NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक: नहीं काम आ रहा 'डबल इंजन’, यूपी-बिहार सबसे नीचे
नीति आयोग के ग़रीबी सूचकांक की तरह स्वास्थ्य सूचकांक भी यही इशारा करता है कि भारत के तकरीबन सभी राज्यों को दुनिया के दूसरे मुल्कों की बजाय भारत के ही केरल से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है।
अजय कुमार
28 Dec 2021
govt hospital
Image courtesy : Hindustan Times

देश ललकारने वाले अंधे नारों से मिलकर नहीं बनता। ना ही कुछ अमीर लोगों के पैसे से बनता है। देश इंसानों से मिलकर बनता है। इसलिए किसी देश की तरक्की का सबसे बड़ा पैमाना वही है जो इंसानों की तरक्की के होते हैं। इसी में से एक पैमाने का नाम है देश का स्वास्थ्य क्षेत्र। इस स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर नीति आयोग की स्वास्थ्य सूचकांक की चौथी रिपोर्ट आई है। यह रिपोर्ट 2018-19 के साल में स्वास्थ्य क्षेत्र के हालत को आधार बनाकर साल 2019 - 20 के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रस्तुत की गई है। यानी नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक में कोरोना महामारी के दौर को शामिल नहीं किया गया है। सूचकांक कोरोना महामारी के दौर के एक साल पहले का है।

नीति आयोग द्वारा जारी किए गए स्वास्थ्य सूचकांक में पूरे देश को तीन कैटेगरी में बांटा गया है। बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश। बड़े राज्य में 19 राज्य शामिल हैं। छोटे राज्य में आठ राज्य शामिल है। केंद्र शासित प्रदेश में 7 राज्य शामिल हैं।

नीति आयोग का यह स्वास्थ्य सूचकांक कई आधारों पर बनाया गया है। मुख्यतया इसमें तीन कैटेगरी शामिल है। पहली कैटेगरी हेल्थ आउटकम से जुड़ी है यानी आबादी में स्वास्थ्य की दशा किस तरह की है? इसमें जन्म के समय मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु दर, लिंगानुपात जैसे पैमानों पर आबादी का स्वास्थ्य क्या है? इस पर फोकस किया गया है।

दूसरी कैटेगरी स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रशासन से जुड़ी है। जिसमें इसे शामिल किया गया है कि स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े प्रशासनिक पद कितनी है? उनका ढांचा क्या है? उस पर कोई कार्यरत है या नहीं?

तीसरी कैटेगरी में निर्धारित डॉक्टरों की संख्या और मौजूद डॉक्टरों की संख्या, निर्धारित हॉस्पिटलों की संख्या और मौजूद हॉस्पिटलों की संख्या, निर्धारित हेल्थ केयर प्रोवाइडर की संख्या और मौजूद हेल्थ केयर प्रोवाइडर की संख्या से जुड़ी जानकारियों को इकट्ठा कर स्वास्थ्य सूचकांक बनाने का काम किया गया है। इस तरह से स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी ढेर सारी जरूरी बातों को आधार बनाकर नीति आयोग ने इस स्वास्थ्य सूचकांक की गणना की है।

मोटे तौर पर कहा जाए तो जो राज्य स्वास्थ्य सूचकांक में पहले नंबर पर होगा वह ओवरऑल स्वास्थ्य के मामले में भारत का सबसे बढ़िया राज्य होगा। जो इस सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर होगा ओवरऑल स्वास्थ्य के मामले में भारत का सबसे खराब राज्य होगा।

भारत के सबसे बड़े 19 राज्यों में केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना स्वास्थ्य सूचकांक की सूची में सबसे आगे खड़े हैं। यानी इन तीन राज्यों की स्वास्थ्य क्षेत्र की ओवरऑल परफारमेंस भारत के दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर है। सबसे निचले पायदान पर योगी आदित्यनाथ की सांप्रदायिकता में झुलसा उत्तर प्रदेश खड़ा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे अधिक बदहाली उत्तर प्रदेश में है।

यह राज्य चुनाव में जाने वाला है। मुख्यधारा की मीडिया में पैसे के दम पर इस राज्य की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े हर पहलू पर डंका बजवाया जाता है। लेकिन बुनियादी सुविधाओं की छानबीन करने पर जो सच्चाई बाहर आती है उसमें यह राज्य सबसे फिसड्डी नजर आता है।साल 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि केरल कि अस्पतालों को उत्तर प्रदेश से अस्पताल चलाना सीखना चाहिए। नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक बता रहा है कि केरल के अस्पतालों को देखकर उत्तर प्रदेश को अपने अस्पतालों को ठीक करने के बारे में सोचना चाहिए।

