NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
एम. के. भद्रकुमार
28 Feb 2022
pop and putin
फाइल फोटो। वेटिकन में 10 जून, 2015 को पोप फ़्रांसिस के साथ मुलाक़ात के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

अगर वैश्विक राजनीति में पोप की हैसियत कभी चली गयी थी तो इस समय ऐसा लग रहा है कि उस हैसियत की वापसी हो गयी है। पोप फ़्रांसिस का शुक्रवार का रोम स्थित रूसी दूतावास का दौरे का यह संकेत निस्संदेह कई कारणों से एक उल्लेखनीय घटना है।

पोप फ़्रांसिस की एक 'उदारवादी पोप' के तौर पर चिरस्थायी प्रतिष्ठा रही है।उन्हें प्रगतिशील विचारों का श्रेय दिया जाता है। जिस पोप ने कभी पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ मिलने से इनकार कर दिया था,उसी पोप का कीव के बाहरी इलाक़े में पहली बार रूसी टैंकों की क़तार दिखायी देने की ख़बरें आने के कुछ ही घंटों के भीतर होने वाला यह दौरा हैरान करता है।

वेटिकन में राजनयिकों और जासूसों, 'विशेषज्ञ समूहों' और पत्रकारों की सदियों पुरानी 'विदेशी सेवा' रही है। ऐसा नहीं है कि पोप जो कुछ भी करते हैं, वह महज़ संयोग होता है। वहां भी भारी भरकम वेटिकन नौकरशाही है, जो कि पोप के लिए फ़ैसले लेती है। लेकिन, दिलचस्प बात यह है कि फ़्रांसिस की शुक्रवार को रूसी दूतावास का वह दौरा उनकी व्यस्तताओं के नियमित दैनिक कार्यक्रम की सूची में नहीं था।

यह दौरा अपनी तरह की ऐसी इकलौती घटना है, जो पहली ही नज़र में पोप से जुड़ा एक ऐसा प्रतीक बन जाता है, जिसकी हाल के दिनों में कोई मिसाल नहीं मिलती। सीएनएन ने बताया कि पोप रूसी राजदूत के साथ डेढ़ घंटे से ज़्यादा समय तक बात करते रहे।

फ़्रांसिस ने यूक्रेन में संघर्ष के शांतिपूर्ण ख़ात्मे का आह्वान किया है और कैथोलिकों से आग्रह किया है कि वे यूक्रेन में शांति को लेकर उपवास और प्रार्थना के लिए बुद्धवार के दिन को समर्पित कर दें।

यूक्रेन के घटनाक्रम की पृष्ठभूमि यह है कि 2014 में यूक्रेन में सीआईए प्रायोजित तख़्तापलट के बाद और कीव में नये शासन की तरफ़ से रूसी-विरोधी रुख़ अख़्तियार करने की शुरुआत के बाद रूढ़िवादी ईसाई धर्म में एक दरार आ गयी थी, क्योंकि यूक्रेन ने दिसंबर 2018 में यूक्रेनियन ऑर्थोडॉक्स चर्च नाम से अपने ख़ुद के रूढ़िवादी चर्च की स्थापना करते हुए ख़ुद को रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च से अलग और स्वायत्त कर लिया था।

यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको का वह कथन बहुत मशहूर है,जिसमें उस औपचारिक विभाजन को चिह्नित करने के लिए कीव स्थित सेंट माइकल कैथेड्रल के सुनहरे गुंबदों के नीचे इकट्ठे हुए जश्न मानते आस्थावानों के जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि उनका देश अब 'मास्को के प्याले से मास्को का ज़हर नहीं पीयेगा'।

2018 के आख़िर और 2019 की शुरुआत तक, जब यूक्रेन में रूढ़िवादी ईसाइयों ने रूस की ऑर्थॉडॉक्स पैट्रियार्क से स्वतंत्रता, या बाहरी और ख़ास तौर पर पितृसत्तात्मक अधिकार से आज़ादी का ऐलान कर दिया था,तब आम तौर पर रूसी मूल के लोग सदमे और तबाही जैसी दो एहसास के बीच बीच फंसकर रह गये थे।

कॉन्स्टेंटिनोपल का ऑर्थोडॉक्स चर्च तुरंत हर हाल में यूक्रेनी रूढ़िवादी चर्च की इस स्वतंत्रता को मान्यता देने के लिहाज़ से हरक़त में आ गया था, जबकि रूसी ऑर्थोडॉक्स नेताओं ने इस ख़ारिज कर कर दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि इस समय यूक्रेन में दो विरोधी ऑर्थोडॉक्स गुट हैं।

