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जनांदोलन के लिए संसदीय संघर्ष के इस्तेमाल का नायाब प्रयोग है किसान-आंदोलन
किसान-आंदोलन के गर्भ में मूल्य-आधारित जन-राजनीति की विराट संभावनाएं पल रही हैं।

लाल बहादुर सिंह
11 Aug 2021
जनांदोलन के लिए संसदीय संघर्ष के इस्तेमाल का नायाब प्रयोग है किसान-आंदोलन

मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करते हुए, " मोदी गद्दी छोड़ो " आह्वान के साथ जंतर-मंतर पर 22 जुलाई से चल रही किसान संसद का " भारत छोड़ो दिवस " 9 अगस्त को समापन हो गया। 

इस दौर में किसान अनेक कारणों से राष्ट्रीय चर्चा में रहे। हरियाणा और पंजाब व देश के अन्य हिस्सों के किसानों के बेटे-बेटियां ओलंपिक पदक जीतने में अगली कतार में रहे और उन्होंने देश को गौरवान्वित किया। किसान आंदोलन के लिए यह दुहरी खुशी की बात रही कि ये विजेता न सिर्फ किसानों के बच्चे हैं, बल्कि किसानों की न्यायोचित लड़ाई के समर्थक भी हैं।

भारत के लिए एकमात्र स्वर्णपदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने दिसम्बर 2020 में किसानों का आंदोलन शुरू होने के बाद ही उनके पक्ष में आवाज उठाई थी और केंद्र सरकार से उनकी मांगे मानने की अपील की थी। कुश्ती में कांस्य पदक जीतने वाले बजरंग पुनिया ने भी ऐसी ही अपील जारी की थी, " किसान देश की रीढ़ की हड्डी है। किसान को मत रोकिए। देश के अन्नदाता को अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार है। बल  प्रयोग से कभी किसी की आवाज को नहीं दबाया जा सकता। अपनी पीढ़ियों की भविष्य बचाने के लिए उतरे किसानों की आवाज सुने सरकार। "

जाहिर है, यह सब उन लोगों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है जो किसान-आंदोलन को देशद्रोही, खालिस्तानी, आतंकवादी, मवाली और न जाने क्या क्या साबित करने की कोशिश करते रहे हैं।

किसान आंदोलन के लिए संसद का मानसून-सत्र बेहद अहम रहा। इस पूरे सत्र के दौरान  संसद के अंदर और बाहर किसानों की गूंज सुनाई पड़ती रही।  राष्ट्रीय संसद का पूरा सत्र तो मोदी सरकार के जासूसी कांड की भेंट चढ़ गया, पर किसान-संसद ने सच्ची जन-संसद कैसी होगी, इसका नज़ारा, एक मॉडल देश की जनता के सामने पेश कर दिया। मोदी जी से जुमला उधार लिया जाय तो 70 साल में यह पहली बार हुआ, और शायद दुनिया में इसका दूसरा उदाहरण न हो, कि सड़क पर चल रही एक जनांदोलन की संसद को दर्शक-दीर्घा में बैठकर देश की 14 राजनीतिक पार्टियों के सांसदों ने देखा, जिनमें से अनेक केंद्र व राज्यों में सरकार चलाते रहे हैं और भविष्य में भी चलाएंगे, कई मंत्री और शायद प्रधानमंत्री बनें।

किसान आन्दोलन ने बेशक अपनी जुझारू ताकत और रचनात्मक रणनीति से-जिस तरह उन्होने पीपुल्स व्हिप् का औजार तलाशा और विपक्ष के सांसदों को उसे मानने के लिए बाध्य किया- जनांदोलनों के इतिहास में एक मौलिक अध्याय लिख दिया है। संसदीय और गैर-संसदीय संघर्ष को मिलाने का यह एक नायाब प्रयोग है।

एक ओर संसद में उनकी आवाज लगातार गूंजती रही,  दूसरी ओर आंदोलन को नकारने और कुचलने की सरकार की सारी कोशिशों को नाकाम करते हुए, अंततः संसद के द्वार तक अपने आंदोलन को पहुंचाकर, किसान-संसद को गम्भीर विमर्श का मंच बनाकर और उसको आदर्श ढंग से चलाकर उन्होने दिखा दिया कि गप्पबाजी का अड्डा और कॉरपोरेट का मंच बन गई संसद को लोकतंत्र की प्रभावी कार्यकारी संस्था में बदलने का- भारत की सच्ची जन- संसद का भविष्य यहाँ गढ़ा जा रहा है । कारपोरेट दलालों को अपदस्थ कर किसान -मेहनतकश इस देश की बागडोर संभालने की तैयारी कर रहे हैं।

