NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मखौल बनाना काफ़ी नहीं, झूठ के सांड़ को सींग से पकड़ना होगा!
असल मुद्दा इस झूठ की मारकता और उसके असर की सांघातिकता है। इसे महज़ मज़ाक बनाकर या कुछ समझदारों के बीच बैठ, झूठ बोलने वाले की खिल्ली उड़ाकर या उसकी लफ़्फ़ाज़ी और थेथरई पर अपना सर पीटकर, अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसके बहुत खतरनाक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। 
बादल सरोज
22 Jul 2021
Modi and Shah

"ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई" सरकार ने संसद में सीना तानकर बोला। "पेगासस से जासूसी! हमे नहीं पता कब, किसने, क्यों और किसकी कराई," सरकार का हर बड़कू और छुटकू नेता यही जवाब रटने में लगा है। इस जासूसी के कालखण्ड में सूचना प्रौद्योगिकी के मंत्री रहे नकफुले जी ने कहा कि "आतंकवाद से बचाव के लिए किये गए उपायों पर संसद में चर्चा करना देशहित में नहीं!" मतलब? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज, खुद मोदी के मंत्री, दो चार महामहिम और गोगोई पर यौन दुराचरण का आरोप लगाने वाली स्त्री आतंकवादी मामलों में संदिग्ध थे?

आप चौंकते रहिये इन झूठों पर - उन्हें इनकी कारगरता पर पक्का भरोसा है। तभी तो ज़रा सी बारिश में ही घुटनों-घुटनों डूबी वाराणसी में मोदी जी "यूपी के यशस्वी, ऊर्जावान और कर्मठ मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी" का गुणगान और स्तुति करते हुए उनकी ऐसी-ऐसी "उपलब्धियां" गिना रहे थे कि बेचारे बाबा जी खुद शर्मा के लालमुखी हो जाएं। 

झूठ की पैदावार अपरम्पार है; ताज्जुब नहीं होगा यदि इन हजार-आठ सौ शब्दों के लिखे जाने के दौरान ही दर्जन भर नये झूठों की खरपतवार उग आये।

अमरीका ने जिस तरह ट्रम्प के झूठों की फेहरिश्त बनाई थी, उस तरह की कोशिश यदि इनके सर्वेसर्वा मोदी जी और उनके वैचारिक कुल कुटुम्ब के मामले में की जाए तो एक भरापूरा विश्वकोश— एनसाइक्लोपीडिया— तैयार किया जा सकता है। मोदी जी का एक बड़ा योगदान झूठ की श्रेणियों में एक नयी श्रेणी जोड़ने का है। प्रचलित मुहावरों में अब तक झूठ की तीन बड़ी श्रेणियां हुआ करती थीं; झूठ, सफ़ेद झूठ और आंकड़ों का झूठ- सत्ता पर बैठे मौजूदा गिरोह ने चौथी और नयी श्रेणी जोड़ी है; मोदी झूठ । जब भी सम्बोधन करते हैं तो बिना कोई झूठ बोले उसे खत्म नहीं करते हैं। मौके की नजाकत को देखकर उसका आकार प्रकार भले कम ज्यादा या ज़्यादा ही ज्यादा हो जाये मगर झूठ के बिना उन्होंने आज तक कोई भी भाषण नहीं दिया। वैसे असल में तो मुद्दा यह नहीं है। 

मुद्दा यह भी नहीं है कि कोई इतने धड़ल्ले से झूठ कैसे बोल सकता है। वह झूठों और अर्ध झूठों की नयी नयी किस्मों की खोज में सिद्धहस्त और माहिर हैं। दुनिया में उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता है। अक्सर इनके इस हुनर की तुलना गोयबल्स जैसे इनके उस्तादों से की जाती रही है- मगर अब गुरु गुड़ ही रह गए चेले शक्कर हो गए हैं। 

असल मुद्दा इस झूठ की मारकता और उसके असर की सांघातिकता है। इसे महज मजाक बनाकर या कुछ समझदारों के बीच बैठ, झूठ बोलने वाले की खिल्ली उड़ाकर या उसकी लफ़्फ़ाज़ी और थेथरई पर अपना सर पीटकर, अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसके बहुत खतरनाक प्रभाव होते हैं। 