ऑर्थोडॉक्स चर्च इस फूट के भंवर में है कि फ़्रांसिस ने इस मामले में दखल दिया है। कोई शक नहीं कि वह इसे लेकर गहरे तौर पर सचेत रहे होंगे। वास्तव में ऐसी सोच है कि रूस और यूक्रेन के बीच राजनीतिक दरार धार्मिक क्षेत्र तक भी फैली हुई है या फिर धार्मिक दरार राजनीतिक क्षेत्र तक फैला हुई है।यह देखते हुए कि राष्ट्रपति पुतिन ख़ुद ही एक कट्टर रूढ़िवादी ईसाई हैं और निजी तौर पर मॉस्को के पैट्रियार्क किरिल के क़रीबी हैं,ऐसे में यह सोच इस बात पर निर्भर करती है कि कोई इसे किस तरह देखता है।   

यूक्रेन में कैथोलिकों की आबादी तक़रीबन 4-5 मिलियन है, जो कुल आबादी का लगभग 9% है। यूक्रेनी कैथोलिक धर्म पर लैटिन संस्कार वाले कैथोलिकों के मुक़ाबले ग्रीक कैथोलिकों का असर ज़्यादा है। यूक्रेनी कैथोलिक चर्च पूर्वी संस्कार वाला एक ऐसा कैथोलिक चर्च है, जो अपने प्रमुख के तौर पर पोप को मान्यता तो देता है, लेकिन उनकी प्रार्थना पद्धति बीजान्टिन वाली है।

फ़्रांसिस को रिश्तों, निजी भेंट-मुलाक़ातों और विश्वव्यापी प्रतीकों के ज़रिये दुनिया के इसाइयों और चर्चों के बीच की एकजुटता को प्रोत्साहित करने के लिए जाना जाता है। असल में 1054 में इसाइयों के बीच ब़ड़ा फूट पड़ गया था और इसका नतीजा यह हुआ था कि कैथोलिक चर्च और ऑर्थोडॉक्स चर्च बतौर समुदाय अलग-अलग हो गये थे। उस घटना के लम्बे समय वाद फ़्रांसिस ही वह पोप हैं, जिन्होंने पहली बार पैट्रियार्क ऑफ़ द रशियन चर्च (ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्चों में सबसे बड़े चर्च) के मुखिया से मुलाक़ात की थी। वह फ़रवरी 2016 में क्यूबा के हवाना के पास स्थित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के एक वीआईपी कमरे में एक पूर्व निश्चित बैठक में पैट्रिआर्क किरिल से मिले थे। (इस मौक़े पर भाग लेने वाले क्यूबा के जाने माने लोगों में राष्ट्रपति राउल कास्त्रो भी शामिल थे।) दो घंटे की उस निजी मुलाक़ात के बाद उन्होंने कई मामलों पर उस संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये थे, जो ईसाई चर्च की एकजुटता और 'ईसाई धर्म में आस्था रखने वाले बिरादरियों' के रूप में उनकी अनूठी भूमिका पर केंद्रित था।'

विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति पुतिन ने विश्व मंच पर रूस के प्रभाव और पैट्रिआर्क किरिल के साथ अपने 'राजनीतिक सम्बन्ध' पर ज़ोर दिया था,इसके देखते हुए पैट्रिआर्क किरिल के साथ फ़्रांसिस की उस मुलाक़ात का एक भू-राजनीतिक आयाम भी था। इसे कुछ और समझने की ज़रूरत है।

यह सबको मालूम है कि पैट्रिआर्क किरिल की नीतियों ने पिछले दो दशकों में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च को रूसी सरकार के क़रीब ला दिया है। 2012 में रूस के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने खुले तौर पर पुतिन का समर्थन किया था, उन्होंने पुतिन के राष्ट्रपति होने के कार्यकाल की तुलना 'किसी ईश्वरीय चमत्कार' से की थी।

अब यह कोई रहस्य वाली बात तो रह नहीं गयी है कि मॉस्को पैट्रिआर्केट ने रूसी अंतर्राष्ट्रीय नीति के एक हथियार के रूप में काम किया है और यह क्रेमलिन के राजनीतिक हितों के लिहाज़ से उसके पक्ष को दुनिया भर में एक असरदार तरीक़े से पहुंचाने का ज़रिया रहा है।

असल में ख़ुद को मुखर करने के लिए उत्सुक रूस की ओर से फ़्रांसिस के ख़ुद के इस्तेमाल किये जाने की अनुमति देने के सिलसिले में फ़्रांसिस की आलोचना भी हुई थी। लेकिन, फ़्रांसिस ने अपनी इस आलोचना का जवाब तैयार कर लिया था। जब उनसे रूस और चीन की यात्रा करने वाले पहले पोप होने की संभावना को लेकर सवाल किया गया था, तो फ़्रांसिस ने एक बार अपने दिल की ओर इशारा करते हुए कहा था, 'चीन और रूस, मेरे पास यहां हैं। प्रार्थना करें।'

पुतिन तीन बार फ़्रांसिस से मिल चुके हैं। अगर पहले कभी ऐसा हुआ हो,तो अलग बात है,लेकिन किसी विश्व स्तर के राजनेता के लिए पोप के साथ मुलाक़ातों की यह तिकड़ी बेहद दुर्लभ संयोग है। वे दोनों राजनीति पर चर्चा करने के लिए जाने जाते हैं।

