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आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
26-27 नवंबर को किसानों-मज़दूरों का मोर्चा देश को बचाने की लड़ाई है
किसानों तथा मज़दूर वर्ग के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनका मुद्दा महज़ उनके तबकायी हित नहीं हैं वरन हमारे राष्ट्रीय जीवन के व्यापक महत्व के सवाल हैं।
लाल बहादुर सिंह
21 Nov 2020
aikkms
फोटो साभार : सोशल मीडिया

यह एक संयोग मात्र नहीं है, वरन जनांदोलनों के बीच बढ़ती एकता का नमूना है कि 26-27 नवंबर को देश के सारे किसान और मज़दूर संगठनों ने मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोला है, मज़दूरों की आल इंडिया जनरल स्ट्राइक और किसानों का दिल्ली चलो एक ही दिन!

मज़दूरों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान करने वाले Joint Platform of Central Trade Unions and Sectoral Federations & Associations ने अपने मांग पत्र में केंद्र सरकार के किसान  विरोधी काले कानूनों की वापसी की मांग भी शामिल किया है और कहा है कि " 26 नवंबर की आम हड़ताल और चक्का जाम सरकार के खिलाफ अवज्ञा और असहयोग (defiance and non-cooperation ) की दिशा में नई ऊंचाई की ओर बढ़ते जनता के संघर्ष के अगले चरण का आगाज है ।"

उधर देश के सारे किसान संगठन अब एक साझा मंच AIKSCC (All India Kisan Sangharsh Coordination Committee ) के झंडे तले आ चुके हैं और आर-पार के मूड में हैं। आंदोलन का केंद्र जरूर हमारे सबसे बड़े अनाज-उत्पादक राज्य पंजाब-हरियाणा बने हुए हैं, पर अलग-अलग स्तर पर हलचल देश के तमाम राज्यों में है।

किसानों और मज़दूरों की इस उभरती एकता के तार एक ही उद्गम से जुड़े हुए हैं। मोदी सरकार ने कोरोना काल की असाधारण आपदा को अवसर में बदलते हुए पिछले कार्यकाल से लंबित पड़े कथित आर्थिक सुधारों को एक झटके में कानूनी जामा पहना दिया है।

दरअसल, पिछले कार्यकाल में ऐसा न कर पाने के कारण वे अपने धुर समर्थक कारपोरेट घरानों तथा नव-उदारवादी अर्थशास्त्रियों की आलोचना के भी पात्र बन हुए थे, जिनकी यह शिकायत थी कि मोदी जी bold ढंग से आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ा पा रहे। अब मोदी जी ने एक झटके में सारी शिकायतें दूर कर दीं हैं।

सरकार के नीति-नियामकों की समझ रही होगी कि महामारी के चलते इन कदमों के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन नहीं हो पायेगा। पर यहाँ वे चूक कर गए।

दरअसल, इन कथित कृषि तथा श्रम सुधारों ने किसानों तथा मज़दूरों के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया है। श्रम-कानूनों में बदलाव ने तो मज़दूरों का लड़ने का अधिकार भी एक तरह छीन लिया है। इसलिए उनके सामने फौरी तौर पर ही लड़ाई में उतरने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है अपनी अस्तित्व-रक्षा का।

पर किसानों तथा मज़दूर वर्ग के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनका मुद्दा महज उनके तबकायी हित नहीं हैं वरन हमारे राष्ट्रीय जीवन के  व्यापक महत्व के सवाल हैं।

सरकार जो बड़े बदलाव कर रही है, उनका हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर, सारी जनता के जीवन पर दूरगामी असर पड़ने वाला है। श्रमिकों के चार्टर का एक प्रमुख बिंदु पब्लिक सेक्टर के निजीकरण का, उसे औने-पौने दाम में कारपोरेट के हाथों सौंपे जाने तथा इनमें FDI की मुख़ालफत है।

