NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
नेशन फ़ॉर फार्मर्स ने शुरू की ‘किसान आयोग’ के गठन की प्रक्रिया
राष्ट्रीय किसान आयोग में कुछ प्रतिष्ठित किसान और कृषि विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसकी अंतिम संरचना को तय करने में थोड़ा समय लगेगा। दावा किया गया है कि यह देश भर के किसानों की नुमाइंदगी करेगा।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
25 Nov 2021
Kisan Commission
नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में 'नेशन फ़ॉर फार्मर्स' की प्रेस कॉन्फ्रेंस

दिल्ली: नेशन फ़ॉर फार्मर्स और अन्य संगठन व सहायक मंच ने देश में कृषि की स्थिति के मूल्यांकन और प्रकाशन के लिए एक 'किसान आयोग' के गठन की प्रक्रिया की घोषणा की है।

यह किसान आयोग कृषि और उससे सम्बद्ध सभी क्षेत्रों में किसानों व खेतिहर आबादी के विभिन्न तबकों की आय के समक्ष खड़ी चुनौतियों के मद्देनजर देश भर में विविध कृषि प्रणालियों से जुड़े संगठनों के साथ मिलकर सार्वजनिक जांच-पड़ताल की एक प्रक्रिया को चलाएगा।

यह घोषणा आज दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई। आंदोलनकारी किसानों के साथ एकजुटता जताते हुए “किसान उगाए अन्न, हम किसान के संग...वी स्टैंड विद फार्मर्स” नाम के बैनर तले की गई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पी साईनाथ, दिनेश अबरोल, अनिल चौधरी, निखिल डे, नवशरण सिंह, जगमोहन सिंह, एन डी जयप्रकाश, थॉमस फ्रांको, गोपाल कृष्ण इत्यादि शामिल थे। सभी ने तीन कृषि कानूनों की वापसी को किसानों की एक बड़ी जीत बताया और  किसान आयोग की ज़रूरत पर बल दिया गया।

किसान आयोग की ज़रूरत क्या है?

नेशन फ़ॉर फार्मर्स की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि आज किसान आयोग की इसलिए जरूरत है कि जब-जब सरकारों द्वारा गठित किये गए आयोगों की सिफारिशें सरकारों और कॉर्पोरेट ताकतों के खिलाफ गयीं, तब-तब उन सिफारिशों को दफना दिया गया। इसलिए अब किसान संगठनों के सामने यह चुनौती है कि वे विभिन्न मजदूर संगठनों, महिला संगठनों, पर्यावरण पर काम करने वाले समूहों, सामाजिक आंदोलनों और खाद्य व पोषण, समग्र स्वास्थ्य, रूपांतरकारी शिक्षा, सुरक्षित पर्यावरण, वन अधिकार व ग्रामीण उद्योगों के पुनर्नवीकरण और स्थानीय स्तर पर चल रही मूल्यवर्धित कृषि गतिविधियों से जुड़े नागरिक समूहों के नेटवर्कों तथा अधिकार केंद्रित मंचों को एक साथ लाकर एक जन-केंद्रित व्यापक मंच बनावें।

इसका उद्देश्य किसान संगठनों की सक्रिय भागीदारी से कृषि क्षेत्र में रूपांतरण की एक ठोस दृष्टि और रणनीति को विकसित करना है ताकि खाद्य विविधता, पारिस्थितिकीय सातत्य, समता व सामाजिक न्याय की राजनीति के एजेंडे को कॉर्पोरेट पूंजी से अप्रभावित रहते हुए कृषि रूपांतरण की प्रक्रिया में समाहित किया जा सके।

राष्ट्रीय किसान आयोग में कुछ प्रतिष्ठित किसान और कृषि विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसकी अंतिम संरचना को तय करने में थोड़ा समय लगेगा। यह देश भर के किसानों की नुमाइंदगी करेगा। यह आयोग राज्यस्तरीय आयोगों के गठन को भी प्रोत्साहित करेगा जो कृषि आधारित समूहों और वर्गों के बीच देश भर में अध्ययन, तथ्यान्वेषण और सुनवाई कर सकें।

डॉक्टर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग, जिसे हम स्वामीनाथन आयोग के नाम से बेहतर जानते हैं, उसका हश्र किसी से छुपा नहीं है। आज भी आयोग की अहम सिफारिशें देश भर के किसानों के बीच लोकप्रिय हैं, जिनमें से कुछ को- खासकर फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने से संबंधित- तत्काल संबोधित किए जाने की ज़रूरत है ताकि आंदोलनरत किसान अपने घर लौट सकें।

स्वामीनाथन आयोग को अपनी पांच में से पहली रिपोर्ट सरकार को जमा किए सोलह बरस हो गए। संसद में इन पर बहस करवाने की बार-बार मांग की गई लेकिन यूपीए और एनडीए दोनों की सरकारों ने इसके लिए न्यूनतम समय भी नहीं दिया। पिछले कई वर्ष से नेशन फ़ॉर फार्मर्स नाम का यह मंच मौजूदा कृषि संकट के संदर्भ में रिपोर्ट और संबंधित मसलों पर संसद में विशेष सत्र रख के बहस करवाने की मांग करता रहा है। यह कृषि संकट बीते दो दशकों में लाखों किसानों को जान ले चुका है।