अगर सूचकांक के स्कोर के लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश को 100 में से महज 30 का स्कोर मिला है। इतने कम स्कोर के साथ उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर हैं। 30 के स्कोर के बाद 31 का स्कोर बिहार को मिला है। बिहार की स्थिति उत्तर प्रदेश से तिनके के बराबर बेहतर है। लेकिन देश भर में सबसे खराब स्वास्थ्य क्षेत्र के मामले में दूसरे नंबर पर है।

सबसे ज्यादा स्कोर केरल को मिला है। केरल का स्कोर 82 है। यानी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी पट्टी के ओवरऑल स्वास्थ्य क्षेत्र के परफॉर्मेंस जब तकरीबन तीन गुना और अधिक बेहतर होगा तब जाकर के वह केरल के बराबर पहुंचेगा।

बिहार और उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र का ओवरऑल परफारमेंस का बुरा हाल बिहार और उत्तर प्रदेश के राजकाज की बनी बनाई महिमा को बड़े बुरे तरीके से तोड़ता है। यह दोनों राज्य राजनीति के मामले में भारत के सबसे धुरंधर राज्य में मशहूर है लेकिन यहां की शासन व्यवस्था कितनी अधिक लचर है इसका नजारा स्वास्थ्य सूचकांक से दिखलाई पड़ता है।

उत्तर प्रदेश के इतने कम स्कोर के बाद भी नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत उत्तर प्रदेश को बधाई दे रहे हैं। उनके बधाई देने का कारण केवल यह है कि साल 2018-19 के मुकाबले साल 2019- 20 नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक में उत्तर प्रदेश में 5 अंक की बढ़ोतरी की है। इससे ज्यादा बढ़ोतरी किसी दूसरे राज्य की नहीं है। इसलिए अमिताभ कांत उत्तर प्रदेश को बधाई दे रहे हैं।

अब इसे क्या कहा जाए? यह विशुद्ध तौर पर चुनावी राजनीति की तिकड़म बाजी है। नहीं तो जनता को दिमाग में रखकर विश्लेषण करने वाले अमिताभ कांत से पूछ सकते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य जिसकी आबादी तकरीबन 20 करोड़ है। जिसकी प्रति व्यक्ति आय भारत के प्रति व्यक्ति आय से आधी है।( भारत की ₹86000 प्रति व्यक्ति आय और उत्तर प्रदेश की तकरीबन ₹41000 प्रति व्यक्ति आय) वैसे राज्य का स्कोर अगर 5 अंकों की बढ़ोतरी के बाद भी भारत के दूसरे राज्यों से सबसे कम है। महज 30 है। तो इसमें बधाई की क्या बात? क्या हम यह उम्मीद कर रहे थे की उत्तर प्रदेश को 30 से भी कम अंक आने चाहिए। इसलिए हम उसे बधाई दे रहे हैं।

नीति आयोग के सीईओ के नाते उत्तर प्रदेश को स्वास्थ्य क्षेत्र में दी गई बधाई भारत के नीति निर्माताओं की नेताओं की चापलूसी करने वाली मानसिकता को दर्शाती है। यही चापलूसी और गुलाम मानसिकता भारत की प्रशासनिक संस्थाओं को सड़ा रही है। जिसकी भुक्तभोगी यूपी बिहार की गरीब जनता बनती है।

स्वास्थ्य सूचकांक का पूरा स्कोर 100 है। यानी जिस राज्य ने स्वास्थ्य सूचकांक के सभी मानकों पर अपने आप को खरा उतरा वह 100 अंक हासिल करेगा। यह स्कोर किसी भी राज्य को हासिल नहीं हुआ है। बदहाली का हाल यह है कि भारत के 19 सबसे बड़े राज्यों में तकरीबन आधे राज्य 50 अंक को भी पार नहीं कर पाए हैं। केरल तमिलनाडु तेलंगाना कर्नाटक हिमाचल प्रदेश आंध्र प्रदेश गुजरात पंजाब महाराष्ट्र ने 50 से ज्यादा का स्कोर हासिल किया है। जबकि उत्तर प्रदेश असम झारखंड मध्य प्रदेश बिहार उत्तराखंड उड़ीसा राजस्थान हरियाणा ने 50 से कम का स्कोर हासिल किया है। इसी तरह से केंद्र शासित प्रदेशों में भी तकरीबन आधे केंद्रशासित प्रदेश 50 अंक से नीचे ही रहे हैं।

हेल्थ केयर सर्विस प्रोवाइडर यानी डॉक्टरों, बीमारी और बीमारी के निदान के मामले में देशभर में सबसे बढ़िया हालत तमिलनाडु की है। सबसे बुरी हालत बिहार की है। तमिलनाडु का स्कोर इस मामले में 71 है और बिहार का 15 है। यानी बिहार डॉक्टरों की संख्या बीमारी और निदान के मामले में तमिलनाडु से 4 गुना पीछे है।