रेलवे, डिफेंस, कोयला, बैंकिंग, BSNL, वित्तीय क्षेत्र आदि में यह अभियान धड़ल्ले से जारी है।

सबसे ताजा उदाहरण पेट्रोलियम सेक्टर की नामी कम्पनी BPCL का है, जो पिछले 5 साल से सालाना 8 से 10 हजार करोड़ लाभांश कमा रही है, वर्ष 2018-19 में इसने 7132 करोड़ मुनाफा कमाया। उसे बेचा जा रहा है और लगभग 9 लाख करोड़ की अनुमानित worth की इस कम्पनी के सौदे में 4.46 लाख करोड़ राष्ट्रीय सम्पत्ति के नुकसान का अनुमान है। विराट राष्ट्रीय सम्पदा के कारपोरेट के हाथों हस्तांतरण के साथ ही देश की राष्ट्रीय Energy Security के लिए  भी इसके गम्भीर निहितार्थ हैं।

यही कहानी एक एक कर भारी मुनाफा कमाने वाले सभी सरकारी उपक्रमों/ संस्थानों/ पब्लिक सेक्टर कम्पनियों के साथ दुहरायी जा रही है। सरकारी उद्यमों के विनिवेश या बिक्री के लिए उनके घाटे में होने का तर्क अब अतीत की बात हो चुकी है।

ठीक इसी तरह किसान और मज़दूर संगठनों, दोनों ने बिजली क्षेत्र के निजीकरण के लिए लाये जा रहे Electricity ( Amendment ) Bill 2020 & Standard bidding document  को अपने आंदोलन का प्रमुख निशाना बनाया है और All India Power Engineers Federation भी इस आंदोलन में शामिल है।

कृषि क्षेत्र में लाये गए नए कानून के अनुसार अब किसानों को बिना सरकारी हस्तक्षेप या मध्यस्थता के सीधे कारपोरेट खरीददार से deal करना होगा। इस बेहद गैर-बराबरी वाली डील में किसान ताकतवर निजी खरीददार की कृपा पर निर्भर हो जाएंगे, APMC एक्ट में बदलाव के फलस्वरूप MSP के निष्फल ( Infructuous ) हो जाने के बाद बाजार के उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए किसान के पास कोई रक्षा-कवच नहीं रह जायेगा,  वे और अधिक कर्ज़ में डूब जाएंगे।

मजेदार यह है कि सरकार बार बार यह राग अलाप रही है कि MSP व्यवस्था जारी रहेगी, लेकिन नए कानून में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है,  न तो सरकार किसान-आंदोलन की इस मुख्य मांग को मानने को तैयार है कि MSP से नीचे कोई खरीद नहीं होगी, कहा जा रहा है कि MSP को किसानों का कानूनी अधिकार बना देने से बाजार का सर्वनाश हो जाएगा, प्राइवेट खरीददार बिदक जाएंगे, वे बाजार में आने से हिचकेंगे !

जिस समय भारत में किसानों को सरकारी समर्थन को लेकर यह अजीबोगरीब तर्क दिया जा रहा है और बाजार के सर्वनाश पर छाती पीटी जा रही है,  उसी समय बाजारवाद के मक्का अमेरिका में कुल 425 अरब डॉलर सरकारी समर्थन किसानों को मिल चुका है। OECD (Organisation of Economic Cooperation and Development ) के Producer Support Estimate (PSE ) के अनुसार जहां अमेरिका, चीन, रूस, ब्राज़ील, कोरिया, जापान, इंडोनेशिया, टर्की समेत तमाम देशों के किसानों को अपनी सरकारों की ओर से भारी  सब्सिडी समर्थन मिल रहा है, वहीं भारत के लिए  PSE ( - 5.7%) है अर्थात कुल मिलाकर सरकारी समर्थन की बजाय उन्हें Tax  किया जा रहा है। यह स्थिति अब तक लागू MSP के बावजूद है। कल्पना की जा सकती है कि समर्थन मूल्य खत्म होने के बाद अब क्या स्थिति होगी !

