NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अब एलआईसी बेचने निकली है राष्ट्रवाद के नाम पर देश चला रही भाजपा एंड कंपनी!
एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी को नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है?
अजय कुमार
10 Sep 2020
LIC

आम आदमी को बीमा का मतलब पता हो या न हो लेकिन उसने जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का नाम जरूर सुना होता है। इसलिए जब बीमा करने की बात होती है तो उसकी सबसे पहली पसंद जीवन बीमा निगम होती है। वजह यह कि यह एक सरकारी कम्पनी है। इसकी 100% शेयरों की मालिक सरकार है।

संसद के अधिनियम द्वारा साल 1956 में इसकी स्थापना हुई थी। Life insurance corporation act की धारा 37 कहती है कि सभी पॉलिसियों की संप्रभुता सरकार में निहित है। यानी भविष्य में एलआईसी के साथ कुछ गड़बड़ी भी होगी तो इसके पॉलिसी धारकों को सरकार सारा पैसा वापस करेगी।

और आम लोगों को अपना पैसा सुरक्षित रखने में जितना भरोसा भारत सरकार पर होता है उतना प्राइवेट कंपनियों पर नहीं। इसलिए बीमा क्षेत्र में 23 प्राइवेट कंपनियों के साथ एक सरकारी कंपनी एलआईसी काम करती है। इन कंपनियों में बाज़ार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी एलआईसी की है। एलआईसी के पास भारत के कुल बीमाधारियों में से तकरीबन 76 फीसदी बीमाधारी हैं।

इस बार के बजट में सरकार ने एलान किया था कि सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचेगी। किसी नीति के तहत हाल फिलहाल मीडिया में खबर आ रही है कि सरकार एलआईसी के 25 फ़ीसदी शयरों को निजी हाथ में बेचने जा रही है।

इसका मतलब है कि एलआईसी के शेयरों की बिक्री की जाएगी। ऐसे में इस सरकारी बीमा कंपनी के मालिकाना हक में आम शेयरधारकों की भी हिस्सेदारी हो जाएगी। 100 फ़ीसदी सरकारी मालिकाना हक वाली एलआईसी का प्राइवेटाइजेशन होना शुरू होगा।

सौ करोड़ की ऑथोराइज्ड कैपिटल वाले एलआईसी के कैपिटल यानी पूंजी की कीमत 8.77 लाख करोड़ रुपये है। यह टाटा कंसल्टेंसी सर्विस और मुकेश अम्बानी के रिलायंस इंडिया लिमिटेड के कुल शेयरों की कीमतों से भी ज्यादा है।

एलआईसी की बैलेंस शीट की स्थिति भी बहुत मज़बूत है। एलआईसी के पास तकरीबन 32 लाख करोड़ रुपये का फंड है। इसमें से 24 लाख करोड़ रुपये सरकार द्वारा नियंत्रित बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा और समाजिक सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में लगा हुआ है। एलआईसी का सरप्लस साल 2019 में 50 हज़ार करोड़ से अधिक का है।

पिछले साल एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक के उतने शेयर खरीदे थे, जितने से आइडीबीआई बैंक का मालिकाना हक एलआईसी को मिल गया था। सरकार इस समय आइडीबीआई बैंक के बचे हुए शेयरों को भी बेचने की बात कर रही रही है।

एलआईसी के शेयर जब बाज़ार में बिकने के लिए जारी किये जायेंगे, तब यह बाज़ार में लिस्ट हुई सबसे बड़ी कम्पनी होगी। जिसके पास सबसे अधिक सम्पति होगी। इसलिए बहुत मुश्किल होगा कि एलआईसी का दस फीसदी शेयर एक बार में बिक पाए। क्योंकि जितनी कीमत के ये शेयर हैं उतने बड़े खरीदार बाजार में नहीं है।

एलआईसी के कर्मचारी रामजी तिवारी अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं कि जब LIC का राष्ट्रीयकरण किया गया तो उस समय सरकार ने निगम को 5 करोड़ की मूल पूंजी उपलब्ध कराई। और साथ मे सावरेन गारंटी भी। जिसका मतलब यह था कि LIC के दिवालिया होने की स्थिति में जनता के पैसे को वापस लौटाने की गारंटी सरकार लेगी। साथ ही साथ सरकार ने LIC द्बारा जमा किये पैसे को अपने निर्देशन में निवेश के लिए उपयोग करने का फैसला भी किया।

इसके बाद LIC ने फिर कभी पीछे मुड़कर नही देखा। अपने कुल मुनाफे में से 95 प्रतिशत की राशि वह अपने पॉलिसीधारको के बीच वितरित करती है। और बाकि बची 5 प्रतिशत की राशि वह सरकार को प्रतिवर्ष डिविडेंट के रूप में देती है। यानि सरकार ने जो उसे 5 करोड़ की मूल पूंजी उपलब्ध कराई थी, उसके प्रतिफल के रूप में। यदि हम गत वर्ष का आंकड़ा देखें तो LIC ने सरकार को डिविडेंट के रूप में 2600 करोड़ रुपये प्रदान किया है। जी.एस. टी. के आंकड़े को मिला देने पर यह राशि कई गुना अधिक हो जाती है।