कहा जाता है कि कैथोलिक चर्च के किसी भी नेता ने अभी तक रूसी ऑर्थॉडॉक्सी क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया है,जबकि रूसी ऑर्थॉडॉक्सी क्षेत्र पोप की यात्रा का एक प्रतिष्ठित गंतव्य बना हुआ है। फ़्रांसिस को रूस में एक बड़ा सम्मान हासिल है, और कुछ हद तक किरिल को अर्जेंटीना के पोप की लोकप्रियता से भी जलन हो सकती है।

पुतिन की फ़्रांसिस के साथ वेटिकन में हुई दूसरी मुलाक़ात 50 मिनट तक चली थी (जहां तक पोप के साथ मुलाक़ात की समयावधि की बात है,तो यह पर्याप्त रूप से लम्बी समयावधि वाली मुलाक़ात थी) । यह मुलाक़ात क्रीमिया के रूस वापसी के महीनों के भीतर जून 2015 में हुई थी। वेटिकन ने उस समय कहा था कि फ़्रांसिस ने यूक्रेन में 'शांति के लिए गंभीर और व्यापक प्रयासों' की मांग की है और इस जोड़ी ने इस बात पर सहमति जतायी थी कि 'बातचीत का माहौल' बहाल करना होगा और 'सभी पक्षों' को मिन्स्क समझौतों का पालन करना होगा।

ग़ौरतलब है कि शुक्रवार को हुई बैठक में फ़्रांसिस ने क्रेमलिन को यूक्रेन के घटनाक्रम के सिलसिले में भी कुछ संदेश दिये हैं। रूसी दूतावास में चली उस लम्बी बैठक के मूल में भी यही संदेश था। दरअसल, ऐसा तब हुआ, जब कीव के बाहरी इलाक़े में रूसी टैंकों की पहली क़तार को देखा गया।

हालांकि,फ़्रांसिस कभी भी रूस के राजदूत को अपने पास बुला सकते थे और इस तरह का चलन रहा भी है,लेकिन भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस के दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह निजी दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।  

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Pope, Putin and Ukraine in Crisis

Pope
Putin
Russia
ukraine
Ukraine crisis

Related Stories

बाइडेन ने यूक्रेन पर अपने नैरेटिव में किया बदलाव

डेनमार्क: प्रगतिशील ताकतों का आगामी यूरोपीय संघ के सैन्य गठबंधन से बाहर बने रहने पर जनमत संग्रह में ‘न’ के पक्ष में वोट का आह्वान

रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने के समझौते पर पहुंचा यूरोपीय संघ

यूक्रेन: यूरोप द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाना इसलिए आसान नहीं है! 

पश्चिम बैन हटाए तो रूस वैश्विक खाद्य संकट कम करने में मदद करेगा: पुतिन

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

90 दिनों के युद्ध के बाद का क्या हैं यूक्रेन के हालात

यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई खाद्य असुरक्षा से बढ़ रही वार्ता की ज़रूरत

खाड़ी में पुरानी रणनीतियों की ओर लौट रहा बाइडन प्रशासन


बाकी खबरें

  • brooklyn
    एपी
    ब्रुकलिन में हुई गोलीबारी से जुड़ी वैन मिली : सूत्र
    13 Apr 2022
    गौरतलब है कि गैस मास्क पहने एक बंदूकधारी ने मंगलवार को ब्रुकलिन में एक सबवे ट्रेन में धुआं छोड़ने के बाद कम से कम 10 लोगों को गोली मार दी थी। पुलिस हमलावर और किराये की एक वैन की तलाश में शहर का चप्पा…
  • non veg
    अजय कुमार
    क्या सच में हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ है मांसाहार?
    13 Apr 2022
    इतिहास कहता है कि इंसानों के भोजन की शुरुआत मांसाहार से हुई। किसी भी दौर का कोई भी ऐसा होमो सेपियंस नही है, जिसने बिना मांस के खुद को जीवित रखा हो। जब इंसानों ने अनाज, सब्जी और फलों को अपने खाने में…
  • चमन लाल
    'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला
    13 Apr 2022
    कई कलाकृतियों में भगत सिंह को एक घिसे-पिटे रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन, एक नयी पेंटिंग इस मशहूर क्रांतिकारी के कई दुर्लभ पहलुओं पर अनूठी रोशनी डालती है।
  • एम.के. भद्रकुमार
    रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं
    13 Apr 2022
    यह दोष रेखाएं, कज़ाकिस्तान से म्यांमार तक, सोलोमन द्वीप से कुरील द्वीप समूह तक, उत्तर कोरिया से कंबोडिया तक, चीन से भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान तक नज़र आ रही हैं।
  • ज़ाहिद खान
    बलराज साहनी: 'एक अपरिभाषित किस्म के कम्युनिस्ट'
    13 Apr 2022
    ‘‘अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है, जो ‘जन कलाकार’ का ख़िताब का हक़दार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License