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मज़दूर-किसान
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किसान आंदोलन से झांकते प्रेमचंद
जयंती पर विशेष: समाज में जब तक अन्याय, अत्याचार, शोषण, अंधविश्वास, छूआछूत और भेदभाव जारी रहेगा। देश के किसान आत्महत्या और आन्दोलन करते रहेंगे तब तक कहीं न कहीं प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे।
राज वाल्मीकि
31 Jul 2021
किसान आंदोलन से झांकते प्रेमचंद
फ़ोटो साभार: Forward Press

पिछले आठ महीनों से किसान देश की राजधानी और इसके  आसपास डटे हुए हैं। प्रेमचंद ने अपनी अमरकृति “गोदान” (उपन्यास) में किसानों का यथार्थ परक चित्रण किया है। आज का किसान निश्चित तौर पर गोदान के ‘होरी’  से बहुत आगे बढ़ा हुआ है। वह राजनीतिक उठा-पठक को समझते हुए कदम बढ़ा रहा है। लेकिन प्रेमचंद का होरी हो या आज का किसान दोनों के मर्म में कृषि संकट है।

आज भी हमारे किसान उनका शोषण करने वाले तीन-तीन काले कानूनों के वापस लेने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। किसान संसद चला रहे हैं। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष रूपी झंडा फहरा रहे हैं। जब तक समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता, अभाव, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट सेक्टर द्वारा मजदूर-किसानों का शोषण, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे कायम रहेंगे। प्रेमचंद के साहित्य का परचम भी फहराता रहेगा। प्रेमचंद की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

विद्यार्थी जीवन से ही प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक रहे हैं। सच कहूं तो उनकी रचनाओं को पढ़ कर ही मैंने गद्य लिखना सीखा। उन दिनों उनकी “ईदगाह”, “पञ्च परमेश्वर”, “बूढ़ी काकी”, “पूस की रात” और “कफ़न” जैसी कहानियों ने बहुत प्रभावित किया। उनकी “कफ़न” कहानी से प्रभावित होकर मैंने नौवीं कक्षा में अपनी पहली कहानी “कालिया” लिखी। यह कहानी अब उपलब्ध नहीं है। दरअसल ‘कफ़न’ कहानी के घीसू की तरह मेरे गांव-मोहल्ले में एक व्यक्ति थे जो रिश्ते में मेरे चाचा लगते थे। वे भी खेतों से आलू एवं अन्य खाद्य सामग्री चुराया करते थे। उन्हीं को मुख्य पात्र बनाकर मैंने वह कहानी गढ़ी थी। बाद में मेरे पिता जी ने घर की रद्दी बेची तो वह कहानी भी रद्दी में चली गई। चौदह-पंद्रह वर्ष की उम्र में लिखी उस कहानी के खोने का बहुत दुःख हुआ। पर अब लगता है कि कमसिन उम्र में लिखी वह कहानी शायद रद्दी के लायक ही हो!

बाद में जब दलित साहित्य का अध्ययन किया तो पता चला कि दलित साहित्यकारों ने “कफ़न”  कहानी का बहुत विरोध किया था। वह एक विवादित कहानी हो गई थी।

दलित साहित्यकारों को आपत्ति इस बात पर थी कि प्रेमचंद ने दलितों (चमारों ) का उस कहानी में मजाक उड़ाया है। घीसू और माधव को अमानवीय रूप में पेश किया है। क्योंकि माधव की पत्नी बुधिया के मरने पर उसके कफ़न के लिए उगाहे गए पैसे की वे शराब पी जाते हैं। दलित बुद्धिजीवी और साहित्यकार डॉक्टर धर्मवीर तो यहाँ तक कहते हैं कि बुधिया के पेट में जमींदार का बच्चा था। वे इसे  जारकर्म की कहानी बताते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने प्रेमचंद पर दो किताबें भी लिखीं – सामंत का मुंशी और प्रेमचंद की नीली आँखें।

