NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लाल क़िले पर गुरु परब मनाने की मोदी नीति के पीछे की राजनीति क्या है? 
प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर जी के जन्मदिवस पर भाषण दिया। इस भाषण के कई गहरे मायने निकाले जा रहे हैं।
परमजीत सिंह जज
25 Apr 2022
modi
नई दिल्ली, 21 अप्रैल (एएनआइ)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री गुरु तेगबहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर गुरुवार को लाल किले में उनकी पूजा-अर्चना की। 

प्रतीकों और रूपकों के उपयोग और राष्ट्र को संबोधित करने के अवसरों को चुनने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना भारत के अन्य किसी भी नये प्रधानमंत्री से नहीं की जा सकती है। इसके हाल-फिलहाल के दो उदाहरण हैं- गुरु नानक देव जी के जन्मदिन पर कृषि कानूनों को निरस्त करना और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के मौके पर दिया गया उनका भाषण। हम यह भी देखते हैं कि मोदी अपनी पार्टी के चुनाव अभियानों के दौरान कुछ कैचवर्ड का उपयोग करते हैं। इस क्रम में "शमशान घाट-कब्रिस्तान" का दिया गया उनका बयान तुरंत दिमाग में आता है। अब, उन्होंने लाल किले से सिखों के नौवें गुरु गुरु तेगबहादुर जी के जन्मदिवस पर भाषण दिया है। 

यह दिन सिखों के लिए बहुत पवित्र है, और मुगल साम्राज्य की शाही शक्ति के प्रतीक के रूप में लाल किला लगभग सिखों के मन में स्थायी रूप से अंकित है। दूसरे शब्दों में, यह दमन का प्रतीक है, क्योंकि यहीं से मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1675 में नौवें गुरु को फांसी देने का आदेश दिया था। हालांकि, आज, लाल किला उत्तर-औपनिवेशिक भारत की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है, जहां से देश के प्रधानमंत्री हर साल 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित करते हैं। 

इस एक शुभ दिन पर प्रधानमंत्री के दिए गए भाषण का विश्लेषण करने से पहले, नौवें सिख गुरु और सिख पंथ के बाद के विकास के प्रति दी गई उनकी शहादत की अहमियत को समझ लेना आवश्यक है। उनका जन्म 21 अप्रैल 1622 को अमृतसर में हुआ था औऱ वे छठे सिख गुरु हरगोबिंद जी के पांच पुत्रों में सबसे कम उम्र के थे। उनके जीवनीकारों ने लिखा है वे अपने समय के दो उच्च सम्मानित सिख भाई बुद्ध और भाई गुरदास द्वारा पढ़ाए गए थे। उन्हें एक रहस्यमय और चिंतनशील तनाव रहता था, जो बाद में उनकी कविता और आचरण में उभरा। 

गुरु तेग बहादुर एक प्रशिक्षित योद्धा भी थे और उन्होंने 13 साल की उम्र में करतारपुर की लड़ाई में भाग लिया था, जिसके बाद छठे गुरु ने उन्हें “तेग बहादुर”नाम दिया, तथापि, रब के प्रति रहस्यमय तनाव और भक्‍ति उसके बाद के उनके जीवन पर हावी हो गई, और गुर गद्दी के उत्तराधिकार के लिए किसी भी संघर्ष में उसकी भागीदारी का कोई प्रमाण नहीं है। अपने महान गुणों के कारण, गुरु होने का मतलब बताते हुए, वे नौवें गुरु बन गए। कहते हैं कि उनके बारे में आठवें गुरु ने ही गुरु तेग बहादुर जी की तरफ संकेत करते हुए कहा था, उनके रूप में नए गुरु मिल गए हैं और वे ही सिखों के नौवें गुरु होंगे, जिसके बाद आठवें गुरु का 1664 में दिल्ली में निधन हो गया। इसके बाद, गुरु गद्दी को प्राप्त करने के लिए संघर्ष तीव्र हो गया, और अपने जीवनकाल में इसकी रोकथाम के एक विफल प्रयास के बाद, गुरु तेग बहादुर बाबा बाकला को छोड़ दिया और दसवें गुरु के जन्मस्थान पटना चले गए। अंत में, वे आनंदपुर साहिब में बस गए, और 1675 में, उन्हें सम्राट औरंगजेब के आदेश पर प्राणदंड दिया गया। 

