NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
‘प्रतीकात्मक’ महाकुंभ के बाद विरोधियों पर चलेगा ‘बुलडोजर’?
सवाल यह है कि क्या महाकुंभ को प्रतीकात्मक बनाने की पहल कर कोई त्याग किया गया है? इसे शुरू ही क्यों किया गया कोरोना संकट के दौर में?
प्रेम कुमार
18 Apr 2021
‘प्रतीकात्मक’ महाकुंभ के बाद विरोधियों पर चलेगा ‘बुलडोजर’?
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

मुंबई के मेयर कह रहे हैं कि कुंभ से लौट रहे श्रद्धालु कोरोना ऐसे बांट रहे हैं जैसे प्रसाद। 17 दिन में दो करोड़ डुबकियां लगी हैं। इतने सारे लोग अगर कोरोना का प्रसाद बांट रहे हैं देश में, तो समझिए स्थिति कितनी गंभीर होने वाली है। 17 दिन बाद महाकुंभ प्रतीकात्मक होगा! क्या इस महाकुंभ से निकल रहा कोरोना का प्रसाद भी प्रतीकात्मक रह सकेगा?

जान बड़ी या आस्था? जवाब सटीक रहा। मगर, सवाल ही देर से पूछा गया। महाकुंभ के आयोजक, साधु-संत और इस पूरे आयोजन को सक्रिय सहयोग कर रही डबल इंजन की सरकारें 17 दिन तक क्यों इस सवाल से कतरा रही थी- जान बड़ी या आस्था?

लोक नहीं तो लोकतंत्र कैसे?

पश्चिम बंगाल में चुनावी महाकुंभ को लेकर अब भी सरकार, संवैधानिक संस्था और राजनीतिक दलों का रुख बदला नहीं है! लोकतंत्र में आस्था के नाम पर यहां जान जोखिम में डाली जा रही है। यह सोचने की जरूरत किन्हीं को दिखाई नहीं दे रही कि ‘लोक’ के बिना ‘लोकतंत्र’ कैसे संभव है!

जबसे प्रधानमंत्री ने साधु-संतों से बात कर महाकुंभ को प्रतीकात्मक बनाने को कहा है तभी से नया नैरेटिव गढ़ा जाना शुरू हो चुका है- साधुओं से सीख लें। कोरोना से लड़ें। जब साधु महाकुंभ छोड़ सकते हैं तो आप क्या आंदोलन नहीं छोड़ सकते?

नमाज़ियों पर भी होगा ‘प्रतीकात्मक’ प्रयोग?

मस्जिदों में नमाज पढ़ने वालों से भी ऐसे ही सवाल पूछे जा सकते हैं। सत्ता के सामन कैमरे भी मनपसंद ‘मुजरा’ दिखा सकती है और हर शुक्रवार मस्जिद के सामने कैमरे लगा सकती है। तभी तो बताया जा सकेगा कि साधु कितने त्यागी हैं कि महाकुंभ छोड़ सकते हैं लेकिन दूसरे नहीं।

राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शनों को भी कोरोना के नाम पर दबाए जाने के वाकये सामने आ सकते हैं। किसान-मजदूर अब विरोध प्रदर्शन की ना सोचें। आगे लॉकडाउन की घोषणा हो तो पैदल चलना एक बार फिर सत्ता की नाफरमानी या फिर कोरोना नियमों का उल्लंघन होगा।

मेहनतकश वर्ग से भी कराया जाएगा ‘त्याग’?

फैक्ट्रियां बंद हों, तनख्वाह रोक दी जाए या नौकरी से हटा दिए जाएं, आपको विरोध करना नहीं है क्योंकि देश कोरोना के गंभीर संकट से गुजर रहा है। विरोध का मतलब कोरोना से संघर्ष को कमजोर करना होगा। जब साधु महाकुंभ छोड़ सकते हैं तो क्या आप संकटकाल में अपने हक नहीं छोड़ सकते?

