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पेंशन सत्याग्रह: 'नेशनल पेंशन स्कीम बनी नेशनल प्रॉब्लम स्कीम'
नई पेंशन स्कीम के विरोध में शुरू हुए 'पेंशन सत्याग्रह' के तहत गुरुवार को गुजरात के अहमदाबाद में सैकड़ों लोगों ने धरना दिया।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
21 Nov 2019
pension sattyagrah

नई दिल्ली: नई पेंशन स्कीम का सरकारी कर्मचारियों का विरोध जो दिल्ली में 9 फरवरी से 'पेंशन सत्याग्रह' के रूप में आरम्भ हुआ था, वो अब पूरे देश के अन्य राज्यों में भी हो रहा है। अब इन कर्मचारियों का कारवां नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (एनएमओपीएस) के नेतृत्व में 13 तारीख से प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात में चल रहा है।

गुरुवार यानी 21 नवंबर को ये कर्मचारी अहमदाबाद में सैकड़ों की संख्या में धरने पर बैठे हैं। कर्मचारियों का कहना हैं कि उनकी एक ही मांग है कि पुरानी पेंशन को लागू किया जाये।

गौरतलब है कि जनवरी 2004 में एनडीए सरकार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी के नेतृत्व में सरकारी कर्मचारियों के लिए वर्षों से चली आ रही पुरानी पेंशन योजना अर्थात गारंटीड पेंशन योजना की जगह शेयर बाजार आधारित एक नई पेंशन योजना का अध्यादेश के जरिए इसे लागू किया गया था। जिसका नाम न्यू पेंशन स्कीम दिया गया। 2004 से लेकर 2013 तक अध्यादेश के माध्यम से इस योजना को बनाए रखा गया तत्पश्चात 2013 में यूपीए द्वारा पीएफआरडीए एक्ट पास कर इस योजना को परमानेंट किया गया।

न्यू पेंशन का विरोध क्यों ?

न्यू पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और डीए से 10% हिस्सा काट लिया जाता है और सरकार उस हिस्से के बराबर ही अर्थात 10% रकम मिलाकर तीन कंपनियों में यथा एलआईसी यूटीआई और एसबीआई में बराबर बराबर निवेश कर देती है फिर यह कंपनियां इस पैसे को अलग-अलग फंड मैनेजर के माध्यम से निवेश करती हैं। जहां यह समस्त रकम कर्मचारी के रिटायरमेंट तक जमा रहती है।

कर्मचारियों के साथ समस्या यह है कि इस संपूर्ण 20% रकम को वे कभी निकाल नहीं सकते हैं यही नहीं आज 15 साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने कर्मचारियों को इस रकम में से केवल अपने हिस्से का अधिकतम 25% विशेष परिस्थितियों में ही निकालने की छूट दी है यह विशेष परिस्थितियां अत्यंत अव्यावहारिक हैं। इस पेंशन स्कीम के लागू होने के बाद से ही कर्मचारियों में भारी गुस्सा हैं।

यही नहीं 2004 से पहले सेवा में आए कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने पर उसकी फैमिली को फैमिली पेंशन प्राप्त है जबकि 2004 अर्थात एनपीएस लागू होने के बाद सेवा में आए कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु होने पर उसकी फैमिली को सरकार तभी फैमिली पेंशन देगी जब उसके एनपीएस अकाउंट की समस्त धनराशि सरकार के खाते में जमा कर दी जाएगी।

कर्मचारी इसे हड़प नीति की संज्ञा दे रहे हैं उनका आरोप है कि सरकार कर्मचारी के हिस्से को किस आधार पर हड़प रही है। यही नहीं निवेश की गई समस्त धनराशि आज ऐसी कंपनियों में जोखिम उठा रही है जहां लगातार घोटाले हो रहे हैं। अभी हाल ही में 15 जनवरी 2019 को आईएल एंड एफएस नामक कंपनी में 92,000 करोड रुपये स्लोडाउन का शिकार हुए जिसमें 16000 करोड़ रुपये कर्मचारियों के पेंशन फंड के थे। जिसके कारण कर्मचारियों की नींद उड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के कर्मचारियों का कई हजार करोड़ रुपये जो कि एनपीएस में जमा हुआ था घोटाले का शिकार हो गए।

पीएफआरडीए के तहत संपूर्ण राशि का केवल 15% शेयर मार्केट में लगाया जाना था जबकि 85% सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाना था किंतु आज तक पीएफआरडीए इस बात की पुष्टि नहीं कर सका है कि समस्त धनराशि का 85% कहां लगा है और 15% कहां लगा है,और न ही इस पर अलग अलग रिटर्न मिलता है, यही नहीं इस रकम पर कोई मिनिमम रिटर्न की गारन्टी नही है। कर्मचारियों का कहना है कि इस समस्त धनराशि को कंपनियां शेयर मार्केट में लगा रहे हैं जहां उनका पैसा सुरक्षित नहीं है।
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कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के पश्चात इसी एनपीएस में जमा हुई रकम के 40% हिस्से से कर्मचारी को पेंशन दी जानी है जबकि 60% रकम सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी को दे दी जाएगी किंतु इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है कि जिस तरह पुरानी पेंशन योजना के तहत रिटायरमेंट कर्मचारी को उसकी अंतिम सैलरी का 50% पेंशन के तौर पर डीए मिला कर दिया जाता है और हर छह माह में उसकी पेंशन में डीए की बढ़ोतरी होती रहती है साथ ही साथ हर साल तीन परसेंट का इंक्रीमेंट मिलता है एवं पे रिवीजन की फैसिलिटी भी प्राप्त होती है किंतु एनपीएस के तहत सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को अंतिम बेसिक सैलरी का कितने प्रतिशत पेंशन प्राप्त होगी