गुरु तेग बहादुर की शहादत की परिस्थितियों को विद्वानों और इतिहासकारों ने अलग-अलग तरीकों से देखा है। हालांकि यह एक तथ्य है कि औरंगजेब ने उन्हें प्राणदंड का आदेश (फतवा) दिया था। सिख धर्म के प्रसिद्ध इतिहासकार लुइस फेनेच अपनी पुस्तक शहीद इन द सिख ट्रेडिशन में लिखते हैं कि भले ही पांचवें गुरु भी शहीद हुए हों, लेकिन यह गुरु तेग बहादुर जी की शहादत है, जो सिख इतिहास में सबसे अहम स्थान रखती है। फेनच बताते हैं कि इसका एक संभावित कारण यह है कि 1699 में खालसा पंथ का निर्माण हुआ। 

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की वजह विवाद में उलझी हुई है- केवल इतिहासकारों के लिए ही नहीं, बल्कि सिख प्रतिष्ठान द्वारा दिए गए कारणों की वजहों से भी ऐसा हुआ है। यदि किसी हुकूमत के नजरिये का कड़ाई से पालन नहीं किया जाता है, या उसका उल्लंघन किया जाता है, तो यह उसके विरुद्ध द्रोह माना जाता है। इस बारे में एक आधिकारिक स्पष्टीकरण यह है कि कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल आनंदपुर साहिब पहुंचा था और उसने खुद को जबरिया इस्लाम कबूल कराने का दुःख व्यक्त किया था। गुरु गुरुतेग बहादुर ने उनका बचाव किया था और जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप उन्हें अंततः 11 नवंबर 1675 को दिल्ली में मृत्युदंड दिया गया था।

यही गुरुतेग बहादुर के जीवन का संक्षिप्त वृतांत है, जो उनकी महत्ता को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करता है, जो न केवल अपने विश्वास की रक्षा के लिए बल्कि दूसरों के विश्वास की हिफाजत के लिए अपने जीवन का स्वेच्छा से बलिदान कर दिया था। सिख परंपरा का सबसे उल्लेखनीय पहलू किसी के प्रति बिना किसी घृणा और दुर्भावना के अपने जीवन का बलिदान करना है। इस प्रकार, उनके गुरु काल में हम कहीं भी नहीं पाते कि सिक्खों ने इस्लाम को अपने दुश्मन के रूप में पहचाना है। उन्होंने एक तरफ राज्य और उसके तंत्र, और दूसरी ओर, लोगों को रखा चाहे, वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों। दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी का भी हिंदुओं और मुसलमानों के साथ समान व्यवहार करने के कई उदाहरण हैं। 

उपर्युक्त संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण के आलोक में, 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्र के नाम दिए गए संबोधन के संबंध में 19 अप्रैल, 2022 को इंडियन एक्सप्रेस अखबार में प्रकाशित केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी. किशन रेड्डी का पत्र अत्यधिक परेशान करने वाला है। रेड्डी ने लिखा है कि, "गुरु तेग बहादुर धार्मिक आस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करके मुगलों के अत्याचारों के खिलाफ खड़े हो गए। उन्होंने सिख और हिंदुओं के हक के लिए संघर्ष किया। धर्मांतरण के लिए मुगलों द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित किए जाने के बावजूद, वे अपनी मान्यताओं पर अडिग रहे और अपना जीवन देने का और हुकूमत के प्रति अपना विश्वास न जताने का फैसला किया... उन्होंने कश्मीरी पंडितों के जबरन धर्मांतरण के खिलाफ लड़ाई लड़ी और इससे मुगलों को झटका लगा।”

