हासिल हुआ है, वह पीएम-किसन योजना है, जो किसानों को आय सहायता के रूप में 6,000 रुपये सालाना प्रदान करती है। यह योजना पिछले साल शुरू की गई थी।

विशेष रूप से, महामारी और लॉकडाउन से पनपे इस संकट को संभालने के लिए, सरकार ने अतिरिक्त खाद्यान्न वितरित करने का वादा किया था और जन धन खाता धारकों के तहत  500 रुपये प्रति माह (तीन महीने के लिए) दिया गया। यह सब खर्च बढ़ाने में योगदान कर सकता था, लेकिन स्पष्ट रूप से यह सामान्य लक्ष्य से भी कम है। और, यह अनजाने में लगाए गए लॉकडाउन से उपजी आपदा से निपटने के लिए आवश्यक स्तर से कम है।

सरकार का उधार आसमान छू रहा है 

खर्च में कटौती के बावजूद, ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार सीमित साधनों से काम चला रही है। सीजीए (CGA) डेटा बताता है कि 'बाहरी उधार' (यानी विदेशी स्रोतों से कर्ज़) 39,165 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो मौजूदा बजट में किए गए प्रावधान का नौ गुना है! इसी तरह, घरेलू उधारी  ने जुलाई अंत तक खगोलीय स्तर यानि 7.82 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा छू लिया है, जो मौजूदा बजट में किए प्रावधान का 99 प्रतिशत है। इसमें न केवल वाणिज्यिक उधार (बैंकों से), बल्कि भविष्य निधि, राष्ट्रीय लघु बचत निधि से उधार आदि भी शामिल है। इन कर्ज़ों को कैसे और कब वापस किया जाएगा, और ब्याज का भुगतान किया जाएगा या नहीं- कोई नहीं जानता है। जाहिर है, मोदी सरकार अपने साधनों से परे खतरनाक रास्ते पर जा रही है। लेकिन लोगों के पास फिर भी खर्च के लिए पर्याप्त धन नहीं है।

हिसाब बराबर करना

जिस तरह से सरकार के आर्थिक दिग्गज सोच रहे हैं, उसे समझने के लिए, उन चालों पर एक नज़र डाल लें जो उन्होंने सब्सिडी के प्रमुख मुद्दे पर बुनी हैं। सीजीए (CGA) डेटा से पता चलता है कि 2020-21 में सब्सिडी में 38 प्रतिशत से अधिक की कटौती की गई है। यह कैसे हुआ है?

अप्रैल-जुलाई के महीनों में पिछले साल की तुलना में पोषक तत्वों पर आधारित उर्वरक सब्सिडी में लगभग 1,173 करोड़ रुपये की कमी आई है। लेकिन इसमें सरकार ने जो किया है कि उसने उर्वरक कंपनियों को भुगतान नहीं किया है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया दावा कर रही है कि सीएमआईई की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार पर 2020-21 की शुरुआत में 50,000 करोड़ रुपये का बकाया है। पेट्रोलियम सब्सिडी पिछले साल की तुलना में 11,924 करोड़ रुपये (लगभग 42 प्रतिशत) कम हुई है। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नाटकीय रूप से गिरावट के कारण ऐसा हुआ, और इसके अलावा, एलपीजी सिलेंडरों की लागत में वृद्धि के कारण ऐसा हुआ था।

सरकारी खातों में खाद्य सब्सिडी को 47.4 प्रतिशत या फिर 51,476 करोड़ रुपये कम करके दिखाया गया है। लेकिन वास्तव में, सरकार ने राज्य के स्वामित्व वाली खाद्य निगम (FCI) को अन्य स्रोतों के माध्यम से धन हासिल करने को कहा है। एफसीआई ने कुछ धन बैंकों से कर्ज़ के रूप में उठाया था, जिसका खाद्य ऋण जुलाई 2020 तक 26 प्रतिशत से अधिक हो गया है। और राष्ट्रीय लघु बचत कोष (NSSF) से 1,4 लाख करोड़ रुपये उधार ले कर धन का एक बड़ा हिस्सा वहाँ से उठाया गया था। 

संक्षेप में, सरकार ने अपने खर्च को अनिवार्य रूप से एफसीआई (FCI) जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में स्थानांतरित कर दिया है, जिन्होंने बैंकों और राष्ट्रीय लघु बचत कोष (NSSF) से उधार लिया है- जिसका अर्थ है लोगों के पैसे से उधार। एफसीआई इन ऋणों का भुगतान कैसे करेगा यह किसी और दिन की समस्या है।

यह सब हेरफेर यह दिखाने के लिए किया गया है कि सरकार अपनी जेब से पैसा खर्च नहीं कर रही है! इस दिखावे की जरूरत क्यों आन पड़ी? क्योंकि मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियों को प्रभावित करना चाहती है और दिखाना चाहती हैं कि वह न्यूनतम हस्तक्षेप के सिद्धांतों का पालन कर रही है, जो विदेशी निवेशकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रभावित करता है।

जाहिर है, मोदी सरकार इस बात से चिंतित नहीं है कि ऐसे समय में भारतीय कैसे जीवित रहते हैं। उनकी प्राथमिकता बड़े व्यावसायिक घरानों (घरेलू और विदेशी) को खुश करना है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Modi Govt’s Bizarre Economic Policy: Borrow More But Spend Less!

Modi government
Economy under Modi Government
Government Spending
government loans
Lockdown Impact on Economy
COVID 19 Lockdown
Economic Slump
GDP growth

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है


बाकी खबरें

  • Economic Survey
    वी श्रीधर
    आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22: क्या महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था के संकटों पर नज़र डालता है  
    01 Feb 2022
    हाल के वर्षों में यदि आर्थिक सर्वेक्षण की प्रवृत्ति को ध्यान में रखा जाए तो यह अर्थव्यवस्था की एक उज्ज्वल तस्वीर पेश करता है, जबकि उन अधिकांश भारतीयों की चिंता को दरकिनार कर देता है जो अभी भी महामारी…
  • muslim
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: मुसलमानों के नाम पर राजनीति फुल, टिकट और प्रतिनिधित्व- नाममात्र का
    01 Feb 2022
    देश की आज़ादी के लिए जितना योगदान हिंदुओं ने दिया उतना ही मुसलमानों ने भी, इसके बावजूद आज राजनीति में मुसलमान प्रतिनिधियों की संख्या न के बराबर है।
  • farmers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान
    31 Jan 2022
    एक साल से अधिक तक 3 विवादित कृषि कानूनों की वापसी के लिए आंदोलन करने के बाद, किसान एक बार फिर सड़को पर उतरे और 'विश्वासघात दिवस' मनाया। 
  • Qurban Ali
    भाषा सिंह
    प्रयागराज सम्मेलन: ये लोग देश के ख़िलाफ़ हैं और संविधान के ख़ात्मे के लिए काम कर रहे हैं
    31 Jan 2022
    जिस तरह से ये तमाम लोग खुलेआम देश के संविधान के खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और कहीं से भी कोई कार्ऱवाई इनके खिलाफ नहीं हो रही, उससे इस बात की आशंका बलवती होती है कि देश को मुसलमानों के कत्लेआम, गृह युद्ध…
  • Rakesh Tikait
    न्यूज़क्लिक टीम
    ख़ास इंटरव्यू : लोगों में बहुत गुस्सा है, नहीं फंसेंगे हिंदू-मुसलमान के नफ़रती एजेंडे में
    31 Jan 2022
    ख़ास इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे को ज़मीनी चुनौती देने वाले बेबाक किसान नेता राकेश टिकैत से लंबी बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि इन चुनावों में किसान…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License