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आने वाले जर्मन चुनाव का भारत पर क्या होगा असर?
इस लेख में 26 सितंबर के बाद भारत-जर्मनी के संबंधों में आने वाले बदलाव की संभावना का विश्लेषण किया गया है।
एलेना काहले
30 Aug 2021
आने वाले जर्मन चुनाव का भारत पर क्या होगा असर?

एलेना काहले लिखती हैं कि यूरोपीय संघ और भारत के बीच जल्द होने वाले व्यापारिक समझौते की पृष्ठभूमि में, आने वाले जर्मन चुनावों में सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां भारत को बड़े भावी साझेदार के तौर पर देख रही हैं। इसलिए यह पार्टियां मानवाधिकारों के विषय में भारत की असफलता पर आलोचनात्मक ढंग से प्रतिक्रिया नहीं दे रही हैं।

26 सितंबर को संघीय गणतंत्र जर्मनी में नई सरकार के लिए चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों में जर्मन गणतंत्र का नया चांसलर चुना जाएगा। यह चुनाव ऐसी पृष्ठभूमि में हो रहे हैं, जब पहली बार मतदान करने जा रहे मतदाताओं ने अपनी उम्र में कभी एंजेला मार्केल को छोड़कर किसी को चांसलर नहीं देखा हो। बता दें एजेंला मार्केल पिछले 16 साल से देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

मार्केल के नेतृत्व में तुर्की, रूस और चीन में मानवाधिकारों पर जमकर चर्चा हुई। लेकिन भारत के विषय में यह उतनी गर्म नहीं रही। ठीक इसी दौरान मार्केल ने तानाशाहों के साथ भी साझेदार की है, जिसके चलते "फायनेंशियल रिव्यू" ने लिखा कि जब मार्केल ने जर्मन मुनाफ़े को यूरोपीय सिद्धांतों व मूल्यों के ऊपर रखा, तो लोकतंत्र, कानून के शासन और मानवाधिकार जैसी चीजों का मखौल बनाया गया।

अब जब मार्केल इस मौके पर मंच छोड़ रही हैं, तो ना केवल जर्मनी, बल्कि भारत में जर्मन निवेश और व्यापार भी नाजुक मोड़ पर है।

इस लेख में 26 सितंबर के बाद भारत-जर्मन संबंधों में संभावित बदलावों का विश्लेषण किया है। कई पार्टियां चांसलरशिप के लिए लड़ रही हैं, लेकिन 3 पार्टियों के पास ही करीब़ 20 फ़ीसदी जनमत का हिस्सा है, तो इन तीन पार्टियों में से किसी एक के प्रत्याशी के चांसलर बनने की संभावना है- द क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU/CSU), द सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) और द ग्रीन्स (बुंडनिस 90/डाई ग्रुएनेन)।

बता दें जर्मनी में गठबंधन सरकारें बनती रही हैं, लेकिन यह गठबंधन चुनावों के बाद ही किए जाते हैं। जैसे मतदान का आंकड़ा बताता है, इस बात की संभावना है कि CDU-SPD गठबंधन जरूरी जनमत तक पहुंच जाएगा। इससे मामला उलट जाता है- खासकर तब जब CDU ग्रीन्स के साथ गठबंधन में ना जाने संबंधी विचार व्यक्त कर चुका है। गठबंधन की अनिश्चित्ता देखते हुए, इस लेख में हर पार्टी के मेनिफेस्टो और संबंधित प्रत्याशियों के पिछले संपर्क का परीक्षण किया गया है।

भारत के लिए बड़ी भूमिका

रूस, चीन, तुर्की या इज़रायल की तरह मेनिफेस्टो में भारत के लिए अलग से खंड नहीं बनाया गया है। लेकिन भारत को एक ऐसे लोकतांत्रिक देश के तौर पर पेश किया गया है, जिसके साथ सभी पार्टियां गहरे संबंध करना चाहती हैं। जहां CDU का मेनिफेस्टो कहता है कि जर्मनी के व्यापारिक साझेदार लगातार अंतरराष्ट्रीय वैधानिक अनिवार्यताओं का उल्लंघन करते हैं, लेकिन इसमें भारत पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जबकि भारत का ऐसा करने का इतिहास रहा है। CDU जोर देकर कहती है कि भारत के साथ सहयोग बढ़ाना केंद्रीय मुद्दा है, क्योंकि भारत नियमों पर चलने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पैरोकार रहा है और इसलिए भारत, जर्मनी के साथ "सहयोग और सिद्धातों में प्राकृतिक साझेदार है।"

