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भारत
राजनीति
फिर बनारस आ रहे हैं मोदी, रखेंगे अमूल प्लांट की आधारशिला, लेकिन किसान नाराज़, नहीं मिला ज़मीन का मुआवज़ा 
औद्योगिक विकास प्राधिकरण (सीडा) यह दावा कर रहा है कि सभी किसानों को मुआवजा दे दिया गया है। जबकि सच यह है कि ज़्यादातर किसानों को फूटी कौड़ी नहीं मिल सकी है। ज़मीन का मुआवज़ा न मिलने की वजह के कई किसानों की बेटियों के हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं।
विजय विनीत
20 Dec 2021
banaras
एग्रो पार्क की जमीन के मुआवजे के लिए धरने पर बैठीं महिलाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 23 दिसंबर 2021 को बनारस के करखियांव स्थित एग्रो पार्क में जिस अमूल डेयरी प्लांट की आधारशिला रखने आ रहे हैं वहां के किसान संकट में है। संकट इसलिए है कि जिन किसानों की जमीन अमूल प्लांट के लिए अधिग्रहीत की गई हैं उनमें अधिसंख्य को अभी तक मुआवजा नसीब नहीं हुआ है। यह स्थिति तब है जब उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (सीडा) यह दावा कर रहा है कि सभी किसानों को मुआवजा दे दिया गया है। नंगा सच यह है कि अधिसंख्य किसानों को अभी तक फूटी कौड़ी नसीब नहीं हो सकी है। जमीन का मुआवजा न मिलने की वजह के कई किसानों की बेटियों के हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं। 

बनारस से करीब 30 किमी दूर जौनपुर के बार्डर पर स्थित एग्रो पार्क में अमूल डेयरी प्लांट की स्थापना की जानी है। इस प्लाट के लिए साल 2000 में जमीन का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन बाद में मुआवजे का पेंच फंस गया। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने अमूल प्लांट और अन्य उद्यमों के लिए जिन किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया था, उनमें करखियांव, बिंदा, तुरही, भुस ली, केहर, फूलपुरी, थरी, कुसांव और डिग्घी गांव के सैकड़ों लोग शामिल हैं। जमीन का मुआवजा काफी कम होने के कारण सौ से अधिक किसानों ने जिला एवं सत्र न्यालय में भूसंदर्भ (एलएआर) दाखिल किया। कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण किसानों को बढ़ी हुई दरों पर मुआवजा देने का निर्देश दिया। सीडा इसके लिए तैयार नहीं हुआ और मामला हाईकोर्ट चला गया। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2018 को किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए किसानों का क्रमशः 5100 और 4760 रुपये प्रति डिस्मिल की दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस बीच प्रशासन के साथ मिलकर सीडा के अधिकारी किसानों की जमीन पर जबरिया कब्जा करने की कोशिश करते रहे। बीच-बीच में प्रशासनिक अफसरों और किसान के बीच टकराव व झड़पें होती रहीं। इलाकाई किसान कभी हंसिया-कुदाल के साथ तो कभी लाठी-डंडा लेकर आंदोलन-प्रदर्शन कर मुआवजा मांगते रहे। वो अड़े हुए थे कि जब तक मुआवजे की राशि उनके खाते में नहीं जाएगी, तब तक वो अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।

इस बीच भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) के जिलाध्यक्ष धनंजय सिंह समेत कई किसानों को गुंडा एक्ट में निरुद्ध कर दिया गया। फिर भी किसानों का हौसला नहीं टूटा। इसी दौरान किसानों को ज्यादा मुआवजा न देने पर अड़ा राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चला गया। सीडा के अफसरों को उम्मीद थी कि किसान मुआवजे की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं लड़ सकेंगे और उनका आंदोलन दम तोड़ देगा। फिर भी किसानों ने हार नहीं मानी और अंततः उनकी जीत हुई। 4 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को जायज बताते हुए बढ़ी हुई दरों पर किसानों को मुआवजा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। 

भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष धनंजय सिहं बताते हैं, "एक दशक तक चले लंबे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही वाराणसी जिला प्रशासन बेलगाम हो गया। जमीन के मुआवजे की राशि खाते में आने से पहले ही बनारस के कलेक्टर कौशलराज शर्मा भारी पुलिस फोर्स के साथ करखियांव पहुंचे। अपनी मौजदूगी में किसानों के खेतों में रोपी गई धान की सारी फसल जेसीबी लगाकर रौंदवा डाली और हमारी जमीनों पर जबरिया कब्जा ले लिया गया। बगैर मुआवजा दिए धान की खड़ी फसल जोते जाने का विरोध किया तो पुलिस ने हमारे साथ बदसलूकी की और हमारे साथ दो अन्य साथियों- निहाला पाल व संजय राजभर को गिरफ्तार कर लिया गया। यह घटना 21 अगस्त 2021 की है। 

"हमारी गिरफ्तारी के करखियांव और आसपास के गांवों में आक्रोश फैल गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर इकट्ठा हो गए। पुलिस और ग्रामीणों के आमने-सामने होने पर प्रशासन पुलिस के जरिये ग्रामीणों को लाठियों से खदेड़वाना शुरू कर दिया। आंदोलनकारी किसानों में बिंदा, फूलपुर और करखियांव के लोग शामिल थे। ग्रामीणों को खदेड़ने के बाद आसपास के सभी चौराहों और बाजारों में पीएसी तैनात कर दी गई। लहलहाती धान की फसल को जोते जाने के विरोध में किसानों ने वाराणसी जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन भी किया। हम सभी कलेक्टर से मिलने की जिद पर अड़े थे,  लेकिन वह हमसे मिलने नहीं आए। बाद में एक अन्य प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे और उन्होंने हमारा पत्रक लिया, फिर हमें बैरंग लौटा दिया।"

पिछले तीन महीने से करखियांव के एग्रो पार्क पर पुलिस की देखरेख में किसानों की जमीनों का सीमांकन किया जा रहा है। जिस स्थान पर अमूल प्लांट खड़ा किया जाना है वहां जौनपुर से मिट्टी लाकर जमीन पाटी जा रही है। 16 दिसंबर 2021 तक एग्रो पार्ट में पीएसी के जवान तैनात रहे। 14 दिसंबर की रात किसानों की सात बीघा सरसों की खड़ी फसल भी प्रशासन ने जबरिया जोतवा डाला, जिसे लेकर किसानों में भारी रोष है। इसी जमीन के पास पीएम नरेंद्र मोदी की सभी होनी है। किसानों की मांग है कि जिनकी धान और सरसों की फसल रौंदी गई है उन्हें उसका मुआवजा दिया जाए।

जिस जमीन पर अमूल डेयरी प्लांट का शिलान्यास होने जा रहा है, उससे प्रभावित किसानों को वाजिब मुआवजा दिलाने के लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा है। एक मर्तबा किसान नेता धनंजय सिंह को पुलिस ने अकारण गिरफ्तार किया तब बड़ी संख्या में लोगों ने फूलपुर थाने का घेराव किया और उनकी रिहाई की मांग उठाई। बाद में फूलपुर थाने के सामने नारेबाजी कर रहे किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इस घटना में राजाराम नामक किसान के पैरों की हड्डियां टूट गईं। रामानंद, लालता पाल और कई महिलाओं को पुलिस ने बुरी तरह पीटा गया। आधा दर्जन किसानों को गंभीर चोटें आईं। आरोप है कि पुलिस ने इन किसानों का मेडिकल मुआयना तक नहीं होने दिया। 

नहीं मिला किसानों को न्याय

लंबी लड़ाई के बाद फैसला आया तब भी किसानों को न्याय नहीं मिल सका है। किसानों का आरोप है कि कलेक्टर कौशलराज शर्मा के अधीन काम करने वाले जिला भूमि अध्याप्ति विभाग के अधिकारी मुआवजा बांटने में हीला-हवाली कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब धनंजय सिंह की बेटी जागृति सिंह की शादी मुआवजा न मिल पाने की वजह से रूकी हुई है। इसके अलावा भीखी यादव उनके भाई की बेटियों की शादी भी नौकरशाही की लापरवाही के चलते नहीं हो सकी है। मुआवजे का इंतजार कर रहे कई किसान आर्थिक तंगहाली के शिकार हैं। मुआवजे के लिए वो पिछले एक दशक से अफसरों की चौखट पर हाजिरी लगा रहे हैं। हैरत की बात यह है कि नौकरशाही ने ऐसा पेंच लगा दिया है कि किसानों के मुआवजे की राशि अभी तक ज्यादातर किसानों के खाते में नहीं पहुंच सकी है। 

