NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
ऑनलाइन एजुकेशन तो ठीक है लेकिन कहीं ये 'डिजिटल खाई' तो नहीं बना रहा है?
केरल के मलप्पुरम में ऑनलाइन क्लास छूटने के बाद एक दलित छात्रा ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि दिहाड़ी मज़दूर की 14 साल की बेटी घर में टीवी सेट या स्मार्टफोन न होने के कारण क्लास अटेंड नहीं कर पाई थी। देश की राजधानी दिल्ली समेत बाक़ी राज्य भी इसी तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं। एक समग्र विवेचन
अमित सिंह
04 Jun 2020
ऑनलाइन एजुकेशन
Image courtesy: Business Insider

दिल्ली: केरल में ऑनलाइन कक्षा में हिस्सा नहीं ले सकने की वजह से दसवीं कक्षा की एक दलित छात्रा ने कथित रूप से आत्मदाह कर लिया। केरल में नया शैक्षणिक सत्र ऑनलाइन कक्षाओं के साथ सोमवार से शुरू हुआ है। छात्रा एक दिहाड़ी मज़दूर की बेटी थी। उसके घर पर स्मार्ट फोन नहीं था और घर का टीवी भी ख़राब था, जिससे वह क्लास में किसी तरह से हिस्सा नहीं ले पाई।

यह घटना सोमवार शाम को वलान्चेरी में हुई। इससे कुछ घंटे पहले ही स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गई थी क्योंकि कोरोना वायरस की वजह से लागू किए गए लॉकडाउन के कारण शिक्षण संस्थान बंद हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 14 साल की इस छात्रा ने सोमवार शाम को अपने घर के पास आत्मदाह कर लिया। पीड़िता के पिता लॉकडाउन की वजह से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

टाइम्स आफ इंडिया के मुताबिक पड़ोसियों और टीचर्स ने बताया कि देविका पढ़ने में काफी तेज थी। वहीं, स्थानीय विधायक आबिद हुसैन ने इस घटना का हवाला देते हुए राज्य सरकार की इस योजना की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऑनलाइन क्लासेज शुरू करने से पहले राज्य सरकार ने पर्याप्त तैयारी नहीं की थी।

दूसरी ओर, प्रदेश के शिक्षा मंत्री सी रवींद्रनाथन ने शिक्षा विभाग के डेप्युटी निदेशक से इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि प्रदेश के छात्रों के लिए ऑनलाइन क्लासेज को सुलभ बनाने पर काम जारी है और जल्दी ही सभी छात्रों को इसकी निर्बाध सुविधा उपलब्ध होगी।

गौरतलब है कि लॉकडाउन में बच्चों की पढ़ाई जारी रहे, इसके लिए हमारे देश में भी ऑनलाइन माध्यम का सहारा लिया जा रहा है लेकिन सभी परिवारों के पास कंप्यूटर, टेलीविजन, स्मार्ट फोन और लैपटॉप जैसी जरूरी चीजें तथा इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा नहीं है।

नेशनल सैंपल सर्वे की शिक्षा पर एक रिपोर्ट (2017-18) बताती है कि देश के महज 24 फीसदी पारिवारों के पास इंटरनेट की सुविधा है। गांवों में यह आंकड़ा 15 तथा शहरों में 42 फीसदी के आसपास है। जिन घरों में पांच से लेकर 24 साल तक की उम्र के लोग हैं, उनमें से केवल आठ फीसदी परिवारों के पास ही कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है। इस तथ्य का विश्लेषण करें, तो सबसे गरीब 20 फीसदी परिवारों में से केवल 2.7 फीसदी के पास कंप्यूटर और 8.9 फीसदी के पास इंटरनेट उपलब्ध है।

शीर्ष के 20 फीसदी घरों में ये आंकड़े क्रमश: 27.6 तथा 50.5 फीसदी है। इसका मतलब यह है कि मध्य आयवर्ग के परिवारों में भी सभी के पास ऐसी सुविधा नहीं है कि उनके बच्चे ठीक से ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई कर सकें। एक बड़ी समस्या बिजली के निर्बाध आपूर्ति की भी है।

