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किसान आंदोलन और महापंचायत: महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक नए युग का आगाज़
जो लोग इन खापों के ख़िलाफ़ लड़ते थे, वे भी इस आंदोलन का स्वरूप देखकर इनके मंच से भाषण दे रहे हैं। वह समाज जो महिलाओं को परदे की पीछे ही रखना चाहता था, वो उन्हें ट्रैक्टर की स्टेरिंग दे रहा है।
मुकुंद झा
08 Feb 2021
किसान आंदोलन और महापंचायत: महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक नए युग का आगाज़

किसान आंदोलन पिछले 70 से अधिक दिनों से देश की राजधानी की सीमाओं पर चल रहा है। लेकिन अब इसका दायरा बढ़कर देश के बाकी हिस्सों में पहुँच गया है, अब गांव, जिलों और तहसील में भी सरकार के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। खासकर 28 जनवरी के बाद से इस आंदोलन का स्वरूप पूरी तरह से बदलता दिख रहा है। अब किसानों के समर्थन में लगातार बड़ी- बड़ी महापंचायतें हो रही हैं। जिसमें हज़ारों-हज़ार की संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं। ऐसी ही एक भिवानी दादरी महापंचायत का दौरा न्यूज़क्लिक की टीम ने किया। इस पूरे इलाक़े को जाटलैंड भी कहा जाता है।

कई एकड़ में बने पंडाल में संयुक्त किसान मोर्चे के झंडे व तिरंगे लगे हुए थे। बच्चों से लेकर युवा, महिलाओं और बुजुर्गों ट्रैक्टर ट्रॉली गाड़ी बाइक और पैदल लगातार पहुँच रहे थे। सभी जो भी वहां आ रहे थे वो पूरे जोश में सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी कर रहे थे। इसके साथ ही वहां हरियाणा, पंजाब, यूपी-राजस्थान भाईचारा जिंदाबाद व जय जवान-जय किसान के नारे गूंज रहे थे। वहां पंचायतों ने अपने लिए हुक्के का भी इंतेज़ाम किया हुआ था। जो लोग समय से पहले आ गए थे, वो वहां बैठकर ताश खेलते दिखे और मंच से लगातार किसान आंदोलन में बने क्रांतिकारी गीत बजाए जा रहे थे। जिससे वहां हर शख़्स जोश से भरा हुआ था।

पंचायत में एक बात जो बेहद अलग थी, वो है महिलाओं की भी शानदार भागीदारी। जबकि इन पंचायतों में जातिगत लकीरें भी हल्की पड़ती दिख रही थीं। जबकि इनकी पुरानी पहचान महिलाओं के ख़िलाफ़ और जातिवाद से भारी दिखाई पड़ती थी। इस आंदोलन की शुरुआत भले ही आर्थिक मांगों के साथ हुई थी, लेकिन अब यह सामजिक एकजुटता की वजह से और मजबूत हो रहा है।

महापंचायत की शुरुआत 11 बजे होनी थी। हम भी वहां गए थे, लेकिन लोगों का हुजूम 12 बजे तक पहुंचा। देखते-देखते ही पूरा मैदान लोगों से पट गया। इसमें सबसे बड़ी बात थी कि महिलाएं जिस तरह गांव से निकलकर आंदोलन का हिस्सा बनने आ रही थीं। वो भी किसानों के समर्थन में नारे बुलंद करते हुए देखी जा सकती थीं, इसके साथ ही वो मंच से गाने भी गा रही थीं और भाषणों के माध्यम से अपनी मांग को बुलंद कर रही थीं। इसके अलावा जो लोग इन खापों के ख़िलाफ़ लड़ते थे, वे भी इस आंदोलन का स्वरूप देखकर इनके मंच से भाषण दे रहे हैं। वह समाज जो महिलाओं को परदे की पीछे ही रखना चाहता था, वो उन्हें ट्रैक्टर की स्टेरिंग दे रहा है।

आयोजकों ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए जानकरी दी कि महापंचायत की व्यवस्था बनाए रखने के लिए आसपास के 10 गांवों से 150 युवाओं को वॉलंटियर बनाया गया है। आस-पास के 5 गांवों की 50 महिलाओं को भी वॉलंटियर की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही ट्रैफिक से लेकर बैठाने की व्यवस्थाओं पर ध्यान रखने के लिए 500 पुरुष व महिलाओं को रखा गया था।

जगमति सांगवान जो एक प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं और वर्तमान में अखिल भरतीय महिला समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। वो हरियाणा में इन खापों के ख़िलाफ़ लड़ने वाली प्रमुख चेहरा हैं, लेकिन वो भी इन महापंचायतों में जाकर भाषण दे रही हैं। उन्होंने इस अंतर्विरोध पर न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, “हमारा शुरू से ही इनके (खाप पंचायत) साथ इसी को लेकर संघर्ष था कि हम सबको मिलकर समाज के बुराई और समाजिक उत्थान के लिए काम करना चाहिए। देखिए इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी है। वो न सिर्फ भीड़ का हिस्सा हैं, बल्कि आंदोलनों का संचालन भी कर रही हैं। यहां अब पुरुष महिला दोनों मिलकर सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लड़ रहे हैं।

उन्होंने पंचायत में भाषण देते हुए अंत में पुरुषों से एक बात कही कि जैसे हम इस आंदोलनों में महिलाओं को आगे कर रहे हैं, यही आंदोलन के बाद घरों में भी हो। उनकी इस बात पर मंच पर बैठे खापों के सरपंच और बाकी भीड़ में बैठे हज़ारो मर्दो ने ताली पीटकर उनका स्वागत किया।