किसान नेता धनंजय सिंह और पुलिस अफसरों के बीच चल रही जिच

जमीन के मुआवजे के लिए संघर्ष की यह कहानी उस करखियांव गांव की है जिस धरती पर पैदा हुए 26 रणबाकुरे आजादी की लड़ाई में शहीद हुए थे। किसान नेता धनंजय सिंह कहते हैं, "हमारे दादा स्व.वंशराज सिंह पर अंग्रेजी हुकूमत ने जुल्म ढाया था। बाद में वह देश को आजाद कराने में शहीद हो गए थे। पहले हमारा कुनवा देश को आजाद कराने के लिए लड़ता रहा और अब किसानों को न्याय दिलाने में हमें दो-दो बार हमें जेल काटना पड़ा। हमारे ऊपर पुलिस ने न सिर्फ तमाम झूठे मामले दर्ज किए, बल्कि फर्जी ढंग से हमें गुंडा एक्ट में निरुद्ध कर दिया गया।"  

किसानों ने अपनी शिकायत पीएम तक पहुंचाने और दोषी अफसरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग उठाई है। फर्जी पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ किसान नेता धनंजय सिंह ने पीएम मोदी, सीएम योगी आदित्यनाथ समेत तमाम आला अफसरों को ट्विटर के जरिए लिखित शिकायत भेजी है। धनंजय सिंह के खिलाफ अवैध तरीके से लगाए गए गुंडा एक्ट की वापसी की कार्रवाई अभी तक शुरू नहीं हो सकी है। 

किसान नेता धनंजय सिंह सवाल उठाते हैं, "क्या मुआवजे की मांग उठाना कोई अपराध है? किसानों के हक में आवाज उठाने का मतलब यह नहीं होता कि बगैर सोचे-समझे दबंगों के इशारे पर गुंडा एक्ट में कार्रवाई कर दी जाए। मुआवजे के मुद्दे पर पुलिस ने अकारण हमें जेल भेजा और हमारे खिलाफ फर्जी संगीन मामले दर्ज किया गया। हम पीएम के कार्यक्रम में कोई अड़चन नहीं आने देंगे। पीएम के कार्यक्रम से पहले गुंडा एक्ट में निरुद्ध किए गए किसानों के फर्जी मामले नहीं हटाए गए तो बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा, जिसमें देश भर के बड़े किसान नेता शामिल होंगे।"

पीएम नरेंद्र मोदी की सभा की तैयारियों में जुटे प्रशासनिक अफसरों को किसानों की समस्याओं को सुनने के लिए समय नहीं है। मुआवजे के संबंध में जिला भूमि अध्याप्ति अधिकारी मीनाक्षी पांडेय से न्यूजक्लिक ने बातचीत की तो उन्होंने कहा, "अभी हाल में मैने इस पद पर कार्यभार संभाला है। तभी से मैं लगातार वीआईपी ड्यूटी कर रही हैं। सही स्थिति पता करने के बाद ही मैं सही जवाब दे सकूंगी। फिलहाल मैं हाईकोर्ट की एक परीक्षा ड्यूटी में हूं। पता करके जल्द ही स्थिति से अवगत करा दूंगी।" 

रात में कुछ ऐसा दिखता है मोदी की सभा स्थल का नजारा

जबरिया काटा जा रहा आयकर

अमूल प्लांट समेत एग्रो पार्क के लिए जिन किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया है उनमें से कुछ ही किसानों को मुआवजा मिल सका है। करखियांव गांव किसानों के अधिवक्ता विजय कुमार सिंह कहते हैं, "कलेक्टर के अधीन काम करने वाले जिला भूमि अध्यप्ति विभाग (एसएलओ) में जबर्दस्त भ्रष्टाचार है, जिसके चलते मुआवजे की राशि अभी तक सभी किसानों के खाते में नहीं पहुंची है। सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के हक में जो फैसला सुनाया है उसके मुताबिक जिन किसानों की जमीनें 250 डिस्मिल से कम हैं, उन्हें 5100 रुपये प्रति डिस्मिल के हिसाब के मुआवजा देने का आदेश है। एग्रो पार्क में जिन किसानों की 250 डिस्मिल से ज्यादा जमीन अधिग्रहित की गई है उन्हें 4760 रुपये प्रति डिस्मिल की दर के मुआवजा दिया जाना है।"