सवाल यह है कि क्या महाकुंभ को प्रतीकात्मक बनाने की पहल कर कोई त्याग किया गया है? इसे शुरू ही क्यों किया गया कोरोना संकट के दौर में? जब रेलवे स्पेशल ट्रेनें चला रहा था, हवाई जहाजों से हरिद्वार के लिए स्पेशल फ्लाइट शुरू किए जा रहे थे, सरकारें महाकुंभ में शिरकत के लिए इश्तेहार दे रही थीं, तब क्या यह इल्म नहीं था कि देश कोरोना की वजह से गंभीर संकट के दौर में गुजर रहा है?

प्रतीकात्मक प्रयोग के पीछे मौत का डर या त्याग?

जब बड़े-बड़े साधुओं की मौत होने लगी, खुद अखाड़ा परिषद के प्रमुख कोरोना की चपेट में आ गये और हर दिन सैकड़ों की संख्या में साधु कोरोना संक्रमित पाए जाने लगे तो मौत के डर ने एक बेचैनी पैदा कर दी। इसी बेचैनी को ‘त्याग’ का नाम दिया गया। प्रतीकात्मक महाकुंभ की अवधारणा के साथ महाकुंभ से बच निकलने का मार्ग प्रशस्त किया गया। 

यह भी तय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘उद्धारक’ के तौर पर पेश किया जाएगा। मगर, यही ‘उद्धारक’ वास्तव में पश्चिम बंगाल में चुनावी महाकुंभ का ‘महामंडलेश्वर’ है। बंगाल में एक दिन में कई-कई रैलियां करते हैं पीएम मोदी। सामने लाखों ‘श्रद्धालु’ होते हैं। कोरोना संक्रमण के लिहाज से बिल्कुल नंग-धड़ंग यानी न मास्क और न ही दो गज की दूरी। सैनिटाइजर आदि का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कभी नरेंद्र मोदी ने इस ओर लोगों का ध्यान दिलाने की जरूरत नहीं समझी। यहां जान से ज्यादा ‘लोकतंत्र की चिंता’ करते दिखे मोदी।

बंगाल में रैली, शेष भारत में दो गज की दूरी?

लोकतंत्र ‘लोक’ की चिंता न करे या फिर धर्म और उसके अनुष्ठान अपने अनुयायियों की बीमारी और मौत का कारण हो जाए- क्या कभी ऐसा हो सकता है? बिल्कुल हो सकता है- मोदी है तो मुमकिन है। लोकतंत्र में ‘लोक’ से अधिक ‘तंत्र’ की रक्षा के लिए चुनाव जरूरी है और इसलिए रैलियां-रोड शो भी। बंगाल में रैली, शेष भारत में दो गज की दूरी दोनों एक साथ संभव हैं!

महाकुंभ के प्रतीकात्मक होने से पहले 16 अप्रैल को चुनाव आयोग को भी कोरोना की सुध हो आयी। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अब शाम 7 बजे के बाद से सुबह 10 बजे तक नहीं हुआ करेगा। यह बहुत कुछ कोरोना काल में ‘नाइट कर्फ्यू’ की तरह है। यह भी प्रतीकात्मक चुनावी महाकुंभ ही लगता है। इससे न चुनावी रैली रुकती है, न रोड शो। और, न ही भीड़-भाड़ वाले चुनावी अभियान। उल्टे चुनाव आयोग के इस फैसले से उन लोगों को रैली-रोड शो करने में मदद मिलेगी जो सुबह 10 बजे तक दिल्ली से कोलकाता पहुंचेंगे और शाम 7 बजे की फ्लाइट से दिल्ली लौट आएंगे। क्या ऐसे ‘चुनावी कर्फ्यू’ से कोरोना कम होगा या फिर इससे कोरोना संक्रमण और बढ़ जाएगा?