जहां स्वतंत्र शोध संस्थान वी-डैम भारत का दर्जा गिराकर "डि फैक्टो इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी (चुनावी तानाशाही)" कर चुका है, ऐसा लगता है कि CDU भारत का दर्जा संचालित लोकतंत्र के तौर पर देखता है। SPD और ग्रीन्स के लिए भी तस्वीर अलग नहीं है, जो भारत की तरफ विश्वास की चादर बढ़ाना चाहते हैं, वह भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि भारत का अस्तित्व औपचारिक तौर पर लोकतंत्र का है। 

CDU जोर देकर कहती है कि "आज सबसे बड़ी विदेशी और सुरक्षा चुनौती चीन की तरफ से पेश हो रही है।" लेकिन CDU यह भी साफ़ करती है कि चीन के साथ-साथ रूस और सीरिया को भी सहयोगी साझेदार बनाए रखना चाहिए। SPD ने भी यही स्थिति बताई है। वहीं ग्रीन पार्टी, दोनों पार्टियों की इन स्थितियों को "गैरजिम्मेदार" बताते हुए उनकी आलोचना करती है। इससे पता चलता है कि भले ही जर्मनी की आर्थिक स्थिरता और विकास को झटका लगे, पर ग्रीन पार्टी का मानना है कि जर्मनी को बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले देशों के साथ साझेदारी नहीं करना चाहिए। 

इस स्थिति में ग्रीन्स की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर आधारित सरकार रूस और चीन के साथ आर्थिक तौर पर कम व्यवहार करेगी। यह वह जगह होगी, जिसे कोई दूसरी बड़ी संस्था भर सकती है। इसलिए माना जा रहा है कि ग्रीन्स के नेतृत्व वाली सरकार में भारत को जर्मनी में ज़्यादा केंद्र में रखा जाएगा। 

केंद्र में नहीं हैं मानवाधिकार

जर्मनी की संघीय संसद- जर्मन बुंडेसटैग में हाल के वक़्त में भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर चर्चा हुई है। SPD और CDU ने 2019 के अपने साझा प्रस्ताव (Drs। 19/14340) में कहा था कि इंडो-जर्मन संबंधों को "भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे की वकालत" को प्राथमिकता देना चाहिए। CDU और SPD के नेतृत्व में बुंडेसटैग ने भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की अपील की थी। 

इन दो वक्तव्यों से साफ़ हो जाता है कि ज़्यादातर पश्चिम की तरह जर्मनी भी नागरिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों, खासकर महिला अधिकारों पर ध्यान केंद्रित कर मानवाधिकारों पर करीबी ढंग से व्याख्या करता है। ध्यान देने की जरूरत है कि ऐतिहासिक तौर पर इन्हीं अधिकारों की आड़ में तीसरी दुनिया के देशों पर गैरकानूनी हमलों को सही ठहराया जाता रहा है, इससे संकेत मिलता है कि बुंडेसटैग ने सिर्फ़ कानून के शासन या पूरी तरह से खुद के हितों से परे यह फ़ैसला नहीं लिया था।

SPD का यह दावा कि "मानवाधिकारों की अविभाज्यता या सार्वभौमिक वैधानिकता पर समझौता नहीं किया जा सकता" और "जो मानवाधिकारों के पक्ष में खड़े होंगे, उनकी रक्षा जर्मनी करेगा", उसका ठोस आधार नहीं है, क्योंकि CDU के नेतृत्व वाला जर्मनी लगातार मुनाफ़े को मानवाधिकारों की समग्र समझ से ज़्यादा प्राथमिकता में रखता रहा है।

