NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
फ़ोटो आलेख: ढलान की ओर कश्मीर का अखरोट उद्योग
कश्मीर में अखरोट उगाने की प्रक्रिया में मशीनीकरण की कमी है, इससे पैदावार कम होता है और फ़सल की गुणवत्ता भी ख़राब हुई है, लिहाज़ा कश्मीर के अखरोट उत्पादकों को इस समय निर्यात में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।
कामरान यूसुफ़
28 Sep 2021
Photo Essay: Kashmir’s Walnut Industry is on the Decline

जम्मू और कश्मीर (J&K) 89,000 हेक्टेयर में लगभग 2.66 लाख मीट्रिक टन का वार्षिक उत्पादन के साथ भारत के कुल अखरोट उत्पादन का तक़रीबन 98% पैदा करता है। यहां से हर साल गत्ते और टाट के बक्से में भरकर अखरोट को देश भर में भेजा जाता है। भारतीय बाज़ार में कैलिफोर्निया, चिली और चीन के अखरोट के आ जाने से कश्मीर के अखरोट उद्योग को झटका लगा है। लिहाज़ा,कश्मीरी अखरोट पैदा करने वाले और उत्पादक इस मांग में आयी गिरावट और कम क़ीमत को लेकर चिंतित हैं।

उच्च गुणवत्ता वाले रोपण की कमी, बग़ानों का ख़राब प्रबंधन और उगाने की लंबी अवधि,ये सब मिलकर जम्मू-कश्मीर के अखरोट किसानों के सामने पेश आयी इस मसले में योगदान देने वाले कारक हैं।

चिंता की बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में अखरोट का उत्पादन साल-दर-साल कम होता जा रहा है। नूरपोरा त्राल के एक व्यापारी ग़ुलाम अहमद डार कहते हैं, “हमारे बच्चे इस पारिवारिक कारोबार को जारी नहीं रख पायेंगे, क्योंकि अखरोट का उत्पादन आम तौर पर दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है। ऐसा नहीं कि सिर्फ़ वार्षिक उत्पादन में ही गिरावट आयी है, बल्कि इसकी क़ीमत में भी गिरावट आयी है, जबकि श्रम की लागत कई गुना बढ़ गयी है।”

जम्मू और कश्मीर भारत के लगभग सभी तरह के अखरोटों का उत्पादन करता है। भारत से निर्यात होने वाले तक़रीबन तमाम अख़रोट यहीं के होते हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश भी ऐसे राज्य हैं, जहां अखरोट उगाये जाते हैं।

भारत के अखरोट मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और दूसरे यूरोपीय देशों को निर्यात किये जाते हैं। लेकिन,पिछले कुछ सालों में निर्यात में लगातार गिरावट आयी है।

भारत ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में दुनिया भर में 1,648.26 मीट्रिक टन अखरोट का निर्यात किया था, जिसकी क़ीमत 52.77 करोड़ रुपये है। यह 2015-16 में भारत की ओर से निर्यात किये गये अखरोट के आधे से भी कम है, जिसकी मात्रा 3,292 मीट्रिक टन थी और इसकी क़ीमत लगभग 117.92 करोड़ रुपये थी। 2016-17 में अखरोट का यह निर्यात घटकर 2,191 मीट्रिक टन रह गया, जिसकी क़ीमत 55.27 करोड़ रुपये थी।

कई जानकारों का कहना है कि मशीनीकरण की कमी ने इस उद्योग को पीछे कर दिया है। जम्मू और कश्मीर को ठीक उसी तरह ज़्यादा पैदावार देने वाले किस्मों के नये अखरोट बाग़ानों की ज़रूरत है, जिस तरह ज़्यादा उपज देने वाले वाले सेब रूटस्टॉक ने भारत में सेब बाग़ानों का चेहरा बदल दिया है।

इस समय अखरोट के एक पेड़ में फल लगने में 13 से 15 साल का समय लग जाता है।उत्पादकों की शिकायत है कि फ़सल देने वाली यही लंबी अवधि एक अहम रुकावट है। इसके अलावा, 2017 में सरकार की ओर से लगाये गये वस्तु और सेवा कर (GST) ने भी उत्पादकों के लिए बाधायें खड़ी कर दी हैं।

अखरोट किसानों को सरकार की ओर से उच्च गुणवत्ता वाले कलम वाले पौधे मुहैया कराये जाने चाहिए। ख़ास तरह की क़िस्मों को उगाये जाने वाले अखरोट के बाग़ों को भी सरकार की ओर से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

