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ग़रीब कामगार महिलाएं जलवायु परिवर्तन के चलते और हो रही हैं ग़रीब
सीमित संसाधनों में रहने वाली गरीब महिलाओं का जीवन जलवायु परिवर्तन से हर तरीके से प्रभावित हुआ है। उनके स्वास्थ्य पर बुरा होने के साथ ही उनकी सामाजिक सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है, इससे भविष्य में लैंगिक असमानता को लेकर चिंताएं और गंभीर हो जाती हैं।
सोनिया यादव
03 Feb 2022
working women
Image courtesy : Shutterstock

बीते दिनों ऐसी कई रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिसमें ये लगातार दावा किया जा रहा है कि देश के लेबर फोर्स से महिलाओं का एक बड़ा तबका बाहर हो गया है। महिलाओं की आय घट गई है, आमदनी के रास्ते बंद हो गए हैं। अब उन्हें पहले के मुकाबले आर्थिक और सामाजिक तौर पर ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है। मोदी सरकार के बजट 2022 से कई लोगों को बेहद उम्मीदें थी, कामगार महिलाओं को लग रहा था कि शायद सरकार उनकी जिंदगी दोबारा पटरी पर लाने के लिए कुछ कदम उठाए। हालांकि मोदी सरकार के अमृतकाल बजट में महिलाओं को कोई खास जगह नहीं मिली। सुरक्षा से लेकर सशक्तिकरण और स्वायत्तता की चुनौतियों में महिलाओं को केवल निराशा ही हाथ लगी।

बजट से ठीक पहले घरेलू कामगार महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठन होमनेट साउथ एशिया की रिपोर्ट से सामने आई। इसमें साफ शब्दों में कहा गया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण घरेलू कामगार महिलाओं की आय में कमी दर्ज की गई है। सीमित संसाधनों में रहनेवाली गरीब महिलाओं का जीवन जलवायु परिवर्तन से हर तरीके से प्रभावित हुआ है। उनके स्वास्थ्य पर बुरा होने के साथ ही उनकी सामाजिक सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है, इससे भविष्य में लैंगिक असमानता को लेकर चिंताएं और गंभीर हो जाती हैं। हालांकि इन तमाम रिपोर्ट्स के बावजूद सरकार ने इस बजट में इन कामगार महिलाओं की राहत के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए।

बता दें कि होमनेट ने इस अध्ययन में भारत के अलावा बांग्लादेश और नेपाल को भी शामिल किया है। बांग्लादेश के ढाका, भारत में अहमदाबाद एवं सूरत और नेपाल के भक्तापुर और ललितपुर से रिपोर्ट के आंकड़े तैयार किए गए हैं। इसमें शोधकर्ताओं ने 202 महिलाओं से इस बारे में जानकारी हासिल कर विस्तृत रिपोर्ट बनाई है।

रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में महिलाओं के रोजगार में घरेलु महिला कामगारों की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई है जबकि पुरुषों का केवल 6 फीसदी हिस्सा ही घरेलु कामगारों के रूप में काम करता है। ये औरतें सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, पैकेजिंग या फिर खाने की रेड़ी लगाने जैसे छोटे मोटे काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालती हैं। होमनेट का कहना है कि घर से काम करनेवाली महिलाओं का यह समूह सबसे कम आय प्राप्त करने वाले समूहों में से एक है और सबसे कमजोर भी है।

रिपोर्ट में खास क्या है?

घर से काम करने वाली इन महिलाओं में बड़ा हिस्सा शहरी झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों का है। ये गरीब महिलाएं पहले से ही बुरी आर्थिक स्थिति में जी रही हैं और आय घटने का उनके जीवन स्तर पर कई गुना बुरा असर होता है। रिपोर्ट के अध्ययन में 61 फीसद महिलाएं 30 से 50 वर्ष की शामिल थी, जिसमें 83 फीसद विवाहित थी, जबकि 63 फीसद के बच्चे 14 वर्ष के कम उम्र के थे। इस सर्वे के बाद होमनेट साउथ एशिया ने ‘इम्पैक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑन अर्बन होम-बेस्ड वर्कर्स इन साउथ एशिया’  के नाम से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

रिपोर्ट कहती है कि इन महिलाओं की औसत आय 1.90 डॉलर यानी लगभग 140 रुपये रोजाना के औसत से कहीं काफी कम है। सर्वे में शामिल 43 फीसदी महिला कामगारों ने आय में आई गिरावट और 41 फीसदी ने उत्पादकता में आती कमी के लिए मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन को जिम्मेवार माना था। वहीं 83 फीसदी का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में गर्मी के दौरान तापमान बढ़ रहा है, जिससे उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि उनमें से दो-तिहाई करीब 66.3 फीसदी को नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि 11 फीसदी ने इसके लिए भगवान के कोप को वजह माना है।

इनमें से 55 फीसदी ने यह स्वीकार किया कि बदलती जलवायु उनके परिवार को प्रभावित कर रही है। इसका जो सबसे ज्यादा असर सामने आया है वो यह है कि इसके चलते महिलाओं के पहले के मुकाबले अपने घरेलु रोजमर्रा के कामों पर ज्यादा वक्त देना पड़ रहा है, जिसके लिए उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। सर्वे में शामिल करीब 60 फीसदी महिलाओं का कहना है कि उन्हें रोजाना दो घंटे और काम करना पड़ रहा है। उनके अनुसार उन्हें बीमार की देखभाल, पानी भरना और खाने के सामान के रखरखाव पर ज्यादा वक्त देना पड़ रहा है। यानी इस कारण उनके काम का बोझ बढ़ गया है।

