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संसद सत्र: न महामारी की चर्चा, न बेरोज़गारी की बात, सिर्फ़ ख़तरनाक बिलों की बरसात
सरकार संसद के मौजूदा सत्र में जिन बिलों को पारित कराने जा रही है वे देश की कृषि अर्थव्यवस्था को बरबाद कर देंगे, औद्योगिक संबधों को उलट देंगे और कॉरपोरेट्स के लिए उपहारों की थैलियां खोल देंगे। संसद के मानसून सत्र का यही असली एजेंडा है।
सुबोध वर्मा
19 Sep 2020
संसद सत्र

14 सितंबर को शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र 1 अक्टूबर तक चलेगा। सरकार के मुताबिक मौजूदा सत्र के दौरान 46 बिलों पर चर्चा होगी। इनमें से 17 बिल कोरोना संक्रमण से पहले के सत्र में पेश किए गए थे। अब बाकियों पर चर्चा होगी और ये पास किए जाएंगे। छह बिल वापस ले लिए जाएंगे। 23 नए बिल पेश किए जाएंगे। इन पर चर्चा होगी और ये पारित कराए जाएंगे। ऐसा लगता है कि संसद के मौजूदा सत्र में काफी कामकाज होगा। खासकर उस स्थिति में तो यह ज्यादा ही लग रहा है, जब लोकसभा में सिर्फ दोपहर के बाद और राज्यसभा में दोपहर के पहले काम हो रहा है। सदन में कोरोना संक्रमण से बचने के सारे उपाय भी किए गए हैं। मोदी सरकार पहले ही प्रश्नकाल खत्म कर चुकी है। यह वह समय होता है जब सदन के सदस्य सरकार से सवाल करते हैं। संसद में सिर्फ लिखित प्रश्नों की इजाजत है, जिन्हें सदन के सामने रखना होता है।

मौजूदा सत्र में अभी तक लगता है कामकाज सुचारू ढंग से चल रहा है। इस दौरान सरकार ने खुद को दो अहम मुद्दों से सफलतापूर्वक बचा लिया है। लोगों के सामने भारी मुसीबत बन कर उभरे ये दो मुद्दे हैं- कोविड महामारी और बेहद तेजी से बिगड़ते आर्थिक हालात।

महामारी और आर्थिक बदहाली

स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने शुरू में ही कोरोना संक्रमण पर बयान दे दिया। जाहिर है, उन्होंने यही दावा किया कि सरकार की लॉकडाउन की नीति और दूसरे फैसलों ने संक्रमण और मौतों की संख्या काफी कम कर दी। वो जो आंकड़े बता रहे थे उन्हें साबित करने के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं था।

संसद का यह सत्र ऐसे समय में चल रहा है,जब कोविड-19 से 50 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और मौतों का आंकड़ा 80 हजार से ऊपर पहुंचा चुका है। ऐसे में हर्षवर्धन का मौतों की संख्या को काबू करने का दावा करते हुए बयान देना न सिर्फ भारी उकताहट पैदा करता है बल्कि यह अपने आप में अपर्याप्त भी है।

लिखित प्रश्नों पर दिए गए ये जवाब न सिर्फ आधा सच थे बल्कि इनमें आंकड़ों का भी हेरफेर किया गया था। कोरोना संक्रमण फैलने के बाद देश में जिस बड़े पैमाने पर शहरों से गांव की ओर रिवर्स माइग्रेशन के परेशान करने वाले मंजर दिखे, उसके बारे भी सरकार ने दावा किया कि यह पलायन भी सिर्फ ‘फेक न्यूज’ फैलने से हुआ। उनका कहना था कि शहरों में काम करने वाले एक करोड़ कामगार अपने गांवों की ओर इसलिए भागे कि लॉकडाउन को लेकर अफवाहें फैलाई गईं। लोगों के बीच जरूरी सामान की सप्लाई में कमी की दहशत पैदा की गई।

सरकार ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य आपदा राहत कोष ( State Disaster Relief Fund) के लिए 11 हजार करोड़ रुपये का फंड जारी किया था। राज्य इसका इस्तेमाल परेशान प्रवासी कामगारों की मदद के लिए कर सकते थे। यह साफ तौर पर धूर्तता भरा तर्क है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद 24 मार्च को यह ऐलान किय था कि लॉकडाउन तीन सप्ताह का होगा और इसके अगले दिन से लोगों का अपने घरों की ओर पलायन शुरू हो गया था। फिर तीन सप्ताह बाद इसमें इसमें भारी तेजी आ गई थी।