कहते हैं कि सच जब तक अपने जूतों के फीते ही बांध रहा होता है तब तक झूठ आधी दुनिया तय कर चुका होता है। ख़तरा सिर्फ यह नहीं है कि कुछ समय के लिए लोग झूठ को ही सच समझ लेते हैं। ज्यादा बड़ा खतरा यह है कि इसकी बारम्बारता और निरंतरता के चलते धीरे-धीरे लोग झूठ की पहचान करने का शऊर और विवेक ही खो बैठते हैं। भारतीय समाज के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है किन्तु अब तक के लिखित इतिहास में सम्पूर्ण समाज के विवेक पर झूठ का इतना तेज, सुसंगठित और सुनियोजित, चौबीस घंटा सातों दिन बिना रुके बिना थके चलने वाला हमला इसके पहले कभी नहीं हुआ। कारपोरेट के साथ साझेदारी के चलते इसकी गति और वाचालता ही नहीं संहारक रेडियोधर्मिता भी बढ़ी है और जैसा कि हिरोशिमा, नागासाकी बरास्ते भोपाल से चेर्नोबिल तक के प्रभावों में दुनिया ने देखा है; रेडियोधर्मिता जब निर्बाध गति से फैलती है तो उसके दुष्प्रभाव वर्तमान के भुक्तभोगियों तक सीमित नहीं रहते। इसके नतीजे अगली कुछ पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ते हैं; लम्हों की खता के लिए सदियों को सजा सहनी पड़ती है। 

हाल के दिनों में इस झूठ को अत्यंत व्यवस्थित रूप से देश भर में फैलाने के लिए सिर्फ गोदी मीडिया को ही भेड़िया नहीं बनाया गया, आईटी सैल नाम का सर्वभक्षी डायनॉसोरास भी पालपोस कर बड़ा किया गया। गली मोहल्ले और गांव बस्ती तक पूजास्थलों से लेकर संस्थानों तक विराजे निकर से फुलपैंट हुए लोग इस झूठ की होम डिलीवरी के काम में मुस्तैदी से डटे हैं। यह मानकर चलना कि इस सबका कोई असर नहीं होता और अंतिम विजय तो सत्य की होगी, यह अपने आपको धोखा देना है। जहर का असर बहुत धीमा होता है। यह तो विषाक्तता की जबर डोज है; इसका असर होना था और हुआ है। इस झूठे और गढ़े हुए नैरेटिव ने असली मुद्दों को पीछे धकेला है। जनता के बड़े हिस्से, मध्यमवर्गीय तबकों को खासकर, विवेकहीन बनाया है। सामाजिक सरोकारों के मायने और मानवीय मूल्य तथा संवेदनाएं यहां तक बदल दी कि इन्ही शासकों की नीतियों से बर्बादी और विनाश झेल रहे उत्पीड़ितों के हिस्से भी इस सत्ता समूह के झूठे नैरेटिव के समूह गान के कोरस का हिस्सा बना चुके हैं। 

इसे किसी शायर के कलम "दोपहर तक बिक गया बाज़ार का हर एक झूठ और मैं एक सच को लेकर शाम तक बैठा रहा" जैसी नियति मानकर चलना कतई ठीक नहीं होगा। इसका मुकाबला करना होगा - पूरी शिद्दत और जिद के साथ झूठ और कुत्सा के इस सांड़ को पूंछ से नहीं बल्कि सींगों से पकड़ना होगा। सिर्फ खंडन करने से यह काम नहीं होगा - सिर्फ डीटॉक्सीफिकेशन करना काफी नहीं होगा। खंडन के साथ उन मूल्यों और सरोकारों का मंडन भी करना होगा जिनसे विवेक की बहाली होती है। समझने और विश्लेषण करने की प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित होती है। यह काम अलग से फुरसत में किया जाने वाला काम नहीं है। यह प्राथमिकता से और साथ-साथ किया जाने वाला काम है। 

क्या इसे किया जा सकता है? 

निस्संदेह किया जा सकता है। झूठ की महाकायता, कारपोरेटजीविता के चलते उसकी बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्य का भी मुकाबला संभव है। जिस तरह पूंजी के सर्वग्रासी सर्वनाशी केन्द्रीकरण का मुकाबला मेहनतकश जनता की बिखरी और विभाजित, असंबद्ध और कमजोर दिखती अनेकानेक धाराओं को आपस में संयुक्त करके किया जाता है वैसे ही इस कार्पोरेटी हिन्दुत्व के झूठ की अश्वमेध यात्रा के घोड़ों को नाथा जा सकता है। इतिहास में ऐसा हुआ है। यह कहानी भर नहीं है कि एक नादान बच्चा तक राजा को नंगा साबित कर सकता है। इस प्रसंग में सिर्फ दो ही उदाहरण काफी हैं; सत्तर के दशक में जब भारतीय लोकतंत्र पर पहला बड़ा ग्रहण पड़ा था तब बाकी सब कुछ के साथ छोटी छोटी पत्रिकाओं ने उसे खण्डित कर विमर्श का मुख मोड़ा था। इमर्जेन्सी के काल में हाथ से लिखकर साइक्लोस्टाइल कराये गए पर्चों ने सन्नाटा तोड़ा था। अस्सी और नब्बै के दशक में जब धर्मान्धता की चादर ओढ़ कर साम्प्रदायिकता की विषबेल पनपी थी तब बाकी सबके अलावा सहमत जैसे संगठनों ने उसकी बढ़त का प्रतिवाद करने में अहम भूमिका निभाई थी। इन दिनों, जिस जगह आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं उस सहित अनेक वेबसाइट्स खण्डन-मण्डन का यही काम कर रहे हैं। 

