NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
"पॉक्सो मामले में सबसे ज़रूरी यौन अपराध की मंशा, न कि ‘स्किन टू स्किन’ टच!"
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सेक्शुअल मंशा से छूना भी अपराध है। धारा 7 के तहत टच और फिजिकल कॉन्टैक्ट को “स्किन टू स्किन टच” तक सीमित करना न केवल संकीर्ण होगा, बल्कि प्रावधान की बेतुकी व्याख्या भी होगी।
सोनिया यादव
19 Nov 2021
sc

"पॉक्सो की धारा 7 के तहत टच और फिजिकल कॉन्टैक्ट को स्किन टू स्किन तक सीमित करना बेतुका है। इससे इस कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा, जिसे हमने बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए लागू किया था।"

ये बातें सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द करते हुए कहीं, जिसमें कहा गया था कि पॉक्सो के तहत यौन उत्पीड़न अपराध के लिए ‘स्किन टू स्किन’ टच जरूरी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 7 के तहत टच और फिजिकल कॉन्टैक्ट को “स्किन टू स्किन टच” तक सीमित करना न केवल संकीर्ण होगा, बल्कि प्रावधान की बेतुकी व्याख्या भी होगी। कोर्ट के मुताबिक अगर इस तरह व्याख्या की जाएगी तो कोई व्यक्ति जो ऐसा करते समय दस्ताने या किसी अन्य सामग्री का उपयोग करता है, उसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा। ये एक बेतुकी स्थिति होगी।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के नागपुर बेंच के दो अलग-अलग मामले में दिए गए फैसले को खारिज कर दिया है। दोनों ही फैसले जनवरी में आए थे और दोनों ही मामले में पॉक्सो के तहत आरोपी को बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही मामले में हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया और एक मामले में आरोपी को पॉक्सो के तहत तीन साल कैद की सजा सुनाई, वहीं दूसरे मामले में आरोपी को पांच साल कैद की सजा सुनाई।

जस्टिस पुष्पा गनेदीवाला के फैसलों का सबसे ज्यादा प्रतिरोध इस साल 19 जनवरी को बॉम्‍बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के उस फैसले में देखने को मिला था जिसमें कोर्ट एक आरोपी को ये कहते हुए बरी कर दिया गया था कि एक नाबालिग लड़की के स्तनों को उसके कपड़ों के ऊपर से टटोलना पॉक्सो के तहत अपराध नहीं है। न्यायमूर्ति पुष्पा गनेदीवाला की एकल पीठ द्वारा सुनाए गए इस फैसले की नागरिक समाज और महिलावादी संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी।

राष्ट्रीय महिला आयोग, अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया और महाराष्ट्र सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी थी। अब करीब दस महीने बाद जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है।

मालूम हो कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में साल 2017 में पॉक्सो के तहत यौन अपराधों के कुल 32,608 मामले दर्ज किए गए तो वहीं साल 2018 में ये आंकड़ा बढ़कर 39,827 हो गया। डाटा के मुताबिक 39,827 में से नाबालिगों से रेप के कुल 21,000 मामले रिपोर्ट किए गए थे।

अदालत ने क्या कहा?

लाइव लॉ की खबर के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य अपराधी को कानून के जाल से बचने की अनुमति देना नहीं हो सकता है। अधिनियम टच या फिजिकल कॉन्टैक्ट को परिभाषित नहीं करता। इसलिए अर्थ को शब्दकोश के हिसाब से माना गया है। कोई भी टच यदि सेक्शुअल इंटेंशन के साथ किया जाता है तो ये अपराध होगा। सबसे बड़ी बात सेक्शुअल इंटेंशन (यौन अपराध करने की मंशा) है ना कि स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट। जब कानून ने स्पष्ट इरादा व्यक्त किया है, तो अदालतें प्रावधान में अस्पष्टता पैदा नहीं कर सकती हैं।

जस्टिस एस रवींद्र भट ने कहा कि हाई कोर्ट के विचार ने एक बच्चे के प्रति अस्वीकार्य व्यवहार को वैध बनाया। हाई कोर्ट का तर्क असंवेदनशील है। ये बच्चों की गरिमा को कम करता है। जस्टिस भट ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस तरह के निष्कर्ष पर आने में गलती की है।

स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट नहीं सेक्शुअल इंटेंशन ज़रूरी

