NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग: आख़िर तुम किस मर्ज़ की दवा हो?
हरिद्वार, आगरा से लेकर गुरुग्राम तक, त्रिपुरा से लेकर कर्नाटक तक, नमाज़ से लेकर चर्च की प्रार्थना सभा तक अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले हो रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिये बना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग बिल्कुल चुप्पी साधे हुए है।
वसीम अकरम त्यागी
27 Dec 2021
haridwar
धर्म के नाम पर हरिद्वार में हुई ‘अधर्म संसद’। फोटो साभार: बीबीसी/वर्षा सिंह

“भारत में धार्मिक आधार पर अत्याचार की घटनाएं नहीं हैं। जिस देश में हम रहते हैं विविधता में एकता है। जहां विविधता है…थोड़ा बहुत चलता रहता है।”

यह बयान राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष इकबाल सिंह लालपुरा ने 18 दिसंबर 2021 को दिया था।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष 18 दिसंबर को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस पर दिल्ली में यह दावा कर रहे थे, जबकि 17 दिसंबर को दिल्ली से सटे गुरुग्राम में शुक्रवार को अल्पसंख्यक समुदाय से ताअल्लुक रखने वाले मुसलमान जुमा की नमाज़ अदा न किये जाने से आहत होकर सवाल कर रहे थे कि “क्या ये हमारा मुल्क नहीं है?”

दरअस्ल गुरुग्राम में मस्जिद न होने की वजह से प्रशासन ने 37 स्थानों पर जुमा की नमाज़ अदा करने की अनुमति दी हुई थी, लेकिन पिछले दिनों हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा ‘खुले’ में नमाज़ का विरोध करने के कारण ज्यादतर स्थानों की अनुमति को रद्द कर दिया गया। जिसके बाद से हर शुक्रवार को हिंदुत्ववादी संगठनों और नमाज़ियो के बीच विवाद जारी है।

अल्पसंख्यक आयोग की चुप्पी

हरियाणा के गुरुग्राम में नमाज़ विवाद कोई एक दिन का नहीं है, बल्कि यह विवाद पिछले दो महीने से भी अधिक समय से जारी है। लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिये बना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग इस प्रकरण पर चुप्पी साधे हुए है।

10 दिसंबर को हरियाणा के ही रोहतक जिला स्थित एक चर्च में दक्षिणपंथी संगठनों की भीड़ ने धर्मांतरण का आरोप लगाकर एक चर्च पर धावा बोला। इस मामले में पुलिस ने धर्मांतरण के आरोपों को खारिज कर दिया। गुरुग्राम में नमाज़ प्रकरण पर खामोश रहने वाला अल्पसंख्यक आयोग रोहतक में ईसाई समुदाय के साथ घटी घटना पर भी खामोश रहा।

अक्टूबर महीने में त्रिपुरा में मुसलमानों के ख़िलाफ हिंसा हुई, यह हिंसा कई रोज़ जारी रही। जमीयत उलमा-ए-हिंद द्वारा जारी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया गया कि त्रिपुरा हिंसा में 16 मस्जिदों को नुक़सान पहुंचाया गया है, जिसमें से तीन मस्जिदों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। इस घटना के ख़िलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सोशल एक्टिविस्टों, ने अपना विरोध दर्ज कराया। यहां तक कि अमेरिकी संस्था United States Commission on International Religious Freedom ने त्रिपुरा की घटना की निंदा की, लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग इस घटना पर भी चुप रहा है।

हद तो तब हो गई, जब इस घटना का सोशल मीडिया पर विरोध करने वाले पत्रकारों, वकीलों, सोशल एक्टिविस्टों को त्रिपुरा पुलिस ने यूएपीए का नोटिस थमा दिया, पत्रकारों को यूएपीए का नोटिस दिये जाने का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विरोध किया, लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग इस घटना पर भी चुप रहा है।

इन दिनों सोशल मीडिया पर हरिद्वार में दक्षिणपंथियों द्वारा लगने वाली “धर्म संसद” के वीडियो तैर रहे हैं। धर्म के नाम पर लगी इस “अधर्म संसद” में मुसलमानों के ख़िलाफ जमकर ज़हर उगला गया, मुसलमानों के जनसंहार का आह्वान किया गया। इस घटना के ख़िलाफ विपक्ष बोला, सोशल एक्टिविस्टों ने तो इसका विरोध किया ही, इसके साथ ही अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने भी इसकी निंदा की। लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग इस घटना पर भी चुप रहा है।

इसे भी पढ़ें : हरिद्वार में ‘धर्म संसद’ के नाम पर तीन दिन तक चलते रहे अल्पसंख्यक विरोधी भाषण, प्रशासन मौन!