भविष्य में भी ऐसा होगा, मगर अपने आप नहीं होगा। करना पड़ेगा। 

हाल के दिनों में, खासकर पिछले 8 महीनो में किसान आंदोलन ने इसे बहुत खूबी से किया है। मजदूरों, खेत मजदूरों सहित मेहनतकश जनता के बाकी हिस्सों को भी इस किसान आंदोलन ने ऊर्जा दी है। उन्हें आपस में जोड़कर ऊर्जापुंज बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं। किन्तु सिर्फ इतना पर्याप्त नहीं है। इसे और तेज तथा विकेन्द्रित करने की जरूरत है - ख़ुशी की बात है कि छात्र, युवा, महिला और बौद्धिक समुदायों के एक बड़े हिस्से ने रणभूमि में हुए इस बदलाव का संज्ञान लिया है और उसके मुताबिक़ अपनी जद्दोजहद को भी अद्यतन किया है। उसकी तासीर निखारी है, तेवर बदले हैं। 

सच है कि झूठ के पांव नहीं होते मगर ज्यादा बड़ा सच यह है कि बड़े से बड़ा झूठ भी रोशनी की छोटी से छोटी किरण से घबराता है। तीली सुलगाइये, शमा जलाइये, जुगनू बनिये, अंधेरा भाग खड़ा होगा। 

Coronavirus
Lack of oxygen
policies Failure
failure of BJP
Narendra modi
Amit Shah
Modi government
Pegasus

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • Refugees
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    अगर सभी शरणार्थी एक देश में रह रहे होते, तो वह देश दुनिया का 17वाँ सबसे बड़ा देश होता
    22 Oct 2021
    अकेले संयुक्त राष्ट्र की गणना के हिसाब से, इस समय लगभग 8.3 करोड़ लोग विस्थापित हैं, और यदि ये सभी विस्थापित एक ही स्थान पर रहें तो वे आपस में मिलकर दुनिया का 17वाँ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएँगे।
  • ARYAN
    तमन्ना पंकज
    आर्यन ख़ान मामला: बेबुनियाद साज़िश वाले एंगल और ज़बरदस्त मीडिया ट्रायल के ख़तरनाक चलन की नवीनतम मिसाल
    22 Oct 2021
    यह अभियोजन है या उत्पीड़न?
  • Prime Minister's Kisan Samman Nidhi
    सरोजिनी बिष्ट
    प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से वंचित हैं आज भी बड़ी तादाद में किसान
    22 Oct 2021
    पिछले दिनों उत्तर प्रदेश से एक ऐसी खबर आई जिसने इस योजना के तहत होने वाली बड़ी धांधली को उजागर किया। हजारों ऐसे किसान चिन्हित हुए जो किसान होने के साथ-साथ या तो सरकारी नौकरी भी कर रहे थे या जिनका…
  • kisan andolan
    लाल बहादुर सिंह
    बाहरी साज़िशों और अंदरूनी चुनौतियों से जूझता किसान आंदोलन अपनी शोकांतिका (obituary) लिखने वालों को फिर निराश करेगा
    22 Oct 2021
    किसान आंदोलन के लिए यह एक कठिन दौर है। किसान नेतृत्व चिंतित, लेकिन सजग है, सूझबूझ और साहस के साथ सटीक स्टैंड लेते हुए कदम बढ़ा रहा है और मोदी-शाह के चक्रव्यूह को तोड़ कर आगे बढ़ने के लिए कृतसंकल्प है।
  • Bangladesh peace rally
    सत्यम श्रीवास्तव
    बांग्लादेश में सांप्रदायिक हिंसा और आश्वस्त करती सरकार की ज़िम्मेदार पहल
    22 Oct 2021
    हाल में जिस तरह से सांप्रदायिक हिंसा पर वहाँ की सरकार ज़िम्मेदारी से काम करते दिखलाई दे रही है उससे लगता है कि वह इस शांति और सद्भाव को बचाने की ईमानदार कोशिश कर रही है। ...अगर इस एक मामले में देखें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License