एक और चालाकी 2018-19 की रिपोर्ट का हवाला देकर देकर दिखाई गई। कहा गया कि देश में बेरोज़गारी सिर्फ 5.5 फीसदी है। जब यह पूछा गया कि देश में कितने लाख लोगों की नौकरियां गई हैं तो कहा गया कि बेरोज़गारी के नए आंकड़े तो हैं ही नहीं। जबकि CMIE ने कहा है कि अप्रैल में बेरोज़गारी की दर 24 फीसदी बढ़ गई। इसका मतलब 12 करोड़ लोगों की नौकरियां चली गई हैं।

महामारी और अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार की चिंता का यह आलम था। इसमें नया कुछ नहीं है। संसद सरकार के इशारे पर चलती है और अक्सर वह जनता के वाजिब मुद्दों को नजरअंदाज कर देती है। इन मुद्दों को बड़े ही लापरवाह तरीके से झटक दिया जाता है। लेकिन सत्र में मानों इतना ही काफी नहीं था।

संसद की मेज पर ख़तरनाक बिल

संसद के इस सत्र में जिन 40 बिलों को चर्चा के बाद कानून बनाने के लिए पारित कराया जाएगा उनमें के कुछ देश के कृषि और उद्योग जगत का चेहरा हमेशा के लिए और निर्णायक तौर पर बदल देंगे। और यह कहने की जरूरत नहीं कि ये बदलाव निजी क्षेत्र (भारतीय और विदेशी) खास कर बड़े कॉरपोरेट घरानों और बड़े जमींदारों के हित में होंगे। जिन कानूनों में बदलाव की कोशिश हो रही है। वे हैं-

श्रम कानून : इसके तहत तीन कोड पारित कराने की कोशिश हो रही है। ये हैं सामाजिक सुरक्षा कानून 2019, औद्योगिक संबंध कानून बिल, 2019 और कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाज के माहौल से जुड़ा बिल (2019). इन्हीं में मौजूदा 44 श्रम कानून समाहित हो जाएंगे। इन कानूनों की वजह से काम के घंटे बढ़ जाएं। मनमाने ढंग से मजदूरी तय होगी। कामगारों को छोटे कांट्रेक्ट पर काम मिलेगा। काम करने से जुड़ी सुविधाएं और सहूलियतें घटेंगी। सोशल सिक्योरिटी को लेकर अनिश्चितता रहेगी और इन कानूनों में मौजूदा प्रावधानों और शर्तों को बदलने का सारा अधिकार सरकार के हाथ में आ जाएगा।

संक्षेप में कहें तो इससे बेलगाम होकर ‘हायर एंड फायर’  की नीति लागू करने का मौका मिल जाएगा। कामगार पूरी तरह नियोजकों (नौकरी देने वालों) और सरकार के रहमोकरम पर रहने को मजबूर जाएंगे। और यह सब ऐसे वक्त में करने की कोशिश हो रही है जब अर्थव्यवस्था बुरी तरह मंदी की गिरफ्त में फंस चुकी है। बेरोज़गारी चरम पर है और लोगों की परचेजिंग पावर रसातल में पहुंच चुकी है। ये कानून पूरे देश की कामगार अवाम के मुंह पर तमाचे की तरह है। इन नीतियों से आर्थिक बदहाली बेकाबू हो जाएगी क्योंकि जब तक लोगों की पर्याप्त कमाई नहीं होगी, वे खर्च नहीं कर पाएंगे। मांग नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था कैसे अपने पैरों पर खड़ी होगी?

कृषि सेक्टर से जुड़े कानून: इस साल की शुरुआत में तीन अध्यादेश लाए गए थे और अब तीन कानूनों के इनकी जगह लेने के लिए लाया जा रहा ये हैं आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) बिल, 2020, कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल और मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा बिल, 2020. इन कानूनों से कुछ कृषि उत्पादों का उत्पादन, सप्लाई, वितरण, कारोबार और व्यापार पर नियमन पूरी तरह हट जाएगा। इससे बड़े व्यापारियों और कंपनी जिस तरह चाहेंगे किसानों से उनकी फसल खरीद सकेंगे, इसे स्टॉक कर सकेंगे और जितनी मर्जी हो उतनी कीमत पर बेच सकेंगे। इसका मतलब यह कि अहम खाद्यान्नों की खरीद पर सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाएगा।

