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राजनीति
राजनीति: जातिगत जनगणना व पेगासस पर नीतीश कुमार के बयान का मतलब
साल 2024 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी के प्रयासों के बीच जदयू की तरफ से ऐसे बयान आने लगे हैं, जिससे भाजपा मुश्किल में दिख रही है।
उमेश कुमार राय
04 Aug 2021
 राजनीति: जातिगत जनगणना व पेगासस पर नीतीश कुमार के बयान का मतलब
image courtesy: BBC

पिछले साल के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का प्रदर्शन भाजपा से बदतर होने के बाद जदयू की तरफ से कभी भी गठबंधन सहयोगी भाजपा के खिलाफ कड़ा रुख सार्वजनिक नहीं किया गया था। मगर, साल 2024 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी के प्रयासों के बीच जदयू की तरफ से ऐसे बयान आने लगे हैं, जिससे भाजपा मुश्किल में दिख रही है।

ताजा बयान खुद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार है, जो कई संगीन मुद्दों पर या तो भाजपा का बचाव करते हुए दिखते थे या चुप्पी साध लेते थे। पेगासस स्नूपिंग खुलासे के बाद भाजपा–नीत केंद्र सरकार पर विपक्षी पार्टियों के नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, न्यायधीश व अन्य लोगों की जासूसी कराने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

इन आरोपों को भाजपा के नेता सिरे से खारिज भी कर रहे हैं, मगर एनडीए के सहयोग दलों की तरफ से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। नीतीश कुमार ने चुप्पी तोड़ते हुए पेगासस जासूसी के आरोपों की जांच कराने की मांग कर दी है। सोमवार को जनता दरबार कार्यक्रम के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए नीतीश कुमार ने कहा, “इस मामले (पेगासस स्नूपिंग) पर संसद में बहस होनी चाहिए। फोन टैपिंग के मामले पर लम्बे समय से बहस चल रही है। अभी कोई नहीं जानता कि किसका फोन टैप हो जाएगा। निश्चित रूप से इसकी जांच की जानी चाहिए। संसद में लोग इसे (स्नूपिंग का मामला) उठा रहे हैं।”      

नीतीश कुमार की लाइन पर चलते हुए मंगलवार को जदयू की सहयोगी पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेकुलर) के मुखिया व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने भी पेगासस स्नूपिंग मामले की जांच कराने की वकालत की। उन्होंने ट्वीट किया, “अगर विपक्ष किसी मामले की जांच की मांग कर लगातार संसद का काम प्रभावित कर रहा है, तो यह गंभीर मामला है। मुझे लगता है कि वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पेगासस जासूसी मामले की जांच करा लेनी चाहिए, जिससे देश को पता चल पाये कि कौन किन लोगों की जासूसी करवा रहा है।”

गौरतलब हो कि भाजपा नेता व नीतीश सरकार में मंत्री सम्राट चौधरी ने रविवार को एक कार्यक्रम में कहा था कि “भाजपा की 74 सीटें हैं और जदयू की मात्र 43 लेकिन इसके बावजूद हमने नीतीश कुमार को मजबूरी में मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया है।”

उन्होंने आगे कहा, “बिहार में गठबंधन की सरकार चलाना चुनौती का काम था क्योंकि बिहार में एनडीए गठबंधन में चार पार्टियां शामिल हैं और उनकी विचारधाराएं अलग हैं। इस स्थिति में हमें बहुत सारी चीजें बर्दाश्त करनी पड़ती हैं”। इससे पहले उन्होंने कहा था कि साल 2020 के विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा को बहुमत मिल जाता, तो सरकार बनाने के लिए जदयू की जरूरत ही नहीं पड़ती। इस पर पलटवार करते हुए जदयू नेता उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था कि नीतीश कुमार पीएम मटीरियल हैं।

पेगासस स्नूपिंग पर भाजपा के ‘बचाव मोड’ के बीच नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी के इस बयान के कई तरह के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि भाजपा को असहज स्थिति में डालकर नीतीश कुमार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि जदयू से सम्मानजनक व्यवहार किया जाए, अन्यथा जदयू उन्हें ‘शर्मनाक स्थिति’ में डाल सकती है, तो दूसरी तरफ कुछ विश्लेषकों का ये भी कहना है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वे दबाव की राजनीति कर रहे हैं।

उनके बयानों को 2024 के आम चुनाव से जोड़कर इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि उनका बयान हाल ही में दिल्ली में तृणमूल सुप्रीमो व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  की कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं व अन्य पार्टियों के नेताओं से मुलाकात और इसके साथ साथ सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बीच मुलाकात के बाद आया है।

हालांकि, जानकार नीतीश कुमार के बयान को साल 2024 में होने वाले आम चुनाव से जोड़कर नहीं देख रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन न्यूज़क्लिक  के लिए बात करने पर बताते हैं, “नीतीश कुमार अब राजनीतिक रूप से उतने मजबूत नहीं हैं कि खुद को पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में देख सकें। ये बात उन्हें भी पता है, इसलिए मुझे नहीं लगता है कि इस बयान का आसन्न आम चुनाव से कोई लेना देना है। हालांकि, राजनीति में कुछ भी ठोस रूप से नहीं कहा जा सकता है।”

गौरतलब हो कि इससे पहले जब नीतीश कुमार से पेगासस स्नूपिंग पर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि जासूसी करना गंदी बात है, ऐसा नहीं होना चाहिए। ये एक गैर-राजनीतिक बयान था। लेकिन, अब उनका बयान खालिस राजनीतिक है और सीधे तौर पर विपक्षी पार्टियों की लाइन से मेल खा रहा है और उनकी मांगों को समर्थन दे रहा है

इसे महेंद्र सुमन नीतीश कुमार के केंद्र की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता दोबारा हासिल करने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं।

