NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
भारत
राजनीति
कला प्रेमी समाज के लिए चाहिए स्तरीय कला शिक्षा: आनंदी प्रसाद बादल
"अब पटना में लगने वाली कला प्रदर्शनियों को ही ले लीजिए, उनमें कलाकारों की तो उपस्थिति रहती है, लेकिन कला प्रेमी समाज कहां रहता है? जब कला प्रेमी ही नहीं है तो कला के खरीदार कहां से आयेंगे? "
डॉ. मंजु प्रसाद
06 Dec 2020
आनंदी प्रसाद बादल अपनी पत्नी के साथ
आनंदी प्रसाद बादल अपनी पत्नी के साथ। फोटो : मंजु प्रसाद

'मैं हूं बादल' शीर्षक है आनंदी प्रसाद बादल की कविता का। जो जीवन के गहरे सच का एहसास करा ही देती है। कवि हृदय वरिष्ठ कलाकार आनंदी प्रसाद बादल को उनकी पुरानी परंपरागत आकृतिमूलक चित्रण शैली  और आधुनिक अमूर्त चित्रण शैली के आधार पर देश के महत्वपूर्ण चित्रकारों में शुमार किया जा सकता है। उनके ढेर सारे चित्रों को कई बार देखने का सुअवसर मिला। जिन्हें वे बाल सुलभ अंदाज में दिखाते हैं। उनकी विशेषता है कि वे निश्छल ढंग से स्वीकार करते हैं  कि  उन्हें कहां-कहां से प्रेरणा ली है। यह बहुत बड़ी बात है।

उनसे मेरा सर्वप्रथम परिचय 2001 में मेरी एकल चित्र प्रदर्शनी में हुआ, जो कला एवं शिल्प महाविद्यालय पटना में चल रही थी। स्नातक के बाद की पढ़ाई के लिए ज्यादातर मेरे बिहार से बाहर रहने के कारण कई वरिष्ठ कलाकारों को मैं नहीं पहचानती थी। मेरे चित्र अभिव्यंजनावाद और अमूर्त अभिव्यंजनावाद से प्रभावित थे जिसमें मैंने रंगों रेखाओं और टेक्सचर का इस्तेमाल निर्भिकता से किया था। अतः सीधे-सरल आनंदी प्रसाद बादल मेरे चित्रों को पसंद करेंगे ऐसी मेरी आशा नहीं थी। परन्तु इसके विपरीत बादल जी ने मेरी कृतियों को बहुत पसंद किया। जो मेरे लिए बहुत उत्साह-जनक रहा। यही खास बात है आनंदी प्रसाद बादल जी में कि वे नवीन कला शैली और नये कलाकारों में सदा रूचि लेते रहे हैं। शायद उनमें यह विशिष्टता समकालीन भारतीय कला परिदृश्य से थोड़ी दूरी की वजह से ही आयी।  क्योंकि लंबे समय तक वे खादी ग्रामोद्योग में कार्यरत थे। मेरी उनसे कला के ऊपर अक्सर बातचीत होती रही है। आज भी समकालीन कलाकारों के कृतियों पर उनके विचार बड़े सटीक होते हैं।

आनंदी प्रसाद बादल का जन्म 11 जनवरी, 1933 में पूर्णिया जिले (बिहार) के श्रीपुर गांव में हुआ था जो कि कोशी नदी के कछार क्षेत्र में था। आनंदी प्रसाद बादल ने 1954 में कला एवं शिल्प महाविद्यालय पटना में दाखिला लिया था और 1956 में ललित कला में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। उपेन्द्र महारथी जैसे प्रख्यात मूर्तिकार के सानिध्य में उन्हें कला सृजन करने का मौका मिला। उपेन्द्र महारथी वाश शैली में सिद्धहस्त थे। बटेश्वर नाथ उनके गुरु थे,जिनसे उन्होंने टेम्परा चित्र शैली सीखी। फलस्वरूप बादल जी ने टेम्परा और वाश शैली में बहुत सारे चित्र बनाए। राधामोहन बाबू से उन्होंने शबीह चित्रण शैली सीखी। जिसके कई उत्कृष्ट उदाहरण उनके निवास स्थल के अतिथि कक्ष में टंगे हुए हैं।