इस संदर्भ में यह भी सोचा जाना चाहिए कि देश के सबसे अधिक साक्षर और संपन्न राज्यों में शुमार केरल में अगर डिजिटल विषमता की खाई ऐसी है कि एक बच्ची को जान देने की नौबत आ सकती है, तो पिछड़े राज्यों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जबकि केरल सरकार ने ऑनलाइन क्लासेज की शुरुआत से पहले बड़े पैमाने पर तैयारी कर रखी थी।

यानी स्थिति साफ है कि शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को अगर डिजिटल तकनीक पर निर्भर बना दिया जायेगा, तो करोड़ों गरीब, निम्न व मध्य आयवर्गीय परिवारों के बच्चे पीछे छूट जायेंगे।

हालांकि इस डिजिटल खाई को पाटने के बजाय सरकार डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने में लगी हुई है। आपको बता दें कि नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट कहती है कि भारत के 55,000 गांवों में मोबाइल नेटवर्क कवरेज नहीं था।

इंडिया टूडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों के किए गए एक अन्य सर्वेक्षण में छात्रों के बीच डिजिटल पहुंच की विविधता पर भी प्रकाश डाला गया। सर्वेक्षण में शामिल लगभग 2,500 छात्रों में से 90 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास एक मोबाइल फोन तो है, लेकिन केवल 37 प्रतिशत ने ही कहा कि वे ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ सकते हैं। अन्य छात्र अनिश्चित कनेक्टिविटी, डेटा कनेक्शन की लागत या अनिश्चित बिजली आपूर्ति के कारण ऑनलाइन क्लासेज से नहीं जुड़ पा रहे थे।

यहां तक कि दिल्ली विश्वविद्यालय के ओपन-बुक परीक्षाओं को ऑनलाइन रखने के निर्णय का छात्रों और शिक्षकों की ओर से काफी विरोध हुआ। 35 से अधिक कॉलेजों के 12,214 छात्रों के बीच कैंपस मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया कि 85 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन परीक्षाओं के खिलाफ थे, 75.6 प्रतिशत के पास उन कक्षाओं में भाग लेने या परीक्षाओं के लिए बैठने के लिए लैपटॉप नहीं था जबकि 79.5 प्रतिशत के पास हाइस्पीड वाला ब्रॉडबैंड नहीं था। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास अच्छा मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ने दावा किया कि उनके घर ऑनलाइन परीक्षा देने के लिए अनुकूल नहीं थे।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्कूली शिक्षा भी उन्हीं परेशानियों से जूझ रही है। जब दिल्ली राज्य शिक्षा विभाग ने लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कीं, तो पाया कि छात्रों की हाजिरी 25 से 30 प्रतिशत के बीच ही रही। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले ज्यादातर बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से हैं।

इसके अलावा पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘दौलत राम कॉलेज’ में पढ़ाने वालीं डॉ. संज्ञा उपाध्याय ने लड़कियों की ऑनलाइन क्लास लेने के अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा  किया था। वो लड़कियों के हवाले से लिखती हैं, “मैम मैं अब और क्लास नहीं कर सकूंगी। मेरा मोबाइल रीचार्ज नहीं हो सकता है। पापा ने मना कर दिया है, पैसे नहीं हैं”  और “मैम, एक ही कमरे का घर है। क्लास के वक्त सब वहीं होते हैं। कोई भी किसी काम के लिए कह दे, तो मना नहीं कर सकती और ध्यान भी बंटता है, इसलिए...”

