NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मुकुल रॉय की वापसी टीएमसी और बीजेपी की आइडियोलॉजी पर भी सवाल खड़े करती है
मुकुल की ये मजबूरियां ही हैं कि वो न बीजेपी से वफ़ा कर पाए और न ही टीएमसी से। वैसे ये बीजेपी और टीएमसी की भी मजबूरियां ही हैं जो एक ने दाग़ी नेता को तुरंत भर्ती कर लिया तो दूसरे ने मौका मिलते ही झट से घर वापसी करवा ली।
सोनिया यादव
13 Jun 2021
मुकुल रॉय
Image courtesy : Newslaundry

“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता”

बशीर बद्र का ये शेर हाल ही में दल बदल कर बीजेपी से टीएमसी में आए मुकुल रॉय पर बेहद सटीक बैठता है। मुकुल की ये मजबूरियां ही हैं कि वो न बीजेपी से वफ़ा कर पाए और न ही टीएमसी से। वैसे ये बीजेपी और टीएमसी की भी मजबूरियां ही हैं जो एक ने दागी नेता को तुरंत भर्ती कर लिया तो दूसरे ने मौका मिलते ही झट से घर वापसी करवा ली। ये मुकुल के साथ ही साथ दोनों पार्टियों की आइडियोलॉजी पर भी सवाल खड़े करती है। वैसे राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं होता लेकिन बंगाल में जारी इस उठापठक को देख कर इतना जरूर कहा जा रहा है कि यहां चुनाव के बाद भी ‘खेला’ जारी है।

मुकुल रॉय टीएमसी छोड़कर बीजेपी में जाने वाले पहले नेता थे। उनके बाद अर्जुन सिंह, सब्यसाची दत्त, शोभन चटर्जी, शुभेंदु अधिकारी और राजीव बनर्जी जैसे कई नेता बीजेपी में शामिल हुए थे। अब मुकुल की घर वापसी ने बीजेपी को पश्चिम बंगाल में भारी झटका दिया है। राजनीति के हलकों में यह अटकलें तेज़ हो गईं हैं कि क्या एक बार फिर मुकुल से ही घर वापसी मामले की पुनरावृत्ति होगी? अभी मुकुल आए हैं, क्या उनके पीछे और भी आएंगे?

कहे अनकहे ममता बनर्जी ने इस बात को माना है कि मुकुल रॉय ने पांच साल से भी कम समय में बीजेपी को बंगाल में एक ताकतवर विरोधी के रूप में खड़ा किया, जिसका कभी राज्य में कुछ खास नाम भी नहीं था। उन्होंने ममता के लिए राजनीतिक दहशत पैदा की। चूंकि बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को विपक्ष का नेता बनाकर रॉय का कद कम कर दिया, इसलिए ममता बनर्जी ने रॉय के गुस्से का इस्तेमाल कर अपने विरोधी के सबसे खास तुरुप के इक्के को दोबारा अपने खेमे में मिला लिया।

भले ही टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी मुकुल रॉय की घर वापसी पर उन्हें टीएमसी परिवार के सदस्य बताकर कोई मतभेद न होने की बात कह रहीं हों लेकिन ये ममता और मकुल के मतभेद ही थे जिसके चलते नवंबर, 2017 में मुकुल बीजेपी में शामिल हुए थे। अब ममता ने मुकुल की वापसी पर "ओल्ड इज़ ऑलवेज़ गोल्ड" की जो बात कही उसके भी कई राजनीतिक मायने हैं। राज्य में कोरोना महामारी की परिस्थिति सुधरने के बाद अब कोलकाता नगर निगम समेत 100 से ज़्यादा नगर निकायों के चुनाव होने हैं। ऐसे में मुकुल की वापसी टीएमसी के लिए बेहद अहम है। उनको संगठन की धुरी माना जाता है। ये उनकी दक्षता का ही कमाल है कि उन्होंने बंगाल में महज तीन सीटों पर सिमटी बीजेपी को 77 सीटों का स्वाद चखा दिया। यही कारण है कि मुकुल को 'बंगाल की राजनीति का चाणक्य' भी कहा जाता है। अब मुकुल रॉय का यूं पाला बदलना बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनावों में भारी मुश्किलें पैदा कर सकता है।

