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भारत
राजनीति
अब एलआईसी बेचने निकली है राष्ट्रवाद के नाम पर देश चला रही भाजपा एंड कंपनी!
एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी को नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है?
अजय कुमार
10 Sep 2020
LIC

आम आदमी को बीमा का मतलब पता हो या न हो लेकिन उसने जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का नाम जरूर सुना होता है। इसलिए जब बीमा करने की बात होती है तो उसकी सबसे पहली पसंद जीवन बीमा निगम होती है। वजह यह कि यह एक सरकारी कम्पनी है। इसकी 100% शेयरों की मालिक सरकार है।

संसद के अधिनियम द्वारा साल 1956 में इसकी स्थापना हुई थी। Life insurance corporation act की धारा 37 कहती है कि सभी पॉलिसियों की संप्रभुता सरकार में निहित है। यानी भविष्य में एलआईसी के साथ कुछ गड़बड़ी भी होगी तो इसके पॉलिसी धारकों को सरकार सारा पैसा वापस करेगी।

और आम लोगों को अपना पैसा सुरक्षित रखने में जितना भरोसा भारत सरकार पर होता है उतना प्राइवेट कंपनियों पर नहीं। इसलिए बीमा क्षेत्र में 23 प्राइवेट कंपनियों के साथ एक सरकारी कंपनी एलआईसी काम करती है। इन कंपनियों में बाज़ार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी एलआईसी की है। एलआईसी के पास भारत के कुल बीमाधारियों में से तकरीबन 76 फीसदी बीमाधारी हैं।

इस बार के बजट में सरकार ने एलान किया था कि सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचेगी। किसी नीति के तहत हाल फिलहाल मीडिया में खबर आ रही है कि सरकार एलआईसी के 25 फ़ीसदी शयरों को निजी हाथ में बेचने जा रही है।

इसका मतलब है कि एलआईसी के शेयरों की बिक्री की जाएगी। ऐसे में इस सरकारी बीमा कंपनी के मालिकाना हक में आम शेयरधारकों की भी हिस्सेदारी हो जाएगी। 100 फ़ीसदी सरकारी मालिकाना हक वाली एलआईसी का प्राइवेटाइजेशन होना शुरू होगा।

सौ करोड़ की ऑथोराइज्ड कैपिटल वाले एलआईसी के कैपिटल यानी पूंजी की कीमत 8.77 लाख करोड़ रुपये है। यह टाटा कंसल्टेंसी सर्विस और मुकेश अम्बानी के रिलायंस इंडिया लिमिटेड के कुल शेयरों की कीमतों से भी ज्यादा है।

एलआईसी की बैलेंस शीट की स्थिति भी बहुत मज़बूत है। एलआईसी के पास तकरीबन 32 लाख करोड़ रुपये का फंड है। इसमें से 24 लाख करोड़ रुपये सरकार द्वारा नियंत्रित बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा और समाजिक सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में लगा हुआ है। एलआईसी का सरप्लस साल 2019 में 50 हज़ार करोड़ से अधिक का है।

पिछले साल एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक के उतने शेयर खरीदे थे, जितने से आइडीबीआई बैंक का मालिकाना हक एलआईसी को मिल गया था। सरकार इस समय आइडीबीआई बैंक के बचे हुए शेयरों को भी बेचने की बात कर रही रही है।

एलआईसी के शेयर जब बाज़ार में बिकने के लिए जारी किये जायेंगे, तब यह बाज़ार में लिस्ट हुई सबसे बड़ी कम्पनी होगी। जिसके पास सबसे अधिक सम्पति होगी। इसलिए बहुत मुश्किल होगा कि एलआईसी का दस फीसदी शेयर एक बार में बिक पाए। क्योंकि जितनी कीमत के ये शेयर हैं उतने बड़े खरीदार बाजार में नहीं है।

एलआईसी के कर्मचारी रामजी तिवारी अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं कि जब LIC का राष्ट्रीयकरण किया गया तो उस समय सरकार ने निगम को 5 करोड़ की मूल पूंजी उपलब्ध कराई। और साथ मे सावरेन गारंटी भी। जिसका मतलब यह था कि LIC के दिवालिया होने की स्थिति में जनता के पैसे को वापस लौटाने की गारंटी सरकार लेगी। साथ ही साथ सरकार ने LIC द्बारा जमा किये पैसे को अपने निर्देशन में निवेश के लिए उपयोग करने का फैसला भी किया।

इसके बाद LIC ने फिर कभी पीछे मुड़कर नही देखा। अपने कुल मुनाफे में से 95 प्रतिशत की राशि वह अपने पॉलिसीधारको के बीच वितरित करती है। और बाकि बची 5 प्रतिशत की राशि वह सरकार को प्रतिवर्ष डिविडेंट के रूप में देती है। यानि सरकार ने जो उसे 5 करोड़ की मूल पूंजी उपलब्ध कराई थी, उसके प्रतिफल के रूप में। यदि हम गत वर्ष का आंकड़ा देखें तो LIC ने सरकार को डिविडेंट के रूप में 2600 करोड़ रुपये प्रदान किया है। जी.एस. टी. के आंकड़े को मिला देने पर यह राशि कई गुना अधिक हो जाती है।