वे कहते हैं, “मौजूदा समय में नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में बिल्कुल अप्रासंगिक हो गये हैं। राष्ट्रीय राजनीति में उनकी चर्चा नहीं होती है। बिहार में उन्होंने जो भी काम किया, उसे भी अब बेच नहीं पा रहे हैं, तो ऐसे में उनके लिए जरूरी था कि किसी भी मुद्दे पर वे रैडिकल स्टैंड ले लें। तमाम मुद्दों पर उनके पहले के बयानों को देखा जाए, तो वे सीधे तौर पर न सही तो अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा के समर्थन में होते थे। अगर समर्थन नहीं भी करते, तो ऐसा बयान दे देते थे जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता था।”

वे कहते हैं, “पेगासस जासूसी और जाति आधारित जनगणना पर उन्होंने रैडिकल स्टैंड लिया है, तो अब वैचारिक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गये हैं”।

जाति आधारित जनगणना पर नीतीश के स्टैंड का अर्थ  

जाति आधारित जनगणना पर भी भाजपा के गोलमटोल जवाबों के बरक्स नीतीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि वे जातीय जनगणना के समर्थन में हैं। शुक्रवार को उन्होंने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मुलाकात की थी। दिलचस्प रूप से इस बैठक में भाजपा की तरफ से कोई नेता शामिल नहीं था।

राजद व जदयू लम्बे समय से जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं। जदयू के एक नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि जाति आधारित जनगनणा जदयू का कोर इश्यू है, जिससे पार्टी पीछे नहीं हटेगी। सोमवार को नीतीश कुमार ने कहा था, “विपक्षी पार्टियों की तरफ से सुझाव आया है कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिला जाए, तो हमलोग प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात रखेंगे।”

उल्लेखनीय है कि जदयू,  राजद व लोजपा जैसी पार्टियों का वोट बैंक जाति केंद्रित रहा है। ऐसे में जाति आधारित जनगनणा होने से उन्हें अपनी राजनीति को और मजबूत करने का मौका मिलेगा, क्योंकि जातिगत जनगणना होने से एक बार फिर आरक्षण बढ़ाने की मांग उठेगी, जिसका फायदा इन पार्टियों को होगा। इसके विपरीत भाजपा की राजनीति हिन्दुत्व पर टिकी हुई है, इसलिए वो जाति आधारित जनगणना कराने के मूड में नहीं दिखती है।

नीतीश के बयान पर भाजपा की चुप्पी

पेगासस स्नूपिंग मामले पर नीतीश कुमार के बयान को लेकर जदयू का स्टैंड साफ है और जदयू इसे अपना अधिकार मान रहा है।

जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने न्यूज़क्लिक के लिए बातचीत में कहा, “जदयू एक स्वतंत्र पार्टी है। हमको भी अपनी बात कहने का अधिकार है। इससे गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।” उन्होंने आगे कहा कि पेगासस जासूसी की जांच पारदर्शी राजनीति के लिए बहुत जरूरी है।

नीरज कुमार ने कहा, “नीतीश कुमारजी ने ये कहा है कि पार्लियामेंट में जो बातें उठ रही हैं, न्यूज पेपरों में जो खबरें आ रही हैं, उसके आधार पर हमलोगों को लगता है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि नई तकनीक का दुरुपयोग कौन, किस तरह कर रहा है, ये कोई नहीं जानता, इसकी जांच होनी चाहिए सबूत के साथ। अभी सोशल मीडिया का जो दुरुपयोग हो रहा है, वो तो सबके लिए चिंता का विषय है।

नीतीश कुमार की कई मौके पर आलोचना करने वाले भाजपा नेता व मंत्री सम्राट चौधरी से जब इस मुद्दे पर बात की गई, तो उन्होंने कहा कि राजनीतिक टिप्पणियां पार्टी के प्रवक्ता देंगे।

भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने न्यूज़क्लिक  से कहा कि वे किसी जरूरी काम से बिहार से बाहर हैं इसलिए उन्हें नहीं पता कि नीतीश कुमार ने क्या कहा है। हालांकि उनकी टिप्पणी सुर्खियां बनी हुई हैं।

माना जा रहा है कि भाजपा की प्रतिक्रिया से दोनों पार्टियों के बीच वाकयुद्ध तेज होगा, जिसका असर गठबंधन पर पड़ सकता है इसलिए भाजपा ने रणनीति के तहत चुप रहने का फैसला लिया है।

यूपी चुनाव से बदल सकता है समीकरण

गौर करने वाली बात है कि जिस तरह अभी नीतीश कुमार ने पेगासस स्नूपिंग और जाति आधारित जनगणना पर भाजपा के विपरीत स्टैंड लिया है, ठीक इसी तरह 2016-2017 में राजद के साथ गठबंधऩ में रहते हुए नोटबंदी पर राजद के खिलाफ स्टैंड लिया था। यही नहीं महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार ने भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन दिया था। इसके बाद वे महागठबंधन से अलग हो गये और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली थी।

तो क्या ये माना जाना चाहिए कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन खत्म कर दोबारा महानगठबंधऩ का हिस्सा हो सकते हैं? इस सवाल पर पटना के वरिष्ठ पत्रकार दीपक मिश्रा कहते हैं, “अभी तुरंत तो ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है। जो कुछ भी होगा, वो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद ही होगा। अगर यूपी चुनाव में भाजपा हार जाती है, तो हो सकता है कि नीतीश कुमार एनडीए से बाहर निकल जाएं। लेकिन अगर वो ऐसा करते हैं, तो इसका उद्देश्य भाजपा को सिर्फ चुनावी नुकसान पहुंचाना होगा। वे खुद को अब प्रधानमंत्री के रेस में नहीं मानते हैं।”

 

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