प्रेमचंद की कहानी “ठाकुर का कुआं” दलित कहानी है। मुझे लगता है कि प्रेमचंद ने उस समय की यथास्तिथि का चित्रण अपनी कहानियों में किया है। यही कारण है कि उन कहानियों के पात्र विद्रोह नहीं करते। पर अपना स्वाभिमान भी नहीं खोते। दलित और गरीब होने पर भी समझौता नहीं करते। फिर चाहे “ठाकुर का कुआं”  की गंगी हो या “घासवाली”  की मुलिया।

इसी तरह कॉलेज के पढ़ाई के दौरान प्रेमचंद के उपन्यास “कर्मभूमि”, “रंगभूमि” और “गोदान” भी पढ़े थे। ये उस समय हमारे सिलेबस में हुआ करते थे। प्रेमचंद जी के अलावा उस समय भीष्म सहानी का “तमस” और राजेंद्र यादव का “सारा आकाश”  उपन्यास भी हमारे बी.ए. के पाठ्यक्रम का हिस्सा थे।

“रंगभूमि” का दलित सूरदास मुझे जागरूक पात्र लगता है। “गोदान” के होरी, गोबर, धनिया में भी हमें दलित पात्रों के दर्शन होते हैं। पर वे व्यवस्था से विद्रोह नहीं करते। यथास्तिथि से टकराते नहीं हैं। मन में प्रश्न यह भी उठता है कि जिस कालखंड में प्रेमचंद ने लेखन किया है उस समय दलितों से व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की उम्मीद करना कितना न्यायोचित होगा?

मैं तो इसे सकारात्मक रूप में लेता हूँ कि उस समय के लेखन में प्रेमचंद जी जाति से कायस्थ होते हुए भी दलित और बहुजन पात्रों का सृजन करते हैं उन्हें अपनी रचनाओं में स्पेस देते हैं।

सर्वविदित है कि प्रेमचंद गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे अम्बेडकरी विचारधारा से नहीं। यही कारण है कि उनके पात्र अपने हक़-अधिकारों के लिए विद्रोह नहीं करते।

वैसे तो प्रेमचंद जी के बारे में सब जानते हैं। पर उनके बारे में दो-एक प्रमुख बात को यहाँ दोहरा देना उचित होगा।

मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) ई. का मूलनाम धनपत राय था। वे ’उर्दू’ में ’नवाबराय’ के नाम से लिखते थे। धनपत राय को ’प्रेमचंद’ नाम उर्दू के लेखक दयानारायण निगम ने दिया था।

प्रेमचंद को ’कथा सम्राट’ की संज्ञा बांग्ला कथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने दी थी।

प्रेमचंद का प्रथम प्रौढ़ उपन्यास सेवासदन (1918) है। इस उपन्यास में सामाजिक अत्याचार से पीड़ित नारी समाज और वेश्यावृत्ति की समस्या को आधार बनाया गया है।

उनका आखिरी उपन्यास गोदान (1936) है जो कि यथार्थोन्मुख है।

उन्होंने कुल 300 कहानियां और लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास लिखे। “मंगलसूत्र” उनका अपूर्ण उपन्यास है।

सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि सबसे पहले अधिकांश दलित साहित्यकारों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में दलित-बहुजन पात्रों के दर्शन किए। अनेक दलित साहित्यकारों को लिखने की प्रेरणा भी प्रेमचंद के लेखन से मिली। ये बात अलग है कि बाद में कई दलित साहित्यकार प्रेमचंद के आलोचक भी बने।

प्रेमचंद की “कफ़न”  कहानी के साथ ओमप्रकश वाल्मीकि की कहानी “शवयात्रा” का जिक्र करना उचित होगा। क्योंकि कुछ दलित साहित्यकारों का मानना है कि जिस तरह “कफ़न” कहानी में प्रेमचंद ने चमार समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की उसी तरह का प्रयास “शवयात्रा”  में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किया है। हालांकि ये बहस का विषय है। पहले भी इस पर वाद-विवाद-संवाद हो चुका है। साहित्य में वाद-विवाद और संवाद की जगह बनी रहनी चाहिए ताकि समाज में लोकतंत्र जिन्दा रह सके।