हाल ही में कर्नाटक की भाजपा सरकार धर्मांतरण रोकने के लिये एक बिल लेकर आई है। यह बिल गुरुवार को कर्नाटक विधानसभा में पारित हो गया, गुरुवार से लेकर अब तक कर्नाटक में ईसाई समुदाय को निशाना बनाए जाने की तीन घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग इन घटनाओं पर भी चुप है।

25 दिसंबर को मनाए जाने वाले ईसाई समुदाय के प्रमुख त्योहार क्रिसमस पर दक्षिणपंथियों संगठनों के लोगों ने देश भर में सात जगह बाधा पहुंचाई है। असम, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में हिंदुत्ववादियों ने क्रिसमस के त्योहार में बाधा पहुंचाई है।

आगरा में क्रिसमस के मौक़े पर बजरंगदल के लोगों ने सेंटा क्लॉज का पुतला फूंका, गुरुग्राम में क्रिसमस के मौक़े पर यही हिंदुत्ववादी, ईसाई समुदाय की एक प्रार्थना सभा में घुस गए, वहां उन्होंने जय श्री राम के नारे लगाए। लेकिन अल्पसंख्यक आयोग ने चुप रहने की अपनी परंपरा को बरक़रार रखा।

क्यों बना अल्पसंख्यक आयोग

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) की स्थापना की। छह धार्मिक समुदाय, अर्थात; मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन को पूरे भारत में केंद्र सरकार द्वारा भारत के राजपत्र में अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में अधिसूचित किया गया है।

भारत के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का मानना है कि वह 18 दिसंबर 1992 की संयुक्त राष्ट्र घोषणा का पालन करता है जिसमें कहा गया है कि "राज्य अपने संबंधित क्षेत्रों के भीतर अल्पसंख्यकों की राष्ट्रीय या जातीय, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान के अस्तित्व की रक्षा करेंगे और उस पहचान को बढ़ावा देने के लिए शर्तों को प्रोत्साहित करेंगे।"

देश में सभी अल्पसंख्यक जनसंख्या का 18.80% हैं। कुल 130 करोड़ के लिहाज से यह 24.40 करोड़ इंसान और भारतीय नागरिक होते हैं। संख्या के लिहाज से यह दुनिया के तीसरे सबसे बड़े जनसंख्या वाले अमेरिका के बाद भारत के अल्पसंख्यक की गिनती होती है। यानी अमेरिका की जनसंख्या है 33 करोड़, भारत में 24.40 करोड़ अल्पसंख्यक रहते है जबकि चौथी सबसे बड़ी आबादी इंडोनेशिया की है जहां 27.35 करोड़ लोग रहते हैं। इतनी बड़ी आबादी अगर इंसाफ़ की पुकार लगाए तो समझना चाहिए कि एक लोकतंत्र के रूप में हमें कितना सफ़र तय करना है। महिलाएं, बुजुर्गों, पिछड़े और अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार से ही किसी लोकतंत्र की सेहत मापी जा सकती है। भारत को बीमार होने से बचाना होगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, विचार व्यक्तिगत हैं)

इसे भी पढ़ें : बात बोलेगी : दरअसल, वे गृह युद्ध में झोंकना चाहते हैं देश को

इसे भी देखें: धर्म संसद का आपराधिक चेहरा, देवभूमि में दलित भोजनमाता की दुर्गति

haridwar
Hate Speech
dharm sansad
National Commission for Minorities
minorities
Religious Freedom

Related Stories

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

वैष्णव जन: गांधी जी के मनपसंद भजन के मायने

तो इतना आसान था धर्म संसद को रोकना? : रुड़की से ग्राउंड रिपोर्ट

रुड़की : डाडा जलालपुर गाँव में धर्म संसद से पहले महंत दिनेशानंद गिरफ़्तार, धारा 144 लागू

कहिए कि ‘धर्म संसद’ में कोई अप्रिय बयान नहीं दिया जाएगा : न्यायालय ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव से कहा

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

नफ़रती भाषण: कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को ‘बेहतर हलफ़नामा’ दाख़िल करने का दिया निर्देश

संकट की घड़ी: मुस्लिम-विरोधी नफ़रती हिंसा और संविधान-विरोधी बुलडोज़र न्याय


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License