चुनाव आयोग को भी ‘प्रतीकात्मक नसीहत’ देंगे मोदी?

संभव है कि आगे पीएम नरेंद्र मोदी चुनाव आयोग को भी आईना दिखाने का काम करें। हालांकि आईने में चुनाव आयोग के साथ-साथ खुद उनका भी चेहरा साझा ही दिखेगा, लेकिन वे दिखाएं और बताएंगे सिर्फ आयोग का चेहरा। पीएम मोदी कह सकते हैं कि बगैर भीड़ के वे रैली को संबोधित करेंगे और उसका सीधा प्रसारण लोग अपने-अपने घरों से सोशल मीडिया या मुख्य धारा की मीडिया में देखें। कहने की जरूरत नहीं कि वे यह भी कहेंगे कि इससे कोरोना के खिलाफ लड़ाई मजबूत होगी।

बंगाल में 180 सीटों के लिए वोट डाले जा चुके हैं। आगे के चुनावों में वैसे भी बीजेपी की अधिक दाल गलने वाली नहीं है। ऐसे में महाकुंभ के साधुओं की तरह ‘त्याग’ भी दिखाया जा सकता है। चाहे महाकुंभ हो या पश्चिम बंगाल का चुनाव दोनों ही पूरी तैयारी के साथ शुरू की गयी। मगर, दोनों ही आयोजनों में कोविड नियमों को ताक पर रखा गया। अब ‘प्रतीकात्मक’ कहकर शर्मनाक करतूतों से बचने का रास्ता निकाला जा रहा है। इसके साथ ही अपने विरोधियों पर इसी रास्ते से बुलडोजर चलाने की भी तैयारी कर ली गयी लगती है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

KUMBH
COVID-19
Symbolic Kumbh
Narendra modi

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • rich poor
    अजय कुमार
    दुनिया के 100 से अधिक करोड़पतियों-अरबपतियों ने लिखी खुली चिट्ठी, कहा- अपने हिस्से का टैक्स नहीं चुका रहे अमीर! 
    20 Jan 2022
    100 से अधिक करोड़पतियों और अरबपतियों की देश के नेताओं और कारोबारियों के नाम खुली चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि बेकार टैक्स प्रणाली की वजह से भयंकर आर्थिक गैर बराबरी पनप रही है।
  • Elections
    सोनिया यादव
    यूपी: क्या इस बार 'मंडल बनाम कमंडल' के राजनीतिक असर की काट है बीजेपी के पास?
    20 Jan 2022
    1993 में मुलायम सिंह यादव व कांशीराम ने मिलकर रामरथ पर सवार बीजेपी को सत्ता में आने से रोका था। हालांकि इस बार की स्थितियां अलग हैं और बीजेपी की सामाजिक भागीदारी की तस्वीर भी। ऐसे में इस फार्मूले का…
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे में पहले आरोपी को सज़ा, जेएनयू में उठी GSCASH की मांग और अन्य ख़बरें
    20 Jan 2022
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी दिल्ली दंगों में हुई पहले आरोपी को सज़ा, जेएनयू में उठी GSCASH की मांग और अन्य ख़बरों पर।
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अखिलेश-भाजपा के लिए क्या है संकेत ?
    20 Jan 2022
    बोल की लब आज़ाद हैं तेरे के इस अंक में अभिसार शर्मा आज बात कर रहे हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसको फायदा होगा और किसको नुकसान और होने वाले चुनाव में किसकी अहम भूमिका होगी ?
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या महानगरों में 'ओमिक्रॉन' के मामलों में गिरावट आ रही है?
    20 Jan 2022
    आज हम डॉ. सत्यजीत के साथ कुछ महानगरों में ओमिक्रॉन संक्रमण के कम होते आँकड़ों के बारे में समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही हम यह भी समझेंगे कि क्या टीकाकरण के कारण कोविड के गम्भीर मामलों में गिरावट आ…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License