NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
LGBTQ+ समुदाय को गौरवान्वित महसूस कराने के लिए नीतिगत सुधार ज़रूरी 
LGBTQ+ समुदाय इस बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि समाज और भारतीय हुकूमत उन्हें स्वीकार करें और उनका समानता और गौरव के साथ देखें।
रवि सिंह छिकारा, नवनीत सिंह
06 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
LGBTQ+ समुदाय को गौरवान्वित महसूस कराने के लिए नीतिगत सुधार ज़रूरी 

जबकि गे प्राइड को अभी एक महीना ही बीता है, नवनीत सिंह और रवि सिंह छिकारा इस संबंध में चार तत्काल नीतिगत उपाय सुझा रहे हैं जिन्हें भारतीय हुकूमत को तरजीह देनी चाहिए और समानता और गरिमा के अधिकार को मजबूत करना चाहिए जिनकी गारंटी भारतीय संविधान देता है और सर्वोच्च न्यायालय मान्यता। 

पिछले महीने, भारत ने पूरी दुनिया के साथ मिलकर समलैंगिक गौरव माह मनाया। यह महीना LGBTQ+ समुदाय, इसके सदस्यों के प्रति भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और सम्मानजनक जीवन जीने के उनके अधिकार का जश्न मनाने के लिए समर्पित है।

हर साल, जून के महीने में, LGBTQ+ समुदाय अपने सदस्यों की आत्म-पुष्टि, गरिमा और समानता को बढ़ावा देने के लिए इसे बड़े स्तर पर मनाता है और जनता से प्यार और दृश्यता का भाव चाहता है। इस महीने का सबसे बड़ा लोकाचार यह है: किसी भी व्यक्ति को इस बात पर गर्व महसूस करना चाहिए कि वह व्यक्ति कौन है और किसी को इस बात से फ़र्क नाहें पड़ना पड़ना चाहिए कि वह व्यक्ति किससे प्यार करता है।

गे प्राइड का इतिहास 

इसकी शुरुवात अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में 1969 के स्टोनवेल दंगों से हुई थी। न्यूयॉर्क पुलिस क्वीर बार में छापेमारी करती थी और क्वीर समुदाय के सदस्यों को परेशान करती थी। हालांकि, 28 जून, 1969 को, स्टोनवेल सराय जब पुलिस ने छापा मारा तो पुलिस काफी हिंसक हो गई थी,  क्वीर समुदाय के सदस्यों ने भी पुलिस हमले का डट कर मुक़ाबला किया और उसके बाद लंबे  समय तक पुलिस के भेदभाव और क्रूरता के खिलाफ निरंतर विरोध प्रदर्शन करते रहे। 

1970 में, दंगों की पहली बरसी पर न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो में गौरव मार्च यानि प्राइड मार्च आयोजित किए गए। तब से, जून का महीना समलैंगिक गौरव को चिह्नित करने का महीना बन गया है।

भारत ने 1999 में कोलकाता में अपना पहला गौरव मार्च निकाला था। तब से, निस्संदेह, LGBTQ+ अधिकारों से जुड़े लोगों ने भारत में एक लंबा सफर तय किया है, फिर भी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। समलैंगिक समुदाय और उसके सहयोगी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विवाह, गोद लेने, भरण-पोषण और स्वास्थ्य बीमा आदि के अधिकारों को सुरक्षित बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। इन अधिकारों के लिए संघर्ष को अदालतों के सामने भी लाया गया है और उम्मीद है कि ये जल्द ही साकार हो जाएंगे।

जब हम गौरव माह की तरफ मुड कर देखते हैं, तो हम भविष्य में सुधार के लिए उन कदमों की एक सूची पेश कर रहे हैं जिन्हे हुकूमत और जनता को LGBTQ+ समुदाय के मुद्दों को आगे बढ़ाने और अगले जून में उन्हें गौरवान्वित महसूस कराने के लिए उठाने चाहिए।

कानूनी क्षमा देना और सार्वजनिक माफी मांगना  

सबसे पहले, समलैंगिक कृत्यों के लिए दोषी ठहराए गए सभी लोगों को पूर्वव्यापी प्रभाव से क्षमा प्रदान करना जिन्हें अब भारत में आपराधिक अपराध नहीं माना जाता है। यह 2017 में पारित यूके के "ट्यूरिंग लॉ" के समान होना चाहिए, जिसने लगभग 50,000 समलैंगिक पुरुषों को स्वचालित रूप से क्षमा कर दिया था, जिनकी मृत्यु हो गई थी। फिर जीवित लोगों को क्षमा के लिए आवेदन करने की पेशकश की गई थी।

इसी तरह, भारत में भी हुकूमत को समुदाय के दोषी सदस्यों के सभी आपराधिक रिकॉर्ड को माफ और साफ करना चाहिए। यह माफी उन्हें उनके अधिकारियों द्वारा बिना किसी उत्पीड़न के नौकरी, पढ़ाई और सबसे महत्वपूर्ण मकान मालिकों से घर किराए पर दिलाने में मदद करेगा। आखिरकार, किसी को भी ऐसे अपराध के लिए अपराधी ठहराकर ज़िंदा रहना कितना अनुचित है, जो ‘अपराध’ उसके मौलिक अधिकार के अलावा और कुछ नहीं है?