हालांकि दूसरी ओर इस सबसे बेपरवाह भारत के मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने दावा किया है कि जब तक बच्चे स्कूल नहीं पहुँच रहे हैं, तब तक ऑनलाइन क्लास के ज़रिए उनके स्कूल घर तक पहुँच गए हैं। लेकिन वह बड़ी चालाकी से ये बात छिपा जाते हैं कि शहरी और सक्षम वर्ग के लिए तो ई-क्लास एक समाधान ला रही है लेकिन छात्रों का एक अच्छा-खासा तबका ऐसा है, जिसके पास आज भी स्मार्ट फोन नहीं है वो एक बड़ी सहूलियत से पूरी तरह महरूम रह जाएंगे। सरकार इस डिजिटल खाई को पाटने के लिए क्या कदम उठा रही है?

digital india
Online Classes
Kerala
kerala suicide case
poverty
Poverty in India
Digital India and Poor people
Education System In India

Related Stories

उत्तराखंड: तेल की बढ़ती कीमतों से बढ़े किराये के कारण छात्र कॉलेज छोड़ने को मजबूर

बिहारः प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट आईटीआई में शिक्षा महंगी, अभिभावकों को ख़र्च करने होंगे ज़्यादा पैसे

लॉकडाउन में लड़कियां हुई शिक्षा से दूर, 67% नहीं ले पाईं ऑनलाइन क्लास : रिपोर्ट

सीटों की कमी और मोटी फीस के कारण मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं छात्र !

ऑनलाइन शिक्षा में विभिन्न समस्याओं से जूझते विद्यार्थियों का बयान

उत्तराखंड में ऑनलाइन शिक्षा: डिजिटल डिवाइड की समस्या से जूझते गरीब बच्चे, कैसे कर पाएंगे बराबरी?

बिहार के बाद बंगाल के स्कूली बच्चों में सबसे ज़्यादा डिजिटल विभाजन : एएसईआर सर्वे

इतना अहम क्यों हो गया है भारत में सार्वजनिक शिक्षा के लिए बजट 2021?

इस साल और कठिन क्यों हो रही है उच्च शिक्षा की डगर?

कोविड में स्कूलों से दूर हुए गरीब बच्चे, सरकार का ध्यान केवल ख़ास वर्ग पर


बाकी खबरें

  • mmummies
    संदीपन तालुकदार
    चीन के तारिम बेसिन ममी : डीएनए विश्लेषण से सामने आए हैरान करने वाले तथ्य
    30 Oct 2021
    27 अक्टूबर को 'नेचर' में प्रकाशित नए अध्ययन से पता चलता है कि यह ममी कुछ स्वदेशी लोगों के अवशेष हैं जिन्होंने शायद अपने पड़ोसी समूहों से कृषि विधियों को अपनाया था।
  • Mau saree Industry Crisis
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: मऊ में टूटी साड़ी उद्योग की कमर और बिनकारी करने वाले फनकारों का हुनर!
    30 Oct 2021
    मऊ की बुनकर कॉलोनी में नजराना कहती हैं, "पावरलूम पर खड़े-खड़े पैर सूज जाते हैं। नसें सुन्न पड़ जाती हैं। हमें पता है कि ये साड़ियां हमें असमय बूढ़ा कर देंगी और आंखों की रोशनी भी छीन लेंगी। शायद यही…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,313 नए मामले, 549 मरीज़ों की मौत
    30 Oct 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 42 लाख 60 हज़ार 470 हो गयी है।
  • Tripura
    वसी मनाज़िर
    त्रिपुरा और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की बराबरी करना क्यों बेमानी है?
    30 Oct 2021
    त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा की संस्थागत प्रकृति, और सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इसे नियंत्रण न करना, इसे बांग्लादेश में हुए हिंदुओं के खिलाफ हालिया हमलों से अलग करती है।
  • EVS
    विनीत भल्ला
    ईडब्ल्यूएस आरक्षण की 8 लाख रुपये की आय सीमा का 'जनरल' और 'ओबीसी' श्रेणियों के बीच फ़र्क़ मिटाने वाला दावा भ्रामक
    30 Oct 2021
    'आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों' के लिए आरक्षण को लेकर पात्रता हासिल करने के लिहाज़ से ऊपरी आय सीमा के पीछे की दलील को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के सामने दायर केंद्र सरकार ने जो हलफ़नामा दिया है, वह…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License