किसान-संसद के अंतिम चरण में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। संयक्त किसान मोर्चा के वक्तव्य के अनुसार, " अविश्वास प्रस्ताव में कहा गया है कि मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का झांसा दिया था, पर इस दिशा में कुछ भी ठोस नहीं किया। प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया है कि भाजपा और प्रधानमंत्री अपने एमएसपी से संबंधित वादों से बार-बार मुकरे है, जिसमें सभी किसानों के लिए C2 + 50% एमएसपी को वास्तविकता बनाना शामिल है। सरकार ने बहुप्रचारित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में भी किसानों को धोखा दिया, जहां सरकारी खर्च बढ़ा, किसानों का कवरेज कम हुआ और निगमों ने मुनाफाखोरी की।  

"अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान आम नागरिकों के गंभीर चिंता के कई मुद्दे भी उठाए गए - इसमें देश के सभी आम नागरिकों को प्रभावित करने वाले ईंधन की कीमतों में असहनीय और अनुचित वृद्धि, और कोविड महामारी के भयावह कुप्रबन्धन, नागरिकों और चुने गए नेताओं की सरकार द्वारा बेवजह जासूसी कर हमारे लोकतंत्र को खतरे में डालने, देश में लोकतंत्र के रक्षकों पर देशद्रोह जैसे आरोपों में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन, बड़ी पूंजी की रक्षा के लिए देश पर मजदूर विरोधी कानून थोपने वाली नीतियां शामिल थीं। "

आंदोलन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका के सम्मान स्वरूप 9 अगस्त को महिला किसान-संसद के साथ इसका समापन हुआ।

इस दौरान, अंतर्राष्ट्रीय मूलवासी दिवस के अवसर पर किसान-आंदोलन ने भूमि और जंगल सहित प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार के लिए आदिवासी संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की।

अब आंदोलन का अगला पड़ाव उत्तर प्रदेश है, जहाँ इसकी निर्णायक अग्निपरीक्षा होनी है। आंदोलन की जोरदार धमक उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंच गई है।

दरअसल, 26 जुलाई को लखनऊ में पत्रकार वार्ता करके जब शीर्ष किसान नेताओं ने मिशन UP का एलान किया और दिल्ली की तरह लखनऊ में भी आंदोलन की चेतावनी दी, तो UP BJP के ट्विटर हैंडल से उनका मजाक उड़ाते और लखनऊ न आने के लिए धमकाते हुए एक बेहद आपत्तिजनक कार्टून वायरल किया गया। 

इसके जवाब में योगी सरकार की चुनौती को कबूल करते हुए राकेश टिकैत ने एक सप्ताह के अंदर ही फिर लखनऊ पहुँच कर भाजपा की वानर-घुड़की की हवा निकाल दी। अनजाने में ही सरकार ने इस घमासान को भाजपा बनाम किसान आंदोलन और योगी बनाम टिकैत बना दिया है, जिसकी उसे बहुत भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। 

इस बार इसमें किसान और छात्र एकता का एक नया आयाम भी जुड़ गया। 6 अगस्त को लखनऊ विश्वविद्यालय के संयुक्त छात्र मोर्चा ने चर्चित शेरोज हैंग-आउट पर किसान नेता राकेश टिकैत का स्वागत किया और जोशीले नारों के बीच किसान-आंदोलन के प्रति अपना समर्थन-पत्र सौंपा। शेरोज़ कैफे के गेट पर ताला लगाकर प्रशासन ने कार्यक्रम विफल करने की कोशिश की लेकिन नौजवानों ने हंगामे और हलचल के बीच कार्यक्रम सड़क पर करके उसे और प्रभावी बना दिया। 

आने वाले दिनों में किसान और नौजवान आंदोलन की एकता की आशंका से सरकार  डरी हुई है क्योंकि दोनों का मुद्दा आज एक हो गया है- रोजी-रोटी का सवाल और लक्ष्य भी एक है-लोकतंत्र की हिफाजत। 

अतीत के आंदोलनों की यह कमजोरी रही है कि सभी तबकों के आंदोलन अलग-अलग होते थे। 74 के आंदोलन में छात्र-युवा, मध्यवर्ग शामिल था, पर किसान-मेहनतकश उसमें नहीं थे, 80 दशक के किसान आंदोलनों में छात्र-नौजवान शामिल नहीं थे। पर, आज के हालात ऐसे हैं कि किसान-छात्र-नौजवान-मेहनतकश आंदोलन की विराट एकता की नई सम्भावना पैदा हो रही है और इसके परिणाम दूरगामी होंगे।