इस पूरी पृष्ठभूमि में यह बात तो साफ है कि एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी को नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है? बेचने के पीछे की वजह क्या है? जब बेचने लायक स्थितियां ही नहीं है।

पहला तर्क तो यह दिया जा रहा है कि सरकार के पास पैसे की कमी है? इसलिए सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है ताकि सरकार के पास पैसा आ पाए। लेकिन इस तर्क में बहुत अधिक दम नहीं लगता। दम इसलिए नहीं लगता क्योंकि यह बात सही है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। यह बात भी सही है कि सरकार को पैसे का जुगाड़ करना चाहिए।

लेकिन इसके जवाब में यह बात सही कैसे हो सकती है कि लाभ कमाती सरकारी कंपनियों को बेच दिया जाए। वैसी कंपनियों को बेच दिया जाए जिसकी साख जनता के बीच सबसे अधिक है। अगर सरकार इन सारी बातों को अलग कर केवल बेचने के बारे में सोच रही है तो इसका मतलब है कि सरकार इन कंपनियों को बेचकर बोझ उतारना चाहती है। और वह अपने अकूत बहुमत के दम पर इस तरह के मनमानी फैसले ले रही है।

दूसरा तर्क आर्थिक जानकारों की तरफ से है कि बाज़ार में एलआईसी की लिस्टिंग हो जाने से एलआईसी के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। इस तर्क का जवाब देते हुए एलआईसी वर्किंग इम्पलॉई एसोसिएशन के वाईस प्रेसिडेंट अनिल कुमार भटनागर ने कहा कि समझ में नहीं आ रहा है कि किसी तरह की पारदर्शिता की बात की जा रही है। एलआईसी अपने सारे खातों को अपने वेबसाइट पर जारी करती है। सारे खाते वेबसाइट पर उपलब्ध है, कोई भी इन्हें पढ़ सकता है।

पारदर्शिता के नाम पर दूसरा सवाल यह उठाया जा रहा है कि एलआईसी में पैसा लगाने वालों को यह पता नहीं चलता कि उनका पैसा कहां लगाया जाता है। इस पर अनिल कुमार भटनागर का कहना है कि एलआईसी का पैसा कहां निवेश होगा, इसका फैसला एलआईसी की बोर्ड करती है।

जो फैसला बोर्ड करती है, उसकी छानबीन करने के लिए इन्सुरेंस रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया होती है। उसके बाद पैसा कहां निवेश किया गया है, इसकी जानकारी भी हम अपने वेबसाइट पर मुहैया करवाते हैं। यह पारदर्शिता नहीं तो और क्या है?

फिर भी चलिए एक समय के लिए उनके कमजोर तर्क को भी मान लेते हैं कि एलआईसी में पारदर्शिता नहीं है तो पारदर्शिता लाने के नाम पर एक पूरी कम्पनी बेच दी जाए जो बेतुकी बात है। अगर सरकार को लगता है कि पारदर्शिता नहीं है तो सरकार कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए क़दम उठा सकती है, बेचने की बात करना बिल्कुल गलत है।

अनिल कुमार भटनागर आगे कहते हैं कि कुछ टीवी वाले तर्क यह भी दे रहे हैं कि अभी डूबी हुई दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में एलआईसी के पैसे का निवेश हुआ था और एलआईसी का पैसा डूब गया। पारदर्शिता आने पर इससे छुटकारा मिलेगा। उनके इस इस तर्क का जवाब उनकी बात में ही है। जवाब यह है कि बाज़ार या सरकारी उपक्रम यानी सबका पैसा डूब सकता है। जैसे किंगफिशर डूब गयी, जेटएयरवेज का दिवालिया निकल गया। सरकरी कंपनी को बाज़ार के हवाले कर देने से यह नहीं होता कि बाज़ार के लोग जहां लगाएंगे, वहां वह डूबेगा नहीं। इस लिहाज से यह तर्क भी बहुत कमजोर है।

अनिल भटनागर कहते हैं कि एलआईसी को बाज़ार के हवाले करने के पीछे सरकार के पास कोई मज़बूत तर्क नहीं है। बस सरकार को पैसा चाहिए और इस पैसे की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अपने सबसे मज़बूत उपक्रम को बर्बाद कर रही है। उस उपक्रम को बर्बाद कर रही है, जो उसके लिए भूकंप, चक्रवात, बाढ़ जैसे आपातकालीन समय में कई बार सहारा बन चुकी है और आगे भी बनेगी। लेकिन सरकार अपने तत्काल फायदे के लिए भविष्य में होने वाले फायदे के आधार को तबाह कर रही है।

एलआईसी के पास मौजूद पैसे के बारे में आप इससे अनुमान लगा सकते हैं कि एलआईसी की जिन सम्पतियों की कीमत खाताबही में सौ करोड़ है, उसकी इस समय बाज़ार में कीमत 5 हज़ार करोड़ से भी अधिक हो सकती है। हो सकता है कि एलआईसी बेचने पर सरकार को पैसा मिले लेकिन इसे बेचने के बाद सरकार अपनी आर्थिक सम्प्रभुता भी गंवा देगी जो भारत की सम्प्रभुता के लिए उचित कदम नहीं है।

LIC
privatization
modi sarkar
Narendra modi
BJP
Economic Recession
economic crises

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License