 पनघट की ओर , कागज पर टेम्परा चित्रकार: आनंदी प्रसाद बादल

बादल जी के एक भीषण अग्निकांड में लगभग 1600 अमूल्य चित्र नष्ट हो गये। इसके साथ बहुत सारी पुस्तकें, रंग-ब्रश एवं अन्य कला सामग्रियां भी राख हो गईं। परंतु अपने प्रियजनों और शुभाकांक्षियों विशेष कर पटना के कला प्रेमी श्री  विवेकानंद जी ने उन्हें कला सामग्री उपलब्ध करा कर उनकी हिम्मत को बढ़ाया।

एक चित्रकार निरंतर सृजनशील है और यथार्थ चित्रण पर भी उसकी पकड़ है तो उसकी चित्रण शैली कौन सा रूप लेगी यह आप नहीं निश्चित और निर्धारित कर सकते। स्वतंत्रता पश्चात देश के कलाकार बाहर जाने लगे। पाश्चात्य कला शैली का आकर्षण व प्रभाव से पहले ही प्रभावित थे भारतीय कलाकार। यह स्वाभाविक ही था। विश्वभर‌ की कला शैलियों, लोककला शैलियों ने अपने अनोखेपन व सौंदर्य दृष्टि के कारण मान्यता प्राप्त कर ली। भारतीय टेम्परा चित्रण शैली, लघुचित्रण शैली ने विश्व कला में अपनी पहचान बनाई। भारतीय कलाकारों को भी आधुनिक चित्रण शैली ने प्रभावित किया। वे भी नये रंगों, रेखाओं, तूलिका घात की तलाश में, अपने को परम्परावादी चित्रण शैली की बंधी हुई आकृतिमूलकता, निरंतर पुनरावृत्त होने वाले रंग संगति के दोष से बचने के लिए एक्सपेरिमेंटल कला सृजन करने लगे।

आनंदी प्रसाद बादल को भी विदेश जाने का मौका मिला। वे स्वीकार करते हैं कि कला शिक्षा पूर्ण करते ही उन्हें जापान और फिलिपिंस जाने का मौका मिला। जहां उन्हें आधुनिक कला को देखने और जानने का अवसर मिला। यहीं से उनकी कला ने नया मोड़ लिया और वे अमूर्त चित्रण शैली से बेहद प्रभावित हुए।

इतिहास गवाह है कि भारत भूमि आरंभ से ही कला और संस्कृति के लिए उर्वर भूमि रही है। भारतीय कलाकारों ने विश्व कला शैलियों से प्रेरणा ग्रहण की है और अपनी कला को परिष्कृत किया है। रही बात चित्रकला में आकृति मूलकता या अमूर्तन की वर्तमान समय में ये कलाकार की अपनी पसंद मानी जा रही है। बादल जी वरिष्ठ कलाकार हैं उन्होंने लंबे समय तक परंपरागत विषयों और शैली में कला सृजन किया है। आरंभ में वे तैल रंगों में शबीह चित्रण, टेम्परा और वाश शैली में ग्राम्य परिवेश पर चित्रण करते थे। उपेन्द्र महारथी से उन्होंने वाश चित्रण सीखा और बटेश्वर नाथ से टेम्परा। पोट्रेट में राधा मोहन बाबू थे ही। इन कला महारथियों के प्रभाव में उन्होंने बहुत सारे चित्र बनाए। परंतु जैसे ऊपर बताया कि एक भीषण अग्निकांड में उनके लगभग 1600 अमूल्य चित्र भस्म हो गये।

दुःख और विषाद के बावजूद अपने प्रिय और आत्मीय जनों के सहयोग से उन्होंने पुनः चित्रण शुरू किया। संभवतः यहीं से वे अमूर्तन‌ की ओर अभिमुख हुए।

प्रकृति समेत अपने आंतरिक भावनाओं को विशुद्ध रंगों और आकारों में चित्रित करने के प्रयास में ही प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमूर्त चित्रण शैली का प्रादुर्भाव भी हुआ। 19वीं के अंत में  विश्वयुद्ध के भीषण और त्रासदी पूर्ण भयावह परिणाम हुए जिससे आम जनता के साथ साथ कलाकार भी प्रभावित हुए। कला के नियमों और सिद्धांतों पर कलाकारों का स्वतंत्र चिंतन होने लगा। नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों ने भी उन्हें प्रयोगधर्मी बनाया। 1912 में रशियन कलाकार वासिली कान्डिन्स्की ने अपने विचारों को शाब्दिक रूप देने के लिए अपनी पुस्तक प्रकाशित की ' कला में आत्मिकता' , जिसमें उन्होंने कला को भौतिकवाद से दूर करते हुए अपनी आंतरिक भावनाओं से जोड़ने पर जोर दिया।