"एसएलओ दफ्तर ने अपने नक्शे में 90 किसानों का मुआवजा कोर्ट में भेजने की बात कही है, लेकिन सच यह है कि आधी-अधूरी रकम ही किसानों के खातों में पहुंची है। इंद्र बहादुर, दोरोगा, पांचू, दुंवेंद्रु राय, वीरेंद्र प्रताप समेत न जाने कितने किसान मुआवजे के लिए रोजाना कलेक्ट्रेट की चौखटों पर एड़ियां रगड़ रहे हैं। मुआवजे की गणना करने में घालमेल किया गया है और अधिकारी किसानों की बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं हैं।"

अधिवक्ता विजय सिंह यह भी बताते हैं, "जिन किसानों की मुआवजा राशि कोर्ट में भेजी गई है उनके मुआवजे से टीडीएस के रूप में पहले ही क्रमशः दस और बीस फीसदी राशि काटी जा रही है। आयकर काटने का अधिकार भूमि अध्यप्ति विभाग को कतई नहीं है। अगर आयकर काटा जा रहा है तो उसका प्रमाण-पत्र किसानों को क्यों नहीं दिया जा रहा है? एग्रो पार्क के चलते जो किसान अपनी सारी जमीन गंवा बैठे हैं उन्हें नौकरी देने के मुद्दे पर भी अफसर खामोश हैं।"

किसानों के मुआवजे के सवाल पर उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (सीडा) के रीजनल मैनेजर आशीष नाथ ने "न्यूजक्लिक"  से कहा, "अमूल प्लांट के लिए हमने जो जितनी जमीन का अधिग्रहण किया है उसके एवज में तय राशि से अधिक धन जमा करा दिया है। एग्रो प्लांट के लिए जितने किसानों की जमीनें अधिग्रहीत की गई हैं, उसके लिए करीब 28 करोड़ दे दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक हमें कुल 38 से 40 करोड़ रुपये मुआवजे के रूप में किसानों को देना है। हमारी कोशिश है कि इस परियोजना में जो गरीब किसान प्रभावित हुए हैं उन्हें शासन के प्राविधानों के मुताबिक उनके परिजनों को नौकरियां भी मिले।"

सीडा के अधिशासी अभियंता आरके चौहान कहते हैं, "हमने सितंबर महीने में 28 करोड़ एसएलओ को दे दिया है। यह धनराशि उन किसानों की जमीनों के एवज में दी गई हैं जिनके मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है। अमूल प्लांट के दायरे में आने वाले किसानों की संख्या 95 है। समूचे एग्रो पार्क के लिए साल 2000 में कुल 265 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। हम ज्यादातर किसानों का मुआवजा दे चुके हैं। मुआवजा बांटेने की जिम्मेदारी जिला भूमि अध्याप्ति विभाग की है, हमारी नहीं।"

किसान नेता धनंजय सिंह सवाल उठाते हैं, "हमारी जमीन के अधिग्रहण से पहले अफसरों सभी किसानों को यकीन दिलाया था कि वो विरोध करना बंद कर दें तो उन्हें अमूल प्लांट में नौकरियां दिला दी जाएंगी। आखिर वो नौकरियां कहां हैं? किसानों का असल मुद्दा तो जहां का तहां पड़ा है। यहां जो खेल चल रहा है उससे नहीं लगता कि अमूल प्रभावित किसानों के परिजनों को नौकरियां देगा। संभवतः गुजरात के लोग ही यहां आकर कंपनी चलाएंगे। हमारे घरों के बच्चों को रोजगार मिल पाएगा, इसकी उम्मीद कम ही नजर आ रही है। अगर अमूल प्लांट के लोग हमें नौकरी देने का पुख्ता यकीन दिला दें तो हम अपना आंदोलन पूरी तरह खत्म कर देंगे।"

अमूल प्लांट के कार्यक्रम और पीएम मोदी की सभा के लिए कई दिनों से भारी-भरकम पंडाल लगाया जा रहा है। करखियांव में सड़क के किनारे रात-दिन काम चल रहा है। स्टेज के लिए एक विशाल पंडाल बनाया जा रहा है और उसके आगे हजारों कुर्सियों के लिए जगह छोड़ी गई है। छोटे-छोटे कई तंबू लगाए गए हैं। मौके पर भारी पुलिस फोर्स तैनात की गई है। पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की कई टीमें मौके पर एकत्र हैं। 