इसके अलावा, पिछले दोषियों और उन पर किए उत्पीड़न से हुकूमत के माफी मांगने से सकारात्मक संकेत जाएगा, और एलजीबीटीक्यू + समुदाय के खिलाफ अभद्र भाषा और भेदभाव को कम करने में मदद मिलेगी। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने खुद के शब्दों में कहा था, कि इस के समुदाय सदस्यों से माफी मांगना तो बनता है।

कई विश्व नेताओं ने खुद अपनी संसद के भीतर अपने देश के एलजीबीटीक्यू + नागरिकों से जैसे कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, विक्टोरियन प्रीमियर डैनियल एंड्रयूज और स्कॉटलैंड के प्रथम मंत्री निकोला स्टर्जन ने दशकों से हुकूमत द्वारा प्रायोजित, व्यवस्थित उत्पीड़न और अस्वीकृति के सिलसिले में माफी मांगी है।

सही सर्वनामों का प्रयोग करना निहायत ज़रूरी 

दूसरा, जनता को ऐसे समुदायों के सदस्यों के प्रति सही सर्वनाम का इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए। किसी के लिए उचित सर्वनाम का उपयोग उनकी लिंग पहचान के प्रति सम्मान दिखाने के सबसे बुनियादी तरीकों में से एक है। जब किसी को गलत सर्वनाम के साथ संदर्भित किया जाता है, तो वह उन्हें अपमानित, अमान्य, खारिज, विमुख, या निराशाजनक महसूस करा सकता है।

ज़्यादातर, हम जिन सर्वनामों का इस्तेमाल करते हैं, वे 'वह' और 'वो' हैं। लेकिन क्वीर, जेंडर नॉन-कन्फर्मिंग, नॉन-बाइनरी और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए, ये सर्वनाम फिट नहीं हो सकते हैं और उनके लिए चिंता, संकट और परेशानी पैदा कर सकते हैं। 2018 में टेक्सास विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए शोध से पता चला कि अगर ट्रांसजेंडर युवाओं को अपना नाम और सर्वनाम चुनने का मौका दिया जाता है, तो उनके अवसाद में जाने और आत्महत्या का प्रयास करने की संभावना कम होती है।

इस प्रकार, जिस व्यक्ति को संबोधित किया जाना है, उसके लिए सर्वनाम लगाने से पहले उससे पूछने के बाद बातचीत शुरू करने का एक मानदंड निर्धारित करना महत्वपूर्ण है। इससे समुदाय के सदस्यों के साथ सर्वनाम के गलत प्रयोग से बचा जा सकेगा, जिससे उन्हें सम्मान और आदर का अनुभव होगा।

LGBTQ+ जोड़ों को बच्चे गोद लेने दें

तीसरा, चूंकि भारत में समलैंगिक विवाह कानूनी नहीं हैं, ऐसे जोड़ों को बच्चे गोद लेने की अनुमति नहीं है। इंटरनेशनल चिल्ड्रन चैरिटी एसओएस चिल्ड्रन विलेज के अनुसार, भारत ढाई करोड़ से अधिक अनाथ बच्चों का घर है। महामारी के कारण यह संख्या पहले की तुलना में तेजी से बढ़ रही है।

हालाँकि, भारत में बच्चा गोद लेने का कानून समलैंगिक जोड़े को बच्चा गोद लेने की अनुमति नहीं देता है। इसे महसूस करना कितना दर्दनाक है कि मौजूदा नीति के अनुसार, हुकूमत यह चाहेगी कि त्याग दिया गया बच्चा बजाय किसी सरकारी आश्रय गृह में या परिवार के बिना पले, उससे बेहतर तो ये होगा कि कोई समलैंगिक या समलैंगिक जोड़ा उसे गोद ले ले। 

LGBTQ+ व्यक्तियों को सशस्त्र बलों में नौकरी करने का मौका दें

चौथा, हुकूमत को सेना अधिनियम, 1950 के उन प्रावधानों को निरस्त करना चाहिए जो सशस्त्र बलों में समलैंगिकता को अपराध बनाते हैं, इसमें सुधार लाने के लिए अदालत में चुनौती देने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। इस कानून के कारण खुले तौर पर समलैंगिक लोग सशस्त्र बलों में शामिल होकर देश की सेवा नहीं कर सकते हैं।

यह अन्यायपूर्ण और अनुचित भी है, क्योंकि देशभक्ति किसी के यौन अभिविन्यास से संबंधित नहीं है, बल्कि देश के प्रति बलिदान की इच्छा से आती है। दक्षिण अफ्रीका, इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ताइवान, थाईलैंड, जापान और फिलीपींस के साथ-साथ अधिकांश उत्तर और दक्षिण अमेरिकी और यूरोपीय देश LGBTQ+ समुदाय के सदस्यों को अपनी सेना में सेवा करने की अनुमति देते हैं।

इस तरह के कानून को रद्द करने से हम न सिर्फ समाज का नाम रौशन करेंगे, बल्कि देश को भी गौरवान्वित करेंगे।

ऊपर चर्चा किए गए इन सभी अधिकारों पर अदालतों के अलग से हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि समुदाय को इन अधिकारों का आधार भारत के संविधान में हासिल है, जैसा कि राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ और अन्य के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों में व्यक्त किया गया है। (AIR 2014 SC 1863), नवतेज सिंह जौहर और अन्य बनाम भारत संघ (AIR 2018 SC 4321) और न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य, (2017) 10 एससीसी 1.