उन्होंने संगीत के समान चित्रकला को वाह्य बंधनों से मुक्त करते हुए रंगों और रेखाओं में अपनी पहला अमूर्त चित्र 1910 में बनाया। जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। अमूर्त चित्रण शैली का प्रयोग भारतीय कलाकारों ने बहुत बाद में किया। यद्यपि जैन कला में तंत्रचित्र के नाम पर ज्यामितीय आकारों में बहुत पहले से ही चित्रण किया जा रहा था।

आनंदी प्रसाद बादल अपने शुरुआती चित्रों में आकृतियों के ‌मोह से मुक्त नहीं होते‌ हैं। परंतु वर्तमान समय के चित्र वास्तव में वस्तु निरपेक्ष कला के सुंदर उदाहरण हैं जिनमें उन्होंने एक्रेलिक रंगो और तूलिका घात का अभूतपूर्व प्रयोग किया। हालांकि उनकी तैल रंगों पर भी अच्छी पकड़ है। मुझे और श्याम (सिंह) कुलपत को कई बार उनके घर जाकर उनकी छोटी सी सुविधाहीन स्टुडियो में चित्रावलोकन करने का अवसर मिला है। आनंदी जी 93 वर्ष के हो चुके हैं लेकिन उनमें कला सृजन का जज्बा युवा कलाकारों से ज्यादा है। उनके चित्र चाहे मूर्त आकृति मूलक हों या अमूर्त वे तत्कालीन, समाज और व्यक्ति विशेष का ही चित्रण हैं जो अभिव्यंजनात्मक रूप में गूढ़ ढंग से प्रकट होते रहते हैं। उन्होंने विश्व व्यापी आतंकवाद, राजस्थान में भूकंप से हताहत हुए असंख्य लोगों और गुजरात दंगों पर चित्र शृंखला बनाई जो उनके मानवीय और संवेदनशील होने का परिचायक है।  अमूर्त चित्रण के साथ एक बात ये भी है कि आपमें अगर सौंदर्य बोध (एस्थेटिक सेंस) नहीं है तो आप उसका अनुभूत नहीं कर सकते, आनंद नहीं ले सकते। आम लोगों में संप्रेषण की समस्या तो होती ही है।

आनंदी प्रसाद बादल की कला का एक दूसरा पक्ष है कि उनकी छात्र जीवन से ही हिन्दी साहित्य और नाटक में भी गहरी रुचि रही है। हिन्दी के दिग्गज साहित्य कार आचार्य शिवपूजन सहाय, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, फणीश्वर नाथ रेणु आदि से उनकी घनिष्ठता थी। वे कविताएं खूब लिखते हैं। जो समय-समय पर पुस्तक रूप में प्रकाशित हुईं ।

आनंदी प्रसाद जी ने अपने कला जीवन में खुद को स्थापित करने में एक संघर्षमय रास्ता तय किया है। इसलिए युवा कलाकारों के प्रति उनका रवैया बहुत ही संवेदनशील और सहानुभूति पूर्ण रहा है। खास कर बिहार के युवा कलाकारों के वे हमेशा मददगार और परोपकारी रहे हैं।

बिहार के कला परिदृश्य पर उनकी स्पष्ट दृष्टि एक समीक्षक समान रही है। मैंने पाया है कि कला पर उनका सार्थक और समीक्षात्मक वक्तव्य रहता है।

फोक आर्ट पिडिया पर कलाकार रविन्द्र दास को दिये साक्षात्कार में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं। जैसे