उदाहरण के लिए, जहां सभी सहमत हैं कि चीन एक तानाशाही है, CDU और SPD जोर देकर कहती हैं कि चीन के साथ सतत सहयोग जरूरी है। 2019 की शुरुआत में चीन की यात्रा पर SPD के ओलाफ स्कोल्ज, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से नहीं मिले थे, मानवाधिकारों की रक्षा करने वालों की तो बात ही दूर है, जबकि उस दौरान स्कोल्ज वाइस-चांसलर थे। यात्रा के बाद सुड्ड्यूश ने अंदाजा लगाया था कि स्कोल्ज वहां व्यापारिक संबंधों को सुधारने गए थे। 

इस महीने की शुरुआत में CDU के प्रत्याशी आर्मिन लासचैट ने किसी अपराध के साबित होने की दशा में अफ़गान शरणार्थियों को वापस भेजे जाने का समर्थन किया था, भले ही उन्हें शरण देना वाला दर्जा या अफ़गानिस्तान की स्थिति कैसी भी हो। इस तरह आर्मिन ने शरणार्थियों को उनकी जगह वापस भेजे जाने का समर्थन किया था, जो मानवाधिकार कानूनों में प्रतिबंधित है। इस तरह उन्होंने बताया कि "मानवाधिकार" CDU के नेतृत्व वाली सरकार के लिए सिर्फ़ मुहावरा हैं।

दूसरी तरफ ग्रीन्स मानवाधिकारों के सम्मान के पक्ष में मजबूत ढंग से खड़े होते हैं। अपने चुनावी मेनिफेस्टो में उन्होंने दुनियाभर के मानवाधिकार रक्षकों की बात की थी और हर जर्मन दूतावास में इन रक्षकों के लिए एक संपर्क बिंदु बनाने की बात कही थी। जैसा नीचे का हिस्सा बताता है, ग्रीन्स समग्र मानवाधिकारों के मु्द्दों को मुख्यधारा में लाने के लिए कदम उठा रहे हैं, यह ना सिर्फ़ धार्मिक और नागरिक स्वतंत्रता के लिए है, बल्कि वे अपनी राजनीति में भारत के साथ होने जा रहे मुक्त व्यापार समझौते पर आलोचनात्मक रवैया भी अपनाए हुए हैं। 

मुक्त व्यापार समझौता को लागू किया जाना

8 मई, 2021 को यूरोपीय संघ और भारत के 16वें सम्मेलन में हुए फ़ैसलो को ध्यान में रखते हुए, EU-भारत मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पर बातचीत को दोबारा शुरू करने के लिए, उन मांगों पर ध्यान देना जरूरी है कि अलग-अलग पक्ष ऐसे समझौते में एक-दूसरे के लिए क्या योगदान दे सकते हैं।

मुक्त व्यापार समझौतों में राज्य का नवउदारवादी वापसी होती है। जबकि मानवाधिकार सुरक्षाओं के लिए राज्य की वैधानिक जरूरत होती है। जैसे-जैसे पर्यावरण संकट आजीविकाओं का खात्मा करेगा, वैसे-वैसे राज्य की मदद की ज़्यादा जरूरत होगी। भारत में कैसे आर्थिक उदारीकरण ने आर्थिक आसमानता को बढ़ाया है, इस विषय में काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है। इस बात के भी बहुत सबूत मिले हैं कि विदेशी संस्थानों के साथ व्यापार से आदिवासियों और पर्यावरणीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की पूरे भारत में हत्याओं को बढ़ावा मिला है। 

जैसा "ईयू-इंडिया पीपल्स रोडमैप" और "यूरोपियन पार्लियामेंट रिसर्च सर्विस" ने दर्शाया है, FTA द्वारा असमानता और गरीबी बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय दुष्परिणामों के उपजने की गंभीर संभावना है, जिनका समाधान किया जाना जरूरी है। लेकिन ईयू-इंडिया मुक्त व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत को पहले लंबित कर दिया गया, क्योंकि भारत ने कुछ मुख्य उपबंधों का विरोध किया था, जिनके ज़रिए मानवाधिकार उल्लंघनों के कड़े विश्लेषण पैमानों का निर्माण होता।

