NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
प्रधानमंत्री जी! पहले 4 करोड़ अंडरट्रायल कैदियों को न्याय जरूरी है! 
4 करोड़ मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं तो न्याय व्यवस्था की पोल खुल जाती है। हाईकोर्ट में 40 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले जुड़कर 56 लाख हो जाते हैं जो लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि एक अप्रैल 2022 को 70,632 मामले लंबित हैं।
प्रेम कुमार
01 May 2022
undertrial prisoners
Image courtesy : DNA India

आम लोगों को उनकी भाषा में न्याय मिले- इस सोच को कौन नहीं सराहेगा? मगर, इस पर अमल कौन करेगा, कैसे अमल होगा, कब तक ऐसा करना मुमकिन हो सकेगा और आखिरकार इसका रोडमैप क्या होगा?- यह बताए बगैर प्रधानमंत्री की इस सदिच्छा का कोई मतलब नहीं है कि आम लोगों को उनकी भाषा में न्याय मिलना चाहिए।

दसवीं कक्षा का छात्र अगर ऐसी इच्छा रखता है कि आम लोगों को उनकी भाषा में न्याय मिले तो यह बेहद सराहनीय है क्योंकि इसमें न्याय व्यवस्था को मजबूत करने का नजरिया है। मगर, यही बात सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और कानूनविदों की मौजूदगी में कही जाती है और वह भी प्रधानमंत्री कहते हैं तो हम सुनहरे सपनों में खोने के बजाए न्याय व्यवस्था के वर्तमान हालात की चिंता करने को मजबूर हो जाते हैं।

अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल जब एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट परिसर में विभिन्न हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मान में आयोजित समारोह में चिंता जताते हैं कि 4 करोड़ मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं तो न्याय व्यवस्था की पोल खुल जाती है। हाईकोर्ट में 40 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले जुड़कर 56 लाख हो जाते हैं जो लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि एक अप्रैल 2022 को 70,632 मामले लंबित हैं।

अदालतों में क्यों रुकी हुई हैं नियुक्तियां?

लंबित मामलों पर न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की फिक्र नज़र नहीं आती। भाषणों में जिक्र को फिक्र नहीं कहा जा सकता। अगर वास्तव में फिक्र होती तो ट्रायल कोर्ट में जहां 4 करोड़ मामले लंबित हैं वहां 5 हजार नियुक्तियां पड़ी नहीं होती। 24 हज़ार पद में 5 हजार पद खाली होना ‘त्वरित अन्याय’ से शुरू होकर ‘विलंबित अन्याय’ की मुख्य वजह क्यों नहीं माना जाना चाहिए? 

जिन हाईकोर्ट में 56 लाख मामले लंबित होंगे, वहां आधी क्षमता के साथ न्यायाधीश कितना न्याय कर पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट में यह सुखद स्थिति है जज की 34 कुर्सियों में 32 भरी हुई हैं। मगर, फिर भी लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए यह कतई सुखद नहीं है। छह साल पहले ऐसे ही सम्मेलन में तत्कालीन सीजेआई टीएस ठाकुर ने कहा था कि अमेरिकी की सुप्रीम कोर्ट में एक जज साल में 81 फैसले देता है जबकि भारत के जज औसतन 2600 फैसले देते हैं। इतना भारी बोझ लेकर न्याय को सुनिश्चित करना वाकई बहुत टेढ़ी खीर है।

25 साल पहले हम जहां थे वहां से कहां पहुंचे?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि जब हम 2047 में होंगे तो ऐसी स्थिति होनी चाहिए कि सबको न्याय मिल रहा हो। ऐसा हो तो अति सुंदर। लेकिन, ऐसे कैसे हो? क्या अब से 25 साल पहले लोग ऐसी ही कल्पना नहीं कर रहे थे? आज हम 25 साल बाद कहां खड़े हैं? 

न्याय के इंतजार में विलंबित मामलों पर नज़र 

1 से 3 साल पुराने मामलों की कुल संख्या 1,11,51,574 है जबकि एक साल के भीतर के कुल मामले 1,21,85,253 है।

(आंकड़े नैशनल ज्यूडिशिल डाटा ग्रिड से। यह ग्रिड न्यायाधीश चंद्रचूड़ की निगरानी में तैयार हो रहे हैं।)

कुल 46 प्रतिशत मामले तो तीन साल के भीतर के हैं जो बताते हैं कि केसों के आने की  गति तेज बढ़ती जा रही है। वहीं 25.76 प्रतिशत मामले 5 साल से लेकर 30 साल के हैं। जब 5 साल पहले के 25 फीसदी मामले नहीं निपटा पा रहे हैं तो जो ताजा मामले आ रहे हैं उन्हें कब और कैसे निपटाएंगे?