करखियांव में मोदी की सभा के लिए तैयार हो रहा पंडाल 

अमूल प्लांट की क्षमता 5 लाख लीटर 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करखियांव 23 दिसंबर को एग्रो पार्क में जिस अमूल डेयरी प्लांट की आधारशिला रखने आ रहे हैं उसकी क्षमता पांच लाख लीटर दूध उत्पादन की है। यह प्लांट 15 से 18 महीने में बनकर तैयार हो जाएगा। अमूल के पशु चिकित्सक डा.एसवी पटेल कहते हैं, "करीब 32 एकड़ भूमि में स्थापित होने वाले अमूल के प्लांट के निर्माण होने के बाद पूर्वांचल के पांच हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। इस प्लांट में अत्याधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी। युवाओं को रोजगार देने और किसानों की आमदनी में इजाफा करने के मकसद से बनारस में अमूल प्लांट की आधारशिला रखी जा रही है। दुग्ध उत्पादकों को कंपनी अपने लाभांश का कुछ हिस्सा साल के आखिर में बोनस के रूप में भी भुगतान करेगी।"

भाजपा के मीडिया प्रभारी नवरतन राठी के मुताबिक, "शिलान्यास के मौके पर पीएम मोदी ने एग्रो पार्क के पास पीएम की एक जनसभा भी रखी है, जिसमें एक लाख से अधिक किसान शामिल होंगे। इसी दिन पीएम मोदी स्मार्ट सिटी के इस हाइटेक सिस्टम का लोकार्पण करेंगे। यह प्रोजेक्ट 128 करोड़ रुपये का है, जिसके तहत शहर में 720 स्थानों पर 2200 से अधिक कैमरे लगाए गए हैं। हाई स्पीड इंटरनेट सेवा के लिए पूरे शहर में आप्टिकल फाइबर लाइन बिछाई गई है। कैमरों की क्वालिटी इतनी शार्प है कि रात को अंधेरे में भी स्पष्ट तस्वीरें कैद हो सकेंगी। अपराधियों की लोकेशन के लिए फेस डिटेक्टर कैमरा सिस्टम काम करेगा। जिसके माध्यम से सिटी कमांड एंड कंट्रोल रूम में आसानी से उनकी पहचान हो सकेगी। स्मार्ट पुलिसिंग के लिए देश भर के अपराधियों का हुलिया और प्रोफाइल सिस्टम में फीड किया जा रहा है। अपराधी के सीसीटीवी कैमरे की जद में आते ही सिग्नल बीप से पुलिस अलर्ट हो जाएगी। सभी पुलिस अधिकारियों के स्मार्ट फोन में थर्ड आई साफ्टवेयर लगे होंगे। स्मार्ट सिटी कमांड कंट्रोल रूम और स्टेट कंट्रोल रूम से यह जुड़ जाएंगे।"

दुनिया भर में ऐसे छा गई अमूल 

गुजरात की कोआपरेटिव कंपनी अमूल का नाम दुनिया के नामी कंपनियों में शुमार है। डेयरी के क्षेत्र में अमूल ऐसा नाम है जो सबकी जुबान पर है। दूध, दही, पनीर, चॉकलेट, लस्सी और अन्य डेयरी प्रोडक्ट में अमूल ने अपनी अहम भूमिका दर्ज कराई है। अमूल ने बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्गों तक का पूरा खयाल रखा है और जिसके लिए जो उपयुक्त हो, वैसा प्रोडक्ट बाजार में उतारा है। 75 साल पहले इस कंपनी की शुरुआत बहुत छोटे स्तर पर हुई थी, लेकिन आज अमूल देश के बड़े हिस्से तक पहुंच गया है।

14 दिसंबर 1946 को गुजरात में सहकारी सोसायटी के रूप में शुरू हुआ अमूल का काम आज लाखों लीटर दूध के कारोबार तक पहुंच गया है। 250 लीटर दूध की क्षमता के साथ शुरू हुआ अमूल का काम आज 30 लाख लीटर से ज्यादा का है। इस काम में कंपनी ने लाखों लोगों को रोजगार भी दिया है। भारत के मिल्कमैन कहे जाने वाले डॉ. वर्गिज कुरियन ने गुजरात में दो गांवों को सदस्य बनाकर डेयरी सहकारिता संघ की स्थापना की थी। भैंस के दूध से पाउडर का निर्माण करने वाले कूरियन दुनिया के पहले व्यक्ति थे। डॉ. कुरियन ने देश में दूध उत्पादन को बढ़ाने और उसके संरक्षण के लिए 1973 में गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) की स्थापना की। वह खुद 34 साल तक इस फेडरेशन के अध्यक्ष रहे। उनके अथक प्रयास से अमूल ब्रांड नाम से शुरू में दूध, दही और घी बाजार में उतारे गए। 