इस मामले में जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने एक साथ जजमेंट लिखा, जबकि जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट ने अलग जजमेंट लिखा। हालांकि दोनों ही जजमेंट एक मत से दिया गया। जस्टिस एस रवींद्र भट्ट ने अपने साथी जज के फैसले से सहमति जताते हुए बताया कि पॉक्सो कानून इसलिए बनाया गया ताकि बच्चों को सेक्सुअल ऑफेंस से बचाया जा सके।

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के मुताबिक ये केस (सतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य) 2016 का है। एक 39 वर्षीय आदमी एक 12 साल की बच्‍ची को अमरूद देने के बहाने अपने घर ले गया, उसका यौन उत्‍पीड़न करने की कोशिश की। पहले बच्ची के ब्रेस्ट को दबाया और उसकी सलवार उतारने की कोशिश ही कर रहा था, कि तभी बच्ची के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर उसकी मां वहां पहुंच गई और उसे बचा लिया।

लड़की की मां के एफआईआर के मुताबिक जब लड़की चिल्‍लाई तो उस आदमी ने अपने हाथ से उसका मुंह दबाया और फिर कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर वहां से चला गया। तभी बेटी की आवाज सुनकर जब मां वहां आई तो उसने दरवाजा खोला और देखा की बेटी अंदर रो रही थी। फिर बेटी ने मां को अपनी आप बीती सुनाई।

इसे भी पढ़ें: यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का बयान दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है?

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को पॉक्‍सो एक्ट और आईपीसी दोनों के तहत दोषी करार दिया। भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (शील भंग के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग), 363 (अपहरण के लिए सजा) और 342 (गलत तरीके से बंदी बनाकर रखने की सजा) के तहत एक साल के कारावास की सजा सुनाई। साथ ही पॉक्‍सो एक्‍ट (प्रोटेक्‍शन ऑफ चिल्‍ड्रेन फ्रॉम सेक्‍सुअल ऑफेंस, 2012) के सेक्‍शन 8 के तहत तीन साल के कारावास की सजा सुनाई।

ट्रायल कोर्ट के बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा। जहां हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को पॉक्‍सो के मामले से मुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “सिर्फ ब्रेस्‍ट को जबरन छूना मात्र यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा। इसके लिए यौन मंशा के साथ ‘स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट’ होना ज़रूरी है।”

यौन मंशा के साथ नाबालिग का हाथ पकड़ना और पैंट की जिप खोलना भी सेक्सुअल असाल्ट

एक अन्य मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 28 जनवरी को एक फैसला सुनाया था, जिसमें हाई कोर्ट द्वारा कहा गया था कि नाबालिग का हाथ पकड़ना और पैंट की जिप खोलना पॉक्सो के तहत सेक्सुअल ऑफेंस नहीं है। इसी के आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी की सजा कम कर दी थी।

दरअसल मामला पांच साल की एक बच्ची के साथ यौन शोषण का था। पीड़ित लड़की की मां ने बताया था कि उन्होंने आरोपी की पैंट की जिप खुली हुई देखी, साथ ही उसने बच्ची का हाथ पकड़ रखा था। इसके अलावा उन्होंने बताया कि 50 वर्षीय आरोपी ने उनकी बेटी को बिस्तर पर आने को कहा था। निचली अदालत ने इसे पॉक्सो की धारा 10 के तहत यौन हमला (सेक्सुअल असाल्ट) माना था और आरोपी को 5 साल के साश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

इसके बाद मामला जब हाई कोर्ट पहुंचा, तो इसे सेक्सुअल हरासमेंट का मामला माना गया ना कि सेक्सुअल असाल्ट (यौन हमले) का। अदालत ने यौन हमले की परिभाषा में 'शारीरिक संपर्क' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ है कि प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क-यानी यौन प्रवेश के बिना स्किन- टू -स्किन- कॉन्टेक्ट। इस वजह से कोर्ट ने इसे आईपीसी की धारा 354A (1) (i) माना और पॉक्सो अधिनियम की धारा 8, 10 और 12 के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। धारा 354A (1) (i) के तहत अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने ये भी माना कि अभियुक्त द्वारा पहले से ही 5 महीने की कैद काटी जा चुकी है, जो इस अपराध के लिए पर्याप्त सजा है।

समाज और सिस्टम में मौजूद पितृसत्ता की पैठ

मालूम हो कि बॉम्बे हाईकोर्ट के इन फैसलों ने हमारे समाज और सिस्टम में मौजूद पितृसत्ता की पैठ को उजागर कर दिया था। महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के तमाम दावों के बीच समाज में आधी आबादी के प्रति उनकी मानसिकता की कलई खोल दी थी। महिलाओं के लिए कई सालों से काम करने वाली कमला भसीन से लेकर शबनम हाशमी तक हाईकोर्ट के इस फैसले का विरोध कर रहे थे तो वहीं ऐपवा, एडवा समेत कई महिलावादी संगठनों ने एक सुर में इसकी निंदा की थी।

