NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
अब चाहिए सरकार आपके द्वार : इंद्रजीत सिंह
“फ़ासला बनाए रखने के नियम का यह मतलब कतई नहीं होता कि प्रशासन और सरकार जनता से ही पहले से भी ज़्यादा दूर चले जाएं।” पढ़िए किसान नेता इंद्रजीत सिंह का विशेष आलेख
इंद्रजीत सिंह
30 Apr 2020
किसान

यह एक जाना माना तथ्य है कि कोविड या ऐसी किसी भी अप्रत्याशित त्रासदी से कोई भी शासन सक्रिय जन-हिस्सेदारी के बगैर सफलता से नहीं निपट सकता। अतीत में ऐसी सभी तरह की विपदाओं में जनसाधारण ने मानव हित में जो सराहनीय भूमिकाएं अदा की हैं, वे इतिहास में दर्ज हैं। हालांकि इससे भी बुनियादी तथ्य यह भी है कि ऐसी विपदा से निपटने में शासन अथवा राज्य का जो वैधानिक दायित्व बनता है उसका भी विकल्प और कुछ नहीं हो सकता।

बाढ़, सूखा, भूकंप, महामारी, प्राकृतिक आपदा अथवा नसली व सांप्रदायिक नरसंहार जैसी विपत्तियों के प्रकोप से मानव व अन्य प्राणियों को पीड़ा से बचाव व उनके निवारण की जिम्मेवारी शासन की ही होती है और वह इस उत्तरदायित्व से मुकर नहीं सकता। कोरोना संक्रमण से सफलता पूर्वक निपटने में लॉकडाउन के दौरान शासन व प्रशासन को आम जनता के संवेदनशील सेवक के रूप में पेश आना चाहिए था। इसके लिए कारगर व परस्पर संवाद की जरूरत थी। बहुत अफसोस व चिंता का विषय है कि इसके विपरीत वह जनता से और ज़्यादा दूरी बनाने की मुद्रा में जा रहा है। 'फ़ासला बनाए रखने' के नियम का यह  मतलब कतई नहीं होता कि प्रशासन और सरकार जनता से ही पहले से भी ज़्यादा दूर चले जाएं। ऐसी महामारी से सफलतापूर्वक लड़ने के लिए यह एक आवश्यक शर्त है कि  न्यूनतम बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए शासन-प्रशासन के पूरे ढांचे को जनता अपने दरवाजे पर खड़ा पाए। यह अपेक्षा जरूर की जाती है कि  हर स्तर पर सरकारी प्रशासन अपनी समूची कार्यप्रणाली में समय की संज़ीदगी के अनुरूप बदलाव लाए।

ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सरकारों के अधीन जो भी आर्थिक व मानव संसाधन आते हैं वह बुनियादी तौर पर जनता की ही मिलकियत होते हैं। कल्याणकारी राज्य के तहत इनके संरक्षण, संवर्धन और न्यायपूर्ण व पारदर्शी उपयोग, पुनर्वितरण और आवंटन किए जाने का दायित्व जनता ने नीचे से लेकर सर्वोच्च स्तर तक अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों की मार्फत सरकारों को सौंप रखा है। तमाम तरह की खामियों और वर्गीय पूर्वाग्रहों के बावजूद संवैधानिक जनतंत्र के तहत पंचायतों, पालिकाओं व विधायिकाओं में व्यक्तिगत सार्वजनिक महत्व के सवालों पर सत्ता का ध्यान खींचते हुए उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करवाने की व्यवस्था इसी संगति में संविधान में आयद है। जब शासन इस उत्तरदायित्व का न्यायपूर्ण निर्वाह करने से दूर हटकर निरंकुशता की ओर चलने लगे तो लोगों के पास धरने, प्रदर्शन, सत्याग्रह, भूख हड़ताल आदि की रोष कार्रवाइयों के माध्यम से आंदोलन करने का भी एक सशक्त माध्यम रहता है। प्रतिरोध की कार्रवाइयों के द्वारा जनता के भिन्न-भिन्न तबकों को अपने अधिकारों और जायज मांगों को उठाने का संविधानिक हक उनके पास है। हाल में लॉकडाउन के चलते उपरोक्त दोनों ही प्रक्रियाएं एक तरह से अवरुद्ध स्थिति में हैं। न ही तो विधायिकाओं का कामकाज चल रहा और न ही लॉकडाउन में लोग अभी सड़कों पर आकर लड़ने की स्थिति में हैं। उनकी इस मजबूरी को अनुकूल स्थिति के तौर पर न देखा जाए।