जून, 2021 में SPD ने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें "सप्लाई चेन ह्यूमन राइट्स एंड एंवायरमेंटल ड्यू डिलिजेंस (HREDD)" लॉ को शामिल किया गया था। लेकिन खानापूर्ति करने वाले उपकरण के तौर पर अधिनियम के उपयोग की बात कहते हुए इसकी आलोचना की गई। कहा गया कि इस अधिनियम के ज़रिए नैसर्गिक तौर पर व्यापार को सकारात्मक दिखाया जा रहा है। SPD का इतिहास देखते हुए यह आलोचना प्रबल भी दिखाई देती है। 

दूसरी तरफ मेनिफेस्टो में ग्रीन्स की मांग "अनिवार्य और लागू किए जाने वाले मानवाधिकारों, पर्यावरणीय और सामाजिक पैमानों" की है। ग्रीन्स ने EU-चीन मुक्त व्यापार समझौते का कड़ा विरोध किया और उसे "मानवाधिकारों व समतल ज़मीन बनाने वाले क्षेत्रों" के लिए अकुशल बताया। साफ़ है कि ग्रीन्स, मुक्त व्यापार समझौतों को उनकी हालिया प्रारूप में मान्यता नहीं दे सकते। 

ग्रीन्स का यह पैमाना, CDU से बहुत विरोधाभास में है। जबकि यूरोपीय संसद द्वारा चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मद्देनज़र ईयू-चीन समझौते को रोक देने के बाद भी CDU मुक्त व्यापार समझौते के लिए जोर लगा रही है।

चूंकि भारत और ईयू के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर शुरुआती बातचीत मानवाधिकारों, पर्यावरणीय और सामाजिक पैमनों पर कड़ाई के चलते रुकी थी, जबकि भारत के कानूनी ढांचे में बिना किसी ठोस बदलाव के यह दोबारा चालू हो चुकी है, तो साफ़ होता है कि SPD या CDU के नेतृत्व जर्मनी द्वारा समर्थित FTA में कई मुद्दों को छोड़ दिया गया होगा। अगर कुछ गंभीर बदलाव नहीं किए गए तो ग्रीन्स के नेतृत्व वाली सरकार में इस समझौते के फिर से रुकने की संभावना है।

अंतिम विचार

ना सिर्फ़ जर्मनी, बल्कि भारत के पूरे यूरोपीय संबंध, जर्मनी के अगले चांसलर की स्थिति पर निर्भर करते हैं, मतलब वे कौन सी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं या किस गठबंधन से आते हैं।

कुल-मिलाकर तीनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों की भारत पर स्थिति लगभग निरंतर रही है। हर पार्टी अपने-आप में दावा करती है कि वे भारत के साथ भविष्य में सहयोग को प्रगाढ़ करेंगी और तीनों ही पार्टियां भारत के तौर पर एक प्राकृतिक साझेदार को देखती हैं। भले ही ग्रीन्स मानवाधिकारों के मु्द्दे पर कड़े पैमानों का समर्थन करते हैं और भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन सामान्य तौर पर वे व्यापार बढ़ाने के विरोधी नहीं हैं, यहां तक कि जरूरी मानवाधिकार और पर्यावरणीय पैमानों के आभाव में भी वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं। तो संभावना है कि भारत और जर्मनी के संबंधों की मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने की संभावना है, लेकिन मानवाधिकारों को संबंधों के केंद्र में रखने की जरूरत पर दोबारा सोचने की जरूरत है।

(एलेना काहले जर्मन नागरिक हैं, जो थिंकटैंक 'द लंदन स्टोरी' में पॉलिसी एसोसिएट के तौर पर काम करती हैं। उन्होंने लीडेन यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय न्याय में डिग्री ली है। यह उनके निजी विचार हैं।)

यह लेख मूलत: द लीफलेट में प्रकाशित हुआ था।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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