अगर हम प्रेमचंद के साहित्य का गहन अध्ययन करें तो उनके लेखन में उनकी कहानियों और उपन्यासों में दलित और बहुजन पात्रों की झलक मिलती है। क्योंकि प्रेमचंद आम जनता के लेखक थे। उनकी रचनाओं में हमें प्रमुख रूप से आमजन के दर्शन होते हैं। जाति व्यवस्था मिलती है। अन्याय और शोषण का चित्रण मिलता है।

कुछ लोग उन्हें भारतीय गांवों को समझने के लिए पढ़ना ज़रूरी बताते हैं। प्रेमचंद मानव पारखी और ग्रामीण समाज का सजीव चित्रण करने में माहिर थे। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उनके किरदार जीवंत होकर उभरते हैं।

प्रेमचंद जी के बारे में अपूर्वानंद अपने एक लेख में कहते हैं- आज समाज के हर तबके के अपने लेखक हैं। मानो लेखक न हुआ समूह विशेष का प्रवक्ता हुआ! लेकिन लेखक, वह भी कथाकार तो वही है जो अपनी निगाह का प्रसार निरंतर विस्तृत करता रहे और हरेक जन के मन में गहरे और गहरे उतरने का कौशल और साहस भी हो उसमें!

असल चुनौती है अपने घेरे से निकलना, दूसरों से आशंकित होकर नहीं, उत्सुक होकर मिलने की तत्परता। यह मानना जो अज्ञेय ने लिखा कि जन्म के कारण जाति, धर्म, वर्ग विशेष से रिश्ते को, जो नितांत संयोग है व्यक्ति की पहचान की शुरुआत और अंत नहीं माना जा सकता। बल्कि उनका अतिक्रमण करने की क्षमता ही हमें मानवीय बनाती है। प्रेमचंद के साहित्य में इस इंसानियत का भरोसा है।

लेखक में ‘परकाया प्रवेश’ का गुण तो होता ही है तभी वह अनेक प्रकार के अनेक चरित्रों के पात्रों का सृजन कर पाता है। पर दलित साहित्य में एक और विवाद का विषय है भोगा हुआ यथार्थ और देखा हुआ यथार्थ यानी बहस स्वानुभूति और सहानुभूति की है। इस पर पहले ही बहुत बहस हो चुकी है। पर कोई साहित्यकार समानुभूति महसूस करते हुए उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करता है तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। 

सवाल अपने-अपने नजरिये का भी है। गिलास यदि आधा पानी से भरा हो तो कुछ लोग इसे आधा भरा कहेंगे तो कुछ आधा खाली। फिलहाल प्रेमचंद का “हंस” हर 31 जुलाई को उनके जन्मदिन पर उनका स्मरण करवाता ही है। मेरे जैसे अनेक लेखक होंगे जिन्होंने प्रेमचंद को पढ़-पढ़ कर लिखना सीखा होगा। उन्हें उपन्यास सम्राट और कथा सम्राट ऐसे ही नहीं कहा गया है। उनकी किस्सागोई के अनेक लेखक और पाठक कायल हैं।

समाज में जब तक अन्याय, अत्याचार, शोषण, अंधविश्वास, छूआछूत और भेदभाव जारी रहेगा। देश के किसान आत्महत्या और आन्दोलन करते रहेंगे तब तक कहीं न कहीं प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे। स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाते रहेंगे। उत्तर प्रदेश के बनारस के निकट लमही गांव में 31 जुलाई 1880 में जन्मे प्रेमचंद किसी अन्य ग्रह के प्राणी नहीं थे। इसलिए उनमे जातिवादी भावना  का होना और मानवीय गुण तथा कमजोरियां होना भी स्वाभाविक ही है। इसलिए उनकी प्रशंसा भी होगी और आलोचना भी। पर प्रेमचंद चर्चा में बने रहेंगे। आज राजधानी और राजधानी की सरहद पर बैठे अन्नदाताओं को देख कर आज के पाठकों और लेखकों को प्रेमचंद याद नहीं आते। प्रेमचंद को मानने वाले लेखकों को क्या किसान आंदोलन पर अपनी कलम नहीं चलानी चाहिए?

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Premchand
Munshi Premchand
farmers protest
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Premchand Jayanti

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