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मज़दूर-किसान
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अर्थव्यवस्था
'प्रोत्साहन' पैकेज से नहीं आएगी तेजी, यह भारत को बर्बाद कर देगा
कोरोना महामारी से लड़ने और अर्थव्यवस्था को उबारने के नाम पर किसानों, कर्मचारियों, और कामग़ारों पर अमीरों के हितों के लिए कड़ा वार किया जा रहा है।
सुबोध वर्मा
18 May 2020
Modi
Image Courtesy: The Print

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए लगातार चार दिनों तक कई योजनाओं की घोषणा की। इस दौरान वह लगातार कहती रहीं कि इन योजनाओं का मकसद प्रधानमंत्री के सपनों का नया 'आत्मनिर्भर' भारत बनाना है।शायद आपने गौर नहीं किया, लेकिन इन नीतिगत घोषणाओं ने भारत को विभाजित कर दिया है। कॉरपोरेट दिग्गज, औद्योगिक संस्थाओं, भूस्वामी, अमीर किसान, बड़े व्यापारी और सरकार समर्थक मीडिया इन घोषणाओं का खुले ढंग से समर्थन कर रहे हैं। इसलिए टीवी के कार्यक्रमों से अपनी बौद्धिक खुराक लेने वाला मध्यम वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा और विदेशी पूंजी इन घोषणाओं के बाद खुश हैं।

लेकिन ट्रेड यूनियनों, किसानों और कृषिगत कार्य में लगे कामग़ारों के संगठनों, प्रगतिशील लोगों, समूहों और जनआंदोलनों ने इनकी तीखी आलोचना की है। लॉकडॉउन के बावजूद पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। 'सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU)' के साथ 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 22 मई से दो दिन का विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।

कोरोना महामारी से लड़ने और सिकुड़ती अर्थव्यवस्था को उबारने के नाम पर नरेंद्र मोदी सरकार ने खुलकर अमीरों के पक्ष में घोषणाएं की हैं। इस तरह गरीबों पर जंग का ऐलान कर दिया गया है। पाठकों को इस विश्लेषण पर हैरानी होगी। क्या इतना सारा पैसा कामग़ारों और किसानों पर खर्च नहीं किया जा रहा है? प्रवासी मज़दूर, मछुआरे, फल और सब़्जी बेचने वाले, दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली ग़रीब महिलाओं को क्या दूसरों की तरह इन योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा? तो आखिर इतनी तीखी आलोचना क्यों हो रही है? इसकी वजह हैं।

क्या किसानों को फायदा मिलेगा?

15 मई को सिलसिलेवार ढंग से जारी घोषणाओं से कृषि उत्पादों के व्यापार की पूरी व्यवस्था बदल दी गई। मुख्य खाद्यान्न फ़सलों की कीमतों का निर्धारण अब तक कानून से होता आया है। क्योंकि विकट गरीब़ आबादी वाले भारत जैसे बड़े देश में जरूरी अनाजों और दूसरे उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार व्यापारियों के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता। वह लोग कीमतों के साथ खिलवाड़ कर लोगों के दुख और भूख से अपना फायदा बनाने पर अमादा हो जाएंगे। बल्कि अब भी वो ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं। इसलिए कीमतों की सीमा निर्धारित की गई थी। यह भी तय था कि कोई व्यापारी कितना माल इकट्ठा कर सकता है। पर अब यह सब खत्म हो गया।

इन कदमों को किसानों को आज़ाद करने वाला बताया जा रहा है, पर इन योजनाओं से सभी के लिए खुल्ली छूट हो जाएगी, जिसमें बड़े व्यापारी बाज़ार पर एकाधिकार कर लेंगे और आखिरकार यही व्यापारी कीमतों और आपूर्ति को तय करेंगे। भारी जेबों वाले लोग और संस्थाएं, स्थानीय व्यापारियों को कुचल देंगी। किसानों के हित बलि चढ़ जाएंगे। इन बड़े व्यापारियों और एकाधिकार करने वाली संस्थाओं में विदेशी कंपनियां भी शामिल होंगी.