पूर्व सांसद और अखिल भारतीय जनतांत्रिक महिला संगठन (एडवा) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली ने तब न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा था कि इस फैसले ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर जो न्यायपालिका में जज की कुर्सी पर बैठते हैं, वो किस सोच के लोग हैं और न्याय के बारे में उनका ज्ञान कितना कमज़ोर है।

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले को बेहद शर्मनाक बताते हुए अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (ऐपवा) की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने इसे गैर-कानूनी कहा था। उन्होंने इस फैसले को ख़ारिज करने की मांग के साथ ही जिन महिला जज ने इस फैसले को सुनाया था, उन्हें जेंडर मामलों में आगे से फैसला देने से रोके जाने की मांग भी की थी।

गौरतलब है कि ये दो फैैसले कोई पहले मामले नहीं हैं, जब किसी न्‍यायालय के फैसले को न्‍याय से ज्यादा औरतों के लिए दुख और अपमान की नज़रों से देखा जा रहा था। इससे पहले भी इंदौर हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में छेड़खानी करने वाले व्‍यक्ति को राखी बांधने की बात कही थी। राजस्‍थान हाईकोर्ट ने एक बार रेपिस्‍ट से शादी करवाने का फैसला दे दिया था, तो वहीं भंवरी देवी केस में राजस्‍थान की निचली अदालत ने कहा था कि एक ऊंची जाति का आदमी निचली जाति की औरत को हाथ भी नहीं लगा सकता है, तो रेप कैसे करेगा। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में कहा कि अगर विवाहिता हिंदू रीति रिवाज के अनुसार चूड़ियां और सिंदूर लगाने से इनकार करती है, तो पति तलाक ले सकता है। जाहिर है ये फैसले आपने आप में कई सवाल समेटे हैं, महिलाओं के अस्तित्व के साथ-साथ न्याय को भी कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

Posco Act
Posco Law
Supreme Court
Bombay High Court
Sexual Assault
skin to skin contact
women exploitation

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 44,230 नए मामले, 555 मरीज़ों की मौत
    30 Jul 2021
    देश में कोरोना के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 15 लाख 72 हज़ार 344 हो गयी है।
  • प्रेफेट डफॉट (हैती), जनरल केन्सन, 1950
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    वाशिंगटन सत्ता परिवर्तन का ढोल पीटता रहता है, लेकिन क्यूबा अपनी क्रांतिकारी लय के साथ काम करता है
    30 Jul 2021
    1959 की क्यूबा क्रांति ग़ुलामी और औपनिवेशिक वर्चस्व के मनहूस इतिहास के ख़िलाफ़ थी। अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया थी? 19 अक्टूबर 1960 को देश पर आर्थिक नाकेबंदी लगा दी गई, जो कि आज भी जारी है।
  • Pegasus snooping row
    भाषा
    पेगासस जासूसी मामले में शीर्ष न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग करते हुए 500 लोगों, समूहों ने सीजेआई को लिखा पत्र
    29 Jul 2021
    पत्र में मीडिया में आई इन खबरों पर हैरानगी जताई है कि स्पाइवेयर का इस्तेमाल छात्राओं, विद्वानों, पत्रकारों, मानवाधिकार के पैरोकारों, वकीलों और यौन हिंसा पीड़िताओं की निगरानी के लिए किया गया।
  • आईसीएफ़
    बढ़ते मामलों के बीच राजद्रोह क़ानून को संवैधानिक चुनौतियाँ
    29 Jul 2021
    राजद्रोह का क़ानून जो भारत में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लाया गया था, उसे इंग्लैंड ने निरस्त कर दिया है।
  • OBC got reservation under All India Medical Education Quota, student organizations said victory of struggle!
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटा के तहत ओबीसी को मिला आरक्षण, छात्र संगठनों ने कहा संघर्ष की हुई जीत!
    29 Jul 2021
    चिकित्सा अभ्यर्थियों की ओर से चिकित्सा शिक्षा के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण देने की लंबे समय से मांग की जा रही थी। कुछ दिनों पहले तक केंद्र सरकार इससे अपना पल्ला झाड़ रही तो और इसे न्यायलय में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License