छह साल पहले बहे सीजेआई के आंसू क्यों बेनतीजा रहे?

छह साल पहले ही तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने न्याय के मंदिर में अन्याय होने का मसला उठाया था। न्यायालय की बेबसी बताते-बताते वे रो पड़े थे। तब भी यही जमघट थी। सारे मुख्यमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री। तब से अब न्याय स्थिति सुधरी नहीं है। जब ऐसे समारोह में गिरे आंसू भी कोई सकारात्मक फर्क नहीं ला सका, तो कैसे मान लिया जाए कि 2047 में कानून का राज देश में कायम हो जाएगा। सबको त्वरित गति से न्याय मिल रहा होगा।

प्रधानमंत्री ने न्याय में मध्यस्थता की भूमिका का भी जिक्र किया। मगर, जिस देश में अंडर ट्रायल मामले 4 करोड़ से ज्यादा हों, वहां मध्यस्थता के लिए भी तो फुर्सत होनी चाहिए। क्या न्यायालय के पास मध्यस्थता का समय है, संसाधन हैं, कर्मचारी और व्यवस्था उस हिसाब से है? वैसे हमारे देश की पंचायती व्यवस्था में मध्यस्थता अगर सही तरीके से काम करती तो न्यायालय तक इतनी तीव्र गति से मामले पहुंचते ही क्यों? 

गरीब सबसे ज्यादा हैं अन्याय का शिकार

चिंतित करने वाला सवाल यह है कि निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक अगर 4.5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं तो इसमें पीड़ित वर्ग कौन है? गरीब लोग जो दलित हैं, आदिवासी हैं, मुसलमान हैं वही सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी बनकर जेलों में बंद हैं। सीजेआई एनवी रमना ने कहा कि गरीब लोगों के पास पैसे नहीं हैं कि वे अपनी जमानत भी करा सकें और वे जेलों में सड़ रहे हैं। ऐसी सभा जहां प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के प्रधान बैठें हों, वहां चिंता की प्राथमिकता गरीबों को न्याय होगा या न्याय देने का माध्यम यानी भाषा?

Undertrials
Undertrial Prisoners
Trial Court
Indian judiciary
Judiciary System
Narendra modi
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

2019 में हुआ हैदराबाद का एनकाउंटर और पुलिसिया ताक़त की मनमानी

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • FCRA
    एस एन साहू 
    मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी का एफ़सीआरए लाइसेंस रद्द होना संघीय ढांचे के लिए एक सबक है
    06 Jan 2022
    क्रिसमस पर घटी घटना और नवीन पटनायक के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी को समर्थन देने से यह उम्मीद जगी है कि अधिक से अधिक राज्य, निरंकुश केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ संवैधानिक मूल्यों और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए आगे…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 7 महीने बाद 90 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज किये गए
    06 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 90,928 नए मामले दर्ज किये गए हैं। वहीं पिछले 24 घंटे में ओमिक्रोन के 495 नए मामले सामने आए हैं और कुल मामलों की संख्या बढ़कर 2,630 हो गई है।
  • Hisham Abu Hawwash
    अभिजान चौधरी
    141 दिनों की भूख हड़ताल के बाद हिशाम अबू हव्वाश की रिहाई के लिए इज़रायली अधिकारी तैयार
    06 Jan 2022
    व्यापक विरोध और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद इज़राइली अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अबू हव्वाश के प्रशासनिक हिरासत आदेश को और आगे नहीं बढ़ाया जायेगा और उन्हें फ़रवरी में रिहा कर दिया…
  •  Bullibai app
    न्यूज़क्लिक टीम
    बुल्लीबाई एप के ज़हरीले कारोबार का राज़ और सर्वोच्च सत्ता की खामोशी
    06 Jan 2022
    बुल्लीबाई एप मामले में रहस्य का पर्दा धीरे-धीरे उठ रहा है. मुंबई पुलिस के प्रयास से बंगलूरु, रुद्रपुर और कोटद्वार से गिरफ्तारियां हुई हैं. क्या इन गिरफ्तारियों से कुछ नये ठोस तथ्य सामने आयेंगे?…
  • unemployement
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या है देश में बेरोज़गारी का आलम?
    06 Jan 2022
    2014 में सत्ता में आने से पहले, बीजेपी और नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा वादा था कि देश की जनता के लिए 2 करोड़ रोज़गार पैदा किए जाएँगे। लेकिन 7 सालों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। Centre for Monitoring Indian…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License