जिस नए ढांचे का सुझाव दिया गया है, दरअसल वो बड़े निजी खिलाड़ियों को कृषि उत्पादों में बेइंतहां फायदा देने वाले प्रबंधों हैं। बेहतर वितरण केंद्र, E-मार्केटिंग और ज़्यादा बेहतर पहुंच से इनकी लॉबी को ही फ़ायदा मिलेगा।तो जो किसान अपनी फ़सलों को ऊचित मूल्य पर बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो अपने खर्च से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी ज़्यादा का समर्थन मूल्य मांग रहे हैं, उन्हें अब अपनी फ़सल बेचने के लिए बड़े व्यापारी का इंतज़ार करना होगा, जो उनकी खड़ी फ़सल खरीदेगा। यह व्यापारी उन्हें अग्रिम और छूट का लालच देंगे, जिससे किसान अपने उत्पाद के लिए दूरदृष्टि नहीं बना पाएगा। तमाम भ्रष्टाचार और खामियों के बावजूद, अब किसानों के पास एक तय बाज़ार की उपलब्धता नहीं होगी। क्योंकि सरकार ने इससे संबंधित नियम को बदल दिया है। अब नया कानूनी ढांचा लाया गया है।

संक्षिप्त में कहें तो इन कदमों से कृषि-वस्तुओं का क्षेत्र मुक्त बाज़ार व्यवस्था के लिए खुल जाएगा। इसे भविष्य में वैश्विक बाज़ारों से जोड़ दिया जाएगा। भारतीय किसानों को अपने अनाज़ को वैश्विक व्यापारियों को उनकी शर्तों पर बेचना होगा। भारत में लोगों के पास अब पर्याप्त अनाज भंडार की सुरक्षा नहीं रहेगी। पिछले दो महीनों में इन्हीं भंडारों से लाखों जिंदगियां बचाई गई हैं। एक बार जब पूरी व्यवस्था का निजीकरण हो जाएगा, तो केवल निजी कंपनियां ही भंडारण कर पाएंगी। अगर ऐसा नहीं होगा, तो भारत को अनाज़ बाहर से आयात करना होगा, जैसा पचास साल पहले किया गया था।

क्या कामग़ारों को फायदा होगा?

पिछले साल मोदी सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी। इसके ज़रिए निजी क्षेत्र को उनकी सामाजिक और आर्थिक ज़िम्मेदारियों से छूट दे दी गई। तबसे मोदी सरकार में 'व्यापार करने की सुलभता (Ease Of Doing Business)' का विचार ही केंद्र में है। तबसे निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सहायता निधि बनाने के लिए कर्ज़ में सुलभता दी गई, सिकुड़ती कॉरपोरेट कंपनियों को जनता के पैसे से खरीदा गया और लाभ देने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेचा गया। बल्कि सिर्फ़ बढावा नहीं दिया गया, निजी क्षेत्र को अर्थव्यवस्था पर कब्ज़ा करने में मदद की गई।

उन कर्मचारियों और कामग़ारों का क्या, जो अपने नियोक्ताओं को लाभ कमाकर देते हैं? श्रम कानूनों में बदलाव के ज़रिए उन्हें अपने शोषण के खिलाफ़ जो थोड़े-बहुत अधिकार मिले हुए थे, उन्हें भी खत्म कर दिया गया। काम के घंटों को बढ़ा दिया गया, वेतन तय करने वाली शर्तों को खत्म कर दिया गया और सुरक्षा के इंतज़ाम वाले प्रावधानों को कूढ़े के ढेर में डाल दिया गया। संगठित मोलभाव करने या विरोध प्रदर्शनों के अधिकारों में भयंकर कटौती कर दी गई है। इन बदलावों को भले ही राज्यों के ज़रिए लाया गया है, लेकिन यह भारतीय बुर्जुआ की मंशा वाले प्रावधान हैं, जिनका प्रतिनिधित्व वामपंथियों को छोड़कर अलग-अलग राजनीतिक दल करते हैं।