इसके बाद 20 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सिख संगत से बात की... उन्होंने रेड्डी के बयान को लगभग दोहराया और कहा कि सिख गुरुओं की कहानी भारत के बच्चे-बच्चे को बताई जाएगी। उन्होंने कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा का उल्लेख किया, जिन्होंने औरंगजेब के खिलाफ उनकी मदद मांगी और यह स्पष्ट कर दिया कि गुरु गुरु तेग बहादुर ने हिंदुओं और सिखों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। 

अमित शाह का दस मिनट का भाषण सिख परंपरा की स्थापना पर आधारित था, जिस पर सभी इतिहासकार सहमत नहीं हो सकते हैं। इससे संकेत मिलता है कि भाजपा सिख धर्म और सिखों को लेकर अपने पुराने नजरिए को मुसलमानों के खिलाफ हिंदू धर्म का संरक्षक मान रही है और वह चाहती है कि दोनों धर्म के सदस्य उसे एक समान दुश्मन समझें। यह कुछ ऐसा है जिसे सिख गुरुओं ने कभी समर्थन नहीं दिया, इस तथ्य के बावजूद कि गुरु गुरु तेग बहादुर ने अपना जीवन बलिदान कर दिया और उन्हें मृत्युदंड देने का आदेश तत्कालीन मुगल सम्राट औरंगजेब ने दिया था। 

अब हम 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी के दिए गए भाषण पर विचार करते हैं। उन्होंने अवसर के अनुसार और स्पष्ट रूप से बात की। हालांकि, सिख इतिहास में नौवें गुरु के स्थान की सटीक पहचान करने के बाद, उन्होंने उल्लेख किया कि गुरु ने “रिलिजिएस फैंटिसिज्म” (धार्मिक कट्टरता) जवाब कैसे दिया। उन्होंने इस प्रसंग में औरंगजेब का उल्लेख किया, हालांकि यह इंगित किए बिना कि उनका मतलब किसी भी धार्मिक समुदाय को लक्षित करना था। वैसे कई बार, प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के सदस्यों ने औरंगजेब को एक क्रूर शासक के रूप में चित्रित किया है, और अपने प्रतिद्वंद्वियों पर मुस्लिम समर्थक होने, और इसलिए उनके विरुद्ध ‘औरंगजेब' समर्थक होने का आरोप चस्पाँ किया है। इसका मतलब यह भी है कि उन्हें विशेष रूप से यह उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है कि औरंगजेब एक मुसलमान था। उन्हें एक संदेश देने के लिए औरंगजेब के संदर्भ में सिर्फ धार्मिक कट्टरता का उल्लेख करने भर की जरूरत है। 

इसके अलावा,प्रधानमंत्री ने कहा कि सिखों की पवित्र पुस्तक श्री गुरु ग्रंथ साहिब अनेकता में एकता का प्रतीक है। उन्होंने उल्लेख किया कि उनकी सरकार ने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं और उनसे संबंधित भविष्य की योजनाओं के लिए क्या-क्या काम किया है। प्रधानमंत्री के भाषण में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 का हवाला देना। उन्होंने कहा कि यह हो जाने के बाद उन सिखों को भारत में नागरिक के तौर पर समायोजित किया जा सकता है,जो अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत कायम होने के बाद विस्थापित हो गए थे। हालांकि अफगानिस्तान से आए सिखों को सीएए के बगैर भी भारत में ठहराया जा सकता था। आखिरकार, नया नागरिकता संशोधन कानून केवल मुसलमानों को ही भारत से बाहर करता है। इसलिए प्रधानमंत्री का यह भाषण यह सिख और मुस्लिम समुदायों को विभाजित करने का एक स्पष्ट संकेत है, एक ऐसा विभाजन जिसे सिख परंपरा में कोई मान्यता नहीं है, जिसका वे लाल किले में उत्सव मना रहे थे। प्रधानमंत्री उस श्रद्धा का उल्लेख करना भी नहीं भूले जिसके साथ सिखों की पवित्र पुस्तक अफगानिस्तान से भारत लाई गई थी। 