इस पूरी पृष्ठभूमि में यह बात तो साफ है कि एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी को नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है? बेचने के पीछे की वजह क्या है? जब बेचने लायक स्थितियां ही नहीं है।

पहला तर्क तो यह दिया जा रहा है कि सरकार के पास पैसे की कमी है? इसलिए सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है ताकि सरकार के पास पैसा आ पाए। लेकिन इस तर्क में बहुत अधिक दम नहीं लगता। दम इसलिए नहीं लगता क्योंकि यह बात सही है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। यह बात भी सही है कि सरकार को पैसे का जुगाड़ करना चाहिए।

लेकिन इसके जवाब में यह बात सही कैसे हो सकती है कि लाभ कमाती सरकारी कंपनियों को बेच दिया जाए। वैसी कंपनियों को बेच दिया जाए जिसकी साख जनता के बीच सबसे अधिक है। अगर सरकार इन सारी बातों को अलग कर केवल बेचने के बारे में सोच रही है तो इसका मतलब है कि सरकार इन कंपनियों को बेचकर बोझ उतारना चाहती है। और वह अपने अकूत बहुमत के दम पर इस तरह के मनमानी फैसले ले रही है।

दूसरा तर्क आर्थिक जानकारों की तरफ से है कि बाज़ार में एलआईसी की लिस्टिंग हो जाने से एलआईसी के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। इस तर्क का जवाब देते हुए एलआईसी वर्किंग इम्पलॉई एसोसिएशन के वाईस प्रेसिडेंट अनिल कुमार भटनागर ने कहा कि समझ में नहीं आ रहा है कि किसी तरह की पारदर्शिता की बात की जा रही है। एलआईसी अपने सारे खातों को अपने वेबसाइट पर जारी करती है। सारे खाते वेबसाइट पर उपलब्ध है, कोई भी इन्हें पढ़ सकता है।

पारदर्शिता के नाम पर दूसरा सवाल यह उठाया जा रहा है कि एलआईसी में पैसा लगाने वालों को यह पता नहीं चलता कि उनका पैसा कहां लगाया जाता है। इस पर अनिल कुमार भटनागर का कहना है कि एलआईसी का पैसा कहां निवेश होगा, इसका फैसला एलआईसी की बोर्ड करती है।

जो फैसला बोर्ड करती है, उसकी छानबीन करने के लिए इन्सुरेंस रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया होती है। उसके बाद पैसा कहां निवेश किया गया है, इसकी जानकारी भी हम अपने वेबसाइट पर मुहैया करवाते हैं। यह पारदर्शिता नहीं तो और क्या है?

फिर भी चलिए एक समय के लिए उनके कमजोर तर्क को भी मान लेते हैं कि एलआईसी में पारदर्शिता नहीं है तो पारदर्शिता लाने के नाम पर एक पूरी कम्पनी बेच दी जाए जो बेतुकी बात है। अगर सरकार को लगता है कि पारदर्शिता नहीं है तो सरकार कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए क़दम उठा सकती है, बेचने की बात करना बिल्कुल गलत है।

अनिल कुमार भटनागर आगे कहते हैं कि कुछ टीवी वाले तर्क यह भी दे रहे हैं कि अभी डूबी हुई दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में एलआईसी के पैसे का निवेश हुआ था और एलआईसी का पैसा डूब गया। पारदर्शिता आने पर इससे छुटकारा मिलेगा। उनके इस इस तर्क का जवाब उनकी बात में ही है। जवाब यह है कि बाज़ार या सरकारी उपक्रम यानी सबका पैसा डूब सकता है। जैसे किंगफिशर डूब गयी, जेटएयरवेज का दिवालिया निकल गया। सरकरी कंपनी को बाज़ार के हवाले कर देने से यह नहीं होता कि बाज़ार के लोग जहां लगाएंगे, वहां वह डूबेगा नहीं। इस लिहाज से यह तर्क भी बहुत कमजोर है।

अनिल भटनागर कहते हैं कि एलआईसी को बाज़ार के हवाले करने के पीछे सरकार के पास कोई मज़बूत तर्क नहीं है। बस सरकार को पैसा चाहिए और इस पैसे की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अपने सबसे मज़बूत उपक्रम को बर्बाद कर रही है। उस उपक्रम को बर्बाद कर रही है, जो उसके लिए भूकंप, चक्रवात, बाढ़ जैसे आपातकालीन समय में कई बार सहारा बन चुकी है और आगे भी बनेगी। लेकिन सरकार अपने तत्काल फायदे के लिए भविष्य में होने वाले फायदे के आधार को तबाह कर रही है।

एलआईसी के पास मौजूद पैसे के बारे में आप इससे अनुमान लगा सकते हैं कि एलआईसी की जिन सम्पतियों की कीमत खाताबही में सौ करोड़ है, उसकी इस समय बाज़ार में कीमत 5 हज़ार करोड़ से भी अधिक हो सकती है। हो सकता है कि एलआईसी बेचने पर सरकार को पैसा मिले लेकिन इसे बेचने के बाद सरकार अपनी आर्थिक सम्प्रभुता भी गंवा देगी जो भारत की सम्प्रभुता के लिए उचित कदम नहीं है।

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