इसी तरह दलित संगठन और समाज के लोग भी इस महापंचायत का हिस्सा बने और उन्होंने भी इस आंदोलन में अपना समर्थन दिया। दलित समाज के कुछ नौजवान लड़कों ने किसान नेता राकेश टिकैत को संविधान की किताब भेंट की, लेकिन इस दौरान वो अपनी जातिगत पहचान को लेकर भी मुखर रहे। वो इस महापंचायत में अपने संगठन के झंडे और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर फोटो छपी टीशर्ट पहनकर आए।

महापंचात में शामिल होने आए किसान नेता भी महिलाओं के मुद्दे पर बोलते नज़र आए और उनके सवालों पर भी जोर दिया। राकेश टिकैत ने कहा कि हमारी महिलाएं पशुपालन का काम देखती हैं, लेकिन उनके दूध का दाम नहीं मिलता है। बल्कि वो पानी से भी सस्ता बिक रहा है। उन्होंने अपने भाषण के दौरान कहा ये सरकार महिला किसानों की आत्महत्या को किसानों की आत्महत्या में शामिल नहीं करती है, क्योंकि उनके नाम ज़मीन नहीं है।

आपको बता दें कि महिला किसानों की काफी लंबे समय से मांग रही है कि उन्हें भी किसानों का दर्जा दिया जाए लेकिन सभी सरकारों ने इसे नज़रअंदाज़ किया है।

इसी मुद्दे पर बात करते हुए जगमति ने भी कहा, “सरकार महिलाओं को किसान नहीं मानती है, जबकि बड़ी संख्या में हरियाणा में विधवाएं हैं जो खुद किसानी करती हैं। लेकिन उन्हें न कोई सरकारी मुआवजा मिलता है और न बाकी सरकारी लाभ क्योंकि उनके नाम पर ज़मीन नहीं हैं। यह आंदोलन अब इन सवालों के लेकर भी मुखर हो रहा है।

सांगवान खाप पंचायत के सरपंच सोमबीर सांगवान जो निर्दलीय विधायक भी हैं, उनकी बहन उर्मिला भी इस पंचायत में शामिल होने आईं थीं। उन्होंने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि आजतक हमें मौका ही नहीं दिया गया और अब मौका दिया है तो देखिए हम कैसे इस आंदोलन को मज़बूत कर रहे हैं।

डॉक्टर सुनीता जो इस पंचायत में आईं थीं, उन्होंने कहा कि पिछले कितने दिनों से सब सर्दी-गर्मी में सड़क पर बैठे है, किसानों की पीड़ा को देखकर किसी का भी दिल पिघल जाए। लेकिन हमारे मोदी जी के मन में इन किसानों के लिए कोई भाव नहीं है।

शकुंतला जो पेशे से हरियाणा के स्वास्थ्य विभाग में काम करती हैं, वो भी इस महपंचायत में महिलाओं की टोली के साथ आईं थीं। उन्होंने कहा अब इस आंदोलन में महिलाएं उतर गईं हैं, इसलिए समय रहते किसानों की मांगे नहीं मानी गई, तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। उन्होंने पंचायत में महिलाओं की भूमिका पर कहा अब देखिए कितनी बड़ी तादाद में महिलाऐं यहां आई हैं और अब आपको आगे भी इसी तरह पंचायतो में इनकी भूमिका दिखेगी।

सैकड़ों महिलाओं की टोली इस पंचायत में शामिल होने आई। उन्होंने कहा कि ये मोदी समझ ले 'हम हरियाणा के नारी जैसे आग-चिंगारी सा' . इसी तरह उनके साथ आईं सभी महिलाओं ने कहा सरकार ऐसे हमारी बात मानती नहीं, लेकिन हम अब उसको बता देंगे कि हम कौन हैं?

चरखी दादरी से आई सुलेखा ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, “हम इस सरकार के होश ठिकाने कर देंगे। हम महिलाओं को भी अब सरकार की साजिश समझ आ गई है। हम भी जागरूक हो रहे हैं। ये सरकार कितनी बदमाशी कर रही है अब हम जान गए हैं। महिलाएं अब अपने पुरुष भाई-भतीजों के साथ मिलाकर यह संघर्ष कर रहीं हैं।”

आपको बता दें इस महापंचायत में आयोजकों के मुताबिक लगभग 50 हज़ार लोग शामिल हुए। भिवानी दादरी से खापों की सयुंक्त पंचायत ने संयुक्त किसान मोर्चा के सामने आंदोलन को मजबूत करने की एक साथ हुंकार भरी। आज यह आंदोलन पूरे देश का जन आंदोलन बनता दिख रहा है, जिसमें जाति और लिंग के भेद भी टूटते दिख रहे हैं। एक व्यक्ति ने कहा कि यह 36 बिरादरी (यानी समाज के हर तबका) के लोग अपनी किसानी को बचाने के लिए दो महीने से संघर्ष कर रहें हैं। इसमें पांच प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पास किए गए। वो इस प्रकार थे:

1. तीनों किसान विरोधी कानूनों को रद्द किया जाए

2. स्वामीनाथन कमीशन के C2 फार्मूला पर MSP की कानूनी गारंटी प्रदान की जाए।

3. किसानों पर लगे झूठे मुकदमे वापस हों, गिरफ्तार किसानों को तुरंत रिहा किया जाए।

4. पुलिस द्वारा जब्त किसानों के वाहन किसानों को वापस दिए जाएं।

5. NH 122B के किसानों को अधिगृहीत भूमि का उचित मुआवजा मिले।

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