बहुमत जनता अचानक बिना किसी पूर्व तैयारी के घोषित किए गए लॉकडाउन से ऐसी विपदा में घिर गई है जिसकी उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी। यह भी कड़वा सत्य है कि आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से जो तबका जितना कमज़ोर है उस तबके को उतनी ही ज़्यादा तकलीफ़ झेलनी पड़ रही है। सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, ट्रेड यूनियनों, जनसंगठनों एवं प्रतिबद्ध व्यक्तियों ने इस कठिन घड़ी में अपनी अपनी क्षमतानुसार ज़रूरतमंद लोगों के लिए आर्थिक व श्रमदान देने का सराहनीय काम किया है। जिन कर्मचारियों व अन्य वेतन भोगी लोगों ने स्वेच्छा से सहायता जुटाई उन्हीं पर और अधिक आर्थिक बोझ डाले जा रहे हैं।  महंगाई भत्ते पर  रोक लग गई है और एलटीसी सुविधा रोक दी गई है। हरियाणा सरकार ने तो एक साल के लिए भर्तियों पर भी रोक लगा दी है। हालांकि नौकरियों की भर्तियां तो पहले भी नगण्य ही थी परन्तु आर्थिक स्थिति का कोई भी ब्यौरा दिये बगैर ऐसे नीतिगत फैसलों से ये प्रभाव देने की कुचेष्टा है जैसे यह सब सरकार को मजबूरीवश ही करना पड़ रहा हो ।

बहरहाल जनता की भरपूर सामाजिक एकजुटता के बावजूद भारी संख्या में अनेकों लोग स्वास्थ सेवाएं और अन्य सुविधाएं तो दूर मात्र भोजन तक के मोहताज हैं तो निश्चित तौर पर शासन-प्रशासन के स्तर पर प्रबंधन व राहत पहुंचाने के काम में यह बड़ी विफलता है। लगभग हर शहर में पीड़ित लोग दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं पर कोई यह बताने वाला नहीं है कि जाएं तो जाएं कहां। भोजन तक के लिए बाहर कदम रखते हैं तो पुलिस द्वारा पीटे जाने और अपमानित किए जाने का डर सिर पर मंडराता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि ये वही वंचित तबके हैं जिन्हें दशकों से भेदभाव व उत्पीड़न का शिकार बनाते हुए इस स्थिति में ला छोड़ा है। उनके मन में अब यह सवाल आना लाजमी है कि सबका साथ मांगते हुए जो सबका विकास और सबका विश्वास की जो बात कही गई थी वो केवल थोथी जुमलेबाजी ही थी।

समय रहते प्रबंध करने की विफलता का नज़ारा हर क्षेत्र में देखा जा सकता है

अनाज मंडियों में जो बदहाली है उसकी तो तस्वीरें भी नहीं देखी जाती। फ़सलों की ख़रीद के मामले में जो अफरा-तफरी सामने आई उसे लेकर सरकार और उसका प्रशासन इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। अनाज खरीद का विषय कोरोना से जूझने में खाद्य सुरक्षा के लिए जो अहमियत रखता है उसे नहीं समझा जा रहा। ख़रीद प्रबंधन की कोताही और प्रणाली में किये गए एकतरफा बदलावों का परिणाम यह है कि किसान और उसकी फ़सल दोनों ही दुर्गति के शिकार हुए हैं। खुले आकाश के नीचे लाख़ों क्विंटल अनाज बरसात में भीग कर बर्बाद हो गया। तुलने के बावजूद ये नुकसान किसान के ही खाते में है।