कहीं-कहीं पर राज्य की आय और राज्य के स्वास्थ्य क्षेत्र के ओवरऑल परफारमेंस के बीच सीधा रिश्ता नहीं बनता है। लेकिन फिर भी सामान्य प्रवृत्ति यही है कि जिन राज्यों की मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में स्थिति बहुत कमजोर है उन राज्यों की हेल्थ इंडेक्स में भी स्थिति बहुत कमजोर है। मोटे तौर पर समझे जिसके जेब में पैसा कम है, उसके वहां स्वास्थ्य की बदहाली ज्यादा है।

नीति आयोग के मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स की तरह स्वास्थ्य सूचकांक भी यही इशारा करता है कि भारत के तकरीबन सभी राज्यों को दुनिया के दूसरे मुल्कों की बजाय भारत के ही केरल से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। दूसरे राज्यों के लोगों को केरल के तरफ देखना चाहिए कि आखिर कर कैसे भारत का ही एक राज्य का राजकाज अपनी जनता के लिए जितना फायदेमंद हो पा रहा है उतना दूसरे राज्य क्यों नहीं हो पा रहे? आखिरकार उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपना वोट देते समय किन बातों को नजरअंदाज करके चल रहे हैं कि उनके यहां स्वास्थ्य की बदहाली इतनी ज्यादा है कि उसे केरल जैसा बनने में 3 गुना ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

नीति आयोग
NITI Aayog health index
NITI Aayog हेल्थ इंडेक्स
केरल
Kerala
Uttar pradesh
Bihar
Health Index of Uttar Pradesh

Related Stories

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी

ग्राउंड रिपोर्ट: स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रचार में मस्त यूपी सरकार, वेंटिलेटर पर लेटे सरकारी अस्पताल

बिहारः पिछले साल क़हर मचा चुके रोटावायरस के वैक्सीनेशन की रफ़्तार काफ़ी धीमी

बिहारः मुज़फ़्फ़रपुर में अब डायरिया से 300 से अधिक बच्चे बीमार, शहर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती

बिहार की राजधानी पटना देश में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर

लड़कियां कोई बीमारी नहीं होतीं, जिनसे निजात के लिए दवाएं बनायी और खायी जाएं

लोगों को समय से पहले बूढ़ा बना रहा है फ्लोराइड युक्त पानी

बिहार में फिर लौटा चमकी बुखार, मुज़फ़्फ़रपुर में अब तक दो बच्चों की मौत


बाकी खबरें

  • मिनेसोटा में क़रीब 250 पाइपलाइन-विरोधी प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया
    पीपल्स डिस्पैच
    मिनेसोटा में क़रीब 250 पाइपलाइन-विरोधी प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया
    10 Jun 2021
    आदिवासी समूह और पर्यावरण एक्टिविस्ट उत्तर पश्चिमी मिनेसोटा में एनब्रिज के स्वामित्व वाली तेल पाइपलाइन परियोजना के अंतिम चरण के निर्माण का विरोध कर रहे हैं।
  • भाईचारिक सांझ का प्रतीक पंजाब का ज़िला मालेरकोटला
    शिव इंदर सिंह
    भाईचारिक सांझ का प्रतीक पंजाब का ज़िला मालेरकोटला
    10 Jun 2021
    पंजाबियों व सिखों का मालेरकोटला के साथ एक अनोखा रिश्ता है, यह पंजाब की ऐतिहासिक विरासत का शानदार हिस्सा है। पंजाब की इस ऐतिहासिक भाईचारिक सांझ के बारे योगी की टिप्पणी गैर-जरूरी व् भद्दी है।
  • एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता पूर्व मुक्केबाज डिंको सिंह का निधन
    भाषा
    एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता पूर्व मुक्केबाज डिंको सिंह का निधन
    10 Jun 2021
    डिंको ने 1998 में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था और उन्हें उसी साल अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। खेलों में उनके योगदान के लिये उन्हें 2013 में पदम श्री से सम्मानित किया गया था। भारतीय…
  • पेरूः कैस्टिलो ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता, फुजीमोरी का मानने से इनकार
    पीपल्स डिस्पैच
    पेरूः कैस्टिलो ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता, फुजीमोरी का मानने से इनकार
    10 Jun 2021
    99.998% मतों की गिनती पूरी होने के साथ वामपंथी उम्मीदवार पेड्रो कैस्टिलो को 50.204% वोट मिले हैं, जबकि अतिदक्षिणपंथी कीको फुजीमोरी को 49.796% वोट मिले।
  • यूरोपीय ट्रेड यूनियनों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक संगठनों ने नाटो विरोधी प्रदर्शन का आह्वान किया
    पीपल्स डिस्पैच
    यूरोपीय ट्रेड यूनियनों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक संगठनों ने नाटो विरोधी प्रदर्शन का आह्वान किया
    10 Jun 2021
    पूरे यूरोप के ट्रेड यूनियनों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक संगठनों ने युद्ध और ब्रुसेल्स में अगले नाटो शिखर सम्मेलन के ख़िलाफ़ कई कार्यक्रम किए।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License