5 सितंबर को जहां मुजफ्फरनगर में विराट किसान महापंचायत के साथ मिशन UP का बाकायदा आगाज़ होने जा रहा है, वहीं आंदोलन की आंच सुदूर पूर्वांचल तक पहुंच गई है। मऊ जिले के घोसी में 9 अगस्त को  सभा के बाद किसानों ने बनारस के मिनी PMO घेराव के लिए कूच किया, रास्ते में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 अगस्त को पूर्वांचल समेत पूरे प्रदेश में किसानों के आह्वान पर  "मोदी गद्दी छोड़ो " नारे के साथ जुझारू कार्यक्रम हुए।

उत्तर प्रदेश के निर्णायक चुनावों के नजदीक आने के साथ किसान आंदोलन का यह नया उभार और बढ़ती हलचल संघ-भाजपा की नींद उड़ाने वाला है। इसका सिर्फ यह असर नहीं होगा कि किसान, जो अब तक भाजपा के वोटर थे, वे अब उसके खिलाफ वोट करेंगे, बल्कि उससे ज्यादा अहम यह है कि किसान आंदोलन से समाज में  जो लोकतान्त्रिक माहौल बन रहा है, उसमें ध्रुवीकरण का एजेंडा चला पाना इनके लिए असम्भव हो रहा है, जो अब उनकी एकमात्र उम्मीद है। यह अनायास नहीं है कि सत्ता-शीर्ष के खुले संरक्षण में दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश तक नफरती  अभियान को तेज करने की जीतोड़ कोशिश हो रही है। लेकिन वह बदले माहौल में अब परवान चढ़ने वाली नहीं है।

दरअसल, यह दौर राष्ट्रीय राजनीति का turning point है। बंगाल की अप्रत्याशित पराजय, कोविड और आर्थिक तबाही के बीच, Pegasus जासूसी कांड के खुलासे के साथ मोदी सरकार अब ऐसे संकट ( terminal crisis ) में फंसती जा रही है, जिससे कोई चमत्कार ही अब उसे उबार सकता है। महंगाई, बेकारी, चौतरफा तबाही के खिलाफ उमड़ते जनाक्रोश, विपक्षी दलों की जोर पकड़ती सक्रियता व एकता, किसान-आंदोलन की बढ़ती चुनौती के भंवर से निकल पाना उसके लिए आसान नहीं रह गया है। उत्तर प्रदेश चुनावों में धक्का उसके ताबूत में आखिरी कील साबित होगा।

किसी भी बड़े आन्दोलन की तरह, किसान आंदोलन की दिशा को लेकर भी बहस जारी है और एक छोटे हिस्से का मोर्चे की मूल दिशा के साथ विवाद गहराता जा रहा है। आंदोलन के एक नेता गुरुनाम सिंह चढूनी  "मिशन पंजाब " अर्थात पार्टी बनाकर पंजाब में विधानसभा चुनाव में उतरने और जीत कर अपना मॉडल पेश करने की वकालत कर रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा उनकी इस दिशा से सहमत नहीं है। मोर्चा आंदोलन को व्यापक और गहरा बनाने, विपक्ष को अपनी मांगों के पक्ष में कायल करने तथा चुनावों में भाजपा को चोट देते हुए अपनी मांगों को पूरा करने के लिए दबाव बनाने की दिशा पर कायम है।

जाहिर है आंदोलन की राजनीतिक दिशा लगातार विकासमान है और इसका ठोस, पूर्ण विकसित स्वरूप अभी भविष्य के गर्भ में है। आंदोलन जिन आधारभूत उसूलों (cardinal principles ) पर चल कर इस अभूतपूर्व ऊंचाई तक पहुंचा है,  उन पर इसे मजबूती से डटे रहना होगा, मसलन हर हाल में अपनी स्वायत्तता बरकरार रखना होगा, किसान विरोधी मोदी सरकार तथा भाजपा के खिलाफ निशाना केंद्रित रखना होगा तथा आंदोलन के पक्ष में व्यापकतम सम्भव सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी की रणनीति विकसित करते रहना होगा। ऐसे किसी भी  कदम से, किसी शॉर्टकट, desperate act, ट्रैप से बचना होगा जो इन बुनियादी उसूलों और रणनीतिक लक्ष्य की अनदेखी करे। 

इस ऐतिहासिक आंदोलन की सफल परिणति पर देश के लोकतंत्र और जनता की आजीविका की लड़ाई का भविष्य टिका हुआ है। किसान-आंदोलन के गर्भ में देश की  कारपोरेट राजनीति के स्थापित मानकों की जगह स्वतंत्रता आंदोलन की मूल्य-आधारित जनराजनीति की विराट संभावनाएं पल रही हैं। 

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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