किसी को नहीं पता कि आढ़तियों की हड़ताल का असली मुद्दा क्या है। सरकार ने खरीद प्रणाली को लेकर किसान संगठनों से परामर्श करना जरूरी नहीं समझा। एक तरफ तो कहा गया कि आढ़ती इस मौके पर किसान से अपने बकाये की वसूली करना चाहता है इसलिए वह सरकार द्वारा किसान के खातों में सीधी पेमेंट का विरोध कर रहा है। जबकि किसान को यह डर भी है कि सरकार के बैंक भी किसान से इसी मौके पर कर्जे की वसूली करने की ताक में बैठे हैं। इस सन्दर्भ में यह कहावत कि चाकू चाहे खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर आखिर कटना तो खरबूजे को ही है, यहां चरितार्थ हो रही है। कहीं न कहीं यह सवाल भी है कि बिचौलिए के खात्मे की आड़ में सरकारी ख़रीद प्रणाली से ही सरकार पल्ला झाड़ने की ओर बढ रही है।

अनाज मंडी का प्रकरण यहां मात्र एक उदाहरण के रूप में लिया गया है।

इस विकट स्थिति में हरियाणा के मुख्यमंत्री की अपील कि नेता लोग अनाज मंडियों में न जाएं और गृह मंत्री द्वारा ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की सार्वजनिक धमकी केवल मात्र एक संयोग नहीं है। दरअसल यह लॉकडाउन की आड़ में शासन की विफलताएं छिपाने और जवाबदेही से बचने का ऐसा रुझान है जिसके स्पष्ट संकेत प्रशासन भी ले रहा है। अफसरशाही द्वारा मनमानी करने की अपनी एक चिरपरिचित तासीर है। ऊपर से राजनीतिक आकाओं की ओर से ऐसे निरंकुश संदेश मिलने के बाद अधिकतर अफसर जनता से कैसे पेश आते हैं यह समझना मुश्किल नहीं।

लोकतांत्रिक परंपराओं और पारदर्शी शासन प्रणाली को सरेआम धता बताते हुए लोगों के अधिकारों को बाईपास करने की ऐसी परिपाटी लॉकडाउन जैसी असामान्य परिस्थितियों में पड़ जाने की संभावनाएं ज़्यादा रहती हैं। 1975 की इमरजेंसी का दौर इसका प्रमाण है।

यह लोकतंत्र के लिए तो घातक है ही साथ में जिस कोरोना से निपटने के नाम पर यह सब चल रहा है वह वास्तव में बीमारी विरोधी लड़ाई को भी कमजोर ही कर रहा है। ऐसी मनमानीपूर्ण कार्यप्रणाली भ्रष्टाचार के फलने फूलने के लिए भी अनुकूल वातावरण पैदा करती है।

उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन की अनुपालना अपने आप में कोई कानून व्यवस्था का मसला नहीं है। इसमें लोगों की सक्रिय हिस्सेदारी जरूरी है। जीवंत संवाद के बिना जन-हिस्सेदारी संभव नहीं होती। सूचना तंत्र अपने आप में एक ऐसा कारक है जिसकी मजबूती के बिना इतना अहम अभियान चल नहीं सकता। हम देख रहे हैं कि सूचना तंत्र दयनीय दशा में है। दो-चार किल़ो राशन के लिए एक व्यक्ति को बैंकों, खाद्य आपूर्ति दफ़्तर, नगर पार्षद आदि के चक्कर काटने को बाध्य किया जा रहा है। उसे यह नहीं पता कि उसे कहां जाना चाहिए। इस प्रकार चक्कर कटवाने के लिए बाध्य करना क्या लॉकडाउन को कमजोर करना नहीं है ? यदि आम आदमी लॉकडाउन तोड़ते पाया जाए तो उसे दंडित किया जाता है। तो ज़रूरतमंद व्यक्तियों को चक्कर कटवाने को बाध्य करने वाले अधिकारी और उनके आका क्या जवाबदेह नहीं हैं?

जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए और उन्हें अभियान में सक्रिय रूप से शामिल किए बिना सूचना तंत्र और राहत कार्यों को भी कारगर नहीं बनाया जा सकता। धरातल पर स्थिति यह है कि हेल्पलाइनों के फोन कोई उठाता नहीं है। विपक्षी ‌ दलों के प्रतिनिधियों से ज़िले के उच्चाधिकारी मिलना नहीं चाहते। यदि वे प्रशासन तक लोगों की दिक्कतें पहुंचाना चाहते हैं तो इसे फालतू का सिरदर्द समझा जा रहा है।

जनतंत्र को विस्तार देने के लिए जन के तत्व को बढ़ाया जाना जरूरी है न कि तंत्र के शिकंजे को और कस दिया जाए। इस संदर्भ में कोरोना को नियंत्रित करने में केरल को एक मॉडल की तरह से दुनिया भर में सराहा गया है। पिछले सप्ताह इंग्लैंड के प्रतिष्ठित अखबार 'द गार्जियन' ने अपने प्रथम पृष्ठ पर केरल सरकार और मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की खुलकर तारीफ़ की है। वहां जन हिस्सेदारी अपने आप में एक निर्णायक व अनुकरणीय कारक रहा है।

देश में अभी कोरोना से मुक्ति मिलने के स्पष्ट संकेत नहीं हैं। बाद में लंबे समय तक इसके चौतरफा प्रभावों से रूबरू होना पड़ेगा। नव उदारीकरण की दिवालिया नीतियों की जगह जनपक्षीय और समतामूलक नीतियों को लाए बिना पहले से ही बढ़ी बेरोज़गारी और भी विकराल रूप लेगी, यह तय है। ग़रीबी की दर तथा आर्थिक विषमता की खाई और ज़्यादा बढ़ेगी। इसलिए बदहाली की शिकार बहुमत जनता को अभी से दृढ़ निश्चय के साथ शासन-प्रशासन की निरंकुशता पर लगाम लगाने और उसे जनतांत्रिक तरीके से पेश आने के लिए बाध्य करने की कार्यनीति अपनानी होगी।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के नेता हैं। आप मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) केंद्रीय समिति के पूर्व सदस्य भी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Coronavirus
COVID-19
Lockdown
farmer
Agriculture
farmer crisis
Agriculture Crisis
Hunger Crisis
poverty
Central Government
State Government

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

कार्टून क्लिक: किसानों की दुर्दशा बताने को क्या अब भी फ़िल्म की ज़रूरत है!

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी चुनाव : किसानों ने कहा- आय दोगुनी क्या होती, लागत तक नहीं निकल पा रही

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!


बाकी खबरें

  • nihang
    अजय कुमार
    निहंग कौन हैं? क्या निहंगों को आगे कर षड्यंत्र रचा गया है?
    20 Oct 2021
    निहंग कौन हैं? इनका इतिहास क्या है? हिंसा को ढाल बनाकर क्या भाजपा सरकार ने फिर से कोई चाल तो नहीं चल दी है?
  • flooding
    रवि कौशल
    दिल्ली के गांवों के किसानों को शहरीकरण की कीमत चुकानी पड़ रही है
    20 Oct 2021
    नरेला के गढ़ी बख्तावरपुर गांव में एक उफनते नाले की वजह से खेतों में साल भर में लगभग आठ महीने तक जलभराव की स्थिति बनी रहती है।
  • Uttar Pradesh's soil testing laboratories stalled but publicity completed
    राज कुमार
    उत्तर प्रदेश की मिट्टी जांच प्रयोगशालाएं ठप लेकिन प्रचार पूरा
    20 Oct 2021
    भाजपा उत्तर प्रदेश ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को लेकर एक वीडियो ट्वीट किया है, आइए जानते हैं इसकी हक़ीक़त।
  • Ajay Mishra Teni cannot be a part of the Council of Ministers of the Government of India: SKM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अजय मिश्रा टेनी भारत सरकार के मंत्रिपरिषद का हिस्सा नहीं रह सकते : एसकेएम
    20 Oct 2021
    एसकेएम की मांग है कि अजय मिश्रा को तुरंत बर्ख़ास्त और गिरफ़्तार किया जाए, और ऐसा न करने पर लखीमपुर खीरी हत्याकांड में न्याय के लिए आंदोलन तेज़ किया जाएगा
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 14,623 नए मामले, 197 मरीज़ों की मौत
    20 Oct 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 41 लाख 8 हज़ार 996 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License