स्वामीनाथन आयोग की पहली रिपोर्ट दिसंबर 2004 और आखिरी रिपोर्ट अक्टूबर 2006 में जमा की गई थी। इस देश के इतिहास में कृषि पर सबसे महत्वपूर्ण इस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा के लिए एक दिन भी नहीं दिया गया। अब जबकि सोलह साल बीत गए हैं, पुराने लंबित मुद्दों और नई परिस्थितियों में पैदा हुए नए मुद्दों (जैसे जलवायु परिवर्तन, कर्ज़ इत्यादि) ने मिलकर स्थिति को और घातक बना दिया है। इस पर नए सिरे से एक रिपोर्ट लाये जाने की ज़रूरत है।

इसी के साथ दूसरे 'सरकारी' आयोगों की निरर्थकता को भी देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की समस्याओं को समझने और समाधान सुझाने के लिए एक कमेटी गठित करने का निर्देश दिया था। इस कमेटी में कृषि कानूनों के स्वयंभू समर्थक भरे हुए थे। अब चूंकि सरकार कह रही है कि वह संसद में इन कानूनों को वापस लेगी, कमेटी के सदस्यों को उसकी अप्रासंगिकता का बोध हो गया है। इस दौरान मीडिया लगातार जोर देकर कहा रहा है कि सिर्फ कॉरपोरेट समर्थक उपायों को ही 'सुधार' कहा जा सकता है।

नेशन फ़ॉर फार्मर्स ने किसान आयोग का गठन शुरू कर दिया है। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट सरकार द्वारा नियुक्त प्रतिष्ठित विद्वानों के अध्ययन व परामर्श का परिणाम थी जिन्होंने किसानों व अन्य से व्यापक रायशुमारी की थी। किसान आयोग का गठन किसानों द्वारा किया जाएगा और उसकी कमान किसानों के हाथ में ही रहेगी, जो विशेषज्ञों के साथ परामर्श करेंगे तथा फॉलो-अप के लिए ऐसे संयुक्त मंचों का गठन करेंगे जिन्हें सरकार या अदालतें खत्म नहीं कर पाएंगी। भारतीय कृषि की समस्याओं के बारे में हमें किसानों से बेहतर आखिर कौन बता सकता है?

यह आयोग भारतीय कृषि के भीतर मौजूद संकट तथा व्यापक खेतिहर समाज के संकटों पर एक समग्र रिपोर्ट तैयार करेगा और किसानों के समूहों, कृषि-खाद्य तंत्र से सम्बद्ध गैर-कॉरपोरेट इकाइयों और नागरिक समूहों को न्यायपूर्ण पारिस्थितिकीय व सामाजिक परिवर्तनों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से एक साथ लाएगा। भारत में जिन वास्तविक सुधारों की ज़रूरत है- ऐसे सुधार जो किसानों और खेत मजदूरों के हित में हों, स्थानीय समुदायों के हित में हों न कि कॉरपोरेट हित के- उन पर यह आयोग अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करेगा।

 

kisan andolan
farmers protest
Kisan Commission
Anti Farm Laws
MSP for farmers
nation for farmers

Related Stories

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

लखीमपुर कांड की पूरी कहानी: नहीं छुप सका किसानों को रौंदने का सच- ''ये हत्या की साज़िश थी'’

किसान आंदोलन ने देश को संघर्ष ही नहीं, बल्कि सेवा का भाव भी सिखाया


बाकी खबरें

  • अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं पर एक नज़र – भाग 6
    एम. के. भद्रकुमार
    अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं पर एक नज़र – भाग 6
    24 Aug 2021
    पंजशीर घाटी के विद्रोहियों के साथ तालिबान की सुलह पूरा खेल बदल सकती है... सबसे बड़ी तस्वीर यह है कि मॉस्को काबुल में जल्द से जल्द अंतरिम सरकार के गठन को प्रोत्साहित कर रहा है।
  • आवाज उठाने की हिम्मत रखने वाली महिलाएं असुरक्षित हैं, फिर भी आवाज बुलंद कर रही हैं
    सबरंग इंडिया
    आवाज उठाने की हिम्मत रखने वाली महिलाएं असुरक्षित हैं, फिर भी आवाज बुलंद कर रही हैं
    24 Aug 2021
    बहादुर अफगान महिलाएं शिक्षा और रोजगार के मामले में समान अधिकारों की मांग करना जारी रखे नजर आती हैं, जबकि तालिबान फिर से अपना पुराना चेहरा दिखा रहा है
  • आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं 363 सांसद, विधायक, दोषसिद्धि से हो जाएंगे अयोग्य: एडीआर
    भाषा
    आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं 363 सांसद, विधायक, दोषसिद्धि से हो जाएंगे अयोग्य: एडीआर
    24 Aug 2021
    चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले संगठन एडीआर और ‘नेशनल इलेक्शन वाच’ ने 2019 से 2021 तक 542 लोकसभा सदस्यों और 1,953 विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया है।
  •  'राSSSम' :  लिंच, लिंचक, लिंचित
    सोनाली
     'राSSSम' :  लिंच, लिंचक, लिंचित
    24 Aug 2021
    आशीष देने वाला हाथ लहू से लथपथ धराशायी था, शान्तभाव मुख मनु की बचाई इन आततायी संतानों के कृत्यों से भयभीत। 
  • यूपी: डूबती भाजपा को तालिबान का सहारा!
    अफ़ज़ल इमाम
    यूपी: डूबती भाजपा को तालिबान का सहारा!
    24 Aug 2021
    भाजपा को चुनाव में तालिबान के मुद्दे का सहारा लेना पड़ रहा। इससे साफ़ है कि उसे अपनी जमीनी स्थिति का अंदाजा हो गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License