प्रधानमंत्री के भाषण को कई नजरिये से देखा जा सकता है लेकिन इसकी दो व्याख्या संभव हैं। पहला, सिखों के नौवें गुरु गुरुतेग बहादुर की जयंती मनाने का मकसद सिख समुदाय को उनके वोट पाने के लिए प्रसन्न करना था लेकिन यह व्याख्या संदर्भ से बाहर लगती है। इसकी दूसरी व्याख्या यह हो सकती है कि इसका मकसद सिखों को याद दिलाना हो कि उन्हें अपने हित के लिए देश के बहुसंख्यक समुदाय के साथ मिल कर रहना चाहिए। यह वैकल्पिक व्याख्या इस मायने में अधिक मुमकिन है कि सिख समुदाय जिसकी देश में कुल आबादी महज 3 फीसदी है, वह वोटों के मामले में ऐसी ताकत नहीं हैं जबकि सिख वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, अगर वे भाजपा के साथ गठबंधन कर लेते हैं। 

तो गुरु गुरुतेग बहादुर की जयंती का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व यह था कि भारत सरकार ने इसे उस स्थान पर आयोजित किया था, जो सत्ता की उस सीट का प्रतीक था जिसने गुरु तेग बहादुर जी को मृत्युदंड देने का फरमान दिया था-जिसकी तरफ संकेत देने के लिए प्रधानमंत्री ने दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के सहयोग से इसका आयोजन किया था। डीजीएमसी के साथ यह सहयोग होना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह इतिहास के सिख सत्ता प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है, जिसका भाजपा और प्रधानमंत्री अपने तरीके से और अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करना चाहते हैं। 

(लेखक गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर में समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं और इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।) 

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:

Red Fort, Guru Purab, and Politics of Celebrating Sikh Faith

Sikh history
Guru Tegh Bahadur
Red Fort speech
CAA
Narendra modi
Amit Shah
G Kishan Reddy
Red Fort

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 7,554 नए मामले, 223 मरीज़ों की मौत
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 7,554 नए मामले, 223 मरीज़ों की मौत
    02 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.20 फ़ीसदी यानी 85 हज़ार 680 हो गयी है।
  • एम. के. भद्रकुमार
    यूक्रेन युद्ध ने यूरोपियन यूनियन और अमेरिका को ईरान सौदे पर सोचने को मजबूर किया
    02 Mar 2022
    क्या नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) के विस्तार पर अमेरिका-रूस टकराव और यूक्रेन के आसपास बने हालात वियना में चल रही ईरान परमाणु वार्ता को पटरी से उतार देगी?
  • ukraine
    एपी/भाषा
    रूस-यूक्रेन युद्ध अपडेट: कीव के मुख्य टीवी टावर पर बमबारी; सोवियत संघ का हिस्सा रहे राष्ट्रों से दूर रहे पश्चिम, रूस की चेतावनी
    02 Mar 2022
    रूसी बलों ने मंगलवार को यूक्रेन के घनी आबादी वाले शहरी इलाकों पर हमले तेज करते हुए यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर के मध्य स्थित एक मुख्य चौराहे और कीव के मुख्य टीवी टावर पर बमबारी की। वहीं भारत ने…
  • बिहार : सीटेट-बीटेट पास अभ्यर्थी सातवें चरण की बहाली को लेकर करेंगे आंदोलन
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : सीटेट-बीटेट पास अभ्यर्थी सातवें चरण की बहाली को लेकर करेंगे आंदोलन
    02 Mar 2022
    पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से सीपीआई माले विधायक संदीप सौरभ ने कहा कि वह सीटेट और बीटेटट उत्तीर्ण सभी अभ्यर्तियों के लिए सातवें चरण की बहाली के लिए 2014-21 तक सभी रिक्तियों को जोड़कर मार्च महीने में…
  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: पश्चिम से चली बदलाव की हवा के पूर्वांचल में आंधी में तब्दील होने के आसार
    02 Mar 2022
    वैसे तो हर इलाके की और हर फेज के चुनाव की अपनी विशिष्ठतायें हैं, लेकिन सच यह है कि इस चुनाव में-किसानों की तबाही, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, बुलडोजर राज का आतंक- कुछ ऐसे कॉमन मुद्दे उभर गए हैं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License