अप्रैल के अंत तक 14 करोड़ कामग़ारों और कर्मचारियों की नौकरियां जा चुकी हैं, लेकिन मोदी सरकार ने इनकी मदद के लिए कुछ नहीं किया। बल्कि ज़्यादातर श्रम कानूनों को एक बेहद तनाव वाले वक़्त में थोपा गया है।पूरी श्रमशक्ति का 27 फ़ीसदी हिस्सा बेरोज़गार है, इसे बढ़ने के लिए प्रश्रय दिया गया। क्योंकि ऐसा होने से वेतन में कमी आती है। इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि लाखों लोग सिर्फ़ अपने जिंदा रहने और किसी तरह गुजारा चलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

प्रोत्साहन पैकेज में महज़ कुछ किलो अनाज़ और चंद रुपयों की मदद देने की व्यवस्था की गई, जो ऊंट के मुंह में जीरा है। इसलिए इस पैकेज की नीतियां कामग़ारों और बेरोज़गारों को 21 वीं सदी में गुलाम बनाने पर आमादा हैं, जो उदास तो है, लेकिन उसने आत्मसमर्पण और बंधुआ होने से इंकार कर दिया है।

क्या मध्यम वर्ग को फायदा मिलेगा?

यह वह वर्ग है, जिसे मोदी सरकार के 'दबंग' और 'निर्णायक' होने से सबसे ज़्यादा मोह है। लेकिन इस वर्ग में भी लाखों नौकरियां जाने, वेतन में कमी और एक अनिश्चित भविष्य होने से तनाव है। इस दौरान घर से काम करने के विकल्प को प्रथामिकता दी जा रही है, क्योंकि इसमें नियोक्ताओं के बहुत से खर्च बच जाते हैं।अलग-अलग क्षेत्रों के निजीकरण और शिकारी विदेशी पूंजी को आमंत्रण देने से कई गलतफहमियां और विभाजन पैदा हुए हैं, जो आखिरकार ज़्यादातर लोगों को हतोत्साहित करेंगे। मौजूदा महामारी में कर्मचारियों को बिना वेतन की छुट्टी पर भेजने या नौकरियों से निकाल देने वाली जो निर्लज्जता निजी क्षेत्र ने दिखाई है, इससे उन वर्गों में भी निजीकरण से विश्वास उठ गया है, जो इसके झंडाबरदार थे।

फिर आर्थिक नीति के भी अपने प्रभाव हैं। बड़े स्तर की बेरोज़गारी, अस्थिर कीमतें, रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अचानक उछाल और विस्फोट जैसे कई प्रभाव इसी के नतीज़े हैं। इससे मोदी के नेतृत्व वाली सरकार और कठोर मध्यमवर्ग के बीच संबंध खराब हुए हैं। मध्यम वर्ग के निचले तबके का बुरी तरह मोहभंग हुआ है। यह अलग बात है कि मौजदूा चुनावी गणित और राजनीति में कई दूसरी वजहों, जैसे कमजोर विपक्ष की वजह से यह साफ नज़र नहीं आ रहे हैं।

लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की शिकारी प्रवृत्ति और प्रतिगामी सामाजिक नज़रिये से लोगों का एक बड़ा वर्ग दूर हुआ है। सरकार इस महामारी का इस्तेमाल बड़े उद्यमियों, व्यापारियों और विदेशी हितों की पकड़ मजबूत करवाने के लिए कर रही है। इससे मोदी का सामाजिक समर्थन भी खोखला हो रहा है। कोरोना महामारी के आने वाले दिनों में यह ज़्यादा साफ़ होता नज़र आएगा।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

How Modi’s ‘Stimulus’ Packages Will Destroy, Not Boost, India

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Labour Laws
Economic Policies
Privatisation
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COVID-19
Lockdown Impact
Agri markets

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