बाद में धीरे-धीरे इसका काम बढ़ता गया और आज इसका दायरा डेयरी प्रोडक्ट के कई क्षेत्रों तक पहुंच गया है। यह वो दौर था जब देश में दूध की कमी थी। कुरियन ने दूध के काम के साथ लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का भी बीड़ा उठाया। उन्होंने गांव के किसानों और महिलाओं को दूध उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया और बताया कि वे दूध बेचकर खुद को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। वे इसमें सफल रहे और उनके सहकारी संगठन में लोगों का कारवां जुड़ता चला गया। कमाई की बात करें तो यह 2019 में 32,960 करोड़ रुपये थी, जो साल 2019-20 में बढ़कर 38,542 करोड़ हो गई। 

परागः सिर्फ़ मजबूरी का नाम 

बनारस में अमूल से पहले, उत्तर प्रदेश की सहकारी समिति पराग दुग्ध का उत्पादन करती रही है, लेकिन लालफीताशाही ने उसे खोखला कर दिया है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके में पराग को न सिर्फ अमूल से कड़ी टक्कर मिल रही है, बल्कि बिहार में ‘सुधा’ ब्रांड के नाम से दूध बेचने वाली दुग्ध सहकारी समिति उत्तर प्रदेश की सरकारी डेयरी पराग से बहुत आगे निकल गई है। वाराणसी मंडल में पराग डेयरी के संचालन का जिम्मा डेयरी विकास बोर्ड को दे दिया गया है। यदि भविष्य में पूरे प्रदेश में की पराग डेयरी को निजी हाथों में दे दिया जाए तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। पराग के बीमार होने की सबसे बड़ी वजह है किसानों के पंजीकरण के लिए भारी-भरकम कागजी खानापूर्ति। 

दुग्ध व्यवसाय से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक दूध खरीदने और उसे पराग के प्लांट तक पहुंचाने में किसानों को पसीने छूट जाते हैं। ज्यादा लाभ के चक्कर में कुछ किसान दूध में पानी मिला देते हैं, जिससे दूध की गुणवत्ता खत्म हो जाती है। इस पर अंकुश लगा भी दिया जाए, तो प्लांट के नखरे शुरू हो जाते हैं। नतीजा, किसान भ्रष्टाचार में लिप्त होकर बाहर दूध बेचता है या फिर प्लांट के कर्मचारियों को पैसा खिलाता है अन्यथा दूध का कारोबार ही बंद कर देता है। शायद इसी का नतीजा है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान सरकारी डेयरी से अलग प्राइवेट डेयरी को अपना दूध बेचने लगे हैं। दुग्ध सहकारी समितियों और दुग्ध उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश का पराग आज सबसे निचले पायदान पर है। पराग के शार्ष पदों पर प्रशासनिक अफसरों की तैनाती ने इसी कोआपरेटिव संस्था का दीवाला पीटकर रख दिया है।

पूर्वांचल के जाने-माने किसान नेता चौधरी राजेंद्र सिंह कहते हैं, "अमूल और बिहार के सुधा प्लांट में ऊपर के पद पर बाहर से ही अधिकारी रखे जाते हैं। वास्तव में जब तक निचले स्तर पर पद नहीं बढ़ाए जाएंगे, उनकी जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। पूरा तंत्र पारदर्शी हो और किसानों की समस्या का त्वरित समाधान हो, तभी उत्तर प्रदेश की सरकारी डेयरी का दूध पराग की पापुलरटी बरकरार रह सकती है, अन्यथा अमूल और सुधा के साथ दूसरी कंपनियों के दुग्ध कारोबारी पराग को पटखनी देने के लिए तैयार बैठे हैं।"

(बनारस स्थित लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

ये भी पढ़ें: EXCLUSIVE: खांटी बनारसियों को ही नहीं पसंद आया मोदी का ‘इवेंट’, पुजारी और भक्त भी ख़ुश होने की जगह आहत

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