इससे आगे चल कर किसानों को सरकारों की ओर से दिया जाने वाला समर्थन मूल्य और सब्सिडी का खात्मा हो जाएगा। सरकार लोगों तक सस्ता अनाज की सप्लाई के लिए किसानों को जो समर्थन मूल्य देती थी वह बीते दिनों की बात हो जाएगी। इससे कृषि सेक्टर की तस्वीर ही पूरी तरह बदल जाएगी और यह मुनाफे से संचालित कॉरपोरेट सेक्टर के नियंत्रण में आ जाएगा। इसमें न किसानों के हितों की चिंता होगी और न उपभोक्ताओं के हितों की।

कॉरपोरेट्स को छूट : मानों, कृषि और श्रम कानूनों में बदलाव लाने के लिए लाए जा रहे ये दो बिल काफी नहीं थे। लिहाजा, एक तीसरे कानून के जरिये यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि मोदी सरकार के हित कॉरपोरेट हितों से किस कदर जुड़े हुए हैं। इसे जानना हो तो कंपनी (संशोधन) बिल, 2020 पर नजर डालनी चाहिए। इसमें कंपनी कानूनों के उल्लंघन के आरोप में जेल की सज़ा और अन्य दंड को खत्म करने का प्रावधान है। यहां तक कि जुर्माने को भी कम कर दिया है, मानो सिर्फ संपत्ति का निर्माण (Wealth creators) करने वालों को ही मदद की जरूरत है। कामगारों और किसानों को मदद की कोई जरूरत नहीं है।

इनके अलावा भी संसद के मौजूदा सत्र में ऐसे कई कानून लाने की तैयार की जा रही है जो वर्तमान टैक्स और दिवालिया कानूनों के प्रावधानों में ऐसे बदलाव कर देंगे जिनसे कॉरपोरेट्स को कई तरह की छूट और सहूलियतें हासिल हो जाएंगीं। और यह सब कोविड-19 से पैदा आर्थिक संकट में कंपनियों को मदद देने के नाम पर किया जाएगा।

इन सबके बीच, वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ( जिन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव में भड़काऊ नारे लगा कर खूब बदनामी बटोरी थी) ने सदन को बताया कि 20 सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार रणनीतिक विनिवेश (यानी हिस्सेदारी बेचने जा रही है) करने जा रही है। ये सारी कंपनियां निजी हाथों में बेचने की तैयारी चल रही है। जबकि छह पूरी तरह बंद होंगी या फिर औद्योगिक विवाद में फंस जाएंगी। सरकार कामगारों से उनका रोज़गार छीन कर कंपनियों को उपहार देगी।

भारी बहुमत का घमंड

दुर्भाग्य से इस देश के लोगों ने 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को भारी बहुमत से जिताया। जाहिर है, लोगों यह पता नहीं था कि यह सरकार एक ऐसा दैत्य बन कर उभरेगी जो न सिर्फ देश की संपत्ति और संसाधनों के निगल जाएगी बल्कि बड़ी संख्या में नौकरियों की कुर्बानी ले लेगी। यह सच है कि अपने भारी बहुमत की बदौलत बीजेपी और इसकी सहयोगी पार्टियां इन जनविरोधी कानूनों को पारित करा लेगी। कुछ बिलों पर विपक्ष सांकेतिक विरोध दर्ज कराएगा और कुछ में तो यह वह भी नहीं कर पाएगा। वैसे एनडीए कैंप में विरोध के कुछ स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। कृषि सेक्टर से जुड़े इन तीनों बिलों के खिलाफ अकाली दल का विरोध शुरू हो गया है। पंजाब में अपने किसान आधार को बड़ा करने के लिए उसने सरकार की मुखालफत शुरू की है। लेकिन यह भी सच है कि संसद में विपक्ष का रूतबा काफी घट गया है। अब विपक्षी पार्टियां भी संसद में बड़े लेफ्ट ब्लॉक की गैर मौजूदगी को महसूस कर रही है।

हालांकि संसद के बाहर लेफ्ट पार्टियां लाखों कामगारों के बड़े संघर्षों की अगुआई करती हुई दिख रही है। ये पार्टियां लाखों कामगारों, किसानों और कृषि मजदूरों और कर्मचारियों के विरोध को आवाज दे रही हैं। भले ही संघर्ष संसद में नहीं होगा लेकिन यह सड़कों पर होता हुआ दिखाई देगा।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-

Parliament Session: Not Pandemic and Economy, But Toxic Laws Being Pushed

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COVID 19 Impact on Economy
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