न्यू पेंशन स्किम में मिनिमम पेंशन की गारंटी भी नहीं है जबकि पुरानी व्यवस्था में 9000 रुपये की सेवानिवृत्ति के पश्चात मिनिमम पेंशन की गारंटी होती है। आज एनपीएस के तहत रिटायर होने वाले कर्मचारियों को कहीं 100, 200, 500, 800 रुपये की पेंशन मिल रही है जिसके कारण कर्मचारी हर राज्य में लगातार विरोध प्रदर्शन करते चले आ रहे हैं।

ऐसे कर्मचारियों को कोई पेंशन नहीं मिल रही है जिसके कारण उनकी सामाजिक सुरक्षा उनका बुढ़ापा उनका सम्मान उनका स्वाभिमान सब खतरे में है। जिन कर्मचारियों के अकाउंट में थोड़ा-बहुत कार्पस था भी उन्हें दो चार सौ की पेंशन मिल रही है। जिसकी वजह से आज 18 राज्यों से अधिक जगह एनपीएस के खिलाफ एनएमओपीएस संगठन के माध्यम से कर्मचारी लामबंद होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनावों में वहां की विपक्षी पार्टियों ने एनपीएस को खत्म कर पुरानी पेंशन अर्थात गारंटीड पेंशन योजना को बहाल करने की बातें अपने चुनावी मेनिफेस्टो में भी रखी।

30 अप्रैल 2018 में रामलीला मैदान दिल्ली में लाखों कर्मचारी एनएमओपीएस बैनर के तले इकट्ठे होकर एनपीएस गो बैक के नारे लगाते देखे गए। इसके बाद 26 नवंबर 2018 को पुनः रामलीला मैदान में एनपीएस के खिलाफ लाखों कर्मचारी इकट्ठे हुए जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कर्मचारियों की मांगों का ना केवल समर्थन किया बल्कि उसी दिन दिल्ली विधानसभा से पुरानी पेंशन योजना का प्रस्ताव पास कर कर्मचारियों के समर्थन में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी। लेकिन ये लागू हो न स्की क्योंकि इस बिल को केंद्र की मंजूरी नहीं मिली हैं।

एनएमओपीएस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी मनजीत सिंह पटेल के अनुसार आज लगभग 4 लाख करोड़ रुपये एनपीएस के तहत अलग-अलग कंपनियों में निवेश किए जा चुके हैं।

उन्होंने कहा 9 नवंबर 2019 से लगातार दिल्ली के शहीदी पार्क में पेंशन सत्याग्रह पर बैठे हजारों कर्मचारियों को सरकार से उम्मीद है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार उनकी मांगों पर निश्चित रूप से अमल करेगी और एनपीएस जैसी शोषणकारी व्यवस्था को खत्म करेगी।

मनजीत सिंह पटेल का कहना था की एनपीएस ना केवल कर्मचारियों के लिए नुकसानदेह है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक है क्योंकि अभी हाल ही में सरकार ने अपना हिस्सा 10% से बढ़ाकर के 14% कर दिया है जो कि 35,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 49,000 करोड रुपए सालाना बैठता है। इस समस्त रकम का बिना गारंटी के ऐसे कंपनियों में निवेश करना जिन पर कोई सरकार की लगाम ना हो निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था को एक दिन गर्त में ले जाएगा।

यदि सरकार कर्मचारियों के हिस्से को जीपीएफ में कन्वर्ट कर दे तो सरकार के खाते में कम से कम 200000 करोड रुपये आएंगे इससे ना केवल सरकार के लिक्विडिटी बढ़ेगी बल्कि कर्मचारियों का पैसा भी सुरक्षित हो सकेगा यही नहीं कर्मचारी जीपीएफ में अपनी कटौती को भी बढ़ा देते हैं जिससे प्रतिवर्ष सरकार के खाते में 35000 करोड़ों पैसे कहीं ज्यादा आने शुरू हो जाएंगे।

कर्मचारियों का कहना हैं कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आज भी सभी इलेक्टेड मेंबर चाहे विधायक हो एमपी हो या फिर मिनिस्टर हो सभी पुरानी पेंशन ही ले रहे हैं आज भी हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के जज महाराष्ट्र डिस्ट्रिक्ट जज और आयोग के सदस्य एवं तीनों सेनाओं को पुरानी गारंटीड पेंशन व्यवस्था ही प्रदान की जा रही है । लेकिन हम कर्मचारियों को पेंशन नहीं दी जा रही है,क्यों? इसका जबाब कोई नहीं दे रहा हैं।

कर्मचारियों का कहना है एक देश में एक पेंशन नीति होनी चाहिए जबकि उन्हें असंवैधानिक ढंग से दो अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया है उनके साथ सौतेला या दोहरा व्यवहार किया जा रहा है।

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