अगर सरकार के तर्क में दम होता तो बिहार के किसानों को तो अब तक मालामाल हो जाना चाहिए था, क्योंकि वहां तो APMC एक्ट नीतीश कुमार ने मोदी जी से डेढ़ दशक पहले 2006 में ही खत्म कर दिया था। हालत यह है कि इस साल भी 10 लाख टन अनाज 1000-1100/- प्रति क्विंटल के भाव बिहार से खरीदकर 1868/-प्रति क्विंटल के भाव पर पंजाब में मंडियों में बेचा गया। बाजारवाद के इस तर्क के हिसाब से तो किसानों की उस विराट आबादी को जिसका उत्पाद आज तक MSP के दायरे से बाहर बाजार के हवाले रहा है, उसे बहुत खुशहाल होना चाहिए? पर सच्चाई तो इसके ठीक विपरीत है ।

सर्वोपरि, कृषि क्षेत्र में किये जा रहे बदलावों का हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए गम्भीर निहितार्थ है। प्रो. प्रभात पटनायक ने इस खतरे को बेहद तल्खी से नोट किया है कि इनका सबसे भयावह परिणाम होगा हमारी खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का अंत।

"ये बदलाव भारतीय कृषि को साम्राज्यवादी देशों तथा कारपोरेट पूंजी की जरूरत और मांग के अनुरूप ढालने की ओर लक्षित हैं। वित्तीय पूंजी लंबे समय से भारत जैसे देशों के सम्पूर्ण कृषि उत्पादन के ढांचे पर  नियंत्रण कायम करने का प्रयास कर रही है। उनकी कोशिश है कि भारत में खाद्यान्न उत्पादन कम हो, इसके स्थान पर भारत फल, सब्जी, पेय (beverages), fibres, विभिन्न किस्म के अनाजों, तेलहन आदि की फसलों का उत्पादक बनकर ठंडे आबोहवा वाले (cold temperate region ) के उन साम्राज्यवादी देशों को आपूर्ति करे जहां इनका उत्पादन या तो नहीं हो पाता या अपर्याप्त होता है। वे चाहते हैं कि भारत अपनी खाद्यान्न जरूरतों के लिए उनसे आयात करे, उनके ऊपर निर्भर रहे।

इसके लिए वे भारत में खाद्यान्न उत्पादन पर हर तरह की सब्सिडी,  सरकारी समर्थन मूल्य खत्म करने,  APMC के माध्यम से खरीद के ढांचे को समाप्त करने, तथा भारत में कृषि व्यापार के क्षेत्र में देशी-विदेशी निजी खिलाड़ियों को बड़े पैमाने पर प्रवेश देने, कांट्रेक्ट खेती के माध्यम से कृषि उत्पादन का प्रभावी नियंत्रण वित्तीय पूंजी और कारपोरेट के हवाले करने तथा विदेश से खाद्यान्न आयात करने के लिए भारत की सरकारो पर दबाव डालते रहे हैं। अपनी बात मनवाने के लिए  विश्व बैंक, IMF और WTO आदि का उन्होंने इस्तेमाल किया है।"

कृषि क्षेत्र में नए कानूनों को लाकर मोदी सरकार ने वित्तीय पूंजी और कारपोरेट दबावों के आगे घुटने टेक दिए हैं।

जाहिर है किसानों और मज़दूरों का यह मोर्चा उनके sectoral interests के साथ ही हमारी अर्थव्यवस्था की संप्रभुता, हमारे बेशकीमती राष्ट्रीय संसाधनों तथा हमारी जनता के जीवन को बचाने का भी मोर्चा है। किसानों और मज़दूरों को अपने आंदोलन के दायरे को व्यापक बनाते हुए मोदी राज के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी की ओर बढ़ना होगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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