ममता बनर्जी का कहना है कि बीजेपी सीबीआई और ईडी का डर दिखा कर मुकुल को अपने साथ ले गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब मुकुल का सीबीआई और ईडी का डर खत्म हो गया है। क्या अब वे आश्वस्त हैं कि उन पर नारदा स्टिंग मामले में कोई कार्रवाई नहीं होगी। इसका जवाब फिलहाल शायद किसी के पास नहीं है लेकिन मुकुल की नाराज़गी और महत्वकांक्षाओं का जवाब सभी के पास जरूर है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि मुकुल को बीजेपी में कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हक़दार थे। विपक्ष के नेता के तौर पर शुभेंदु अधिकारी को बिठा दिया गया। जिन उम्मीदों के साथ वे बीजेपी में शामिल हुए थे वो पूरी नहीं हुईं। प्रदेश नेतृत्व ने उनको ख़ास तवज्जो नहीं दी। ऊपर से उनकी पत्नी कृष्णा जो बीते महीने से ही कोलकाता के एक निजी अस्पताल में नाज़ुक  हालात में भर्ती हैं, उनकी प्रदेश या केंद्र के किसी बीजेपी नेता ने ख़ैर-ख़बर नहीं ली। इससे मुकुल काफ़ी नाराज़ बताए जाते जा रहे थे। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उनको फ़ोन भी किया गया था। लेकिन ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी मुकुल रॉय की कोरोना संक्रमित पत्नी को देखने अस्पताल पहुँचे थे तो उनके घर वापसी के कयासों को बल मिल गया था।

मुकुल रॉय के साथ ही उनके बेटे शुभ्रांशु ने भी टीएमसी ज्वाइन कर ली। शुभ्रांशु लगातार बाग़ी तेवर अपनाए हुए थे। पहले उन्होंने अपने एक ट्वीट में पार्टी को टीएमसी की आलोचना करने की बजाय आत्ममंथन की सलाह दी थी और उसके बाद पत्रकारों से बातचीत में ममता बनर्जी और अभिषेक की भी सराहना की थी।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव 2021 के बाद मुकुल लगभग राजनीति से अलग ही दिखे। विधायक के तौर पर शपथ लेने के बाद उनको सार्वजनिक तौर पर किसी कार्यक्रम में नहीं देखा गया। कहा जा रहा है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव भी काफ़ी अनिच्छा से ही लड़ा था। वो तो जीत गए, लेकिन उनके बेटे बीजपुर सीट से हार गए। यह मुकुल के लिए एक झटका ही था।

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने मुकुल की घर वापसी पर कहा कि कोई भी किसी पार्टी में जाने के लिए स्वतंत्र है। उनके आने से तो कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ था। अब देखते हैं जाने से क्या नुक़सान होगा। वैसे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और मुकुल रॉय के बीच पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। लेकिन ये बात किसी से छिपी नहीं है कि मुकुल रॉय की वजह से ही बीजेपी को ख़ासकर वर्ष 2018 के पंचायत और 2019 के लोकसभा चुनावों में काफ़ी फ़ायदा मिला था। कहा जाता है कि सभी बागियों को मुकुल ही बीजेपी में लेकर आए थे, उन्होंने प्रदेश में बीजेपी को संगठित किया, सभी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार दिए और राज्य में बीजेपी की जमीन तैयार करने के लिए जी-जान एक कर दिया। अब जब बीजेपी का साथ उन्होंने छोड़ दिया है तो इसका खामियाजा तो जरूर पार्टी को उठाना पड़ेगा। अब हालांकि इसकी भी बहुत उम्मीद नहीं है की उन्हें टीएमसी में वही जगह और सम्मान मिले जो पहले कभी हुआ करता था।

Mukul Roy
TMC
BJP
mamta banerjee​​
Modi government
dilip ghosh

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License