NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पंडित जसराज की मेवात घराने के संस्थापक की क़ब्र खोजने की चाहत अधूरी ही रह गई
पंडित जसराज द्वारा उस्ताद घग्गे नज़ीर ख़ान की क़ब्र को खोजने की चाहत ने भारत सरकार की कई विख्यात शख़्सियतों और कला रूपों के प्रति उदासीनता की कलई खोल कर रख दी है, जो भारतीय मिट्टी में सदियों से दफ़न हैं मगर जीवित हैं।
अनूप दत्ता
19 Aug 2020
Translated by महेश कुमार
पंडित जसराज

पंडित जसराज एक ऐसी दुनिया में पले-बढ़े जहां कई हजारों वर्षों में विविध जातियों, संस्कृतियों और  विभिन्न लोगों के बीच जटिल संपर्क और उनके आपसी सहयोग के कारण संगीत विकसित हुआ। उन्होंने मेवात घराने की विरासत को 80 वर्षों से अधिक समय तक सफलतापूर्वक निभाया और उसे आगे बढ़ाया।

जैसे ही सोमवार को 90 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, इस बात का एहसास हुआ कि पंडित जसराज की भोपाल में उस अज्ञात क़ब्र को खोजने की आकांक्षा या इच्छा लगता है कि उनके अंतिम क्षण तक कमजोर नहीं पड़ी थी। ये मेवात घराने के कोई और नहीं बल्कि इसके सह-संस्थापक उस्ताद घग्गे नज़ीर ख़ान की क़ब्र की दास्तान है, जिनकी मृत्यु 1920 के दशक में भोपाल में हुई थी।

घग्गे नज़ीर ख़ान मेवात घराने के गायक थे, जिसमें राजस्थान और हरियाणा के भी कुछ हिस्से शामिल थे। घराने के दूसरे संस्थापक उनके बड़े भाई उस्ताद वाहिद ख़ान थे, जो रुद्र वीणा वादक थे।

उस्ताद घग्गे नज़ीर ख़ान ग्वालियर घराने के उस्ताद छोटे मोहम्मद ख़ान के शिष्य थे और उस्ताद वारिस अली ख़ान, रीवा के उस्ताद बडे मोहम्मद ख़ान के पुत्र थे। यहीं पर मेवाती घराने की गायकी की जड़ें हैं।

नज़ीर ख़ान की शादी विख्यात हद्दू ख़ान की पोती से हुई थी। इसने उन्हें उनका पोत्र-दामाद बना दिया। दूसरी तरफ, उस्ताद बंदे अली ख़ानसाहब, जो प्रसिद्ध बीनकर थे का विवाह हद्दू ख़ान की बेटी से हो गया था।

दामाद और पौत्र-दामाद बहुत अच्छे दोस्त थे और दोनों साथ में काफी समय बिताते थे। उस्ताद बंदे अली ख़ान भी उस्ताद वाहिद ख़ान के शिक्षक थे। बंदे अली ख़ान ने उस्ताद बेहराम ख़ानसाहेब डागर से अपनी बीन (रुद्र वीणा) का प्रशिक्षण हासिल किया था। इस प्रकार, हम मेवाती वाद्य प्रस्तुति के जोड-भाग पर एक बहुत निश्चित डागर-बानी का प्रभाव देखते हैं। हासु- हद्दू ख़ान के साथ मजबूत पारिवारिक संबंधों के कारण नज़ीर ख़ान के गायन में भी डागर का प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

सबसे अधिक जो सच है, वह शायद यह है कि इस दुर्लभ रचना ने मेवाती घराने को जन्म दिया जो गायन और वाद्य परंपराओं का आनंद देती है।