- " अलग-अलग प्रदेशों में रह रहे बिहार के कलाकार अपना नाम खूब रोशन कर रहे हैं। राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी। वो खूब कला सृजन कर रहे हैं। पूर्व में भी यहां जो कलाकार रहे वे जीवन भर पोट्रेट बनाते रहे। आप गौर कीजिए राधामोहन बाबू अच्छे कलाकार होते भी आगे नहीं बढ़ पाये। श्यामानंद बहुत आगे नहीं बढ़ पाये। जबकि दूसरे प्रदेश से आए कलाकारों ने बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाया और चमके भी। जैसे उपेन्द्र महारथी उड़ीसा से, विरेश्वर बाबू बंगाल से, श्याम शर्मा, पाण्डेय सुरेन्द्र, बटेश्वर नाथ उत्तर प्रदेश से ...। पटना आर्ट्स कालेज के ज्यादातर प्रिंसिपल बाहर के प्रदेशों से रहे। वर्तमान प्रिंसिपल भी उत्तर प्रदेश से है। क्या बिहार का कोई भी कलाकार यह साबित नहीं कर पाया कि उनमें प्रिंसिपल बनने क्षमता है? अपने इस सवाल को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, '' यह विचारणीय प्रश्न है। मुझे लगता है इन सबकी एक वजह यह भी रही है कि बिहार के कलाकारों को न तो सामाजिक स्तर पर प्रोत्साहन मिला है, न ही सरकार की ओर से प्रशासनिक स्तर पर बिहार के कलाकारों के हित में न्याय हुआ। ऐसा आर्ट्स स्कूल की स्थापना के समय से ही रहा है। पटना आर्ट्स कालेज को अच्छे शिक्षक चाहिए उनकी नियुक्तियां कहां है? बिहार में वह कला प्रेमी समाज विकसित-शिक्षित ही नहीं हुआ जिससे कला संपोषित होती है। प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे का कथन है, " एक स्तरीय कला फिल्म को समझने के लिए अभ्यस्त संवेदनशीलता की जरूरत है।" स्पष्ट है यहां अभ्यास और अभिरूचि का प्रश्न है। ये कला दृष्टि से सम्पन्न और अकादमिक शिक्षण से ही एक कला प्रेमी समाज विकसित होगा। आनंदी जी के अनुसार "आज भी उस समाज का अभाव है।"

बिहार के नागरिक समाज को लेकर उनका सवाल है , "अब पटना में लगने वाली कला प्रदर्शनियों को ही ले लीजिए, उनमें कलाकारों की तो उपस्थिति रहती है , लेकिन कला प्रेमी समाज कहां रहता है? जब कला प्रेमी ही नहीं है तो कला के खरीदार कहां से आयेंगे? "

सचमुच बादल जी ने कलाकारों के हित में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठायें हैं। उन्हें साधुवाद!

बहरहाल आनंदी प्रसाद बादल ने अपने कला जीवन में बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। देश विदेश में महत्वपूर्ण जगहों पर उनकी कलाकृतियां संग्रहित हैं। वो बिहार ललित कला अकादमी के चेयरमैन भी रह चुके हैं। आज भी निरंतर सृजनशील हैं।

(लेखिका डॉ. मंजु प्रसाद एक चित्रकार हैं। आप इन दिनों लखनऊ में रहकर पेंटिंग के अलावा ‘हिन्दी में कला लेखन’ क्षेत्र में सक्रिय हैं।)

कला विशेष में इन्हें भी पढ़ें :

कला विशेष : चित्रकार उमेश कुमार की कला अभिव्यक्ति

कला विशेष: हितकारी मानवतावाद से प्रेरित चित्रकार अर्पणा कौर के चित्र

चित्रकार बी.सी. सान्याल की‌ कलासाधना : ध्येय, लोक रूचि और जन संवेदना

सतीश गुजराल : एक संवेदनशील चित्रकार-मूर्तिकार

कला विशेष: शक्ति और दृष्टि से युक्त अमृता शेरगिल के चित्र

कला विशेष : शबीह सृजक राधामोहन

कला विशेष: चित्र में प्रकृति और पर्यावरण

Anandi Prasad Badal
Painter
sculptor
Art teacher
Indian painter
art
artist
Indian painting
Indian Folk Life
Art and Artists
Folk Art
Folk Artist
Indian art
Modern Art
Traditional Art

Related Stories

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

राम कथा से ईद मुबारक तक : मिथिला कला ने फैलाए पंख

पर्यावरण, समाज और परिवार: रंग और आकार से रचती महिला कलाकार

सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 

आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक

आर्ट गैलरी : देश की प्रमुख महिला छापा चित्रकार अनुपम सूद

छापा चित्रों में मणिपुर की स्मृतियां: चित्रकार आरके सरोज कुमार सिंह

जया अप्पा स्वामी : अग्रणी भारतीय कला समीक्षक और संवेदनशील चित्रकार

कला गुरु उमानाथ झा : परंपरागत चित्र शैली के प्रणेता और आचार्य विज्ञ

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा : चित्रों में रची-बसी जन्मभूमि


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License