स्वास्थ्य की समस्याएं और बीमा का खेल

यदि स्वास्थ्य की बात करें तो करीब 15 फीसदी का कहना है कि उनके परिवार के किसी न किसी सदस्य को पिछले कुछ वर्षों में हीटस्ट्रोक का सामना करना पड़ा था। वहीं 33 फीसदी ने गंदे पानी के कारण होने वाली बीमारियों और 34 फीसदी ने वेक्टर जनित रोगों की शिकायत की थी।

मानसून के दौरान 30 फीसदी घरेलु महिला कामगारों का कहना है कि उनके घरों में बारिश का पानी भर गया था, जबकि उनमें से 47 फीसदी ने घरों के नुकसान की जानकारी दी है। इनमें से 48 फीसदी को जलवायु परिवर्तन की मार से बचने के लिए अतिरिक्त उपाय करने पड़े थे। करीब 20 फीसदी को अपना घर बदलना पड़ा था, जबकि 16 फीसदी ने अपनी जीविका में बदलाव किए थे।

इनमें से 57 फीसदी का कहना है कि उन्हें अपना घर चलाने के लिए पार्ट टाइम में काम भी करना पड़ा था क्योंकि उनकी मासिक आय 5,000 से भी कम है। वहीं सर्वे में शामिल 65 फीसदी का कहना है कि उनके पास सेविंग अकाउंट हैं, जबकि 24 फीसदी ने स्वास्थ्य बीमा की बात को स्वीकार किया है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन यदि उनके स्वास्थ्य पर असर डालता है तो उससे निपटने के लिए उनके पास बहुत कम साधन हैं।

इन तमाम समस्याओं का हल क्या है या इन बदलावों से कैसे निपटा जाए इस बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। गर्मियों में तापमान बढ़ने पर कैसे बचा जाए इस बारे में पूछे जाने पर 55 फीसदी ही यह बता पाए थे कि उन्हें क्या करना चाहिए। 51 फीसदी का कहना है कि उन्हें इस बारे में विशेष जानकारी नहीं है इसलिए वो जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए जरुरी कदम नहीं उठा पाते। इसके बाद 18 फीसदी ने इसके लिए उपयुक्तता की कमी, 17 फीसदी ने उच्च कीमत और 14 फीसदी ने मदद की कमी को वजह माना था।

कैसे निपटा जाए इस समस्या से?

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में दक्षिण एशिया में मौसम में बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं। एकाएक मौसम का बदल जाना आम हो गया है। सूखा, बाढ़, अत्याधिक गर्मी और सर्दी जैसी आपदाओं की पुनरावृत्ति बढ़ी है। होमनेट के मुताबिक सर्वे में शामिल दो तिहाई लोग मानते हैं कि यह सब ईश्वर कर रहा है।

घरेलू कामगार महिलाएं जलवायु परिवर्तन की मार से बुरी तरह से प्रभावित हैं। जो उनके लिए एक बुरे सपने जैसा है। गरीबी, सामाजिक सुरक्षा से दूरी, जानकारी की कमी उन्हें इसके प्रति और संवेदनशील बना देती हैं, जो उनकी अनुकूलन क्षमता को भी कम कर देता है। इससे बचने के लिए अधिकांश को अपने घरों और रोजगार को छोड़ना पड़ता है। ऐसे में यह जरुरी है कि उन घरेलु महिला कामगारों की अनुकूलन क्षमता के निर्माण पर ध्यान देने के लिए विशेष ध्यान दिया जाए। इन बदलावों से कैसे बच सकते हैं इसके लिए उन्हें जागरूक करना भी जरुरी है।

जागरूकता की कमी

हम जानते हैं कि समय के साथ इस क्षेत्र में तापमान और बढ़ता जाएगा, साथ ही भारी बारिश वाले दिनों में भी इजाफा होने की पूरी सम्भावना है। ऐसे में यह जरुरी है कि इन्हें इसके लिए तैयार किया जाए। रिपोर्ट में भी इनके बचाव के लिए गर्मी रोधी निर्माण सामग्री और ऊर्जा दक्ष घरेलू उपकरणों के उपयोग के साथ ही पीने के साफ पानी तक पहुंच में सुधार की सिफारिश की गई है। साथ ही उनके घरों को अपग्रेड करने के लिए उन्हें सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय सहायता प्रदान करने की पेशकश को प्रस्तावित किया है, जिससे यह भी अपने और अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य के सपने को साकार कर पाएं।

रिपोर्ट की मानें तो ऐसी महिलाएं अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन का हिस्सा हैं, इसलिए जरूरी है कि बड़ी कंपनियां इन महिलाओं की मदद के लिए निवेश करें। इन महिलाओं को कौशल विकास और पर्यावरण परिवर्तन से लड़ने में सक्षम बनाने के लिए मदद की जरूरत है। इसमें सरकार एक अहम कड़ी है जो इन महिलाओं को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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