नज़ीर ख़ान जो जोधपुर से आए थे, भोपाल के शाही परिवार में दरबारी संगीतकार के रूप में काम करने लगे। चूँकि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई मुनव्वर ख़ान को गोद लिया, जिन्हें उन्होंने गायन में प्रशिक्षित किया। मुनव्वर ख़ान की भी कोई संतान नहीं थी और उन्होंने अपने बड़े भाई वाहिद ख़ान के बेटे गुलाम कादिर ख़ान को गोद ले लिया था, जिन्होंने मेवाती घराने की मुखर परंपराओं को आगे बढ़ाया। नज़ीर ख़ान के दो अन्य शिष्य थे-पंडित नाथूलाल और पंडित चिमनलाल। पंडित नाथूलाल ने अपने भतीजे पंडित मोतीराम को प्रशिक्षित किया, जिन्हें कश्मीर दरबार  और बाद में हैदराबाद के दरबार में संगीतकार के रूप में नियुक्त किया गया था। और यह उन्हीं में से एक संदर्भ है जहां से कि पंडित जसराज का मेवाती संपर्क या वंशावली का पता चलता है। नाथूलाल ने अपने भतीजे पंडित मोतीराम और उनके बेटे जसराज को प्रशिक्षित किया। ब्रिटिश भारत में 1930 में जन्मे, जसराज को उनके पिता के जल्दी ही गुज़र जाने के बाद उनके चाचा पंडित मनीराम ने भी प्रशिक्षित किया था।

1937 में आठ साल की उम्र में तबला कलाकार के रूप में अपनी शुरुआत करने वाले जसराज, जिनका पहला सार्वजनिक गायन का कार्यक्रम 1952 में आयोजित हुआ था, हमेशा से उस्ताद घग्गे नज़ीर ख़ान की क़ब्रगाह को ढूँढने के काफी उत्सुक थे।

पंडित जसराज के सामने यह एक असाधारण सी स्थिति थी, क्योंकि जब वे लगभग 2000 दर्शकों की मजबूत संख्या बल के सामने बैठे थे, यह समारोह 1976 में राज्य राजधानी भोपाल में आयोजित प्रतिष्ठित संगीत कला रत्न पुरस्कार समारोह का साक्षी बना था। उन्हें जब यह पुरस्कार मिला और उसे लेने के बाद उनसे तकरीर करने को कहा गया जहां दिवंगत उस्ताद लतीफ ख़ान जैसे प्रमुख भारतीय शास्त्रीय संगीत की हस्तियों के अलावा सरकारी अधिकारियों, कला प्रेमी, कला समीक्षक सहित हजारों दर्शक बैठे थे।

उस्ताद ने दर्शकों के सामने तकरीर करते वक़्त गायकी के प्रति उनकी मोहब्बत, अपनी यात्रा, संगीत में आए बदलाव और गुरु शिष्य परम्परा के महत्व के बारे में बताया। जब दर्शक उनकी तकरीर के उस अंश जिसमें उन्हौने देश के भीतर भारतीय शास्त्रीय संगीत के कम होते प्रभाव को समझने के लिए अपना ध्यान केंद्रित किया, तो दर्शकों के सामने पंडित जसराज ने एक सवाल उछाला, और कहा कि वे मेवात घराने के संस्थापक की यानि उस्ताद घग्गे नज़ीर ख़ान की क़ब्र को ढूँढने की इच्छा रखते हैं, जिनकी मृत्यु भोपाल में 1920 में हो गई थी, उनकी इस बात ने सबको अचंभे में डाल दिया।

जसराज का सवाल कोई लफ़्फ़ाज़ी से भरा नहीं था, बल्कि उन्हे इसके सोचे-समझे जवाब की दरकार थी।

और जब महान हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायक पंडित जसराज, जिनके नाम पर एक मामूली ग्रह का नाम भी रखा गया है, को दर्शकों से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उन्होंने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया, और अपनी रुचि को दफन कर और तकरीर को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। दर्शकों में क़ब्र के बारे में जानकारी की कमी कोई नई बात नहीं थी। स्वतंत्र भारत का इतिहास सरकारी उदासीनता के कई उदाहरणों से भरा पड़ा है और सरकार की कई विख्यात शख्सियतों और कला रूपों के प्रति उपेक्षा रही है जो अज़ भी भारतीय मिट्टी में सदियों से जीवित हैं।

अपने हिस्से के तौर पर, अधिकारी हमेशा यह तर्क देते है कि उनकी नीतियां लोगों के अनुकूल हैं और समाज के हर वर्ग का ध्यान रखती हैं। यह, हालांकि, सच्चाई से परे की बात है। मौजूदा हालत में शायद ही कोई आश्चर्य की बात होगी कि दर्शकों का हिस्सा बनने वाली भव्य शक्तिशाली प्रशासन लॉबी भी जसराज के सवाल के जवाब में नम साबित हुई।