यह सही वक़्त है कि संसद और कार्यकारी शाखाएं इन निर्णयों में न्यायपालिका द्वारा परिकल्पित अधिकारों के पूरे सार को समुदाय को प्रदान करें। समुदाय आज भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि समाज और हुकूमत उन्हे स्वीकार करें और उन्हे समानता और गरिमा के साथ जीने दें। 

(रवि सिंह छिकारा और नवनीत सिंह दोनों विधि संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंतिम वर्ष के छात्र हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)

लेख मूल रूप से द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

Policy Reforms to Make the LGBTQ+ Community Prouder by Pride Month Next Year

LGBTQ Community
gender rights
LGBTQI
social justice

Related Stories

राष्ट्रीय युवा नीति या युवाओं से धोखा: मसौदे में एक भी जगह बेरोज़गारी का ज़िक्र नहीं

सवर्णों के साथ मिलकर मलाई खाने की चाहत बहुजनों की राजनीति को खत्म कर देगी

मंडल राजनीति को मृत घोषित करने से पहले, सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान अंबेडकर की तस्वीरों को याद करें 

डॉ.अंबेडकर जयंती: सामाजिक न्याय के हजारों पैरोकार पहुंचे संसद मार्ग !

हिंदुत्व की गोलबंदी बनाम सामाजिक न्याय की गोलबंदी

सामाजिक न्याय का नारा तैयार करेगा नया विकल्प !

पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना

फ़ासीवाद से कैसे नहीं लड़ना चाहिए?

जेंडर आधारित भेदभाव और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

अगर मुस्लिमों के भीतर भी जाति है तो इनकी आवाज़ जातिवार जनगणना की मांग में क्यों दब रही है?


बाकी खबरें

  • कश्मीर: आर्टिकल 370 हटने के दो साल बाद व्यापार और पर्यटन ठप
    न्यूज़क्लिक टीम
    कश्मीर: आर्टिकल 370 हटने के दो साल बाद व्यापार और पर्यटन ठप
    07 Aug 2021
    जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को निरस्त किये जाने के दो साल बाद भी ज़िंदगी पटरी पर नहीं आयी है। व्यापार और पर्यटन Covid-19 और उसकी वजह से लगे lockdown…
  • 2018 की बाढ़ के बाद दोबारा बनाया गया, केरल का FHC राज्य के लचीले सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है
    अज़हर मोइदीन
    2018 की बाढ़ के बाद दोबारा बनाया गया, केरल का FHC राज्य के लचीले सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है
    07 Aug 2021
    मलप्पुरम के वझक्कड में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 2018 की बाढ़ में पूरी तरह बर्बाद हो गया था। इसे अब दोबारा बना लिया गया है। यह अपनी तरह का देश का सबसे बड़ा केंद्र है। केरल के सार्वजनिक स्वास्थ्य…
  • संसद
    अनिल जैन
    संसद को अपने रसोईघर की तरह इस्तेमाल कर रही है मोदी सरकार!
    07 Aug 2021
    हक़ीक़त यह है कि संसद का यह सत्र उसी तरह चल रहा है जिस तरह सरकार चलाना चाहती है। कथित हंगामे के बीच सरकार का अपने जन विरोधी एजेंडा पर अमल धड़ल्ले से जारी है।
  • 9 अगस्त को “मोदी गद्दी छोड़ो, कॉरपोरेट भारत छोड़ो” और 15 अगस्त को ‘किसान मज़दूर आज़ादी संग्राम दिवस’
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    9 अगस्त को “मोदी गद्दी छोड़ो, कॉरपोरेट भारत छोड़ो” और 15 अगस्त को ‘किसान मज़दूर आज़ादी संग्राम दिवस’
    07 Aug 2021
    जंतर-मंतर पर चल रही ‘किसान संसद’ में शुक्रवार को मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया जिस पर सोमवार को भी बहस होगी।
  • कोलकाता में मनाई गई कम्युनिस्ट नेता मुज़फ़्फ़र अहमद की 133वीं जयंती
    संदीप चक्रवर्ती
    कोलकाता में मनाई गई कम्युनिस्ट नेता मुज़फ़्फ़र अहमद की 133वीं जयंती
    07 Aug 2021
    माकपा नेताओं ने बंगाल में प्रगतिशील परंपराओं को मजबूत करने के लिए 'काका बाबू' द्वारा किए गए प्रमुख कार्यों को याद किया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License