अखरोट को ऐसी क़िस्मों के साथ ज़्यादा से ज़्यादा ज़मीन पर उगाया जाना चाहिये, जो उच्च पैदावार देती हैं और उत्पाद देने में कम से कम समय लेती है। जानकारों का कहना है कि किसान कटाई से पहले और कटाई के बाद के जो तरीक़े इस्तेमाल करते हैं,वे पुराने हो चुके हैं, और इस चलते उत्पादकता कम हो जाती है और फ़सल की गुणवत्ता भी कम हो जाती है।

जम्मू और कश्मीर के अखरोट उत्पादकों को इस हक़ीक़त से भी जूझना पड़ता है कि कई बाग़ों में फल अलग-अलग आकार और गुणवत्ता के होते हैं। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसके समग्र उत्पादन को जो अपना प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलना चाहिए,वह नहीं मिल पाता है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में समान आकार और उच्च गुणवत्ता की मांग होती है। हालांकि,उन किसानों ने इस समस्या का हल ढूंढ़ लिया है,जो अखरोट के कलम का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन,ऐसा बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रहा है।

किसान प्रति इकाई क्षेत्र कम घनत्व की समस्या का समाधान करने में असमर्थ हैं। कम उत्पादकता में योगदान देने वाला एक कारक जलवायु परिवर्तन भी है।

पौधे के लगभग हर हिस्से का कुछ ही हद तक इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन फल और लकड़ी का पूरी तरह से दोहन किया गया है। अखरोट का खाये जाने वाला भाग गिरी या उसके दाने होते हैं, जो पूरे फल के वज़न का तक़रीबन आधा होता है और इसमें प्रोटीन, वसा और खनिज होते हैं, और यह विटामिन बी का भी एक अच्छा स्रोत होता है।

अखरोट के पत्ते त्वचा की समस्याओं, आंखों में जलन, भूख न लगना और घाव भरने जैसी अन्य चीज़ों में भी मददगार होते हैं। पुराने अतिसार,यानी दस्त में अखरोट का बाहरी छिलका फ़ायदेमंद होता है। अखरोट के खोल के आटे से जो उत्पाद बनते हैं,उनमें से कुछ हैं- प्लास्टिक फ़ाइबर, औद्योगिक टाइल्स और कीटनाशक स्प्रेडर्स।

इसके अलावा, हमारे हस्तशिल्प कलाकार जब अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करते हैं,तो उसका एक अलग ही रूप सामने आता है। कश्मीर में अनंतनाग (इस्लामाबाद), शोपियां और कुपवाड़ा अखरोट उगाने वाले सबसे बड़े इलाक़े हैं। इसकी तीन मुख्य क़िस्में हैं-काग़ज़ी, वोंथ और बुर्जुल।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Photo Essay: Kashmir’s Walnut Industry is on the Decline

Kashmir
Walnut Industry
Walnut Farmers
Jammu & Kashmir
GST
Walnut Export
Agriculture

Related Stories

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर


बाकी खबरें

  • indian freedom struggle
    आईसीएफ़
    'व्यापक आज़ादी का यह संघर्ष आज से ज़्यादा ज़रूरी कभी नहीं रहा'
    28 Jan 2022
    जानी-मानी इतिहासकार तनिका सरकार अपनी इस साक्षात्कार में उन राष्ट्रवादी नायकों की नियमित रूप से जय-जयकार किये जाने की जश्न को विडंबना बताती हैं, जो "औपनिवेशिक नीतियों की लगातार सार्वजनिक आलोचना" करते…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.5 लाख नए मामले, 627 मरीज़ों की मौत
    28 Jan 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 6 लाख 22 हज़ार 709 हो गयी है।
  • Tata
    अमिताभ रॉय चौधरी
    एक कंगाल कंपनी की मालिक बनी है टाटा
    28 Jan 2022
    एयर इंडिया की पूर्ण बिक्री, सरकार की उदारीकरण की अपनी विफल नीतियों के कारण ही हुई है।
  • yogi adityanath
    अजय कुमार
    योगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड: अर्थव्यवस्था की लुटिया डुबोने के पाँच साल और हिंदुत्व की ब्रांडिंग पर खर्चा करती सरकार
    28 Jan 2022
    आर्थिक मामलों के जानकार संतोष मेहरोत्रा कहते हैं कि साल 2012 से लेकर 2017 के बीच उत्तर प्रदेश की आर्थिक वृद्धि दर हर साल तकरीबन 6 फ़ीसदी के आसपास थी। लेकिन साल 2017 से लेकर 2021 तक की कंपाउंड आर्थिक…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    रेलवे भर्ती: अध्यापकों पर FIR, समर्थन में उतरे छात्र!
    28 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License