संगीत के जानकार इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि उनकी न्यायसंगत मांग भी शायद सरकारी तंत्र को नहीं हिला पाएगी, जो अपनी अयोग्यता और अक्षमताओं के लिए जानी जाती हैं, और उन्हें भोपाल में स्थित मेवात घराने के संस्थापक की अज्ञात क़ब्र भी शायद ही हिला पाए।

झीलों के शहर की अपनी बाद की यात्राओं में, जसराज ने कभी भी क़ब्र के बारे में पूछताछ नहीं की, शायद वे दूसरों को परेशान नहीं करना चाहते थे, और अपना समय ज्यादातर अपने दोस्तों के साथ बिताते थे, खासकर भोपाल के सबसे प्रतिष्ठित परिवारों में से एक राजेंद्र और आशा कोठारी के घर पर उनका अधिकतर समय बीतता था।

आज, जब कोई पंडितजी के चेहरे को याद करता है, तो कोई भी उस बडा तालाब (ऊपरी झील) पर बने मानव जाति के संग्रहालय (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संघालय) के खुले रंगमंच पर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाले उनके शास्त्रीय संगीत नोट्स को नहीं भूल सकता है। यह देखना भी अपने आप में अद्भुत था कि दर्शकों को अपनी आवाज़ से मंत्रमुग्ध करने से पहले उनकी आँखें कैसे आसमान की ओर चली जाती थी।

जसराज जी, जिनकी आवाज़ में एक भक्ति स्पर्श भी था, जब वे भजन नहीं भी गा रहे होते थे, तो वे दृढ़ता से यह बात मानते मानते थे कि गायक के रूप में उनका गायन खुदा के साथ एक सीधा संवाद कर रहा होता था। अपने शब्द-चयन या उच्चारण में काफी स्पष्टता के लिए लोकप्रिय, उन्होंने अपनी आवाज़ की मुखर पिच में साढ़े चार सप्तकों (octaves) की महारत हासिल की हुई थी और हमेशा पुरानी शैली जैसे संगीत शैली पर शोध और उसे लोकप्रिय बनाने में गहरी रुचि लेते थे, जिन्हे अक्सर मंदिरों में गया जाता था।

लेखक मध्य प्रदेश में स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

Pandit Jasraj
Hindustani Classical Music
Government Neglect of Art
Conservation of Heritage
Ustad Ghagge Nazir Khan
Mewat Gharana

Related Stories


बाकी खबरें

  • रवि शंकर दुबे
    दिल्ली और पंजाब के बाद, क्या हिमाचल विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय बनाएगी AAP?
    09 Apr 2022
    इस साल के आखिर तक हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो प्रदेश में आप की एंट्री ने माहौल ज़रा गर्म कर दिया है, हालांकि भाजपा ने भी आप को एक ज़ोरदार झटका दिया 
  • जोश क्लेम, यूजीन सिमोनोव
    जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 
    09 Apr 2022
    जलविद्युत परियोजना विनाशकारी जलवायु परिवर्तन को रोकने में न केवल विफल है, बल्कि यह उन देशों में मीथेन गैस की खास मात्रा का उत्सर्जन करते हुए जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट को बढ़ा देता है। 
  • Abhay Kumar Dubey
    न्यूज़क्लिक टीम
    हिंदुत्व की गोलबंदी बनाम सामाजिक न्याय की गोलबंदी
    09 Apr 2022
    पिछले तीन दशकों में जातिगत अस्मिता और धर्मगत अस्मिता के इर्द गिर्द नाचती उत्तर भारत की राजनीति किस तरह से बदल रही है? सामाजिक न्याय की राजनीति का क्या हाल है?
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट आईटीआई में शिक्षा महंगी, अभिभावकों को ख़र्च करने होंगे ज़्यादा पैसे
    09 Apr 2022
    एक तरफ लोगों को जहां बढ़ती महंगाई के चलते रोज़मर्रा की बुनियादी ज़रूरतों के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भी अब ज़्यादा से ज़्यादा पैसे खर्च…
  • आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: इमरान को हिन्दुस्तान पसंद है...
    09 Apr 2022
    अविश्वास प्रस्ताव से एक दिन पहले देश के नाम अपने संबोधन में इमरान ख़ान ने दो-तीन बार भारत की तारीफ़ की। हालांकि इसमें भी उन्होंने सच और झूठ का घालमेल किया, ताकि उनका हित सध सके। लेकिन यह दिलचस्प है…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License