NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी जी, अर्थव्यवस्था के बारे में क्या कोई योजना है?
उग्र और बढ़ती महामारी फिर से वापस आ गई है, और इसलिए देश के कई हिस्सों में क़रीब-क़रीब लॉकडाउन जैसी स्थिति है, लेकिन क्या सरकार फिर से वही ग़लतियाँ दोहराने जा रही है?
सुबोध वर्मा
16 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
मोदी जी, अर्थव्यवस्था के बारे में क्या कोई योजना है?

जब देश भर में कोविड-19 की नई लहर चल रही है, कई राज्यों ने रात के कर्फ्यू से लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं (सिर्फ हरिद्वार में कुंभ मेले को छोड़कर)! पिछले साल की तरह, देश भर में अनिश्चितता और भय, महामारी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन, पिछले साल की तुलना में केंद्र सरकार मुख्यत सिरे से गायब है। पिछले साल, इस समय पीएम मोदी अपने तीसरे देशव्यापी संबोधन के जरिए आम लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जबकि इस साल कुछ रस्मी शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कि मास्क और 'सफाई' के बारे में बताया जा रहा  हैं, और टीकाकरण के बारे में कुछ प्रचार किया जाता रहा तब तक कि यह अभियान भी टीके की कमी के कारण रस्साकसी में नहीं बदल गया।

लेकिन जो बात चौंकाने और डराने वाली है वह यह कि कोविड की इस नई लहर से जो आर्थिक तबाही उआ नुकसान होने वाला है उससे निपटने की सरकार की कोई तैयारी या योजना नज़र नहीं आती है। लगता है आर्थिक गतिविधियों को बड़ा नुकसान होगा, और महामारी अनियंत्रित हो जाएगी। इस पहेली को हल करने का एकमात्र तरीका यही है कि सरकार इस बात को सुनिश्चित करे कि आम लोगों को बीमारी या प्रतिबंध के कारण आर्थिक/वेतन आदि का नुकसान होने पाए उनका समर्थन किया जाए। यह समर्थन कई रूपों में दिया जा सकता है - प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता देकर, मुफ्त अनाज और अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थों का वितरण कर, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना, जिसमें जांच और मुफ्त टीके लगाना, मुफ्त और निरंतर इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध कराना आदि शामिल हैं ताकि बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकें।

इस सब को लागू करने के लिए कुशल योजना और सबसे महत्वपूर्ण, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। मोदी सरकार को पिछले साल की तरह कर्व (बढ़ती बीमारी) के पीछे दौड़ने के बजाय कर्व के आगे चलने की जरूरत है। याद है मोदी सरकार ने पिछले साल अचानक और भयानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी और अपर्याप्त आर्थिक सहायता या खाद्यान्न वितरण में बहुत देरी की थी। 

सरकारी ख़ज़ाने से ख़र्च करो 

इस मुद्दे पर मोदी सरकार की शिथिलता या कमी के कुछ अर्थ या समझ नीचे दिए गए चार्ट से हासिल की जा सकती है, जो इस महीने जारी किए गए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम आंकड़ों पर आधारित है। ये आंकड़े पिछले साल कुछ सरकारों द्वारा लोगों को आर्थिक संकट में दी गई मदद से हुए अतिरिक्त खर्च को दिखाता है। यह मदद, प्रत्यक्ष सहायता या खर्च बढ़ाने या फिर राहत देने के लिए राजस्व में कुछ छूट के रूप में हो सकती है।

आम लोगों को या अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए सहायता प्रदान करने के मामले में भारत का दर्जा बहुत खराब है, क्योंकि इसने इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 3.1 प्रतिशत  खर्च किया है। यह उन सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मामले में औसत से भी कम है जिनमें से एक भारत भी है। जो सबसे आश्चर्यजनक बात है वह यह कि उन्नत यानि विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का औसतन लगभग 13 प्रतिशत खर्च किया है, हम उससे बहुत ही नीचे है। ध्यान दें कि चीन ने (4.7 प्रतिशत), दक्षिण अफ्रीका ने (5.5 प्रतिशत) और ब्राजील ने (8.3 प्रतिशत) सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा खर्च किया है।

तर्क यह दिया जा रहा है कि अमीर देशों के पास खर्च करने के लिए काफी अधिक संसाधन हैं, और भारत इस तरह की विलासिता को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। लेकिन यह तथ्य सही नहीं है क्योंकि अगर मोदी सरकार ने आम जन में वितरण के लिए अनाज के स्टॉक का इस्तेमाल किया होता, कॉरपोरेट्स को दिए गए बड़े पैमाने पर कर छुट को वापस लिया होता, और सुपर-रिच पर कर लगाकर अधिक संसाधन जुटाए होते तो सार्वजनिक खर्च में काफी वृद्धि हो सकती थी।

इस प्रत्यक्ष खर्च के अलावा, अधिकांश सरकारों ने व्यापात/व्यवसायों को ज़िंदा रखने के लिए कर्ज़, इक्विटी या गारंटी की भी पेशकश की थी। इन्हें आमतौर पर सरकारों द्वारा पेश किए जाने वाले आम ‘पैकेज’ के हिस्से के तौर पर गिना जाता है, लेकिन वास्तव में ये उल्लेखनीय फंड हैं, और इसका इस्तेमाल अगले कुछ वर्षों तक प्रभाव बनाए रखेगा। आईएमएफ के आंकलन के अनुसार, भारत ने जीडीपी के लगभग 5.1 प्रतिशत क्रेडिट और गारंटी की पेशकश की है।

अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब 

अर्थव्यवस्था पिछले साल कोविड+लॉकडाउन के झटके से अभी तक उबर नहीं पाई है। सीएमआईई के अनुमान के अनुसार अप्रैल में बेरोजगारी दर 7.1 प्रतिशत पर है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) फरवरी 2020 की तुलना में इस वर्ष फरवरी में 3.6 प्रतिशत कम है, यह सब दर्शाता है कि औद्योगिक गतिविधि में बहुत सुधार नहीं हुआ है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंक ऋण में वृद्धि पिछले वित्त वर्ष में सबसे निम्न स्तर यानि 4.2 प्रतिशत पर रही है, और इस वर्ष इसमें कोई सुधार होने का संकेत नहीं मिल रहा है। और, फरवरी में, सरकार का खुद का अनुमान था कि 2020-21 में जीडीपी पिछले वर्ष की तुलना में 8 प्रतिशत कम रहेगी, निजी उपभोग के खर्च में लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट होगी और सकल स्थिर पूंजी निर्माण (यानी पूंजी निवेश) पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत गिर जाएगा। 

जैसे-जैसे 2020-21 का वित्तीय वर्ष नज़दीक आया छोटे वृद्धिशील सुधारों को लेकर बहुत उत्सव मनाया गया, जबकि पूरी की पूरी तस्वीर उदास बनी रही है। इस पृष्ठभूमि में, नई महामारी की लहर विनाशकारी परिणाम ला सकती है - औद्योगिक उत्पादन में और गिरावट आ सकती है, निवेश निश्चित रूप से सुस्त हो जाएगा, निजी खपत खर्च कम हो जाएगा, और अधिक लोग नौकरी खो देंगे। ये वे हालात हैं जो अब भारत के ऊपर मंडरा रहे है।

करना क्या चाहिए 

केंद्र सरकार चुपचाप राज्य सरकारों को विस्फोटक कोविड-19 के संकट से निपटने के लिए अकेला छोड़े दे रही है और वह इससे उत्पन्न दोनों संकट आर्थिक और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से लड़ने की तैयारी से इंकार कर रही है। कामकाजी लोग यानि कारखाने के मजदूरों, खेतिहर मजदूरों और अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों की सीधे मदद के वित्तीय पैकेज की घोषणा तुरंत कर दी जानी चाहिए। पिछले साल, ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने आयकर नहीं चुकाने वाले सभी परिवारों को 7,500 रुपये प्रति माह प्रत्यक्ष अनुदान देने की मांग उठाई थी। इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि काम कर रहे लोगों को ऐसे समय में कमाने के लिए बाहर जाने से रोका जा सके खासकर तब-जब कोरोनोवायरस का प्रसार तेजी से हो रहा हो। इस कदम से न केवल सामाजिक संपर्क और बीमारी के प्रसारण पर अंकुश लगेगा, बल्कि लोगों के हाथों में बहुत ही जरूरी खरीद करने की ताक़त आएगी, जो बाज़ार में मांग बढ़ाएगी और इस तरह अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और उसे संकट से बचाने में मदद भी मिलेगी।

इसके अलावा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सरकारी गोदामों में अटे पड़े भारी अनाज के भंडार को सभी लोगों तक पहुंचाने में तेजी लाने की जरूरत है। रबी की फसल की खरीद से अगले दो महीनों में खाद्यान्न का भंडार बढ़ने वाला है और देश में अनाज की मात्रा हर किसी के लिए पर्याप्त होगी, बशर्ते मोदी सरकार इसके वितरण को तैयार हो। यह एक विशाल रसद पहुंचाने का काम है और इसे जल्द शुरू करने की जरूरत है ताकि आने वाले हफ्तों में कोई भी भारतीय इंसान भूखा न सोए, जैसा कि पिछले साल हुआ था।

चूंकि पिछले साल महामारी के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश में पूरा वक़्त बर्बाद हो गया था और फिर न ही ढहती स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार की कोई दीर्घकालिक योजना बनाई गई,  इसलिए देश में अभी भी पिछले साल के समान ही नज़ारे नज़र आ रहे हैं – जांच के परिणाम में देरी, अस्पतालों में बिस्तर नहीं है, स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, इत्यादि। यह एक तरह की आपराधिक उपेक्षा से कम नहीं है। हालांकि स्वास्थ्य का मसला काफी हद तक राज्य का विषय है, लेकिन राज्यों को हेल्थकेयर सुविधाओं को बढ़ाने या उनका विस्तार करने के लिए केंद्रीय स्तर  से धनराशि मुहैया कराने से मोदी सरकार हजारों लोगों की जान बचा सकती है और निजी अस्पतालों की जबरन फीस वसूली से निजात दिला सकती है, और साथ ही अपने खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे परिवारों पर आर्थिक बोझ को भी कम कर सकती है।

मोदी सरकार को इस संकट के समय में बड़ी तेजी से काम करने की जरूरत है। इसे राज्य सरकारों को विश्वास में लेने की जरूरत है और अपना पर्स ढीला करने की भी निहायत जरूरत है। अन्यथा, भारत फिर से पिछले साल की तुलना में बहुत खराब आपदा प्रबंधन में नामवर हो जाएगा। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Mr. Modi, Any Plan for the Economy?

COVID-19
COVID-19 lockdown
indian economy
FCI
CMIE
unemployment
Job Losses
IMF
RBI

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License